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वाह बस्तर वाह

Written By बरुण सखाजी on रविवार, 31 मई 2015 | 1:15 am

आदिवासियों का क्या यही इस्तेमाल है। मैंने उनके साथ फोटो खिंचवा ली। बस्तर के जिस रास्ते में ये लोग चमकदार पोशाक में मिले वहां ये किसी सवर्ण के भव्य विवाह समारोह में बैंड बजाने आए थे। फिर आप इनकी युवतियों के अर्धनग्न चित्र ड्राॅइंग रूम में सजा लीजिए। कुछ आर्ट दीवार पर टांग लीजिए। कुछ राॅट आयरन इत्यादि के बस्तर आर्ट शोभायमान कर लीजिए। लेकिन इनकी जिंदगी में कोई मुकम्मलियत मत दीजिए। सरकारों के हेल्पिंग हैंड भी भरोसे के साथ नहीं जाते। वे एक हाथ में दूध भात तो दूसरे हाथ में इनके जीवन का सहारा जंगल छीन लेना चाहते हैं। बैलाडीला खोखला हो रहा है। टाटा, एस्सार, एनएमडीसी आदि बस्तर की कोख से सब निकाल बेच देना चाहते हैं। प्रेस, गैर सरकारी संगठन, समाजसेवी अपने अलग ही मकसद से यहां दाखिल होते हैं। बड़ी भारी होटलों में सेफ घुसकर मीडिया बस्तर के बीहड़ का ग्राउंड जीरो दिखाता है। चंद गांवों में लकड़ियों की झौंपड़ियों में विपन्नता में दो पाव धान ले देकर गैर सरकारी संगठन चले जाते हैं और वस्त्र विहीन बुड्ढे आदिवासियों को सत्यनारायण की कथा वाली धोती देते हुए फोटो खिंचवाकर समाजसेवी चले जाते हैं।
ऐसे में इनके साथ तपती धरती, जलते सूरज और उफनते नालों व बीहड़ जंगल के खूंखार जानवरों के बीच माओवादी ही रहते हैं। हर कदम पर हमकदम। तब न तो आदिवासियों की किस्मत बदलनी है और न ही माओवाद खत्म होना है।
-सखाजी
(पहली बस्तर यात्रा के अनुभव)

