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यह रिवाज़ है कि अगर लड़की पैदा हुई तो पहले से तयशुदा 'फीस' के एवज़ में दाई उसकी गर्दन मरोड़ देगी और घूरे में दबा आएगी...!!!

Written By Saleem Khan on गुरुवार, 3 मार्च 2011 | 10:56 am


उजाले और चकाचौंध के भीतर खौफ़नाक अँधेरे
नारी जाति के वर्तमान उपलब्धियां- शिक्षा, उन्नति, आज़ादी, प्रगति और आर्थिक व राजनैतिक सशक्तिकरण आदि यक़ीनन संतोषजनक, गर्वपूर्ण, प्रशंसनीय और सराहनीय है. लेकिन नारी स्वयं देखे कि इन उपलब्धियों के एवज़ में नारी ने अपनी अस्मिता, मर्यादा, गौरव, गरिमा, सम्मान व नैतिकता के सुनहरे और मूल्यवान सिक्कों से कितनी बड़ी कीमत चुकाई है. जो कुछ कितना कुछ उसने पाया उसके बदले में उसने कितना गंवाया है. नई तहजीब की जिस राह पर वह बड़े जोश और ख़रोश से चल पड़ी- बल्कि दौड़ पड़ी है- उस पर कितने कांटे, कितने विषैले और हिंसक जीव-जंतु, कितने गड्ढे, कितने दलदल, कितने खतरे, कितने लूटेरे, कितने राहजन और कितने धूर्त मौजूद हैं.

आईये देखते हैं कि आधुनिक सभ्यता ने नारी को क्या क्या दिया

व्यापक अपमान
  • समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में रोज़ाना औरतों के नंगे, अध्-नंगे, बल्कि पूरे नंगे जिस्म का अपमानजनक प्रकाशन.
  • सौन्दर्य-प्रतियोगिता... अब तो विशेष अंग प्रतियोगिता भी... तथा फैशन शो/ रैंप शो के कैट-वाक् में अश्लीलता का प्रदर्शन और टीवी चैनल द्वारा ग्लोबली प्रसारण
  • कारपोरेट बिज़नेस और सामान्य व्यापारियों/उत्पादकों द्वारा संचालित विज्ञापन प्रणाली में औरत का बिकाऊ नारीत्व.
  • सिनेमा टीवी के परदों पर करोडों-अरबों लोगों को औरत की अभद्र मुद्राओं में परोसे जाने वाले चल-चित्र, दिन-प्रतिदिन और रात-दिन.
  • इन्टरनेट पर पॉर्नसाइट्स. लाखों वेब-पृष्ठों पे औरत के 'इस्तेमाल' के घिनावने और बेहूदा चित्र
  • फ्रेंडशिप क्लब्स, फ़ोन सर्विस द्वारा दोस्ती.
(सवाल: अब आप नारी की इस स्थिति के समर्थक तो हो नहीं सकते, और अगर है तो क्या आप अपनी माँ-बहनों को ऐसा करने दे सकते हैं?)

