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ग़ज़लगंगा.dg: कोयले की खान में दबकर रहा हीरा बहुत.

Written By devendra gautam on शुक्रवार, 31 अगस्त 2012 | 7:57 am

हर किसी की आंख में फिर क्यों नहीं चुभता बहुत.
कोयले की खान में दबकर रहा हीरा बहुत.

इसलिए मैं धीरे-धीरे सीढियां चढ़ता रहा
पंख कट जाते यहां पर मैं अगर उड़ता बहुत.

ज़िन्दगी इकबार भटकी तो भटकती ही गयी
सबने समझाया बहुत समझा मगर थोडा बहुत.

रात भर बिस्तर पे कोई करवटें लेता रहा
रातभर रोता रहा बिल्ली का एक बच्चा बहुत.

Read more: http://www.gazalganga.in/2012/08/blog-post_29.html#ixzz256IuUITZ

fact n figure: सोशल मीडिया के एक्टिविस्ट टीम की जरूरत

Written By devendra gautam on बुधवार, 29 अगस्त 2012 | 9:25 am

 प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मार्केंडेय काटजू ने इलेक्ट्रोनिक और सोशल मीडिया के नियमन की जरूरत पर बल दिया है. इसके लिए उन्होंने प्रेस काउंसिल अक्त 1978  में संशोधन का आग्रह किया है. वे इन दोनों मीडिया को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के दायरे में लेन के पक्षधर हैं. इस ब्लॉग पर 20  अगस्त के पोस्ट में मैंने भी इस तरह के विचार रखे थे लेकिन मेरी अवधारणा   थोडा भिन्न है. काउंसिल शिकायतों की सुनवाई करने वाली एक संवैधानिक संस्था है. मेरे विचार में सोशल मीडिया के अंदर गड़बड़ी फ़ैलाने या इसका दुरूपयोग करने वालों को नियंत्रित करने के लिए इतनी लंबी प्रक्रिया कारगर नहीं होगी. यह प्रिंट की अपेक्षा फास्ट मीडिया है इसलिए अफवाहों को कुछ ही क्षणों में जवाबी कार्रवाई कर निरस्त करने के जरिये ही इसपर नियंत्रण पाया जा सकता है. इसके सेवा प्रदाता अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क का संचालन करते हैं इसलिए कानूनी प्रक्रिया बहुत पेचीदा हो सकती है. राष्ट्रहित में इसपर नियंत्रण के लिए एक्टिविस्ट किस्म के लोगों की एक टीम होनी चाहिए जो इस मीडिया में दखल रखते हों. वे काउंसिल के दायरे में काम करें लेकिन उनका विंग अलग हो तभी बात बनेगी. हमला जिस हथियार से हो जवाब भी उसी हथियार से देना होता है. यह प्रोक्सी वार का जमाना है. इसका जवाब एक्टिविज्म       के जरिये ही दिया जा सकता है. दूसरी बात यह कि आरएनआई, ड़ीएवीपी जैसी संस्थाओं में कुछ अहर्ताओं के आधार पर भारतीय वेबसाइट्स को सूचीबद्ध कर उन्हें और जवाबदेह बनाने की संभावनाओं पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है.

---देवेंद्र गौतम
fact n figure: सोशल मीडिया के एक्टिविस्ट टीम की जरूरत:

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हज यात्रियों को मिलेगा सउदी का सिमकार्ड

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इस साल हज पर जाने वाले भारतीय नागरिकों को पहली बार सउदी टेलीकॉम की ओर से सिमकार्ड बेहद किफायती  दर पर मुहैया कराया जाएगा। जेददा में भारतीय महावाणिज्य दूतावास ने एक बयान में कहा कि इस सिमकार्ड के जरिए कॉल करने की दर पांच रियाल होगी, जबकि इनकमिंग मुफ्त होगी। इस सिमकार्ड में पहले से ही सभी संबंधित अधिकारियों और कुछ दूसरे महत्वपूर्ण नंबर भी होंगे। बयान में कहा गया है कि ये सिमकार्ड भारत में ही विभिन्न स्थानों पर दिए जाएंगे ताकि हज यात्रियों के परिवार के लोग ये नंबर पहले से ही जान सकें। महावाणिज्य दूतावास ने कहा कि भारतीय हज यात्रियों को पूरी सुविधा मुहैया कराने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। 
सौरसे : http://www.livehindustan.com/news/videsh/international/article1-Haj-Saudi-SIM-Cards-Indian-Haj-pilgrims-2-2-256582.html