परलोक में सैटेलाइट: व्यंग्य का जीवंत नायक

Written By बरुण सखाजी on शुक्रवार, 29 मई 2015 | 2:19 am

डॉ. सुभद्रा राठौर,
बी-81,  वीआईपी इस्टेट, खम्हारडीह, रायपुर (छत्तीसगढ़)
विज्ञान और विश्वास के अद्भुत मणिकांचनीय योग से पैदा हुई बरुण सखाजी की कृति ''परलोक में सैटेलाइट'' साहित्य जगत के साथ-साथ आम पाठक को भी अच्छी खासी दस्तक देती है। एक ओर ''परलोक'' है, जिसका संबंध मिथक से है, पौराणिक गल्प से है तो दूसरी ओर है ''सैटेलाइट'', जो विशुद्ध वैज्ञानिक युग की देन है। शीर्षक पर नजर फेरते ही तत्काल समझ में आ जाती है यह बात कि लेखक की दृष्टि सरल नहीं बंकिम है।आलोच्य कृति व्यंग्य है, जिसे हास्य की पांच तार की चासनी में खूब डुबोया, लपेटा गया है। व्यंग्य पितामह हरिशंकर परसाई की परंपरा के अनुपालक व ज्ञान चतुर्वेदी की शैली के परम भक्त सखाजी के भीतर विसंगतियों के प्रति भरपूर असहमतियां हैं। आक्रोश यह है कि मनुष्य अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनैतिक, मूल्यहीन, पापमय हो गया है। कहीं शुचिता नहीं, कहीं प्रतिबद्धता नहीं। मनुजता लुप्त हो रही है। क्यों? क्योंकि उसमें किसी भी प्रकार का भय नहीं रहा। इहलोक का सिस्टम उसके आगे पानी भरता है, उसमें इतनी कठोरता नहीं रह गई है कि वह मनुष्य को अनुशासित रख सके। ऐसे में एक सार्थक डंडे की तलाश है कृति, जिसका मंतव्य और गंतव्य मानुष-मन है, उसे झिंझोड़ा-जगाया जाए। कर्मफल के दर्शन को आधार बनाकर लेखक ने मानव समुदाय को ''परलोक'' दिखाते हुए वस्तुत: भविष्य के प्रति न सिर्फ सचेत किया है, वर्तमान को सुधारने का संदेश भी दिया है। खूबी यह है कि गहनतम संदेश गंभीर होकर भी बोझिल नहीं होता, पाठक को आद्यांत गुदगुदाते हुए लक्ष्य की ओर ले चलता है।
प्रारंभिक अंशों में साइंस-फिक्शन सा अहसास देते इस व्यंग्य उपन्यास का प्रसार पौराणिक कथा की भूमि पर होता है। लेखक ने अपने ''कंफर्ट जोन'' से प्लॉट का चयन किया है, उसकी चिर-परिचित भूमि है गरुड़ पुराण की। गरुड़ पुराण इसलिए माफिक था क्योंकि इसमें कर्मफल के अनुसार सुख-दुख भोगने के विधान वर्णित हैं। इसलिए ही लेखक का ''सैटेलाइट'' किसी अन्य धर्म के परलोक में गमन नहीं करता, भारतीय संस्कृति की डोर पकड़कर यमपुरी ही चला जाता है। पाठकों को प्रथम दृष्टया यह उपन्यास काल्पनिक प्रतीत होगा किंतु यह सुखद आश्चर्य है कि कल्पना की जमीन पर रोपी गई कथा में लेखक ने अपनी ही तरह का ''जादुई यथार्थवाद'' पैदा कर लिया है। कल्पना में भी मानवीय जीवन का घोर यथार्थ। यहां तक कि धरती में तो यथार्थ वर्णित है ही, परलोकवासियों के कृत्यों में भी धरतीवासियों के क्रियाकलाप, छल-छद्म पूरी सत्यता के साथ उकेरे गए हैं। समाज में व्याप्त कदाचार, भ्रष्टाचार, अनैतिक कार्य व्यापार, अधर्म, पापाचार पर तीखे कटाक्ष हैं यहां। राजनाति, समाज, धर्म, ज्योतिष, अर्थ, विज्ञान, पुलिस, प्रशासन, अफसरशाही, अवसरवादिता, प्रकृति, पर्यावरण, मीडिया, कानून, गांव, शहर, कौन-सा क्षेत्र छूटा? लेखक की टोही नजरें उन्हें देखती हैं, दिखाती हैं और कर्मदंड की भागी भी बनाती चलती हैं। उपन्यास में यत्र-तत्र संकेत हैं कि धरती पर पाप बढ़ गए हैं, फलत: स्वर्ग सूना-सूना सा है, यहां कोई आता ही नहीं। जबकि नरक में रेलमपेल है। पापकर्म अनुसार नरक में दी जाने वाली यातनाओं के दृश्य भी खूभ उभारे गए हैं ताकि पाठक को उनसे वितृष्णा हो। देखा जाए तो कृति का उद्देश्य सीधे तौर पर ''लोक शिक्षण'' ही है। लोक मानस यदि पापिष्ठ हो गया है, तो उसे यह भी समझना होगा कि ''जो जस करहिं सो तस फल चाखा''। धरती पर फैलने वाली नई-नई बीमारियों, आपदाओं,  विपदाओं, कष्टों का कारक लेखक कर्म को ही बताता चलता है, नरक की भीड़ कम करने के लिए ऊपरवाले ने धरती को ही नरक बना देने की योजना बना ली है। ''जैसी करनी वैसी भरनी'' ही नहीं, जहां किया, वहीं भुगतो, यह भी।