यौन शोषण (Sexual Exploitation)
  • देह व्यापार, गेस्ट हाउसों, सितारा होटलों में अपनी 'सेवाएँ' अर्पित करने वाली संपन्न व अल्ट्रामाडर्न कॉलगर्ल्स.
  • रेड लाइट एरियाज़ में अपनी सामाजिक बेटीओं-बहनों की ख़रीद-फ़रोख्त. वेश्यालयों को समाज और क़ानून या प्रशासन की ओर से मंजूरी. सेक्स-वर्कर, सेक्स-ट्रेड, सेक्स-इंडस्ट्री जैसे आधुनिक नामों से नारी-शोषण तंत्र की इज्ज़त-अफ़ज़ाई व सम्मानिकरण.
  • नाईट क्लब और डिस्कोथेक में औरतों और युवतियों के वस्त्रहीन अश्लील डांस, इसके छोटे रूप में सामाजिक संगठनों के रंगरंज कार्यक्रमों में लड़कियों के द्वारा रंगा-रंग कार्यक्रम को 'नृत्य-साधना' का नाम देकर हौसला-अफ़ज़ाई.
  • हाई-सोसाईटी गर्ल्स, बार-गर्ल्स के रूप में नारी यौवन व सौंदय्र की शर्मनाक दुर्गति.
यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment)
  • फब्तियों की बेशुमार घटनाएँ.
  • छेड़खानी की असंख्य घटनाएँ, जिनकी रिपोर्ट नहीं होती. देश में सिर्फ दो वर्षों में (2005-06) 36,617 घटनाएँ.
  • कार्य-स्थल पर यौन उत्पीड़न. (Women unsafe at work place)
  • सड़कों, गलियों, बाज़ारों, दफ़्तरों, अस्पतालों, चलती कारों, दौड़ती बसों आदि में औरत असुरक्षित. (Women unsafe in the city)
  • ऑफिस में नौकरी बहाल रहने के लिए या प्रमोशन के लिए बॉस द्वारा महिला कर्मचारी का यौन शोषण.
  • टीचर या ट्यूटर द्वारा छात्राओं का यौन उत्पीड़न.
  • नर्सिंग होम/अस्पतालों में मरीज़ महिलाओं का यौन-उत्पीड़न.
यौन-अपराध
  • बलात्कार- दो वर्ष की बच्ची से लेकर अस्सी साल की वृद्धा से- ऐसा नैतिक अपराध, जिसकी अख़बारों में पढ़कर किसी के कानों में जूं तक नहीं रेंगती.मानों किसी गाड़ी से कुचल कर कोई चुहिया मर गयी हो.
  • 'सामूहिक बलात्-दुष्कर्म' इतने आम हो गएँ हैं की समाज ने ऐसी दुर्घटनाओं की ख़बर पढ़-सुन कर बेहिसी और बेफ़िक्री का खुद को आदि बना लिया है.
  • युवतियों, बालिकाओं, किशोरियों का अपहरण, उनके साथ हवास्नाक ज़्यादती, सामूहिक ज्यात्दी और हत्या भी...
  • सिर्फ़ दो वर्षों (2005-06) आबुरेज़ी (बलात्कार) की 35,195 वाक़ियात. अनरिपोर्टेड घटनाएँ शायेद दस गुना ज़्यादा हों.
  • सेक्स-माफिया द्वारा औरतों के बड़े-बड़े संगठित कारोबार. यहाँ तक कि विधवा आश्रम की विधवा भी सुरक्षित नहीं.
  • विवाहित स्त्रियों का पराये मर्द से सम्बन्ध (Extra Marital Relations) इससे जुड़े अन्य अपराध हत्याएं और परिवार का टूटना-बिखरना आदि.
औरतों पर पारिवारिक यौन अत्याचार (कुटुम्बकीय व्यभिचार) व अन्य ज्यातादियाँ
  • बाप-बेटी, बहन-भाई के पवित्र रिश्ते भी अपमानित.
  • आंकडों के अनुसार बलात-दुष्कर्म में लगभग पचास प्रतिशत निकट सम्बन्धी मुल्व्वस (Incest).
  • दहेज़-सम्बन्धी अत्याचार व उत्पीड़न. जलने, हत्या कर देने आत्म-हत्या पर मजबूर कर देने, सताने, बदसुलूकी करने, मानसिक यातना देने की बेशुम्मार घटनाएँ. कई बहनों का एक साथ सामूहिक आत्महत्या दहेज़ के दानव की देन है.
कन्या भ्रूण-हत्या (Female Foeticide) और कन्या वध (Female Infanticide)
बच्ची का क़त्ल उसके पैदा होने से पहले माँ के पेट में ही. कारण: दहेज़ व विवाह का क्रूर और निर्दयी शोषण-तंत्र. पूर्वी भारत में एक इलाके में यह रिवाज़ है कि अगर लड़की पैदा हुई तो पहले से तयशुदा 'फीस' के एवज़ में दाई उसकी गर्दन मरोड़ देगी और घूरे में दबा आएगी. कारण: वही दहेज़ व विवाह का क्रूर और निर्दयी शोषण-तंत्र और शादी के नाकाबिले बर्दाश्त खर्चे. कन्या वध के इस रिवाज़ के प्रति नारी-सम्मान के ध्वजावाहकों की उदासीनता.

