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ग़ज़लगंगा.dg: रास्ते में कहीं उतर जाऊं?

Written By devendra gautam on रविवार, 20 मई 2012 | 7:20 am

रास्ते में कहीं उतर जाऊं?
 घर से निकला तो हूं, किधर जाऊं?

पेड़ की छांव में ठहर जाऊं?
धूप ढल जाये तो मैं घर जाऊं?

हर हकीकत बयान कर जाऊं?
सबकी नज़रों से मैं उतर जाऊं?

जो मेरा  जिस्मो-जान था इक दिन
उसके साये से आज डर जाऊं?

जाने वो मुझसे क्या सवाल करे
हर खबर से मैं बाखबर जाऊं.

जिसने  रुसवा किया कभी मुझको
फिर उसी दर पे लौटकर जाऊं?

क्या पता वो दिखाई दे जाये
दो घडी के लिए ठहर जाऊं.

वो भी फूलों की राह पर निकले
मैं भी खुशबू से तर-ब -तर जाऊं.

अपना चेहरा बिगाड़ रक्खा है
उसने चाहा था मैं संवर जाऊं.

मैंने आवारगी बहुत कर ली
सोचता हूं कि अब सुधर जाऊं.

----देवेंद्र गौतम


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सम्मान तो मिलेगा केवल 5 ब्लॉगर्स को अपमान आएगा बाक़ी सबके हिस्से में

Written By DR. ANWER JAMAL on सोमवार, 14 मई 2012 | 8:10 pm

हिंदी ब्लॉगिंग को एक दशक पूरा नहीं हुआ और दशक का ब्लॉगर और ब्लॉग चुना जा रहा है।
यह एक नायाब आयडिया है। इसका नतीजा वही होगा कि सम्मान तो मिलेगा केवल 5 ब्लॉगर्स को अपमान आएगा बाक़ी सबके हिस्से में। न चुने जाने का दंश मालूम नहीं किसके संवेदनशील दिल को कितना ज़्यादा दुखा दे।
गटबाज़ी और रंजिश की वजह से पहले ही बहुत से हिंदी ब्लॉगर्स रूख़सत हो चुके हैं लेकिन हिंदी ब्लॉगिंग के ताबूत में कीलें लगातार ठोंकी जा रही हैं।

दशक का ब्लॉगर, एक और गड़बड़झाला

काला धन न सफ़ेद हुआ बाबा के बाल सफ़ेद !

Written By shikha kaushik on शुक्रवार, 11 मई 2012 | 5:22 pm



[ अमर  उजाला  दैनिक 11 मई  2012 पेज  11 ]
  काला  धन  न  सफ़ेद हुआ  बाबा  के  बाल सफ़ेद  !


राजनीति की कोठरी   में  छिपे हुए हैं भेद ,
ऐसी छलनी में क्या छने जिसके हो छोटे  छेद ,
काले  धन को लेकर बाबा को है बड़ा खेद  ;
इस चक्कर  में हो  गए  उनके  बाल  सफ़ेद  .

                              शिखा  कौशिक 

ग़ज़लगंगा.dg: जाने किस-किस की आस होता है

Written By devendra gautam on रविवार, 6 मई 2012 | 1:10 pm

जाने किस-किस की आस होता है.
जिसका चेहरा उदास होता है.

उसकी उरियानगी पे मत जाओ
अपना-अपना लिबास होता है.

एक पत्ते के टूट जाने पर
पेड़ कितना उदास होता है.

अपनी तारीफ़ जो नहीं करता
कुछ न कुछ उसमें खास होता है.

खुश्क होठों के सामने अक्सर
एक खाली गिलास होता है.

हम खुलेआम कह नहीं सकते
बंद कमरे में रास होता है.

वो कभी सामने नहीं आता
हर घडी आसपास होता है.

----देवेंद्र गौतम


'via Blog this'

Written By प्रदीप नील वसिष्ठ on बुधवार, 2 मई 2012 | 10:53 am


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Founder

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Saleem Khan