उपन्यास की अंतर्वस्तु जितनी गंभीर है, उसका ताना-बाना उतना ही सरल-सहज और हल्का फुल्का है। कहें तो ''गुड़ लपेटी कुनैन''। शैली में रोचकता, चुटीलापन है; व्यंग्य इसका प्राण है तो हास्य देह। फलत: धीर-गंभीर विषय को भी पाठक सहज ही हंसता-मुस्कुराता गटकने को तत्पर हो जाता है, प्रारंभ से ही। लेखक हास्य का एक भी क्षण छोड़ने को तैयार नहीं, सदैव लपकने को तत्पर, ''मत चूको चौहान''। कठोर चट्टान को फाड़कर भी कुटज की तरह इठलाने को तैयार। उदाहरण के तौर पर वह दृश्य लीजिए, जहां धरती पर ही नाना प्रकार के कष्ट झेल आई गरीब की आत्मा को नरक की वैतरणी भी कहां कष्टप्रद लगती है, वह वैतरणी में भी चहक रही है। वैतरणी का मतलब तो खूब समझते हैं आप, वही नदी जिसे पार करने को प्रेमचंद का ''होरी'' जीते जी एक अदद गाय तक न खरीद सका था। वैतरणी अर्थात् खून, पीब, बाल, अस्थि, मज्जा और हिंसक जीव-जंतुओं से भरी वीभत्स नरक की नदी, जिसे पापी आत्मा को पार करना होता है। तो कृति में वह गरीब आत्मा इस वैतरणी को भी खुशी-खुशी पार कर रही है, कभी मगर की पीठ पर चढ़ जाती है, कभी उसकी पूंछ से ही खेलने लग जाती है। ऐसे स्थलों पर छलककर आता हास्य और व्यंग्य वस्तुत: हास्य-व्यंग्य से आगे बढ़कर करुण में तब्दील हो जाता है, अचानक और अनायास। वैसे, हास्य उपजाने में लेखक बेजोड़ है, कई बार आपको भ्रम होगा कि आप कहीं हास्य ही तो नहीं पढ़ रहे।
इस व्यंग्य कृति में एक ओर हास्य की विपुलता है तो दूसरी ओर गंभीर स्थलों की भी कमी नहीं है। यहां सूक्तियां हैं, तो कई प्रोक्तियां भी। जहां भी अवसर आया, लेखक पूरे धैर्य के साथ, ठहरकर चिंतन-मनन करता दीख पड़ता है। संदर्भों, अर्थों, भावों को सहेजे यह अंश सूझ-विवेक से भरे हुए हैं। धर्म पर कटाक्ष करते हुए लेखक का यह कथन देखिए- ''धर्म की यही विकलांगता है, यह अजीब है। जो नहीं मानता, वो नहीं मानता, मगर वो भी मानता है। यानी जो नास्तिक है, वह भी आस्तिक है और जो आस्तिक है वह तो आस्तिक है ही''। इसी प्रकार यह कथन भी गूढ़ संदेशों के साथ आकर्षित करता है- ''जब सफलता मिलती है तो वह अपने साथ मद मस्ती भी लोटाभर  लेकर आती है। जब असफलता आती है तो अपने प्रहार से आत्मबल को रगड़ती है तो सतर्क भी करती है''।
कृति की भाषा सहज-सरल, ग्राह्य अर्थात् आमफहम है। भाषा में, कहन में एक रवानी है, गति है। भाषा कथा के लिए सप्रयास जुटाई गई हो, ऐसा प्रतीत नहीं होता। बोलचाल की भाषा है, फलत: इस दौर की हिंदी, जिसमें अंग्रेजी के शब्द बहुतायत में आ गए हैं, लेखक ने उसे अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है। कुछ शब्द व्यंग्य और हास्य के बहाव में डूबते-उतराते लेखक ने खुद ही गढ़ लिए हैं, जो फुलझडियां ही बिखेरते हैं। यथा- ''अनयकीनेबल'',  ''अप्सराईजेशन''। इसी तरह हिंदी-अंग्रेजी के ''स्लो मौत'' जैसे संकर प्रयोग भी भाषा को चमक ही देते हैं, अवरोध नहीं बनते। हां, कथारंभ में पाठक को आंचलिकता के दर्शन अवश्य होंगे, जहां रामसेवक और अन्ना जैसे पात्र बुंदेली बोलते नजर आएंगे। यह आंचलिकता भी रोचक है, पात्रानुकूल है और अर्थ में किसी प्रकार की बाधा भी उत्पन्न नहीं करती। चूंकि बुंदेली हिंदी की ही बोली है, सहज समझ में आती है।
कुल मिलाकर, कैसी है सखाजी की यह रचना? कथानक की दृष्टि से देखें तो कथावस्तु अच्छी है, रोचक है। उद्देश्य भी ऊंचा है। कथा की बनावट-बुनावट भी ठीक है, यह अवश्य है कि इसे शत-प्रतिशत अंक दिया जाना भले ही संभव नहीं है, पर लेखक की तारीफ की जानी चाहिए इसलिए कि उसमें संभावनाएं परिलक्षित हो रही हैं। ''पूत के पांव पालने में''। पहली ही कृति है, पूर्णता की अपेक्षा करना बेमानी होगी, किंतु लेखक में क्षमता है कि वह पूरी सुगठता और कसाव के साथ ऐसी कई कृतियों को आगे भी जन्म दे सकेगा। लेखन में प्रकृति झांक रही है, अकृत्रिमता का यह गुण अच्छी कृति की पूर्वपीठिका बनेगा। देश को, समाज को तीखी और तिरछी नजर की बेतरह आवश्यकता है, जो उसकी चीर-फाड़ करे, पड़ताल करे, उसकी खामियों को उजागर करे और तिलमिला देने वाली वाणी से जगा सके। सन्मार्ग दिखाने के लिए अभी कई कबीर अपेक्षित हैं, सखाजी का मानव-समाज में स्वागत है, वे ऊंघते-उनींदे मानुष को जाग्रत करें। हमारी शुभकामनाएं।