दाढ़ी वाली मल्लिका शेरावत

Written By प्रदीप नील वसिष्ठ on रविवार, 26 अगस्त 2012 | 1:33 pm



आदरणीय अन्ना अंकल ,
कल राम औतार अखबार ले कर भागा-भागा आया और बोला " मेरी फोटो छपी है, तुमने देखी ?"
मैंने फोटो सुबह ही देख ली थी जिसमें राम औतार गधे पर बैठा था ,गले में जूत्तों की माला और चारों तरफ पुलिस वाले. मुझे तो यह फोटो देखने में ही शरम आ रही थी और इधर यह राम औतार फोटो यूँ दिखा रहा था मानो फोटो ना हो कर  कोई गोल्ड मैडल हो .
मैंने कहा " इस उम्र में तुम्हे यह क्या सूझी राम औतार कि अपनी बेटी की उम्र की लड़की छेड़ दी ?"
राम औतार हंसने लगा " इस अखबार के सम्पादक को नीचा दिखाना था, दिखा दिया ."
मैंने पूछा " उसकी लड़की छेड़ कर ?"
राम औतार फिर हंसा " नहीं यार , उसके अखबार में अपनी फोटो छपवा कर ."
मैं हैरान रह गया , मैंने कहा " फोटो तुम्हारी छपी और नीचा उसने देखा ? मैं कुछ समझा नहीं ."
राम औतार बोला " समझाता हूँ . वैसे तो कहानी बहुत लम्बी है पर सारांश यह कि पिछले महीने मुझे दस लाख रुपयों से भरा एक बैग सडक पर पड़ा  मिला था. मैंने उसके मालिक को ढूंढकर बैग लौटा दिया. तब इस अखबार वाले ने यह समाचार सिर्फ दो लाइनों में छापा था और वे दो लाइनें भी पता है कहाँ ? सातवें  पेज पर खोया-पाया और टेंडर-नोटिस के विज्ञापनों के बीच ."
मैंने कहा " ओह तभी उस समाचार पर मेरी निगाह नहीं पड़ी..."
राम औतार ने कहा " तुम्हारी क्या किसी की नहीं पड़ी . खुद मुझे चश्मा लगा कर वह खबर ढूंढनी पड़ी थी "
मैंने कहा " बहुत बुरी बात है . उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था, बल्कि ऐसी न्यूज़ तो फोटो समेत फ्रंट-पेज पर छापनी थी..."
राम औतार बोला " तुम्हारी कही यही बात जब मैंने सम्पादक से कही तो वो चिढ गया .कहने लगा तू कोई मल्लिका शेरावत है जो तुझे फ्रंट-पेज पर छापूँ ? सातवें पेज पर भी न्यूज़ इसलिए छाप दी कि एक विज्ञापन आना था और वो आया नहीं इसलिए जगह बची हुई थी ."
मैंने पूछा " फिर ? "
राम औतार बोला " मैंने सम्पादक को धमका दिया और कह दिया कि एक दिन ऐसा भी आएगा  जब दाड़ी वाले बदसूरत राम औतार नाम की इस मल्लिका शेरावत की फोटो तू ही छपेगा और वह भी फ्रंट-पेज पर. बस फिर तो वह बहुत चिढ गया और बोला ऐसा इस जन्म  में तो होगा नहीं क्योंकि हमने अखबार बेचना है , बंद नहीं कराना ."
मैंने कहा " चल आज उसको चिढा कर आते हैं कि राम औतार की फोटो तुमने ही ..."
राम औतार बोला " मै वहीँ से आ रहा हूँ . सम्पादक ने न केवल मुझे चाय  पिलाई बल्कि पिछली बातों के लिए माफ़ी भी मांगी ."
मै हैरान रह गया , मैंने कहा " तुमने पूछा नहीं कि अब फोटो कैसे छाप दी ?"
राम औतार हंसा " चाय पीते-पीते पूछा था ."
मैंने डरते-डरते पूछा " सम्पादक क्या बोला ? "
राम औतार बोला " कुछ नहीं यार , सर झुका कर बोला हमने अख़बार बेचना है .."
अब मैं  या आप क्या बोलें अंकल , सम्पादक ने एक लाइन में सब कुछ ही तो कह दिया .
आपका अपना बच्चा
मन का सच्चा,
अक्ल का कच्चा
प्रदीप नील 

राजगुरु जी की 104वी जयंती पर "हम अपने मन को निर्मल बनाकर जियें"

Written By DR. ANWER JAMAL on शुक्रवार, 24 अगस्त 2012 | 8:05 pm

आज 24 अगस्त है ... आज  राजगुरु जी की 104वी जयंती है ...

देश के लिए क़ुर्बान होने वाले वीरों के लिए "हिंदी ब्लोगर्स फोरम इंटरनेश्नल" की और से प्रेममय मनोभाव .
शिवराम हरि राजगुरु मराठी थे . उन्होंने हिन्दू धर्म-ग्रंन्थों तथा वेदों का अध्ययन तो किया ही लघु सिद्धान्त कौमुदी जैसे क्लिष्ट ग्रन्थ को भी बहुत कम आयु में ही कण्ठस्थ कर लिया था। वह छत्रपति शिवाजी की छापामार युद्ध-शैली के बड़े प्रशंसक थे.

इसके बावजूद वह क्षेत्रवाद और सांप्रदायिकता की भावना से ऊपर थे . अपने मन की संकीर्णता से मुक्ति पाना अंग्रेजों से मुक्ति पाने से भी ज़्यादा कठिन काम है. यह काम उन्होंने किया और हमारे लिए एक अच्छी मिसाल क़ायम की.
उनका जन्म 24 अगस्त 1908 को हुआ था. आज उनके जन्मदिन पर हम सब अपने मन को संकीर्णताओं से मुक्त करने का संकल्प लें.
उन्हें 23 मार्च 1931 को फाँसी पर लटका दिया गया था ।

जिन्हें फाँसी पर नहीं लटकाया गया, उनके काल के दूसरे सब भी मर चुके हैं. उन्हें फांसी देने वाला जल्लाद, जज और अंग्रेज़ सब मर गए हैं.

मौत सबको आनी है.  उन्हें आई है तो हमें भी आएगी.
हम अपने मन को निर्मल बनाकर जियें और बुराई से पवित्र हो कर मर जाएँ, तो हम सफल रहे.
यह एक लड़ाई हरेक आदमी अपने आप से लड़ ले तो हमारे देश की हर समस्या हल हो जायेगी.
वर्ना हिसाब लेने वाला एक प्रभु परमेश्वर तो हमारे सभी छिपे और खुले कामों का साक्षी है ही.
अपने शुभ अशुभ कर्मों को खुद हमें ही भोगना है.