सहमती यौन-क्रिया (Fornication)
  • अविवाहित रूप से नारी-पुरुष के बीच पति-पत्नी का सम्बन्ध (Live-in-Relation) पाश्चात्य सभ्यता का ताज़ा तोह्फ़ा. स्त्री का सम्मानपूर्ण 'अपमान'.
  • स्त्री के नैतिक अस्तित्व के इस विघटन में न क़ानून को कुछ लेना देना, न ही नारी जाति के शुभ चिंतकों का कुछ लेना देना, न पूर्वी सभ्यता के गुण-गायकों का कुछ लेना देना, और न ही नारी स्वतंत्रता आन्दोलन के लोगों का कुछ लेना देना.
  • सहमती यौन-क्रिया (Fornication) की अनैतिकता को मानव-अधिकार (Human Right) नामक 'नैतिकता का मक़ाम हासिल.
समाधान
नारी के मूल अस्तित्व के बचाव में 'All India Bloggers' Association' की इस पहल में आईये, हम सब साथ हो और समाधान की ओर अग्रसर हों.

नारी कि उपरोक्त दशा हमें सोचने पर मजबूर करती है और आत्म-ग्लानी होती है कि हम मूक-दर्शक बने बैठे हैं. यह ग्लानिपूर्ण दुखद चर्चा हमारे भारतीय समाज और आधुनिक तहज़ीब को अपनी अक्ल से तौलने के लिए तो है ही साथ ही नारी को स्वयं यह चुनना होगा कि गरीमा पूर्ण जीवन जीना है या जिल्लत से.

नारी जाति की उपरोक्त दयनीय, शोचनीय, दर्दनाक व भयावह स्थिति के किसी सफल समाधान तथा मौजूदा संस्कृति सभ्यता की मूलभूत कमजोरियों के निवारण पर गंभीरता, सूझबूझ और इमानदारी के साथ सोच-विचार और अमल करने के आव्हान के भूमिका-स्वरुप है.

लेकिन इस आव्हान से पहले संक्षेप में यह देखते चले कि नारी दुर्गति, नारी-अपमान, नारी-शोषण के समाधान अब तक किये जा रहे हैं वे क्या हैं? मौजूदा भौतिकवादी, विलास्वादी, सेकुलर (धर्म-उदासीन व ईश्वर विमुख) जीवन-व्यवस्था ने उन्हें सफल होने दिया है या असफल. क्या वास्तव में इस तहज़ीब के मूल-तत्वों में इतना दम, सामर्थ्य व सक्षमता है कि चमकते उजालों और रंग-बिरंगी तेज़ रोशनियों की बारीक परतों में लिपटे गहरे, भयावह, व्यापक और जालिम अंधेरों से नारी जाति को मुक्त करा सकें???

आईये आज हम नारी को उसका वास्तविक सम्मान दिलाने की क़सम खाएं!

-सलीम खान
swachchhsandesh@gmail.com

महंगाई कंट्रोल का मोदी फार्मूला क्या लागू हो सकेगा

देश में बढ़ रही महंगाई को रोकने के लियें गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने महंगाई कंट्रोल फार्मूला सुझाया हे लेकिन कोंग्रेस सरकार इस फार्मूले पर कब और केसे योजना तय्यार करेगी देखने की बात हे ।
ताज्जुब हे जिस मोदी को कोंग्रेस नफरत की निगाह से देखती आई हे उसी मोदी ने गुजरात को पुनर्स्थापित और विकसित , खुशहाल कर खुद को इतना बुलंद कर लिया के कोंग्रेस को खुद मोदी को महंगाई कंट्रोल समिति का अध्यक्ष बना कर सुझाव देने के लियें कहा । मोदी पीछे नही हटे और उन्होंने देश में महंगाई कम करने का सटीक फार्मूला सुझा दिया उनके फार्मूले में वायदा व्यापार को खत्म करना प्रमुख शामिल हे दुसरा जमाखोरों के खिलाफ सख्त कार्यवाही का सुझाव हे तीसरा क्रषि उपजों पर अंकुश का फार्मूला हे ,मोदी ने देश में महंगाई कम करने के तीनों फार्मूले व्यवहारिक और आवश्यक सुझाए हें लेकिन अफ़सोस यह सब कोंग्रेस के फाइनेंसर बने हें अब कोंग्रेस इनके खिलाफ केसे कार्यवाही कर सकेगी यह देखने की बात हे ।
मोदी ने अपने फार्मूले में देश की महंगाई कम करने और सटोरियों जमाखोरों को सबक देने के लियें जो सुझाव दिए हें इसके लियें उन्हें बधाई पुरे देश को मोदी फोर्मुले को जल्द अज जल्द देश में लागु करने का दबाव बनाना चाहिए ताकि मुनाफाखोरों को सबक मिल सके और देश में अमन सुकून हो सके । अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

