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जानवरों की तरह कहीं भी ,कभी भी, किसी से भी ,

Written By S.M Masum on रविवार, 31 मार्च 2013 | 8:16 pm

वोह औरतें या मर्द जो जानवरों की तरह कहीं भी ,कभी भी, किसी से भी ,शारीरिक सम्बन्ध बना लेने को गलत नहीं समझते यदि अपने शरीर का प्रदर्शन करते दिखाई दें तो बात समझ में आती है लेकिन आश्चर्य तो उस समय होता है जब वो लोग जो इस्लाम के कानून को मानने का दावा करते हैं अपने शरीर का प्रदर्शन करते नजर आते हैं| 

कई बार तो महरम और नामहरम की परिभाषा भी यह बदल देते हैं |कभी किसी नामहरम के करीब जाते हैं तो कहते हैं बेटी जैसी है, कभी कहते हैं बहन जैसी है | वहीं इस्लाम कहता है यह नामहरम है इस से पर्दा करो | “अल्लाह ओ अकबर “ का नारा लगाने वाले ऐसे दो चेहरे वाले मुसलमानों के यहाँ होता वही है जो यह चाहते हैं या जो इनका खुद का बनाया कानून कहता है |क्योंकि सवाल नामहरम औरत की कुर्बत का है| अल्लाह कहता है दूर रहो ,इंसान का दिल कहता है औरत के करीब रहो |जीत इन्सान के दिल की गलत ख्वाहिशों की होती है और नतीजे में कभी बलात्कार होता है कभी व्यभिचार होता है |जब औरत के शरीर के करीब रहने की लालच इंसान को अल्लाह से दूर कर देती है,इस्लाम के कानून को भुला देता है तो दौलत और शोहरत की लालच के आड़े आने वाले इस इस्लाम के कानून को भुला देने में कितनी देर लगेगी | 

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चाँद आंसू, चंद अलफ़ाज़ ( ग़ज़लनुमा कविताएँ )

Written By Dilbag Virk on शुक्रवार, 22 मार्च 2013 | 9:10 pm

अरे भई साधो......: पशु प्रताड़ना की चिंता तो कीटों की अनदेखी क्यों

आज पशु क्रूरता निवारण में कई सरकारी गैर सरकारी संस्थाएं लगी हुई हैं लेकिन पता नहीं क्यों कीट पतंगों की सुधि नहीं ली जाती. आखिर वह भी तो कुदरत के बनाये जीव हैं और डार्विन के सिद्धांतों को माना जाये तो उनका अस्तित्व मनुष्य जाति की उत्पत्ति से बहुत पहले से है. एक मायने में वे बंदर से भी प्राचीन पूर्वजों की श्रेणी में आयेंगे.
हर दिन पता नहीं कितने करोड़ मच्छर बेमौत मारे जाते हैं. कितने ही काक्रोचों की बलि चढ़ती है.माना कि कीट-पतंगो की श्रेणी के जीव अल्पजीवी होते हैं. लेकिन क्या उन्हें स्वाभाविक मौत नसीब नहीं होनी चाहिए. उनकी हत्या के लिये दवायें खुलेआम बाजार में बिक रही हैं. उनका मूल्य उनकी मारक क्षमता के अनुरूप तय किया जाता है. कहीं कोई रोक-टोक नहीं. न जाने कितनी कंपनियां उन्हें मारने के आसान उपायों पर रात दिन शोध करा रही हैं. उनकी नन्ही सी जान सबकी आंखों में कांटा की तरह चुभती रहती है. उनके संरक्षण के लिये कोई कानून नहीं. हाल में गौरैया दिवस मनाया गया. अन्य कई पशुओं और चिड़ियाओं को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा प्रदान की जाती है. क्या आजतक किसी कीट के लिये कोई दिवस घोषित हुआ. उसके प्रति प्रेम या श्रद्धा का भाव प्रदर्शित किया गया. क्या कीट सुंदर नहीं होते. उन्हें नष्ट कर दिया जाना चाहिए. बताइये भला

---देवेंद्र गौतम
अरे भई साधो......: पशु प्रताड़ना की चिंता तो कीटों की अनदेखी क्यों:

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Life is Just a Life: बनाते हैं हम मिटाते हो तुम Banate hain ham Mitate ...

Written By Neeraj Dwivedi on रविवार, 17 मार्च 2013 | 12:27 am

Life is Just a Life: बनाते हैं हम मिटाते हो तुम Banate hain ham Mitate ...: बनाते  हैं  हम  मिटाते  हो तुम , जगाते  हैं  हम  सुलाते  हो तुम। छीना झपटी में माहिर होते जो हैं , उन्ही को ही  बर्दी चढाते हो तु...

Life is Just a Life: पक चुका है नासूर भारत वालों pak chuka hai nasoor

Written By Neeraj Dwivedi on शुक्रवार, 15 मार्च 2013 | 7:22 pm

Life is Just a Life: पक चुका है नासूर भारत वालों pak chuka hai nasoor: कब गुजरेगा ये कुहासा दिल्ली से भारत के दिल से ? नेतृत्व की एतिहासिक चुप्पी , राजनैतिक नपुंसकता , दरबारी षणयंत्र , अनैतिक नै...