बहू लायेंगे इंग्लैंड से



  आदरणीय अन्ना अंकल,
  बेटी बचाओ के नारों के इस दौर में एक नारे ने मेरी नींद हराम कर रखी है . यह नारा लगभग हर मंच से गूंजने लगा है ”बेटी नहीं बचाओगे तो बहू कहां से लाओगे ?“
 देखने में यह नारा बेटियां बचाने के पक्ष में लगता है जबकि वास्तव में ऐसा है नहीं . इसमें चिंता बेटी बचाने को ले कर नहीं बल्कि अपने लाड़ले के लिए बहू लाने  को ले कर है कि बेटियां अगर नहीं बचाई गई तो आपके बेटे रण्डुए रह जायेंगे और आपने दहेज़ में एक किलो सोना और कार लेने का या बाद में बहू को जला कर आनन्द लेने का जो सपना देख रखा है, वह अधूरा रह जाएगा. कोई माने या न माने, लेकिन नारा साफ कह रहा है कि और लोगों  को बेटियां बचानी ही चाहिए ताकि हमारे  बेटे को बहू आसानी से मिल जाए. क्योंकि भारत ने अभी इतनी तरक्की तो की नहीं कि कोई अपनी ही बेटी को बहू बना ले .तो मतलब साफ है कि ये नारा यह नहीं कहता कि बेटियां हम बचाएं बल्कि यह सुझाव दे रहा है कि जहाँ हमारे बेटे का रिश्ता  हो सकता है, वे परिवार बेटियां बचाएं ताकि हम बहू ले आएं  . यानि, कुला जामा  बात तो यह हुई कि सारा मामला बहुओं को बचाने का है, बेटियों को बचाने का नहीं . शायद  इसी बात पर गालिब ने कहा था :
  ” वो कहते हैं मेरे भले की
    लेकिन बुरी तरह “
दूसरी बात ये कि यह नारा चुनौती देता है कि बहू कहां से लाओगे ? चुनौती जब भी कोई देता है, हम भारतवासी आगे बढ कर स्वीकार कर लेते हैं. सारे भारतवासी न सही हमारा पड़ौसी राम दुलारे तो स्वीकार कर ही लेता है. कल ही हमारे मोहल्ले के मंच से नारा गूंजा ” बेटी नहीं बचाओगे तो बहू कहां से लाओगे ?“ राम दुलारे तुरंत चिल्लाया ” बिहार से, बंगाल से, उड़ीसा से . और अब तो इंटरनेट, फेसबुक का ज़माना है तो चैटिंग-सैटिंग करके पोलैंड  या होलैंड  से भी ले आयेंगे .“
मंच-संचालक को राम दुलारे का जवाब बहुत बुरा लगा . लेकिन राम दुलारे समझाने लगा कि इसी सवाल को ऐसे पूछो ”बहुएं नहीं बचाओगे तो बेटी कहां से लाओगे? यानी, पहले बहुओं को तो बचाना सीख लो , बेटियाँ तो खुद हो जायेंगी .
  इस बात पर भीड़ में बैठी कुछ सास टाइप औरतें नाराज़ हो गई कि यह मुआ भी ज़ोरू का गुलाम निकला ! कोई हम बूढियों का पक्ष भी तो ले, सास को बचाने की बात क्यों नहीं कहते, हरामियो ?
तब से बेचारा मंच-संचालक अपना सर पकड़े बैठा है कि बेटियां बचाने के लिए वह क्या नारा लगाए ? इतना तो वह भी जानता है कि बेटियां नारे लगाने या उनकी घुड़चढी करवा देने से नहीं बचती . खुद जब वह पिछले साल अपनी पत्नी को मैटरनिटी होम ले कर जा रहा था तो उसकी मां ने कहा था ” चांद सा बेटा ले कर आना . ईंट-पत्थर मत ले आना .“
ऐसे में आप ही हमारी मदद कर सकते हैं यह समझा कर कि बेटियां ईंट-पत्थर  नहीं होती बल्कि वे  तो छुई-मुई का पौधा होती हैं जिन्हे खाद-पानी और खुला आसमान तो चाहिए ही, अनचाहे स्पर्श  से भी दूर रखे जाने की भी वे मांग करती हैं .
आपका अपना बच्चा,
मन का सच्चा,
अकल का कच्चा
- प्रदीप नील 

Life is Just a Life: अश्रु रीते Asru Reete

Written By Neeraj Dwivedi on मंगलवार, 21 अगस्त 2012 | 8:27 pm

Life is Just a Life: अश्रु रीते Asru Reete: कब तक तुम्हारी याद के , मोती बनाऊँ अश्रु रीते ? तुम  इंद्रधनुषी रेख हो या , आँख का  काजल सुहाना ? तुम गीत का सृंगार हो या , कोई र...

Sahitya Surbhi: अगज़ल - 44

Written By Dilbag Virk on शनिवार, 18 अगस्त 2012 | 10:05 pm

Sahitya Surbhi: अगज़ल - 44:       अपनी हस्ती को गम के चंगुल से आजाद करने का        काश ! हम सीख लेते हुनर खुद को शाद करने का ।       अंजाम की बात तो बहारों पर मुनस्...

फव्वारा चौक का अन्ना ?

