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Life is Just a Life: राहों के पत्थर Rahon ke Patthar

Written By Neeraj Dwivedi on शनिवार, 30 जून 2012 | 3:48 pm

Life is Just a Life: राहों के पत्थर Rahon ke Patthar: बूँद बना जीवन चंचल है , कैद सीप में मोती तन्हा। बस बादल जीवित होता है, सीप भला जिंदा होती है ? जिसका स्वप्न न हो उड़ने का, जिसको ...

कितने अच्छे लोग हमारे

Written By surendra kumar shukla BHRAMAR on शुक्रवार, 29 जून 2012 | 12:04 am




कितने अच्छे लोग हमारे
—————————-
JB971949
कितने अच्छे लोग हमारे
भूखे-प्यासे -नंगे घूमें
लिए कटोरा फिरें रात-दिन
जीर्ण -शीर्ण – सपने पा जाएँ
जूठन पा भी खुश हो जाते
जीर्ण वसन से झांक -झांक कर
कोई कुमुदिनी गदरायी सी
यौवन की मदिरा छलकी सी
उन्हें कभी खुश जो कर देती
पा जाती है कुछ कौड़ी तो
शिशु जनती-पालन भी करती
(photo from google/net with thanks)



‘प्रस्तर’ करती काल – क्रूर से
लड़-भिड़ कल ‘संसार’ रचेंगे
समता होगी ममता होगी
भूख – नहीं- व्याकुलता होगी
लेकिन ‘प्रस्तर’ काल बने ये
बड़े नुकीले छाती गड़ते
आँखों में रोड़े सा चुभ – चुभ
निशि -दिन बड़ा रुलाया करते
दूर हुए महलों में बस कर
भूल गए – माँ – का बलि होना
रोना-भूखा सोना – सारा बना खिलौना
कितने अच्छे लोग हमारे
नहीं टूट पड़ते ‘महलों’ में
ये ‘दधीचि’ की हड्डी से हैं
इनकी ‘काट’ नहीं है कोई
जो ‘टिड्डी’ से टूट पड़ें तो
नहीं ‘सुरक्षित’ – बचे न कोई
नमन तुम्हे है हे ! ‘कंकालों’
पुआ – मलाई वे खाते हैं
‘जूठन’ कब तक तुम खाओगे ??
कितनी ‘व्यथा’ भरे जाओगे ??
फट जाएगी ‘छाती’ तेरी
‘दावानल’ कल फूट पड़ेगा
अभी जला लो – झुलसा लो कुछ
काहे सब कल राख करोगे ?
अश्रु गिरा कुछ अभी मना लो
प्रलय बने कल ‘काल’ बनोगे ??
——————————————-
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर ‘५
४-४.४५ मध्याह्न
३१.५.२०१२ कुल्लू यच पी






दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं



DE AISA AASHISH MUJHE MAA AANKHON KA TARA BAN JAOON

Life is Just a Life: तुम बिन Tum Bin

Written By Neeraj Dwivedi on मंगलवार, 26 जून 2012 | 1:21 pm

Life is Just a Life: तुम बिन Tum Bin: तुम बिन  आँसू  पानी से हैं , अखियाँ हैं  अब सूखा पोखर, तुम बिन राहें बड़ी कठिन हैं, कैसे जीतूँ  तुम  बिन होकर । तुम बिन नींद न ...

भाजपा को आज एक राहुल गाँधी चाहिए

Written By shikha kaushik on सोमवार, 25 जून 2012 | 5:04 pm


shri rahul gandhi 




  



घुट  रही  है   भाजपा ;परिवर्तन  आंधी  चाहिए ,
भाजपा को   आज   एक   राहुल   गाँधी   चाहिए .

पद  का  मोह  जिसको  न  हो संगठन  पर ध्यान दे  ;
मखमली  नेता  नहीं  मोटी   खादी  चाहिए .

चुक गए  नेता हैं जो संन्यास लेने  को  कहो    ;
उनको  लोभ- मोह  छोड़  लेनी  समाधि चाहिए .

तर्क की  अब  धार  भाजपा में  न  रही  ;
बात  पूरी  न  सही  आधी  तो  होनी चाहिए .