स्मार्ट फोन चलेगा, अफसर नहीं

Written By बरुण सखाजी on शुक्रवार, 15 मई 2015 | 4:10 pm

हमें स्मार्ट सिटी चाहिए, स्मार्ट सरकार, स्मार्ट कार्ड, स्मार्ट फोन, स्मार्ट पत्नी, स्मार्ट क्लास और स्मार्ट टीवी समेत और भी न जाने क्या-क्या स्मार्ट चाहिए। मगर अफसर वही चाहिए। सफारी सूट या तपती धूप में भी गलेबंद टाई, सूट में कैद कांख में फाइल दबाए कोई मुनीम सा। ऐसा क्यों?
छत्तीसगढ़ कैडर के आईएएस अफसर और जगदलपुर के जिला कलक्टर अमित कटारिया से राज्य सरकार ने सिविल सर्विस के सिविल कोड की किसी अ, ब, स, द धारा के उपबंध ढिमका के तहत फलां के उल्लंघन का दोषी मानते हुए जवाब तलब किया है। अफसर की चूक सिर्फ इतनी है कि उसने प्रधानमंत्री से मिलते वक्त ब्रांडेड चश्मा और रंगीन चटक शर्ट पहन रखी थी। बेचारे कमअकल अफसर ने भारत की आम आदमी की पहचान बांह से फटी शर्ट नहीं पहनी, अस्पतालों में मिलने वाला मोतियाबिंद ऑपरेशन वाला चश्मा नहीं लगाया था। मोदी के दो घंटे के कार्यक्रम में दो शर्ट भी बदल ली थी। इसलिए अफसर बहुत दोषी है।
न जाने क्यों ये देश नंगों पर ही भरोसा करता है। बाबा, वैराग्य के चोले को ही क्यों मान्यता देता है। हाथी पर बैठकर भीख मांगने वाले को क्यों संत कहता है और पैदल चलकर तल्ख धूप में सब्जी बेचने वाले को ठग्गू क्यों मानता है।
इक्कसवीं सदी में प्रधानमंत्री के सूट पर बवाल, अफसर के ब्रांडेड चश्मे पर सवाल गले में फंस जाते हैं। क्या इस देश को गंगा किनारे के पंडा चलाएं, जो पहनें तो भरोसे का प्रतीक भगवा, मगर ठगी में चंबल के डाकुओं के बाप हों। क्यों किसी अफसर को हम भिनका सा ही देखना चाहते हैं। क्या छत्तीसगढ़ में ही ऐसे अफसर नहीं हैं, जो अरबों की संपत्ति के मालिक हैं, जिनके पैसे स्विस बैंक में जमा हैं। दुबई में इंटरनेशनल कंपनी में भागीदारी है। कइयों मंत्रियों की अकूत संपदा देश-विदेश में है। नसबंदी कांड के दोषी मंत्री अमर अग्रवाल के दामादों की दवा कंपनियों के ही कितने ठेके राज्य के स्वास्थ्य विभाग में हैं। लेकिन वे सामान्य खादी का कुर्ता पहनते हैं, इसलिए हमें ऐतराज नहीं। वे सामान्य पोशाक में आते हैं तो हमें दिक्कत नहीं है। बस कोई स्टाइल में नजर न आए। मजे की बात तो ये है कि समकक्ष और वरिष्ठ अफसर तो वेतन वृद्धि तक रोकने की बात कह रहे हैं। अमित कटारिया कोई दूध के धुले नहीं हैं। मगर इस मामले में आम आदमी उनके साथ है। ऐसे तो युवा अफसर लाॅबी डिमॅरलाइज हो जाएगी। जरा मुक्त रखिए इन्हें बकवासों से। कितने ऊर्जावान हैं छत्तीसगढ़ के युवा अफसर ओमप्रकाश चौधरी, अमित कटारिया, सारांश मित्तर, रजत कुमार, किरण कौशल, सिद्धार्थ कोमल परदेशी। इन्हें यूं डिमॅरलाज न कीजिए।
-सखाजी