    आदरणीय अन्ना अंकल,
                  आपने भ्रष्टाचार  के खिलाफ जो आंदोलन छेड़ा उसका नतीज़ा यह हुआ कि आम आदमी अब सिर्फ नेताओं और कर्मचारियों को चोर मानने लगा है और उसे अपनी कोई भी कमी नज़र नहीं आती.
 अब  देखो न अंकल , औसत दूधिया दोनों समय पानी मिला कर दूध बेचता है और फिर भी  यह दावा करता है कि वह तो किसी तरह बच्चों का पेट पाल रहा है. इन नेताओं को देखो ना जो करोड़ों खा गए. बिल्कुल यही बात बिजली और पानी की चोरी करने वाला सोचता है और यही बात वह भी कहने लगा है जो नकली घी बनाता है या सोने में पीतल मिलाता है . किसी का बिना हैल्मेट के चालान कटने लगता है तो उसकी यही दलील होती है कि पुलिस वाले खुद तो हैल्मेट पहनते नहीं और हमारा चालान काटते हैं . यानि हर चोर अब नेताओं को चोर बता कर खुद को सही ठहराने  लगा है .
 अंकल जी, आप तो हमें शायद  यह सिखा रहे थे कि शराब  से कीड़े मर जाते है़ं इसलिए यह हानिकारक है जबकि हमने यह समझा कि शराब अच्छी चीज़ है जिसे पीने से पेट के कीड़े मर जाते हैं . आप को लगता नहीं कि आप कैसे-कैसे  चेलों के गुरू हो गए ?
इससे भी बड़ी बात तो यह अंकल जी, कि हम लोगों की नज़दीक की नज़र बहुत  कमज़ोर हो गई है और दूर की बहुत तेज.  हमें दिल्ली के राम लीला मैदान में खड़ा अन्ना तो दिखता है लेकिन मेरे अपने  शहर  के फव्वारा चौक पर खड़ा रहने वाला अन्ना नहीं दिखता . यह अन्ना ना तो खादी पहनता है और ना  गांधी टोपी ही  बल्कि पुलिस की वर्दी में  हर समय हैल्मेट पहने खड़ा रहने वाला हमारे शहर  का ट्रेफिक-इंचार्ज़ देवा सिंह है.  लेकिन हम इतने बेशर्म  हो चुके हैं कि हेलमेट लगाए धरती पर खड़े उस देवा सिंह के  पास से बिना हैल्मेट लगाए बाईक पर गुजरते रहते हैं और एक पल भी नहीं सोचते कि खाकी वर्दी वाला यह आदमी सारा दिन हैल्मेट क्यों पहने रहता है और तब भी जब वह बाईक पर नहीं होता  बल्कि चौक पर  खड़ा होता है ? इसके हाथ में लाठी नहीं है इसलिए हम इसे पुलिस वाला नहीं मानते और इसने गांधी टोपी नहीं पहनी इसलिए हम इसे अन्ना भी नहीं मानते. हम अन्ना का भक्त उसी को मानने लगे हैं जो कुछ भी करे लेकिन टोपी लगा ले जिस पर लिखा हो ” मैं भी अन्ना “ लेकिन यह बात हम बेवकूफों को कौन समझाए कि अन्ना तो मन से अन्ना होता है उसने चाहे गांधी टोपी पहन रखी हो या हैल्मेट .
खाकी वर्दी में कहते हैं बहुत नशा  होता है लेकिन इस इंस्पेक्टर को देख कर यह बात झूठ लगती है .यह नशे की बजाए प्रेरणा से लोगों को समझाना चाहता है . लेकिन हम जूत्ते से समझने वाले लोग....
कल को यही देवा सिंह पुलिसिया लाठी उठा कर खड़ा हो जाए कि आओ मेरे प्यारो आज देखता हूं कौन मेरे पास से बिना हैल्मेट लगाए गुजरता है ? तब क्या होगा ? लोग या तो रास्ता बदल जायेंगे या हैल्मेट लगा कर ही उधर से गुजरेंगे .लेकिन वही दलील फिर भी देंगे कि नेता तो देश  को लूट के खा गए उनका कोई पुलिस वाला  कुछ बिगाड़ता नहीं, हमने क्या अपराध किया है , एक छोटा सा हैल्मेट ही तो नहीं पहना .अंकल जी, आप को लगता नहीं कि आप कैसे-कैसे भक्तों के देवता हो गए ? 
आपका अपना बच्चा,
मन का सच्चा,
अकल का कच्चा
--- प्रदीप नील

ग़ज़लगंगा.dg: हुकूमत की चाबी.....

हकीकत यही है
ये हम जानते हैं
कि गोली चलने का कोई इरादा
तुम्हारा नहीं है.
कोई और है जो
तुम्हारे ही कंधे पे बंदूक रखकर
तुम्हीं को निशाना बनाता रहा है.
सभी ये समझते हैं अबतक यहां पर
जो दहशत के सामां दिखाई पड़े हैं
तुम्हीं ने है लाया .
तुम्हीं ने है लाया
मगर दोस्त!
सच क्या है
हम जानते हैं
कि इन सब के पीछे
कहीं तुम नहीं हो.....
फकत चंद जज्बों  के कमजोर धागे
जो उनकी पकड़ में
रहे हैं बराबर .
यही एक जरिया है जिसके  सहारे
अभी तक वो सबको नचाते रहे  हैं
ये तुम जानते हो
ये हम जानते हैं
तुम्हारी ख़ुशी से
तुम्हारे ग़मों से
उन्हें कोई मतलब न था और न होगा
उन्हें सिर्फ अपनी सियासत की मुहरें बिछाकर यहां पर
फकत चाल पर चाल चलनी है जबतक
हुकूमत की चाबी नहीं हाथ आती
हकीकत यही है
ये तुम जानते हो
ये हम जानते हैं
हमारी मगर एक गुज़ारिश है तुमसे
अगर बात मानो
अभी एक झटके में कंधे से अपने
हटा दो जो बंदूक रखी हुई है
घुमाकर नली उसकी उनकी ही जानिब
घोडा दबा दो
उन्हें ये बता दो
कि कंधे तुम्हारे
हुकूमत लपकने की सीढ़ी नहीं हैं.

--देवेंद्र गौतम
ग़ज़लगंगा.dg: हुकूमत की चाबी.....:

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स्वतंत्रता दिवस (एक कविता)

Written By Sudhir Gupta on मंगलवार, 14 अगस्त 2012 | 2:03 pm


मैंने मित्र से पूछा

क्या बात है

हमसे छुप रहे हो

बहुत खुश दिख रहे हो?

मित्र बोला-

हाँ

मैं आज बहुत खुश हूँ

इसलिए

देशभक्ति के गीत गा रहा हूँ

और

स्वतंत्रता दिवस मना रहा हूँ

मैंने कहा

लेकिन

आज तो स्वतंत्रता दिवस नहीं है!

मित्र बोला

यह सही है

कि

आज स्वतंत्रता दिवस नहीं है

लेकिन-

मुझे इस बात का गम नहीं है

क्योंकि

पत्नी का मायके जाना भी

किसी

स्वतंत्रता दिवस से कम नहीं है।

जीवन के रंग .....: सिर दर्द

Written By mark rai on सोमवार, 13 अगस्त 2012 | 5:58 pm

Life is Just a Life: तरश रहीं दो आँखें Tarash Rahin Do Ankhein Apnon ko...

Life is Just a Life: तरश रहीं दो आँखें Tarash Rahin Do Ankhein Apnon ko...: कब से तरश रहीं दो आँखें , अपनों को। जीवन का मोह न छूटा , छूट गए सब दर्द पराए , सुख दुख की राहगुजर में , अपनों ने सारे स्वप्न जलाए...

बाबा बड़े परेशान हैं करें तो क्या?

