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जो सेठ प्रेस में हो वह किसी और पेशे में न हो....

Written By बरुण सखाजी on सोमवार, 28 अप्रैल 2014 | 2:01 am


प्रेस की आजादी की जब भी बात होती है, तो दो बातें सामने आती हैं। पहली तो यह कि आजादी छीन कौन रहा है और दूसरी यह कि आजादी छीनी कोई क्यों रही है। पहली बात तो सीधी और सपाट है, कि यह आजादी वही छीनना चाहेगा, जिसकी अपनी नकारात्मक आजादी खतरे में होगी। इसे आजादियों का आपसी झगड़ा भी कह सकते हैं। यानी नकारात्मक आजादी सकारात्मक आजादी को छीन लेना चाहती है। इस पर तो हमारा जोर नहीं है। अगर कोई आजादी छीन रहा है, तो हम लड़ेंगे और लड़ते रहेंगे। बेशक यह होना भी चाहिए। मगर क्या इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि आजादी आपकी बची रहेगी। यह निरंतर चलते रहने वाली प्रक्रिया है। कभी आप अपनी आजादी को बचा पाएंगे, तो कभी नहीं। मगर दूसरी बात जरूर आपके हाथ में है और नतीजे लेकर आने वाली मजबूत बात है।
यह बात है कि आजादी छीनी क्यों जा रही है। अगर हम इसके मंथन में जाएंगे, तो 5 प्रमुख बातें पाएंगे।
पहली, तो यह कि आजादी छीनने के लिए हम खुद ही दोषी हैं। जब हम कमिश्नर के बंगले पर बिल्ली और मिका सिंह के किस वाले केस लगातार दिखाते हैं, तभी हम अपनी आजादी को गिरबी रख देते हैं।
दूसरी, जब हम किसी खास मामले में यहां उदाहरण नहीं दूंगा, बाइस्ड होकर बात करने लगते हैं, तो अपनी आजादी को बेच देते हैं.
तीसरी, टीआरपी और आईआरएस के सर्वे हमें परेशान करते हैं। उदाहरण दूंगा, कि आईआरएस के सर्वे में कोई अखबार बहुत आगे है, इसके दो कारण हैं एक तो वह बेहद कस्टमाइज खबरें छापता है, दूसरा वह भाषाई स्तर पर अंग्रेजी का बेइंमतहां इस्तेमाल करता है। ठीक ऐसे ही अंग्रेजी को अखबार भी हैं, जो बेहद सरल इज आर एम वाली अंग्रेजी का इस्तेमाल करते हुए फख्र से कहते हैं, वी आर नॉट इन जर्नलिज्म, रादर इन एटवर्टाजिंग इंडस्ट्री। बस यहीं खत्म हो जाते हैं।
चौथी, ऑगसटस हिक्की से लेकर आज के कोई मुहल्ला अखबार तक, कहीं भी कोई ऐसा सिस्टम नहीं है, कि कोई विचारशील व्यक्तित्व सीधा किसी स्थान पर बैठ सके। अकेडमीज क्या पढ़ाती हैं और क्या जमीन पर होता है, इस फर्क को बताने की जरूरत नहीं है।
पांचवी, मालिकान के अपने व्यावसायिक हित। यह बात निबंध की तरह लगेगी, किंतु इसका समाधान है।
समाधान है, हमारे पास। इस दिशा में हम काम भी कर रहे हैं। हम लोग ऐसे केस खोज रहे हैं, कि जिससे यह साबित कर सकें, कि फलां सार्वजनिक हित का ऐसा केस था, जिसे मीडिया ने ऐसा बना दिया, इसके पीछे मीडिया की यह मंशा थी। अगर हम इसे कर पाए, तो जरूर दुनिया में यह मील का पत्थर साबित होगा। इसमें हम ऐसे कमसकम 200 केस लेंगे, जिनके बीहाफ पर कोर्ट में एक पीआईएल के रूप में लिटिगेशन दायर की जा सके। इसमें हमारी मांग होगी कि देश में अखबार को व्यवसाय से दूर कर दिया जाए।