''परलोक में सैटेलाइट'' की समीक्षा

Written By बरुण सखाजी on बुधवार, 13 मई 2015 | 1:47 pm

व्यंग्य उपन्यास ''परलोक में सैटेलाइट'' हास्य व्यंग्य का जीवंत नायक है। इसके जरिए लेखक ने समाज के हर वर्ग को संबोधित किया है। गहन विज्ञान और मनोविज्ञान का इस्तेमाल नजर आता है। कथानक की शुरुआत ही बुंदेलखंड के एक ऐसे पात्र से होती है, जो अपनी कुर्सी बचाने और उसे जस्टीफाई करने के लिए अपने मातहतों को तौलता रहता है। व्यंग्य सरकारी दफ्तरान में ''साहबवाद'' को भी एड्रेस करता है। सबसे मौजू और महत्वपूर्ण व्यंग्य के भीतर छुपा वह विचार है, जिसमें लेखक दुनियाभर की स्पेस एजेंसियों के अलग-अलग मिशनों पर कटाक्ष करता है। वह यहां सार्वभौमवाद जैसे अतिगंभीर टाॅपिक पर भी पाठक से वार्तालाप सा करता हुआ हास्य अंदाज में चर्चा करता है।
भूखे देश में अरबों रुपये विफल सैटेलाइट पर खर्चने के बाद स्पेस एजेंसी के डायरेक्टर की राजनैतिक खुरफातों का व्यंग्य में जीवंत चित्रण है। गंभीर से गंभीर बात बेहद सरल और हास्य के जरिए ऐसे कर दी गई  है, जैसे पाठक से आमने-सामने तादातम्य बिठाकर बात की जा रही हो।
सैटेलाइट का परलोक से दृश्य भेजना। पृथ्वी के मानव समाज की प्रतिक्रियात्मकता अद्भुत है। कई बातें ऐसी हैं, जिनकी बहुत ढंग से व्याख्या की जा सकती है। कई नये शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। मुद्दों पर विस्तृत राय है।
व्यंग्य दो कारणों से जरूर पढ़े। पहला तो एक संपूर्ण व्यंग्य, जहां कहीं भी आपको गंभीर होने की जरूरत नहीं और एक बार भी बचकाना या हल्कापन नहीं लगेगा। दूसरा कारण इसकी शैली है। पाठक को कहीं भी उलझना नहीं पड़ता। एक पैरा सवाल खड़ा करता तो दूसरा ही पैरा जवाब दे देता है।
व्यंग्य की दो खामियां भी हैं। पहली तो यह अश्लील गालियों से गुरेज नहीं करता दूसरी इसमें किसी तरह की व्यावसायिकता की परवाह नहीं की गई। इससे प्रकाशक खोजने में दिक्कत हुई। वहीं  इतनी स्पष्टवादिता बरती गई है, कि कोई भी सरकारी पुस्तकालय इस विस्फोटक को अपने यहां रखने से भी गुरेज कर रहा है।

परलोक में सैटेलाइट अब pothi.com पर भी

Written By बरुण सखाजी on मंगलवार, 12 मई 2015 | 2:28 am

व्यंग्य उपन्यास ''परलोक में सैटेलाइट'' अब notnul.com के साथ  pothi.com पर भी।
http://pothi.com/pothi/preview?pFile=51294#preview-top