Written By बरुण सखाजी on शनिवार, 11 अगस्त 2012 | 11:36 pm

तमाम गवाहों और सुबूतों को मद्दे नजर रखते हुए अदालत किस नतीजे पर पहुंची कल पता चलेगा। बहरहाल रामदेव का धरना तीन दिनों में तीन मानसों पर केंद्रित रहा। पहला कांग्रेस की चापलूसी करके अनशन तुड़वाने बुलाकर अन्ना को नीचा दिखाना, अन्ना की सियासी पार्टी पर गैर सियासी एजेंडे वाली बात कहके बढ़त बनाना और तीसरा जब कुछ नहीं तो व्यायामशालाएं खोलकर सेना तैयार करना। रविवार को देखेंगे आखिर रामदेव चाहते क्या हैं? भोपाल में एक बार आरक्षण, राजनीति फिल्म की शूटिंग हो रही थी। मैं गया था, तो सारे अखबारों में हर रोज कुछ न कुछ छापा जा रहा था। कहीं कुछ सनसनीखेज, तो कहीं अजय देवगण, अमिताभ से बात। शहर के होटलों में फिल्म यूनिट के लोग अटे पड़े थे। कम से कम किसी भी पेपर के एक पुल आउट में कुछ न कुछ होता था। मगर यह सब भीड़ के बाद भी कुछ यह कोई नहीं कहता था, कि अब सूरत बदल जाएगी, देश बदल जाएगा या भोपाल बदल जाएगा। चूंकि सब जानते थे, यह एक फिल्म है। इसमें लिखी गई स्क्रिप्ट के अनुरूप ही सब काम करेंगे। शूटिंग प्लान, फ्लोर प्लान पहले से तय है। तो कुल मिलाकर बड़ी भारी भीड़ और लोक चर्चा के बावजूद यह कोई राष्ट्रीय रोमांच का विषय नहीं था। लोगों में यह तो क्वाइरी थी कि आज शूटिंग कहां हुई होगी। कैसे शूटिंग होती है। मगर यह कोई नहीं जानना चाहता था, कि आज क्या होगा। यानी कोई रहस्य नहीं था। ऐसा ही हुआ बाबा रामदेव का आंदोलन। तीन दिनों में किसी को कोई भी ऐसा नहीं लगा जबकि बाबा कुछ नया बोलेंगे। इसपर कांग्रेस एक बारगी किसी पेंशनर्स समाज के धरने तक को पूछ ले मगर बाबा की बात नहीं सुनने पर आमादा सी दिखी। लंबी रिहर्सल, वाद और विवाद पैदा करने की पूरी कोशिश। मगर मीडिया का सिक्स्थ सेंस लगातार कहता रहा, यह कोई नहीं महज एक फिल्म शूटिंग सा माहौल है। बाबा वैसे भी अन्ना की तरह प्रभावी नहीं है। वे अपनी ह्युमन चेन के जरिए जाते रहे हैं। जरा देखें बाबा के कुछ दांव पेंच जो उन्होंने यहां पर खेले। अन्ना गलत मैं सही: यह बाबा की सबसे पहली इच्छा और नीति थी। उन्होंने शुरू के पहले दिन तो ऐसा बोला जैसे अन्ना के खिलाफ बैठे हैं। लोकपाल चाहिए, अपनी मत चलाओ, सुनो लोकपाल बनने दो। और बार-बार सियासी दल नहीं बनाऊंगा। सियासत नहीं करूंगा। मेरा कोई सियासी ड्रामा नहीं है। यह सब बातें यह थीं कि जैसे कांग्रेस की ओर से बाबा बैठे हों। क्यों कोसा अन्ना को: बाबा रामदेव ने अन्ना टीम को कोसा। वजह रही जैसे कांग्रेस ने अन्ना टीम के साथ व्यवहार किया था, एक अनबोला सा बना रखा था। वह न रहे। फिर बाबा के पास आएं सिब्बल, चिदंबरम, सुशील आदि। और बाबा का कद बढ़े। वे बताएं देखो इसे आंदोलन कहते हैं। हमने झुका दिया सरकार को। अन्ना रणछोर निकले। तो बाबा लगातार कांग्रेस की अप्रत्यक्ष रूप से तारीफ करते रहे। दिखाया डर भी: बाबा अपनी चापलूसी से इतने घिरे हुए हैं, कि उन्हें लगता है पूरा देश उनकी चापलूसी नहीं सम्मान कर रहा है। बनियो के राजनैतिक झगड़ों को सुलझाने में माहिर बाबा ने इतनी औकात तो बना ही ली है, कि उन्हें उद्योगपतियों का चापलूसी मिश्रित सम्मान मिलता रहे। जब कांग्रेस की चापलूसी से बाबा का काम नहीं बना तो उन्होंने क्रांति का डर दिखाया। किसके बूते? उनके बूते, जो पहले से ही अपनी किसी बीमारी को दूर करने के लिए बाबा के अनुलोम विलोम में शामिल थे। बाबा एक डॉक्टर हैं, इलाज करें। अब क्या करें बाबा: अब पूरा घटनाक्रम क्लोज होने को है। बाबा करेंगे तो क्या? चूंकि अब सारी बातें हो गईं। चीजें खत्म हो रही हैं। कैसे इसे कन्क्लूड करें। तो वे अब रविवार को 11 बजे ऐलान करेंगे। तो क्या अन्ना के खिलाफ हैं रामदेव: हां। सत्य है। रामदेव के अबतक के चाल चलन से तो ऐसा ही लग रहा है। वे सिर्फ और सिर्फ अन्ना के आंदोलन को ही नेस्तनाबूत करना चाहते हैं। जरा इतिहास देखो: रामदेव दो सालों से काला धन और काला धन कर रहे थे। अन्ना चुपचाप प्रकट हुए और लोकपाल के लिए अप्रैल में 5 दिवसीय अनशन पर बैठे। लोगों ने समर्थन दिया। यानी एक बार जब आप बैठ चुके तो रामदेव ने इसपर अपना रंग पोतने के लिए जून में अनशन किया। क्या दुर्दशा हुई सभी जानते हैं। बालकृष्ण जैसे स्त्रियण व्यक्ति को आगे किया। अब फिर अगस्त में अन्ना बैठे और फिर महाभीड़ जुट गई। लोकपाल नहीं बना। दबाव बन गया। अन्ना ने मुहलत दी। फिर बैठ गए। लोकपाल फिर नहीं बना। दबाव बना रहा। इस बीच रामदेव के पास पूरी सियासी विरासत खतरे में नजर आने लगी। फिर इस बार अगस्त में बाबा के बैठने की बात से पहले ही टीम अन्ना बैठ गई। फिर वही हुआ। मैदान बनाते रामदेव, खेल खेलते अन्ना। यानी लड़ाई रह गई, सिर्फ अन्ना और रामदेव के बीच। लड़ाई ऐसी जो दिखती नहीं है। इसलिए रामदेव अन्ना को अब पहले खत्म करना चाहते हैं। - सखाजी