जो व्यक्ति भी अखबार निकालेगा वह किसी दूसरे व्यवसाय में नहीं जा सकता। यह चौंकाने वाली बेहूदा सी बात है। बेशक ऐसा ही है। चूंकि सवाल उठेंगे, कि पत्रकारों का आर्थिक हालत खराब हो जाएगी, मालिकान के संपादक होने से संपादक नाम की संस्था खत्म हो जाएगी, कई बड़े संस्थान हैं, जो नो लॉस नो प्रॉफिट में काम कर रहे हैं वे ऐसा नहीं कर पाएंगे, मालिक जब दूसरा धंधा नहीं करेगा, तो वह इसमें ही काला पीला करेगा। तमाम सारे ऐसे सवाल हैं, जो मौजूं हैं। बहुत सही हैं।
किंतु दोस्तों हम करना भी यही चाहते हैं। पहली आशंका कि पत्रकारों की आर्थिक हालत खराब हो जाएगी, तो बिल्कुल सही है। हो जाएगी, मगर अभी कौन सी अच्छी है। नौकरीनुमा पत्रकारिता में एक रिपोर्टर न्यूज एक्जेक्यूटिव बन कर रह गया है। उसे अपने स्रोत को पटाए रखते हुए संस्थान की चाही गईं खबरों में से खबरें देना है। तब वह पत्रकार कहां रहा? जब वह अपने दिल के विद्रोह को जाहिर ही नहीं कर पा रहा तो कैसा पत्रकार। जबकि स्वतंत्र पूर्ण समय पत्र से जुड़ेगा, तो वह खुद की अपनी एक इमेज स्थापित करेगा। टैग जर्नलिस्ट नहीं रहेगा, कि फलां के ढिमकां जी। जब यह एक मिशन बन जाएगा, तो खुदबखुद इसमें पत्रकार अपनी हिस्सेदारी करेगा, न कि नौकरी। सुबह उंगली से पंच करो, शाम को रिपोर्ट बनाओ कि कितनी खबरें पढ़ीं आपने।
अब आशंका नंबर 2 पर आते हैं, कि संपादक नाम की संस्था खत्म हो जाएगी, तो भैया अभी कौन सी जिंदा है। कितने संपादकों के केबिन में बुक शेल्फ है, कितने संपादकों के पास अपना कोई दुनिया को बदल देने का जज्बा है। संपादक शब्द से यही उम्मीद की जाती है। यह भैया नौकरी है, बस। पाठक को केंद्र में रखकर उसके लिए कुछ ऐसी सूचनाएं देना, जो उसके काम की हों। यानी रायपुर की चमक को बस्तर की तपती जिंदगी नहीं देनी
तीसरी बात यानी आशंका मालिक जब दूसरा धंधा नहीं करेगा, तो इसीसे कालापीला करेगा। भैया इसमें कौन सी बुराई है, अभी ऐसे लोग कालापीला कर रहे हैं, जो नीचे वालों को चूस रहे हैं। अगर तब हमारा अपना आदमी कोई कालापीला कर लेगा तो क्या हो जाएगा। यह तो मजाक रहा, किंतु सत्य यह है कि इस उद्योग से सबसे पहले तो कचरा हटेगा, पैसा कमाने वालों का। दूसरा विचारवानों के पास बहुत कुछ रहेगा, अपना करने का.
हम कोई ऐसी स्वर्ण व्यवस्था की बात भी नहीं करने जा रहे, जिससे कि सतयुग आ जाएगा, हम तो बस इसे रिप्लेस करके इससे बेहतर लाना चाहते हैं। ऐसे ही रिप्लेसमेंट से एक दिन वास्तव में सतयुग ला पाएंगे।
अगर आपके पास ऐेसे केस दस्तावेजों के साथ हैं, जिनसे यह साबित हो कि फलां मामला इतनी बड़ी जनसंख्या से जुड़ा था, इतने व्यापक असर वाला था, लेकिन मीडिया ने अपने इस आर्थिक कारण से उसे दबा डाला, तो हमें बताएं। हम इस पर काम कर रहे हैं।
धन्यवाद।
-सखाजी