anant ki gazal

ye meri gazalon ka blog aap sadar amantrit hai,

--anurag anant

anant ka dard

ye meri kavitaaon ka blog hai aap jaroor padharen --anurag anant

Written By आपका अख्तर खान अकेला on बुधवार, 2 मार्च 2011 | 8:43 pm

सच कहा तो बुरा मान गये ....

जयपुर के पत्रकार एक अख़बार में छपी उस खबर से नाराज़ हें जिसमे इस अख़बार ने सरकारी सुविधाएँ लेकर मजे करने वाले और सरकार के आगे दुम हिलाने वाले पत्रकारों की खिल्ली उढाई हे ।
जयपुर के एक देनिक अख़बार ने अपने मुख प्रष्ट पर प्रकाशित आलेख में पत्रकारिता के नाम पर चाटुकारिता और फिर भ्रस्ताचार के बाद भी खबरों को दबा देने और सरकार से विशिष्ठ सुविधाएँ प्राप्त करने वाले पत्रकारों का मजाक उड़ाया हे कहते हें के सच कडवा होता हे और इस लेख के प्रकाशन के बाद भी यही हुआ जयपुर के अखबार के कर्मचारी और कुछ मालिक इस सच से तिलमिला गये हें और इस मामले में सभी पत्रकारों ने जयपुर पिंक सिटी प्रेस क्लब में एक बैठक आयोजित कर इस खबर पर निंदा प्रस्ताव पारित किया हे , काश जयपुर के अखबार इस सच के छपने के बाद निंदा प्रस्ताव के स्थान पर खुद को सुधारने की शपथ लेते और खुद को सुधर कर अनुकरणीय उदाहरण पेश करते लेकिन चोरी और सीना जोरी बस इसी का नाम हे ........ । अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

वक्त के साथ कदम मिलाकर चलते गए जगजीत :गुलजार


यह 70 साल का छोटा सा बच्चा है, जिसका गला आज भी 17 साल के युवा की तरह जवान है। इस आवाज के तिलिस्म के बारे में कुछ भी बोलना गुनाह लगता है और आदमी चाहता है कि इसी में डूब जाये। यह रेशमी आवाज दिल को सहलाती और दिलासा देती है।

 वक्त के साथ कदम मिलाकर चलने पर जोर देते हुए ऑस्कर अवार्ड विजेता गीतकार गुलजार ने कहा कि हर व्यक्ति को अपने दौर के साथ ही युवा पीढ़ी को समझना बेहद जरूरी है और यही सफलता का सबसे बड़ा राज है।