मनोरंजन पर भारी शोक समाचार

Written By बरुण सखाजी on शुक्रवार, 10 अगस्त 2012 | 1:48 pm

मनोरंजन अपनी कमी या ज्यादाती को रोटी की तरह पेट या शरीर पर नहीं दिखाता। यह मनुष्य के मानस, आचरण, व्यवहार से नजर आता है। इसका मीटर डाउन हुआ तो खराब ऊपर हुआ तो खराब। संतुलित होना जरूरी है। और इंसान की पहचान रोटी तो है नहीं, उसकी सोचने समझने की शक्ति ही असली पहचान है। तब मनोरंजन एक तरह से रोटी से भी ज्यादा जरूरी हुआ। हास्य का बोध, रुदन का एहसास यह सभी मनोरंजन से ही तो आएगा न?
गांव छोटा था। सबलोग एक दूसरे को जानते थे। कोई अपना या पराया नहीं था। सबके दुख से सब दुखी और सबके सुख से दुखी। यकीनन यह गांव किसी सतयुग का काल्पनिक गांव कतई नहीं था। मनोरंजन के साधन सीमित। इतने सीमित कि तार बिजली तक से मनोरंजन करना पड़ता। जले हुए ट्रांसफार्मर से एल्युमिनियम के तार निकालना और उनसे कुछ बनाना। सबकुछ आनंद के लिए। टीवी के नाम पर महज एक पटवारी की टीवी। दोस्ती करो तो टी
वी वरना महरूम। देखें तो कहां देखें मृगनयनी, मुंगेरीलाल के हसीन सपने, हम लोग, भीमभवानी और सबसे ज्यादा जरूरी महाभारत। संडे को तो खेतों में चरने वाले जानवर, खरपतवार, कीड़े मकोड़े, हिरण, हिन्ना सब जान गए थे कि आज संडे है। दूर तलक न खेतिहर मजदूर न मालिक। सब सुन्न सपाटा। वजह सुबह महाभारत शाम को हिंदी फीचर फिल्म। बीच में कुछ खाना पीना और जरूरी काम। फिल्म कौन सी या तो मारधाड़ वाली या फिर रोमांटिक। यह फर्क तो नहीं पता था, पर हां कुछ जादुई सी दुनिया का जरूर एहसास होता। कहीं कोई सितारों के बीच परि है, तो कहीं कोई बहन का बदला लेने मिथुन लाल सलाखें नंगे हाथों से पकड़ रहा है, तो कहीं प्रेम चौपड़ा मृदुभाषिता से अच्छे खासे सेठों की दौलत कब्जा रहा है। मनोरंजन के सीमित साधनों पर ही निर्भर रहना था। और तिसपर तरह-तरह के बंधन अलहदा से थे। टीवी नहीं देखना चाहिए, आंखे तो खराब होती ही हैं, साथ में पढ़ाई भी। यह तो ऐसी समस्या थी कि बुजुर्गों को बच्चों को टीवी देखने से हर हाल में रोकना था और बच्चों, महिलाओं और नौजवानों की जिद थी कि टीवी हर हाल में देखना है। तो मामला विरोध, सहमति, असहमति, वार्ता, संवाद और चोरी, मनमानी के जरिए सुलझ भी जाता। मगर समस्या तब विकराल हो जाती जब गांव या देश में कोई मर जाए। यह चूंकि संवेदनशील मामला होता था। इसपर नौजवानों ने अगर तर्क दिए तो यूपीए-2 जैसा मामला होगा, कि लोकपाल लाओ नहीं तो भ्रष्टाचार के पोषक कहलाओ। विरोध करें टीवी बंद का तो मरें, चुपचाप देखें तो मन की नैतिकता खा जाए। मगर मनोरंजन तो मनोरंजन है। क्या करें, यह भी खाने, पीने, या अन्य दैनिक कार्यों की तरह ही जरूरी है। लेकिन ऐसा जरूरी जिसपर लोकचर्चा नहीं होती। मनोरंजन अपनी कमी या ज्यादाती को रोटी की तरह पेट या शरीर पर नहीं दिखाता। यह मनुष्य के मानस, आचरण, व्यवहार से नजर आता है। इसका मीटर डाउन हुआ तो खराब ऊपर हुआ तो खराब। संतुलित होना जरूरी है। और इंसान की पहचान रोटी तो है नहीं, उसकी सोचने समझने की शक्ति ही असली पहचान है। तब मनोरंजन एक तरह से रोटी से भी ज्यादा जरूरी हुआ। हास्य का बोध, रुदन का एहसास यह सभी मनोरंजन से ही तो आएगा न? मगर क्या करें। टीवी बंद करने के आदेश और सक्रिय कार्यकर्ताओं ने बिना वक्त गंवाए टीव के निचले हिस्से में लगीं 3 बटनों में कोने वाली चट से बंद कर दी। यह काम करने में अक्सर वे बजरंगी टाइप के कार्यकर्ता आगे रहते थे, जो खुद भी टीवी देखना चाहते थे, किंतु बड़ों की नजर में सकारात्मक छवि के लिए ऐसा करते। एक पल के लिए तो ऐहसास होता आज के दौर के वेलेंटाइंस के अनुयायियों पर लगने वाली पाबंदी सा। मगर मसला ऐसा कि विरोध, प्रतिरोध और मनमानी किसी की गुंजाइश नहीं। लोग भी जैसे मरने के लिए तब तक बैठे रहते थे, जब तक कि कोई अच्छा सा कार्यक्रम न आने वाला हो। कस्तवारिन 90 साल की थी। घर के एक कोने में रह रही थी, बीसों साल से तो वह बूढ़ी होना तक बंद हो चुकी थी। जैसी की तैसी थी। न जाने क्या हुआ। मरने का क्या मुहूर्त सा खोज रही थी। बेटा धनसिंह खुद चाहता था मरे ये तो अब। पढ़ा लिखा नहीं था न? जो बुद्धि रखते थे, वे कहते अब तो माताराम को भगवान उठा ले, वे बड़े कष्ट में हैं। जैसे यह बड़े दयालु हैं। मगर चूंकि इंसानी बिरादरी की पहचान हैं संवेदनाएं, तो कस्तवारिन मरे, या नौजवान बेटा। अपने आप कोई मरे या दुर्घटना में। असर सीधा टीवी पर ही पड़ता। फिल्म चल रही थी राजकुमार, दृश्य था हाथी पर बैठा एक आदमी। बचपन था। पता नहीं क्या संवाद थे, क्या एक्टिंग थी। क्या प्लॉट था, होने वाला क्या था, फिल्म में। मगर एक बात थी गहरे से, हाथी को देखकर मन इतना खुश हो रहा था, कि अभी इसपर लद जाऊं। फिल्म पूरे शबाव पर थी। बाकी दर्शकों का तो नहीं पता पर मैं जरूर हाथी की मदमस्त चाल और वहां के परिवेश में फिल्माया गया उत्साह देखकर मुदित था। मनोरंजन अपार हो रहा था। इतना कि जैसे में किसी प्रभू की याद में रोकर भी प्राप्त न कर सकता। विशुद्ध आध्यात्मिक आनंद सा। मगर सुख कहां लंबे टिकते हैं। डर था बिजली न चली जाए, देश में कोई झंडा झुकाऊ आदमी न मर जाए। और सबसे बड़ा डर तो था कि कस्तवारिन का। चूंकि ऐसा पहले भी कई बार हुआ जब कस्वारिन मरते-मरते बच गई। चूंकि कोई कार्यक्रम नहीं आ रहा था न? और तभी टीवी वाले कमरे में दाखिल हुए दो कार्यकर्ता और टीवी को कोने वाले बटन को पकडक़र मरोड़ दिया। इससे पहले कि कोई कुछ कह पाता फरमान सुनाया गया। कस्तवारिन चल बसीं। लोगों का अंदेशा सच में तब्दील हो गया। पता नहीं क्यों कस्वारिन राजकुमार फिल्म का ही इंतजार कर रही थी। लेकिन उस बेचारी का क्या दोष, वो न मरती तो देश में कोई और मरता। चंद्रकांता के दौरान तो मरे भी थे न वो जो झंडा झुकाऊ। - वरुण के सखाजी