सब मिल बोलो मोदी लहर नहीं है...

Written By बरुण सखाजी on शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014 | 4:27 pm

जिनका है उन्हें क्रेडिट.
भूतों से डरने की ज़रूरत नहीं, तेज स्वर में बोलो भूत नहीं होता...मोदी की लहर नहीं एक स्वर में बोलो कोई लहर नहीं...कोई कहे विकास, रोड, पानी, नौकरी, स्थाई अर्थ व्यवस्था, ग्रोथ...तो मोहन के पास मैडम के सिखाये मंत्र हैं न...
धर्म निर्पेक्षताये नमः,
मुस्लिमों पे खतराए नमः,
गुजरात दंगाये नमः
इन्दिराए नमः,
१२५ साल पुरानी पार्टिये नमः
बम में मरे बलिदानाए नमः

१० साल तक इतना काम किया कि, देख ही नहीं पाए चारों तरफ अँधेरा छा गया. घुप अन्धकार, सियारों की आवाजें, सांपों का सड़कों पर खुल्ला घूमना और भी न जाने क्या-क्या है रास्ते में. न जाने क्यों घडी नहीं देख पाए, तभी तो खराब घडी आ गई है. मगर करते भी क्या, पीएमओ में काम ही इतना रहता है. कोई कितना भी चाहे मगर वक्त पर नहीं निकल सकता. फिर आखिर में दिन भर की रिपोर्ट भी तो मैडम लेती हैं. इन्हें बताना पड़ता है, दिन भर में मीडिया ने कितना लताड़ा, उसके बदले में आपने कितना उन्हें कोसा, कल की तुलना में कुछ कम लताड़ा तो उपलब्धि वरना खतरा, किसी मंत्री ने कोई अकेले ही तो करप्शन नहीं कर डाला, मैडम और मुझे पता ही न चला हो, पता चला तो कोई बात नहीं मगर बिना बताये ऐसा करने पर अनुशासन भंग की कार्रवाई क्यों नहीं की, ऊपर से शाम होते ही पत्नी एसएमएस करने लगती है, कब तक आओगे, भिन्डी खाते नहीं हो चिकेन डॉक्टर ने मन किया है, बताओ क्या खाओगे, ज्यादा लेट किया तो फोन आ जाता है, मोबाइल नहीं उठाया तो आफिस के नंबर पे लगा देती है. वो पारख स्साला शाम होते ही फोन पे किसी न किसी बहाने से डट जाता है, फोन उठाके बोलता था मैडम का फोन है...घर वाली मैडम का....सरकार वाली नहीं. घर वाली मैडम फोन पे दहाड़ती और कहती तुम्हे किसने कहा था पीएम की नौकरी करो.
जिनका है उन्हें क्रेडिट.
आरबीआई में कितने मजे थे. मुझे तुम पर उसी वक्त से गुस्सा आता है, जब तुमने मेरी एक न सुनी. तुम अमेरिका के कुछ बनियों के चक्कर में देश में उदारवाद की बातें कर रहे थे. वो तो मेरी मति मारी गई थी, जो उसी वक्त पंजाब न चली गई. तुम्हे तभी रोकना था, जब वित्त मंत्री बने थे. लेकिन मैंने सोचा चलो भाई जिसके लिए अर्जुन, मोतीलाल, विध्याचरन, नरसिम्हा ओंधे मुह गिरते थे, वो तुम्हे तुम्हारी अमेरिकी दोस्तों से दोस्ती की क़ाबलियत पर मिल गया. मगर तुम ऐसी नौकरी में फसोंगे सोचा न था. थोडी ही देर में फिर फोन घनघनाया,...इस बार बारू ने उठाया..मोहन की तरफ मुस्कुराते हुए लो भाई किसी बच्चे की आवाज़ है...वहाँ बाहुल बाबा की आवाज़ थी....अंकल मेरे लिए आते समय कनाट प्लेस से गाँव, गरीब, किसान के टेटू लेते आना. वो चुनाव हैं न तो माँ ने कहा है गाँव, गरीब, किसान को पहचान. मोहन के पास पहले से क्या कम काम थे.
आज तो बड़ी घबराहट हो रही है, डर लगने लगा है. यूँ तो मोहन रोज पीएमओ में काम ख़तम करते-करते लेट होता था. रोज़ सियारों की आवाजे और सांपो को सड़कों पे देखता था, मगर किसी तरह से स्कूटर इधर-उधर करके चला जाता था..इस बार वह थोडा ज्यादा डरा हुआ है. दरअसल जयराम रामेश ने दोपहर में आके कहा था रस्ते में मोदी की लहर है, तब से ही मोहन परेशान था. बारू और पारख ने बहुत समझाया मोदी एक नेता है...उसकी लहर है चुनाव को लेकर...लेकिन इससे डरना क्या...दरअसल मोहन मोदी लहर यानी कोई भूत समझ रहे थे. मोहन से पंकज पचोरी ने भी कहा, डोंट वरी सर....जिस चीज से डर लगे इसके खिलाफ बोलते जाओ डर...और मन से कहो मोहन तुम्हे किसी चीज से डर नहीं लगता बस...जाओ फिर.