राजधानी में गजल सम्राट जगजीत सिंह की सालगिरह के दौरान आयोजित कार्यक्रम में शिरकत करने आये गुलजार ने खास मुलाकात में कहा, ‘‘केवल रोजमर्रा की जिंदगी में ही नहीं बल्कि हर विधा से जुड़े व्यक्ति के लिये वक्त के साथ कदम मिलाये रखना बेहद जरूरी है। अपने दौर के साथ ही व्यक्ति को नयी पीढ़ी की रूचि को समझना चाहिए, यही हर सफल कलाकार की सफलता राज है।’’ एस डी बर्मन, मदन मोहन और आर डी बर्मन सरीाखे संगीतकारों के कालजयी गीतों के लेखक गुलजार ने एक सवाल के जवाब में कहा, ‘‘अब लोग बदल रहे हैं तो स्वाभाविक रूप से गीत और संगीत भी बदलेगा। यह कहना कि केवल 60 और 70 का संगीत सबसे बेहतर था, कतई उचित नहीं हैं। इस वक्त भी ए आर रहमान, शंकर एहसान लॉय और विशाल भारद्वाज जैसे संगीतकार बेहतरीन संगीत दे रहे हैं।’’ फिल्म ‘स्लमडाग मिलेनियर’ के गीत ‘जय हो’ के लिए ऑस्कर अवार्ड और ग्रेमी अवार्ड जीतने वाले गुलजार ने कहा कि इसके अलावा शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में पंडित रविशंकर, उस्ताद जाकिर हुसैन और पंडित बिरजू महाराज जैसे संगीतज्ञों ने हमारी विरासत को पूरी दुनिया में पहुंचाया है।
जगजीत सिंह के बारे में गुलजार ने कहा, ‘‘यह 70 साल का छोटा सा बच्चा है, जिसका गला आज भी 17 साल के युवा की तरह जवान है। इस आवाज के तिलिस्म के बारे में कुछ भी बोलना गुनाह लगता है और आदमी चाहता है कि इसी में डूब जाये। यह रेशमी आवाज दिल को सहलाती और दिलासा देती है।’’ 2004 में पद्मभूषण और उससे पहले 2002 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित गीतकार, फिल्म निर्देशक और निर्माता ने कहा, ‘‘जगजीत सिर्फ गजल तक नहीं समेटा जा सकता बल्कि वह भजन, शबद, शास्त्रीय संगीत को नये तरीके से पेश करने वाले गायक का नाम है। गजल की जानी बूझी तालों को तबले, सारंगी और बासुंरी के साथ तब्दील करते हैं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘जगजीत की भजन गायिकी में एक अलग ही रस है और उनकी नज़्म एवं गज़ल का अंदाज सबसे अलहदा है। वह एक तराशे हुए हीरे की तरह हैं, जिसके हर रूख में अलग ही तरह का नूर दिखाई देता हैं।’’ 1988 में दूरदर्शन के लिए ‘मिर्जा गालिब’ धारावाहिक का निर्माण करने वाले गुलजार ने कहा, ‘‘मैं कई दफा कह चुका हूं और आज भी कहता हूं कि मुझसे वो गालिब की जिंदगी कभी मुकम्मल नहीं होती, अगर मुझे जगजीत सिंह और नसीरूद्दीन शाह का साथ नहीं मिला होता।’’ गौरतलब है कि ‘मिर्जा गालिब’ में नसीर ने मुख्य भूमिका निभायी थी और इसका संगीत जगजीत सिंह ने दिया था।

कुंडलिया छंद ----- दिलबाग विर्क

धरा पर घट रहे पेड़ , बढ़ता जन - पसारा
एक बच्चे ,एक पेड़ का , लगाओ तुम नारा .
लगाओ तुम नारा , ताकि बन जाए संतुलन 
सृष्टि होगी सुंदर , खुशहाल होगा जीवन  .
हरा - भरा  संसार  ,  देंखें  देवता  आकर 
कोशिश करना  'विर्क ', उतरे स्वर्ग धरा पर . 