व्यंग्य उपन्यास ''परलोक में सैटेलाइट'' विमोचित

Written By बरुण सखाजी on गुरुवार, 7 मई 2015 | 2:37 am

रायपुर.
तकनकी युग में ई-पुस्तकों का दौर है। आने वाला वक्त पूरी तरह से ऑनलाइन हो जाएगा। यह अच्छा है। एक  छोटे से टैब में सैकड़ों पुस्तकों को पढ़ स·ते हैं। यह कहना है वरिष्ठ साहित्यकर रमेश नैयर का श्री नैयर बरुण सखाजी के पहले व्यंग्य उपन्यास परलोक में सैटेलाइट के विमोचन अवसर पर बोल रहे थे। यह छत्तीसगढ़ का  ऐसा पहला उपन्यास है जो ईबुक के तौर पर विमोचित किया गया है। वृंदावन हॉल में २७ अप्रैल २०१५, सोमवार को आयोजित कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि साहित्यकार सुभद्रा राठौर ने कहा कि व्यंग्य में नई शब्दावली गढ़ी गई है। जैसे यकीनेबल। अप्सराइजेशन आदि। नई और नई ऐसी बातें भी की गईं हैं, जो जुमले की तरह हैं। जैसे भगवान विष्णु ही क्यों सर्वोच्च हैं, क्योंकि वे ही इकलौते ऐसे भगवान हैं, जो अपनी पत्नी से पैर दबवा सकते हैं। उनके अलावा कोई  और नहीं जो इतना बड़ा साहस कर सकता। लेकिन व्यंग्य में गालियों का इस्तेमाल गैरज़रूरी लगता है.
विज्ञान और धर्म के रोचक कथानक
विशिष्ट अतिथि व्यंग्यकार प्रभाकर चौबे ने कहा कि नए लोगों में जबरदस्त ऊर्जा दिखाई देती है। परलोक में सैटेलाइट में विज्ञान और धर्म की मिलीजुली फंतासी है। यह प्रज्ञ और परिपूर्ण लेखन की निशानी है।
हास्य की परिधि तोड़ता है परलोक में सैटेलाइट
अन्य विशिष्ट अतिथि और वरिष्ठ पत्रकार अभय किशोर ने कहा कि परलोक में सैटेलाइट हास्य की परिधि को तोड़कर नश्तर से मौजूदा व्यवस्था पर करारा व्यंग्य करता है। विशिष्ट अतिथि दूरदर्शन केंद्र के निदेशक संजय प्रसाद ने कहा कि यह बेहद खुशी की बात है कि लेखन के मामले में रायपुर समृद्ध है। परलोक में सैटेलाइट के जरिए जिस हास्य को छूने की कोशिश की गई है, वह लाजबाव है। वहीं विशष्ट अतिथि महेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि परलोक में सैटेलाइट एक तरह से अंतरिक्ष, विज्ञान और धर्म के बीच त्रिकोण बनाता है। कार्यक्रम का संचालन अनिल द्विेदी ने किया। अंत में अतिथियों और आगुंतकों का आभार वरिष्ठ भाजपा नेता प्रकाश बजाज ने किया।
नॉटनल डॉट काम से क रें डाउनलोड
इस व्यंग्य उपन्यास को नॉटनल डॉट काम से डाउनलोड किया जा सकता है। वहीं यह जल्द ही न्यूजहंट मोबाइल एप पर भी जारी होने जा रहा है। इसके अलावा उपन्यास की हार्डकाही के लिए ९००९९८६१७९ पर एसएमएस करके मंगाई जा सकती है।
यहां से करें डाउनलोड।
http://notnul.com/Pages/ViewPort.aspx?Shortcode=eAVycMqD