जिनका है उन्हें क्रेडिट.
मोहन को राहत मिली. उसने रट लगाईं, मोदी की कोई लहर नहीं है....मोदी की कोई लहर नहीं है...वह आगे जाता गया, बहुत आगे कपिल की साईकिल मिल गई...मोहन बोला कपिल मोदी की कोई लहर नहीं है...कपिल बोला हाँ मोहन कोई लहर नहीं है, डरो मत मैं भी यही कहते हुए जा रहा हूँ...मोहन का स्कूटर तीसरे गियर में था...जय राम रामेश पैदल मिले, मोहन ने कहा जय राम मोदी की कोई लहर नहीं है...रमेश ने कहा हाँ मोहन डरो मत इतनी ज्यादा लहर भी नहीं है...मोहन का डर और बढ़ गया...आगे नटखट दिग्गी मिला, मोहन ने हाथ हिलाया बोला मोदी की कोई लहर नहीं है...दिग्गी ने भी कहा कोई लहर नहीं है...उसे तो दिल्ली के बुखारी बाबा ने भगा दिया है....मोहन को ताकत मिली...ऐसे ही मनीष, अभिषेक, अहमद, जनार्दन, अंटोनी, मोइली, नबी आदि मिलते मोहन सबसे कहता मोदी की कोई लहर नहीं है... वे सब भी मोहन का बताते मोदी की कोई लहर नहीं....
मोदी लहर का भूत थोडा कमजोर पड़ा. लेकिन मोहन को अब सबसे बड़ी परीक्षा देना थी....बड़ी खाई पड़ती है. इसमें विख्यात है कि कई तरह के भूत रहते हैं. मोहन की घिग्घी फिर से बांध गई, ठीक वैसे ही जैसे १० सालों से बंधी थी....
जिनका है उन्हें सप्रेम क्रेडिट.
खाई में दाखिल होते ही आवाज़ आई विकास...मोहन बोला नहीं मैं मोहन...फिर आवाज आई विकास...मोहन बोला नहीं मैं मोहन हूँ... फिर से आवाज़ आई गुजरात की सड़के..मोहन बोला नहीं अभी तो भूतों वाली खाई है. फिर आवाज़ आई नदियों को जोड़ेंगे, मोहन बोला भाई जो करना है कर लो बस मुझे घर जाने दो...मोदी लहर नहीं है...मोहन ने कहा. फिर आवाज़ आई...विकास...मोहन समझ गया अब वह पूरी तरह से भूतों के घेरे में है लाख कहे मोदी लहर नहीं है या भूत नहीं है तो भी भूत उसे छोड़ेंगे नहीं आज तो मर गया...इधर पत्नी का फोन फिर बजा...आवाज़ आई मोहन तुम अभी पीएमओ में हो या १० जनपथ पे...मोहन का गला सूख रहा था...आवाज़ नहीं निकल रही थे...बस इतना बोला घर आ पाया तो ज़रूर बताऊंगा..और फोन काट दिया.
मोहन ने मैडम के सिखाये मन्त्र पढ़े, जब भी कोई विकास, सड़क, बिजली, पानी, रास्ते, राजमार्ग, रोजगार जैसे भूतों से तुम्हारा सामना हो तुम इन मंत्रो का जाप करना...मोहन चिल्लाया...
धर्म निर्पेक्षताये नमः
मुस्लिमों पे खतराये नमः 
गुजरात दंगाये नमः
बस इन मन्त्रों के पढ़ ही रहा था की पीछे से कई आवाज़े इन्ही मंत्रों का रिपीट जाप कर रही थी...
धर्म निर्पेक्षताये नमः
मुस्लिमों पे खतराये नमः 
गुजरात दंगाये नमः
मोहन ने पीछे मुडके देखे...तो कपिल, अभिषेक, दिग्गी, बाहुल बाबा, रियंका दीदी, कॉर्पोरेट वाड्रा, सोना चांधी, मनीष, नबी आदि थर थर कम्पते हुए इस मन्त्र का जाप कर थे.
जिनका है उन्हें सप्रेम क्रेडिट.
पास ही में अदानी, अम्बानी, अदानी, अम्बानी का जाप करते हुए एक "जाम आदमी" गले में मफलर लगाये खड़ा था....एक "हाथी" पे बैठी जोगन जाप कर रही थी मुस्लिमों पे अत्याचार नहीं होने देंगे....तो साईकिल की घंटी बजाते हुए गिर के सिंहों का पीछा करते हुए "उत्त पदेश" का नेता भाग रहा था...बिहार में सरकारी राम मंदिर बनाने वाला एक दडियल बार बार सांसे लेके छोर रहा था...जैसे डर के मारे पगला गया हो.
विकास, सबके लिए खाना, सबके लिए नौकरी, स्थाई अर्थ व्यवस्था, हाई सेंसेक्स, दो अंकों में ग्रोथ, बड़ी सड़के, पानी भरपूर, सर्वश्रेष्ठ मॉस ट्रांसपोर्टेशन आदि आदि कुछ अजनबी से आवाज़े आ रही थे,,,,इनका सामना कर रहे लोग थर थर काँप रहे थे...मोहन ने आवाज़ लगाई भागो भाई....मोदी की लहर आई...
- सखाजी.