                      * * * * * 
             ----- sahityasurbhi.blogspot.com
        

मकान जो लाखों में नहीं मिलता था कोडियों में मिल गया

मकान खरीदने के चक्कर में तांत्रिक से ठगे गये जनाब

मेरे एक खासमखास दोस्त जो बहुत जल्दी किसी पर भी भरोसा कर लेते हें जज्बाती हे प्यारे हें सभी से मोहब्बत करते हें और इसीलियें वोह कई बार लोगों के झासे में आ जाते हें हम उन्हें समझाते हें तो बस वोह अब हमसे कई बातें छुपाने लगे हें ।
मेरे यह दोस्त मेरे साथ ही पड़े लिखे हें साथ रहे हें शरारती भी हें जिद्दी भी हे नाम हे सय्यद मोहम्मद अली इनका निजी स्कुल हे और यह वकालत भी कर रहे हें निजी स्कुल का यह विस्तार करना चाहते थे इसलियें इन्हें नजदीक ही एक बिकने वाली काका जी की बिल्डिंग खरीदना थी बिल्डिंग पर बिकाऊ हे का बोर्ड लगा था इन जनाब ने जब बिल्डिंग खरीद की बात कही तो काका जी ने साफ़ शब्दों में कहा के भाई यह बिल्डिंग में किसी भी मुस्लिम को नहीं बेचूंगा लेकिन इस बिल्डिंग की स्कुल के विस्तार के लियें पडोस में होने जरूरत थी इसलियें वोह इसका मुह माँगा दाम देने को तय्यार थे लेकिन जब काका जी का फरमान सुना तो फिर मेरे इन दोस्त ने अपने हिदू भाई जांबाज़ दोस्तों को मकान खरीदने भेजा जिस मकान को वोह ५ लाख रूपये में बेच रहे थे अब वोह ६ से १२ फिर १८ फिर २१ लाख की कीमत मागी जाने लगी लेकिन पोल खुल गयी मकान की रजिस्ट्री जब मेरे मित्र की राखी बहन जीजी बाई के नाम करवाई जाना थी तब ऍन वक्त पर मकान बेचने वाले ने मकान बेचने से इंकार करते हुए साईं की रकम लोटा दी ।
अब मेरे यह जज्बाती दोस्त जिद पर अड़ गये उन्हें एक तात्रिक मिले तांत्रिक इस लियें मिले के वोह तन्त्र मन्त्र विद्या पर ज्यादा ही विश्वास करते हें और बस यह जनाब तांत्रिक के पास जा पहुंचे तांत्रिक जी का कहना था दस हजार का खर्चा हे ऐसा मन्त्र दूंगा के मकान मालिक खुद तुम्हारे घर मकान बेच कर जायेंगे तात्रिक को दस हजार रूपये दिए गये लेकिन तांत्रिक जी ने कब्रिस्तान और श्मशान की मिटटी मिलाकर मंगवाई अब कब्रिस्तान की मिटटी तो आसानी से मिल गयी लेकिन मेरे यह दोस्त अपने हिदू भाई दोस्तों के साथ श्मशान पहुंचे तो एक श्मशान में तो ताला लगा था फिर दुसरे श्मशान में पहुंचे जहां कुछ शवों को ताज़ा जलाया गया था सभी दोस्त जब श्मशान में मिटटी लेने घुसे तो लोगों ने इन्हें हड्डियां चोरने वाला समझ लिया और यह सभी लोग बढ़ी मुश्किल में श्मशान से अपनी जान बचाकर भागे फिर शहर से दूर एक श्मशान से इन जनाब ने मिटटी लाकर तत्न्रिक जी को दी तांत्रिक जी ने जाप किया और मिटटी जिस मकान को खरीदना चाहते थे उसकी छत पर डालने के निर्देश दिए गये किराये के आदमी से छत पर मिटटी डलवाई गयी लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला फिर तांत्रिक ने कहा के जनाब यह बढ़ी सख्त जान हे इसके पेरों के नीचे की मिटटी लादो बस फिर कम हो जाएगा ।
अब काका जी के पैर के नीचे की मिटटी केसे लें एक तो सडक पक्की दुसरे काका जी के जुटे केसे उतरवाएँ खेर एक चाल चली गयी काका जी को फर्जी सालगिरह का कार्यक्रम बुलाया गया कच्चा खाना रखा गया और एक कच्ची जमीन वाले पार्क पर काका जी को खाना खिलने बताया यकीन काकाजी तो मोज़े पहन कर बेठे थे खेर काका जी के मोजों पर दाल गिराई गयी और फिर काका जी ने मोज़े उतारे फिर उनके पाँव के नीचे की मिटटी तांत्रिक जी को ले जाकर दी मिटटी फिर पढ़ी गयी और काका जी के घर पर डालने का हुक्म हुआ मिटटी भी डल गयी लेकिन काका जी मकान बेचें को तय्यार नहीं हुए आखिर तांत्रिक ने काका जी से हार मान ली और मेरे मित्र से हाथ जोड़ कर कहा के मेरा पहला केस ऐसा हे जो फेल हुआ हे आप रपये वापस ले लेना आज महाशिवरात्रि का अवकाश होने से में मेरे मित्र सय्यद मोहम्मद अली के घर उनसे मिलने गया था इसी बीच तांत्रिक जी रूपये देने आ गये वोह अनजान थे के मेरे दोस्त ने मुझ से सारी बातें छुपा रखी हे बस इसलियें उन्होंने सारी बात मेरे सामने ही बताना शुरू कर दी पहले तो मेरे मित्र ने उन्हें रोकना चाहा फिर बस मेरे मित्र ने खुद ही सारी बात मुझे बताई काका जी का मुकदमा हमारे पास था इसलियें हमने काका जी से फोन पर बात की और मकान खरीदने की पेशकश की काका जी ने कहा किसे चाहिए मेने कहा मेरे खास दोस्त मोहम्मद अली का स्कुल पास में हे उन्हें खरीदना हे काका जी ने पहले तो सोचा फिर कहा के ठीक हे मकान आपका हे जब चाहो ले लो ताज्जुब हे इतने झंझट के बाद जो मकान काका जी बेचने को तय्यार नहीं थे उसे बेचने के लियें वोह एक मिनट में राज़ी हो गये में और मेरे दोस्त काका जी के घर पहुंचे काका जी ने सत्कार किया साईं वापस ली और मकान की लिखा पढ़ी हो गयी ना मेने उनसे पूंछा के पहले इस मकान को बेचें से इनकार करते हुए साईं क्यूँ लोटा दी थी ना उन्होंने इस बारे में मुझ से कोई बात की अब मकान मेरे दोस्त के पास कल से आ जाएगा और काका जी ही खुद स्कुल से जुड़ा हुआ मकान होने से अपनी देख रेख में मकान का पुनर निर्माण करवाने का वायदा क्या हे और काका जी अब मोहम्मद अली मेरे दोस्त के परम मित्र बन गये हें यह सब केसे हुआ एक संयोग था या भाग्य कुछ कह नहीं सकते लेकिन कहानी कुछ ऐसी अप्रत्याशित बनी के में आप सभी भाइयों से शेयर कर रहा हूँ .................. । अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