ग़ज़लगंगा.dg: लोकतंत्र का मर्सिया

Written By devendra gautam on रविवार, 5 अगस्त 2012 | 9:11 pm

तुमने कहा-
अब एक घाट पर पानी पीयेंगे
बकरी और बघेरे

इसी भ्रम में हलाल होती रहीं बकरियां
तृप्त होते रहे बघेरे.

हमारे हिस्से में आया
काली दुनिया के सफेदपोशों की तर्जनी पर
कठपुतली की तरह नाचता तंत्र
कालिया नाग के फुफकार का मंत्र
और.....
पर्दानशीं तानाशाहों का रिमोट संचालित यंत्र
कार्पोरेट घरानों के कंप्यूटरों का डाटा
अंकेक्षकों की वार्षिक रिपोर्ट की प्रतिच्छाया
धन्ना सेठों का बही-खाता
जिसमें मात्र
आय-व्यय
लाभ-हानि के फर्जी आंकड़े
जिसमें हमारी रत्ती भर भागीदारी नहीं
हमारे लिये तो....
हाशिये में भी जगह खाली नहीं

और तुम्हारे हिस्से में.....?
मनचाही रोटियां सेंकने की
अंगीठी
शाही खजाने की चाबी
कई श्रेणियों का सुरक्षा घेरा
और ...
एक जादुई मुखौटा
जिसे जब चाहो लगा लो
जब चाहे हटा लो

पता नहीं यह
बाजार की आवारा पूंजी है
या आवारा पूंजी का बाजार
जो...हमारी श्वास नली में
घुयें के छल्ले की तरह रक्स करता
फेफड़ों में
बलगम की तरह जमता
हमारी जरूरियात के रास्ते में
रोडे की तरह बिछता जा रहा है

झूठ और पाखंड की यह
पैंसठ साला इमारत
दीमक का ग्रास बन चुकी है
इसके तमाम पाए खोखले हो चुके हैं
कभी भी धराशायी हो सकती है
ताश के पत्तों की तरह

अपने सर पर हाथ रखकर बोलो
क्या यह वही तंत्र है
जिसकी बुनियाद
वैशाली,मगध,तक्षशिला और पाटलीपुत्र में पड़ी थी
जिसकी कामना
रूसो, दिदरो और मांटेस्न्यू ने की थी
जिसका सपना
आजादी के दीवानों ने देखा था.

यह तंत्र तो
कबूतर की उड़ानों पर बंदिशें लगाता
और बाज के पंजे थपथपाता है
गौरैया का निवाला छीन
चील-कौओं की चोंच सहलाता है
कोयल की कूक पर झुंझलाता
 और शेर की दहाड़ पर थिरकता है

यह हमारे हिस्से का नहीं
तुम्हारे हिस्से का जनतंत्र है

हमें अपने हिस्से का जनतंत्र चाहिए
और हम इसके लिये कोई अर्जी
कोई मांगपत्र नहीं सौंपेंगे
अपने दम पर हासिल करेंगे
चाहे इसके लिये
जो भी कीमत अदा करनी पड़े.