Life is Just a Life: मुक्तक - भगत सिंह के नारे

Life is Just a Life: मुक्तक - भगत सिंह के नारे:

जब जब आँखें होतीं बदरा, भाव मेरे बूँदें बन आते,
जब भी बरसा मीठा अम्बर, श्वर मेरे कविता बन जाते,
जीवन की रागनियाँ बजती, और नील गगन में तारे,
सपनों के सरगम पर नाचें, भगत सिंह के नारे।

Life is Just a Life: मुक्तक - तेरे बिन

Written By Neeraj Dwivedi on गुरुवार, 24 अप्रैल 2014 | 8:09 am

Life is Just a Life: मुक्तक - तेरे बिन:

मुक्तक -
तेरे बिन

तुझको जीतूँ
लक्ष्य है मेरा, तुझसे जीत नहीं चहिए,
तेरी जीत
में जीत हमारी, तेरी हार नहीं चहिए,
तू मेरा प्रतिमान
किरन है, जो मैं सूरज हो जाऊँ,
तू मेरा सम्मान
किरन है, जो मैं सूरज हो जाऊँ,
तेरे बिन
उगने ढलने का भी, अधिकार नहीं चहिए,


तेरे बिन
जीने मरने का भी, अधिकार नहीं चहिए।

Life is Just a Life: मैं, तुम और हम Main Tum aur Hum

Written By Neeraj Dwivedi on बुधवार, 9 अप्रैल 2014 | 8:43 am

Life is Just a Life: मैं, तुम और हम Main Tum aur Hum: मैं, तुम और हम होने का एहसास उस वक्त जब हम, हम नहीं थे मैं और तुम थे, उस वक्त जब आसमां के टुकड़े टुकड़े हो चुके थे और हर टुक...

श्री रामचन्द्र जी के साथ यह अन्याय क्यों?

Written By DR. ANWER JAMAL on सोमवार, 7 अप्रैल 2014 | 12:17 pm

चाय के ठेले पर विकास पुरूष

के बाद अब एक अहम सवाल
श्री रामचन्द्र जी के साथ यह अन्याय क्यों?
सांप्रदायिक तत्व धर्म के झंडे लेकर चलते हैं लेकिन मक़सद अपने पूरे करते हैं जो कि धर्म के खि़लाफ़ होते हैं। इसीलिए ये धार्मिक सत्पुरूषों को पीछे धकेलते रहते हैं।
राम मंदिर का मुददा गर्माने और भुनाने वाालों ने प्रधानमंत्री पद के लिए रामचन्द्र जी के वंश में से किसी का नाम आगे क्यों नहीं बढ़ाया?
क्या इन सांप्रदायिक तत्वों को श्री रामचन्द्र जी की सन्तान में कोई योग्य व्यक्ति ही नज़र नहीं आया या फिर उन्हें गुमनामी के अंधेरे में धकेलने वाले यही तत्व हैं?
रामकथा के अनुसार सारी धरती मनु को दी गई थाी और इसी उत्तराधिकार क्रम में यह श्री रामचन्द्र जी को मिली थी लेकिन आज उनके उत्तराधिकारी वंशजों के नाम दुनिया वाले तो क्या स्वयं भारत में उनके श्रद्धालु भी नहीं पहचानते।
श्री रामचन्द्र जी के साथ यह अन्याय क्यों?
यही बात मुसलमानों को भी समझ लेनी चाहिए कि उनके लीडर किसी दीनदार आलिम को अपना रहबर क्यों नहीं मान लेते?
इसके पीछे भी यही कारण है कि ये लीडर दीन के मक़सद को नहीं जो कि अमन और भाईचारा है बल्कि अपने लालच को पूरा करने में जुटे हुए हैं।
चुनाव का मौक़ा इन मौक़ापरस्तों को पहचानने का महापर्व होता है। जनता इन्हें अच्छी तरह पहचान रही है।

Life is Just a Life: समर्पण Samarpan

Written By Neeraj Dwivedi on मंगलवार, 1 अप्रैल 2014 | 8:41 pm

Life is Just a Life: समर्पण Samarpan: समर्पण मैंने कभी नहीं चाहा कि तुम बदलो कभी रत्ती भर भी मेरे लिए, हाँ बुरा लगा है मुझे कई बार बताया भी तुम्हे खुद को समझा...

Founder

Founder
Saleem Khan