मै आतंकी बनूँ अगर माँ खुद “फंदा” ले आएगी


प्रिय दोस्तों इस रचना को ( कोई नहीं सहारा ) ३.३.२०१3 के दैनिक जागरण अखबार में कानपुर रायबरेली (उ.प्रदेश भारत ) आदि से प्रकाशित किया गया रचना को मान और स्नेह देने के लिए आप सभी पाठकगण और जागरण जंक्शन का बहुत बहुत आभार
भ्रमर ५
हम सहिष्णु हैं भोले भाले मूंछें ताने फिरते
अच्छे भले बोल मन काले हम को लूटा करते
भाई मेरे बड़े बहुत हैं खून पसीने वाले
अत्याचार सहे हम पैदा बुझे बुझे दिल वाले
कुछ प्रकाश की खातिर जग के अपनी कुटी जलाई
चिथड़ों में थी छिपी आबरू वस्त्र लूट गए भाई
माँ रोती है फटती छाती जमीं गयी घर सारा
घर आंगन था भरा हुआ -कल- कोई नहीं सहारा
बिना जहर कुछ सांप थे घर में देखे भागे जाते
बड़े विषैले इन्ही बिलों अब सीमा पार से आते
ज्वालामुखी दहकता दिल में मारूं काटूं खाऊँ
छोड़ अहिंसा बनूँ उग्र क्या ?? आतंकी कहलाऊँ ?
गुंडागर्दी दहशत दल बल ले जो आगे बढ़ता
बड़े निठल्ले पीछे चलते फिर आतंक पसरता
ना आतंक दबे भोलों से – गुंडों से तो और बढे
कौन ‘राह’ पकडूँ मै पागल घुट घुट पल पल खून जले
बन अभिमन्यु जोश भरे रण कुछ पल ही तो कूद सकूं
धर्म युद्ध अब कहाँ रहा है ?? ‘वीर’ बहुत- ना जीत सकूं
मटमैली इस माटी का भी रंग बदलता रहा सदा
कभी ओढती चूनर धानी कभी केसरिया रंग चढ़ा
मै हिम हिमगिरि गंधक अन्दर ‘अंतर’ देखो खौल रहा
फूट पड़े जो- सागर भी तब -अंगारा बन उफन पड़ा
समय की पैनी धार वार कर सब को धूल मिला देती
कोई ‘मुकद्दर’ ना ‘जग’ जीता अंत यहीं दिखला देती
तब बच्चा था अब अधेड़ हूँ कल मै बूढा हूँगा
माँ अब भी अंगुली पकडे हे ! बुरी राह ना चुनना
कर्म धर्म आस्था पूजा ले परम -आत्मा जाने
प्रतिदिन घुट-घुट लुट-लुट भी माँ ‘अच्छाई’ को ‘अच्छा’ माने
भोला भाला मै अबोध बन टुकुर टुकुर ताका करता
खुले आसमाँ तले ‘ख़ुशी’ को शान्ति जपे ढूँढा करता
मै आतंकी बनूँ अगर ‘माँ ‘ खुद “फंदा” ले आएगी
पथरायी आँखे पत्थर दिल ले निज हाथों पहनाएगी
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल ‘भ्रमर’ ५
प्रतापगढ़ उ प्र

Sahitya Surbhi: सम्मान स्त्रीत्व का ( चोका )

Written By Dilbag Virk on शुक्रवार, 8 मार्च 2013 | 8:34 pm

Sahitya Surbhi: सम्मान स्त्रीत्व का ( चोका ): अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ -  होती गोष्ठियाँ दिए जाते भाषण हालात वही लुटती महिलाएँ सरे-बाजार महिला...

स्त्री-पुरूष

(महिलाओं की स्थिति पर एक कविता)


तुम (पुरूष)
सहज सकते हो
केवल
अपना अहम्
वह (स्त्री) सहेजती है
पीड़ा‌ और दर्द

पुरूष शब्द
तुम्हारे मस्तिष्क
और
तुम्हारी सोच को
खाली कर चुका है
विपरीत इसके
स्त्री भरी रहती है हमेशा
अपनी आँखों में आँसू
क्योंकि
इकठ्ठा करना जानती है वह

भरी रहती हैं हमेशा
उसकी दोनों आँखें
इसलिए तो
पलकें नम रहती हैं
और
उसके सुख
जगह नहीं मिलने पर
लौट जाते हैं खाली हाथ

पुरूष से स्त्री का
भेद सिर्फ इतना है
कि
स्त्री
वह शब्द है
जब
कहा जाए
परिभाषा लिखो दुःख की
तो
मात्र एक शब्द ही पर्याप्त है
स्त्री

सादर ब्लॉगस्ते!: शोभना फेसबुक रत्न सम्मान प्रविष्टि संख्या - 14

Written By Dilbag Virk on रविवार, 3 मार्च 2013 | 8:56 pm

सादर ब्लॉगस्ते!: शोभना फेसबुक रत्न सम्मान प्रविष्टि संख्या - 14: ग़ज़ल सोचो तुम तन्हाई में  लुटते हम दानाई में । उथले जल में कुछ न मिले  मिलता सब गहराई में । दौलत को सब कुछ माना  उलझे ...

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Saleem Khan