सबल  विपक्ष लोकतंत्र का  रहा  प्रहरी  सदा  ;
भाजपा की  दूर होनी  हर  व्याधि  चाहिए .

       शिखा  कौशिक

Life is Just a Life: लाचार आसमान

Written By Neeraj Dwivedi on शनिवार, 23 जून 2012 | 9:42 am

Life is Just a Life: लाचार आसमान: बेहतर है आसमां का दर्द भी कोई समझे , बादलों की आवारगी कब तक सहेगा वो ? कब तक नंगी आँखों से देखता रहेगा , मरती हुई प्यास ...

आखिर क्यूँ ??

Written By Pallavi saxena on शुक्रवार, 22 जून 2012 | 3:26 pm



यूं तो माँ की ममता का कोई पर्याय नहीं है। माँ अपने आप में इतनी महान होती है, कि उसके लिए जो भी कहा जाये जो भी लिखा जाये वो हमेशा ही कम होगा। लेकिन फिर भी, उन्हीं बातों में से कुछ बातों को आज मैं दौहराना चाहूंगी।
   
एक माँ जिसे अपने बच्चे की ज़िंदगी की पहली पाठ शाला कहा जाता है। 
एक माँ जो अपने बच्चे को हर चीज़ सिखाती है। 
एक माँ जो उसे ज्ञान का पहला अक्षर सिखाती है" 


फिर भाषा चाहे कोई भी हो, शुरुवात माँ की गोद में बैठकर खेल ही खेल में किताबों में रंगीन चित्र को देखते हुए ही बच्चा पहचान ना सीखता है की से अनार या A से Apple होता है और दो चार बार अपने बच्चे की तोतली मधुर बोली में माँ इन अक्षरों को सुन खुद फुली नहीं समाती है क्यूँ ? क्यूंकि वो अपने बच्चे को हर क्षेत्र में कुशल बनाना चाहिती है। दुनिया के कदम ताल से कदम मिलाकर कैसे चला जाता है यह सिखाना चाहती है। लेकिन जब बच्चा माँ के आँचल से निकल कर खुद अपने परों पर खड़ा हो जाता है और बहार की दुनिया से अपने आस-पास के वातावरण से प्रभावित होकर दूसरों की देखा देखी जब वही बच्चा अपनी ही माँ की हंसी उड़ाने लगता है, तो कैसा लगता हो उस माँ को जिसने उसे उंगली पड़कर चलाने से लेकर सब कुछ सिखाया और उसके बावाजूद भी जब उसका बच्चा उसे यह कहे कि अरे माँ तुम तो इतनी पढ़ी लिखी हो, फिर भी तुम्हें आज इतना भी नहीं मालूम कि अँग्रेजी में वाक्य कैसे बनाते है। अँग्रेजी में बोलते कैसे है। हाँ कैसे पता होगा तुमको, सारा दिन घर में जो रहती हो। तुम्हें तो बाहर की दुनिया के बारे में कुछ पता ही नहीं है। मेरे दोस्तों की माओं को देखो सब नौकरी करती हैं। उनको सब पता है, बस एक तुम ही हो जो घर में रहती हो। 


तुमको भी नौकरी करनी चाहिए आखिर घर में रहकर तुम करती ही क्या हो सिवाए खाना बनाने और घर की  साफ सफाई के आलवा तुमको तो कुछ नहीं आता। यहाँ तक कि तुम्हें तो ढंग से इंगिल्श बोलना भी नहीं आता। घर से बाहर निकलो माँ, देखो दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच रही है। मेरे दोस्तों की माओं से कुछ तो सीखो और कुछ नहीं कर सकती। तो कम से अपना रहन सहन ही बदल लो यह पुराने जामने के हिदुस्तानी कपड़े पहन कर मत आया करो मुझे लेने स्कूल, आना है तो औरों कि तरह जीन्स में आया करो और हिन्दी मत बोला करो ज्यादा, मेरे दोस्तों को लगता है, कि तुम्हें इंगिल्श बोलना नहीं आता। इसलिए बोला करो मगर कम ताकि मेरे दोस्तों को यह पता चल सके की तुमको इंगलिश बोलना आता तो है। मगर कम इसलिए ताकि उन्हे यह न पता चले की तुम्हें सही इंगलिश बोलना नही आता। मगर यहाँ बात माँ के पढे लिखे होने या अनपढ़ होने की नहीं बल्कि उसकी भावनाओं की है 
  