कुर्सी चरित्रम***

कुर्सी ताकत है, तो कुर्सी कमजोरी भी है। कुर्सी अदावत है तो यह नजाकत भी है। कुर्सी कथा है तो यह नाटक भी है। कुर्सी वक्त है तो यह बुरा वक्त भी है। कुर्सी सपना है तो यह श्याह हकीकतत भी है। कुर्सी विरासत है तो यह समरथ भी है। कुर्सी कल है तो यह आज भी है। कुर्सी कर्म है तो नसीब भी है। कुर्सी अहम है तो उपेक्षित भी है। कुर्सी नर्म है तो कुर्सी गर्म भी है। कुर्सी के आगे अच्छे-अच्छे झुके हैं। कुर्सी कमाल है। कुर्सी के कई रूप हैं। कुर्सी पर बैठकर नीचे चटाई पर बैठना भी कुर्सी ही का ही एक रूप है। कुर्सी से उतरकर कुर्सी के लिए काम करना भी कुर्सी ही है। कुर्सी जो है वह कुर्सी ही है। उसके समकक्ष न टेबल है न स्टूल। बनने को अपने मुंह मियां मिट्ठू बना करें। टेबल अपना ओहदा ऊंचा माना करे, स्टूल अपनी जरूरत जताता रहे, मगर हैं सब कुर्सी के इर्दगिर्द ही। कुर्सी लालच है तो कुर्सी निरमोह भी है। कुर्सी तेरे कितने चरित्र हैं, कुर्सी तू क्यों इतने सत्चरित्रा है, तू क्यों इतना वैश्या है। कुर्सी तेरी लीला तू ही जाने। कितने नाचें, कितने आएं, कितने जाएं, कितनों को कितने ही श्रम करने पड़ जाएं, तुझ पर बैठे को नीचे उतारने में। कुर्सी यूं तो अभिमान है, लेकिन अपमान भी है। कुर्सी यूं तो क्रोध है, लेकिन विरोध भी है। कुर्सी पर डटकर जो चिपक जाए, कुर्सी उसे ही आहार बना लेती है। उसे निगल जाती है। कहने को वह कुर्सी में समा जाता है, लेकिन कुर्सी उसमें कभी नहीं समाती। कुर्सी फिर नई तशरीफों की तलाश में रहती है। कुर्सी कर्ज है, तो कुर्सी मर्ज भी है। कुर्सी आफत है तो राहत भी है। कुर्सी के लिए न जाने किस-किसने क्या न किया। कुर्सी ने अपने पर चढ़ाकर किसको न दचका, किसको न गिराया, किसको न उठाया। कुर्सी पर बैठकर न जाने कितने गौरवान्वित हुए, कुर्सी पर बैठकर न जाने कितने अपमानित हुए। कुर्सी ने रंग नहीं बदला। कुर्सी ने चाल नहीं बदली। कुर्सी ने चरित्र नहीं बदला। किसी के लिए यह वैश्या रही तो किसी ने इसे पूजा। अयोध्या में कुर्सी राम की पादुकाएं पाकर गौरवान्वित हुई, तो दिल्ली में भ्रष्टों के पिछवाड़ों से आहत रही। अपानवायु से नाक सिकोड़ती, त्योरियां ताने, नथुनों से आग बरसाती सी। कुर्सी आंगन का एक ओंटा भी है। कुर्सी आंगन की एक टिपटी भी है। कुर्सी राख का ढेर भी है, तो कुर्सी कर्तव्यों की करताल भी है। कुर्सी खुद में कुछ नहीं, लेकिन सबकुछ भी है। कुर्सी तू गजब है। कुर्सी से निकले चार पायों में इतना अभिमान है कि वह नितंबों को जमीन से मिलने नहीं देते। हमेशा रखते हैं दूर, ऊपर, चार पायों पर कुछ इस तरह से जैसे चलता है कोई मुर्दा चार कांधों पर। कुर्सी पर बैठे बख्तरबंद, दस्तरखानों पर भोजन करने वाले शाहों की भी नहीं है कुर्सी। कुर्सी गजब है। कुर्सी गलत फहमी है तो कुर्सी हकीकत भी। कुर्सी जवाब है तो कुर्सी सवाल भी। कुर्सी अदावत है, तो कुर्सी नजाकत भी। कुर्सी हाल तो कुर्सी चाल भी है। कुर्सी यूं न चलेगी अपने इशारों पर कुर्सी यूं न घूमेगी आपके सहारों पर। कुर्सी पर बैठकर इठलाना, पतली डाल पर चढ़कर फल तोड़ने जैसा है। टूटी तो धड़ाम न टूटी तो मीठा फल। पर गारंटी कुछ भी नहीं। स्थाई कुछ भी नहीं। कुर्सी कल्पना है, तो कुर्सी वास्तविकता भी है। कुर्सी कसम है तो कुर्सी वादाखिलाफी भी है। कुर्सी दौड़ है तो कुर्सी ठहराव भी है। कुर्सी कलम है तो कुर्सी कलाम भी है। कुर्सी किसी की नहीं, कुर्सी सबकी है। कुर्सी पर कोई नहीं बैठ पाया, तो कुर्सी पर हर कोई चढ़ा हुआ है।
- सखाजी

Founder

Founder
Saleem Khan