----देवेंद्र गौतम
ग़ज़लगंगा.dg: लोकतंत्र का मर्सिया:

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करिए करिए शाहा ब्यारी..एक आध्यात्मिक आनंद

Written By बरुण सखाजी on शनिवार, 4 अगस्त 2012 | 11:41 pm

नर्मदा का रेतीला मैदान, तो कई बार ऊंची घाटी को छूते पल्लड़। यानी कभी गर्मी में तो कभी भारी बारिश तो कभी ठंड की सिहरन में भी मल मास पड़ा। पर महिलाओं में इतना जोश को सुबह 4 बजे से नर्मदा के एक महीने तक लगातार स्नान करतीं। फिर पूजन और एक बहुत ही खूबसूरत भजन गीत: करिए करिए शाहा ब्यारी, जी महाराजा अवध विहारी, इतनी सुन मैया जानकी जी बोली कहा बनी तरकारी। कहने को यह भजन था, लेकिन अध्यात्म के गहरे मंथन सा आनंद इसमें आता। नर्मदा में ठिठुरते हुए स्नान फिर बीच में भगवान की मूर्ति और फिर यह गीत। हम लोग ज्यादा नहीं समझते थे। गांवों में मनोरंजन के साधन भी कम होते हैं, इसलिए ही सही। मगर सब दोस्त टोली बनाकर इस आनंद में शरीख होते जरूर थे। कालांतर प्रकारांतर में पता चला कि यह एक धार्मिक विधि है। सभी महिलाएं मल मास (विक्रम संवत में हर तीन साल में एक महीना अतिरिक्त होता है। इसे ही मल मास या पुरुषोत्तम मास कहा जाता है) या कार्तिक मास में ब्रह्म मुहूर्त की गोधुली बेला में स्नान कर शायद पाप धोना चाहती होंगी, मगर मेरे लिए तो सिर्फ इस गीत का सुमधुर गीतात्मक आनंद जरुरी था। बचपन बीता कुछ चीजों की समझ बढ़ी। तब सालों बाद गांव पहुंचे तो देखा पहले मल मास के स्नान के लिए सुबह से ही महिलाएं घरों घर बुलौआ सा देती हुई जाती थी। यह बुलौआ महज एक आह्वन नहीं हुआ करता था, बल्कि आत्मिक रूप से माईं, चाची, बड़ी अम्मा, दादी या किसी को उनके गांव के नाम वाली फलां के नाम से पुकारती हुईं चली जाती थीं। यह कोई वंृदावन की कृष्ण भक्ति सा नजारा था, लेकिन जब में इस बार गया तो सबकुछ बदल सा गया था। अगस्त में यह मल मास चल रहा है, महिलाएं अब भी उसी नर्मदा में नहाने जा रहीं हैं। किंतु तरीका बदल गया है। पहले जो पूरा गांव एक होकर धमनी के रास्ते, ऊपर के रास्ते से नर्मदा में इकट्ठा होता था, वह अब सब अपनी-अपनी राह से नर्मदा जा रहा था। कोई किसी को नहीं बुलाता, अब बस कुछ झुंड थे। कोई एक जाति के नाम पर तो कोई एक परिवार के नाम पर। इनमें कुछ ऐसे झुंड भी थे, जो मुहल्लों के नाम पर हैं। कुल संख्या में भी कमी आई थी। मेरे लिए यह सब रोमांचक था, चूंकि शहरी परिवेश ने जो दिया सो दिया लेकिन सुबह जल्दी उठने की अच्छी आदत वह हमेशा के लिए लेकर उड़ गया। लेकिन करिए करिए शाहा ब्यारी की एक सुरमयी धुन अभी भी कानों में तैर जाती है, तो एक आध्यात्मिक संगीत मन के भीतर कहीं बज उठता है। निश्चित तौर पर यह एक धार्मिक विधि और पापों से मुक्ति का एक जरिया थी। किंतु यह प्रक्रिया गांवी सहजता, अपने कर्मोंं के साथ ईश्वरीय चिंतन, सबके बीच के प्रेम, उत्सवी भारतीय मानस, को प्रतिबिंबित करती थी। पूरी जिंदगी भले ही सही और गलत के बीच फैसला न कर सके हों, किंतु एक डुबकी इस नाम पर लगाना कि जो कुछ गलत किया उसके लिए माफी अच्छी बात थी। यह उस युगबंधक मनुष्य के मानस पर एक तमाचा भी है, जो यह मानता है कि युग बदला है तो हम सतयुग या अच्छे युग के कैसे हो सकते हैं। एक अलग इंसानी फितरत भी यहां झलकती है कि इंसान चाहे कितना ही आगे पीछे, ऊपर नीचे चला जाए मगर वह अपने गलत कामों को सुधारने की कोशिश करता ही रहेगा। सालों बाद के गांवी गुटों को देखकर तकलीफ होती जरूर है, किंतु यह सोचकर कि इंसान हमेशा सुधरने की कोशिश करता है। इस मामले में भी वह आज नहीं, कल नहीं परसों जरूर अपने मुहल्ला गुटों को खत्म करके एकल गांवी गुट बन सकेंगे। चूंकि इन दिनों मल मास चल रहा है और यह महिलाएं स्नान भी कर ही रहीं है, तो मुमकिन है वे फिर चाची, दादी, बड़ीअम्मा, नन्हेघर की दादी, नैलापुर वाली, कैलकच्छ वाली, भौजी आ जाओ चिल्लाती हुईं नर्मदा जरूर जाएंगी। और मुझे वो गीत सुनने मिलेगा करिए करिए शाहा ब्यारी, जी महाराज अवध विहारी, इतनी सुन मैया जानकी जी बोलीं कहा बनी तराकारी। करिए करिए शाहा ब्यारी... वरुण के सखाजी चीफ रिपोर्टर, दैनिक भास्कर, रायपुर

ग़ज़लगंगा.dg: हमने दुनिया देखी है

Written By devendra gautam on शुक्रवार, 3 अगस्त 2012 | 9:19 pm

भूल-भुलैया देखी है.
हमने दुनिया देखी है.

उतने की ही बात करो
जितनी दुनिया देखी है.

हमने झिलमिल पानी में
अपनी काया देखी है.

तुमने मन के उपवन में
सोनचिरईया देखी है?

उसको देख नहीं पाया
उसकी माया देखी है.

इक मुद्दत के बाद यहां
इक गोरैया देखी है.

लहरों में हिचकोलें खाती
डगमग नैया देखी है.

--देवेंद्र गौतम  
ग़ज़लगंगा.dg: हमने दुनिया देखी है:

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Saleem Khan