कभी सोचा है क्या गुजरती होगी उस माँ के दिल पर जो अपने ही स्कूल जाने वाले बच्चे के द्वारा इस कदर लगभग रोज़ ही अपमानित होती है। पढ़ी लिखी होते हुए भी उसे जाने अंजाने उसका बच्चा यह एहसास करता रहता है, कि तुम एक गृहणी हो और तुमको अँग्रेजी कम आती है तो तुम जाहिल और गंवार से कम नहीं हो।क्यूँ आज के आधुनिक युग में भी एक बच्चे के लिए उसके पिता एक सुपर हीरो से कम नहीं और एक माँ जो शायद  उसके पिता से ज्यादा न सही, मगर कम भी नहीं है, लेकिन महज़ सदा लिबास और सदा व्यवहार होने कि वजह से वही उसका अपना बच्चा, उसका अपना खून उसे सिवाए एक केयर टेकर से ज्यादा कुछ भी नहीं समझता। आखिर क्यूँ और कब तक.....खुद को यूं ही दूसरों के सामने साबित करते रहना पड़ेगा एक औरत को बचपन में आपने माता-पिता के आगे खुद को उनकी अपेक्षा के स्तर पर जाकर खुद को साबित कर के दिखाओ, शादी के बाद ससुराल में एक अच्छी बहू और एक अच्छी पत्नी के रूप में खुद को साबित करो, और जब बच्चे हो जाएँ तो उनकी नज़रों में भी खुद को एक अच्छी माँ साबित करो क्यूँ???? क्या एक औरत की ज़िंदगी में सिवाय खुद को साबित करके दिखाते रहने के आलवा और कुछ नहीं है??? क्या उसकी अपनी मर्ज़ी के कोई मायने नहीं है ??क्या उसे अपनी ज़िंदगी अपनी मर्ज़ी से गुज़ारें का भी कोई हक़ नहीं ??? आखिर क्यूँ ?       

मेरा ‘मन’ बड़ा पापी -नहीं-मन-मोहना


मेरा मन बड़ा पापी -नहीं-मन-मोहना 
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मन बड़ा निर्मल है
न अवसाद न विषाद
ना ज्ञान   ना विज्ञान
न अर्थ ना अर्थ शास्त्र
चंचल मन बाल हठ  सा
बड़ा गतिशील है..
गुडिया खिलौने देख
रम जाता है ! कभी -
राग क्रोध से ऊपर …
न जाने मन क्या है ?
लगता है कई मन हैं ?
एक कहता है ये करो
दूजा "वो" करो
भ्रम फैलाता  है मन
मुट्ठी बांधे आये हैं
खाली हाथ जाना है
किसकी खातिर फिर प्यारे
लूट मारकर उसे सता कर
गाड़ रहे --वो खजाना हैं
प्रश्न बड़ा करता है मन  !
माया मोह के भंवर उलझ मन
चक्कर काटते फंस जाता है
निकल नहीं पाता ये मन
कौन उबारे ? भव-सागर है
कोई "ऊँगली" उठी तो
हैरान परेशां बेचैन मन
कचोटता हैं अंतर जोंक सा
खाए जाता है घुन सा
खोखला कर डालता है
मन बड़ा निर्मल है
बेदाग, सत्य , ईमानदार
बहुत पसंद है इसे निर्मलता
ज्योति परम पुंज आनंद
सुरभित हो खुश्बू बिखेरते
खो जाता है निरंकार में
अपने ही जने परिवार में
इनसे स्नेह उनसे ईर्ष्या
कौड़ी के लिए डाह-कुचक्र
देख -देख मन भर जाता है
बोझिल हो मन थक जाता है
मन बड़ा 'जालिम ' है
प्रेम, प्रेमी, प्रेमिका, रस-रंग
हीरे -जवाहरात महल आश्रम छोड़ मन
न जाने क्यों कूच कर जाता है .....
कहाँ चला जाता है मन ??
कौन है बड़ा प्यारा रे ! बावरा मन ??
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर
कुल्लू यच पी -७-७.५५ पूर्वाह्न
३१.०५.२०१२

Life is Just a Life: एक नया भारत रच दे, भारत मेरे Ek naya Bharat rach d...

Written By Neeraj Dwivedi on गुरुवार, 21 जून 2012 | 6:44 pm

Life is Just a Life: एक नया भारत रच दे, भारत मेरे Ek naya Bharat rach d...: अब एक नया भारत रच दे, भारत मेरे। जब रातों  की  तानाशाही में , सूरज  आने से  घबराता हो , दीप  हो गए  बुझे  चिराग , फि...

प्रोफेशन की आंधी में इंसानी भार न खो दें

अपने जूनियर्स के प्रति आपका नजरिया कूटनीतिक से ज्यादा ईमानदारी भरा हो यह जरूरी है। कूटनीति भी कंपनी के कुछ हितों के लिए जरूरी है। किंतु ईमानदारी की कीमत पर कतई नहीं। चूंकि आपका जूनियर आपसे ही सीखता है। अगर हम अपने छोटे-छोटे स्वार्थों के चलते जूनियर के लिए नकारात्मक रहेंगे तो संभव है कि हम अपना इंसानी वजन तो खो ही रहे हैं, साथ ही कंपनी को भी एक खुराफाती ब्रेन दे रहे हैं। कई फैसले, जिनमें जूनियर यह अपेक्षा करता है कि इसमें रिस्क फैक्टर है तो निर्णय आप लें और उसे अमल करने को कहें। तो हमें ही साफ कर देना चाहिए कि यह करना है या नहीं करना है। खासकर तब, जबकि वह फैसला हम भी स्वयं लेने में डर रहे हों। कहीं कोई ऐसी बात न हो जाए, जो कंपनी की पॉलिसी के विपरीत हो। ऐसी स्थिति में जिम्मदारी और साहस की बड़ी जरूरत होती है। और ऐसा तभी हो सकता है, जब हम सिर्फ और सिर्फ काम के प्रति सजग, समर्थ, बहादुर और जिम्मेदार होंगे। कंपनियों के मुख्य काम के अलावा भी कई जिम्मेदारियां सीनीयर्स के कंधों पर होती हैं, ऐसे में मुमकिन है कि हम लगातार कूटनीतिक होते चले जाएं। किंतु इन सब पेशेवराना तंग दर्रो से भी होकर हमें अपने आपको बेहद साफ सुथरा और खासकर ईमानदार बने रहना होगा। दरअसल यह बात जेहन में उस वक्त आई, जब गांव के बहुत धनाड्य रहे परिवार के अंतिम सदस्य की बड़ी गुरवत में दम तोडऩे की खबर सुनी। दुनिया से जाने के बाद उनके बारे में जो ख्याल आया वह बड़ा नकारात्मक था। दिमाग के सिनेमा हॉल में उनके जीवन की डॉक्यूमेंट्री चलने लगी। वे बड़े सेठ हुआ करते थे। इस समय उन पर कई व्यावसायिक जिम्मेदारियां थीं। वे अपने कर्मचारियों के प्रति ऐसा रवैया रखते थे, कि अगर कल को बड़े सेठ नाराज हुए तो वे गोलमोल कुछ ऐसा कह सकें कि ठीकरा कर्मचारी पर फूट जाए। जब भी उनसे किसी बड़े फैसले के लिए पूछा जाता तो वे कोई ऐसी बात करते कि वह घूम फिरकर पूछने वाले की ही जिम्मेदारी रह जाए। ऐसे में कई कर्मचारी परेशान भी रहते थे। किंतु वह कुछ बोल नहीं सकते थे। यह बात इतनी शातिर तरीके से वे करते थे कि लोग समझ ही नहीं पाते। लेकिन जब उन सेठ के यहां से कर्मचारी दूसरी जगह काम पर गए तो उन्हें कहने के लिए एक भी काम से जुड़ा उदाहरण नहीं मिला। नई जगह पर भी उनके काम में यही डर रहा कि हमारा बॉस कोई भी बात हमपर ही ढालेगा। छोटे सेठ इस बात की लंबे समय तक ताल भी ठोकते रहे। आज जब नव पेशेवर युग शुरू हुआ तो न उन सेठ जी का पता चला और वैसे कर्मचारियों का। असली में उदारवाद के बाद तेजी से देश में नव पेशेवर युग जो शुरू हुआ है, तो कोई भी ऐसी कंपनियां, लोग, संस्थाएं या विचार आगे नहीं बढ़ पा रहे, जो स्पष्ट और ईमानदार न हों। यह नकारात्मक विचार होता है कि झूठ जीत रहा है, बल्कि मुझे तो कई बार लगता है कि सतयुग आ रहा है। ऐसे लोग इतनी तेजी से रिप्लेस हो रहे हैं, कि अगले 6-8 सालों में पेंशनर्स हो जाएंगे। वक्त ने हमेशा अपने साथ बदलने वालों को ही साथ में लिया है, जो नहीं बदले वे दूर कहीं पीछे रह गए हैं। गोलमोल बात, अस्पष्ट विचार, सोले के सिक्के (दोनों तरफ एक से, सिर्फ भ्रम भर रहे कि दो पहलू होंगे) जैसे गैर इंसानी भार के लोग अगले दशक तक अल्प संख्यक हो जाएंगे। वरुण के सखाजी

ग़ज़लगंगा.dg: रिश्तों की पहचान अधूरी होती है

Written By devendra gautam on मंगलवार, 19 जून 2012 | 1:14 pm

रिश्तों की पहचान अधूरी होती है.
जितनी कुर्बत उतनी दूरी होती है.

पहले खुली हवा में पौधे उगते थे
अब बरगद की छांव जरूरी होती है.

लाख यहां मन्नत मांगो, मत्था टेको
आस यहां  पर किसकी पूरी होती है.

खाली हाथ कहीं कुछ काम नहीं बनता
हर दफ्तर की कुछ दस्तूरी होती है.

किसको नटवरलाल कहें इस दुनिया में
जाने किसकी क्या मजबूरी होती है.

उनका एक लम्हा कटता है जितने में
अपनी दिनभर की मजदूरी होती है.

-----देवेंद्र गौतम

ग़ज़लगंगा.dg: रिश्तों की पहचान अधूरी होती है:

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प्रणब ने टेंटुआ दबाया था पत्रकारों का

Written By बरुण सखाजी on सोमवार, 18 जून 2012 | 11:31 pm

भारत की बदकिस्मती कहिए या फिर जनाब इसे अंधापन भयानक रोग। जिन प्रणब के हाथों देश के प्रथम पुरुष की कमान आने को है वह जरा देखें तो क्या कर रहे थे इनरजेंसी के दौरान। शाह कमिशन में प्रणब को अपात काल में सर्वाधिक मीडिया पर अत्याचार का दोषी पाया गया था। इस रिपोर्ट को देश की कई लाइब्रेरी में भी रखा गया था। किंतु जैसा कि होता है भारत के लोग लंबे अरसे बाद कांग्रेस से परेशान होकर हर किसी को चुन लेते हैं और वह अपने आपको साबित भी नहीं कर पाता। जैसा कि हुआ था जनता पार्टी की सरकार में। और अभी भी। वाह रे एनडीए चुप है। औकात इतनी भी नहीं कि एकाध कैंडीडेट उतार सके। यहां देखिए कांग्रेस अपने सबसे बुरे दौर में भी सबसे ज्यादा लड्डुओं को अपने मुंह में ठूंसे खड़ी है। मैं कह रहा था प्रणब के खिलाफ केस भी दर्ज हुआ और इस रिपोर्ट के आधार पर उन्हें दोषी माना गया। किंत इंदिरा ने अपनी सरकार आते ही सारे केस वापस ले लिए। प्रणब ये वही शख्स हैं, जिन्होंने पत्रकारों का तो जैसे गला दवा रखा था। और न जाने कितनों को जेल में ठूंस दिया और बाद में कुछ छुट्टुओं को तो मरवाया भी था। और आज वह राष्ट्रपति की गरिमा को सुशोभित करेंगे। वहीं यह वही प्रणब हैं जिन्होंने सभी लाइब्रेरी से इस शाह कमिशन की रिपोर्ट को जला देने के लिए कहा था। अभी इसकी इकलौती रिपोर्ट एक ऑस्ट्रेलियन लाइब्रेरी में रखी हुई है।

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Saleem Khan