लघु कथा ----- जसवंत घारू

                       चोर 

   मैं कई दिनों से देख रहा था कि बस परिचालक आधी सवारियों को टिकट देता और आधी सवारियों की टिकट के रूपये वह अपनी जेब में डाल लेता . मैंने मजाक-मजाक में उससे कह ही दिया :-" कन्डक्टर साहब आप तो हराम की खाते हैं ."
                  वह भी मुझसे हँसते हुए बोला :-" मास्टर जी आपकी बात बिलकुल ठीक है,लेकिन इस समाज में सही कौन है ? कोई हरामखोर है, कोई रिश्वतखोर ,तो कोई कामचोर है . आप भी सही नहीं होंगे .आप भी आधा समय गप्पें मारते होंगे और आधा समय पढ़ाते होंगे और सरकार से पूरी तनख्वाह पाते होंगे."
                     मैंने अपनी चोरी छुपाते हुए झट से कहा:-
" नहीं,नहीं ऐसा नहीं है ,मैं तो पूरा समय पढाता हूँ ."
     उसने कहा :- " मास्टर जी हो सकता है कि आप ईमानदारी से अपना कर्त्तव्य निभाते हों , लेकिन आपके सही होने से पूरा समाज तो सही हो नहीं जाता . हर कोई इस देश को लूट रहा है , अगर मैंने थोड़ी-बहुत चोरी कर ली तो क्या बुरा कर दिया ?
               उसकी बात सुनकर मुझे लगा कि उसने हम सबके भीतर छुपे हुए चोर को आइना दिखा दिया हो . 
 
                      * * * * *
 ----- jaswantgharu.blogspot.com 

मीडिया को संभलना होगा


राही कुरैशी के शब्दों में-
   सबको पहचान लिया,देख लिया जान लिया,
   एक दिन खुद को भी आईने में देखा जाये."
    अक्सर हम देखते हैं कि मीडिया में लगभग हर बड़ी हस्ती कटाक्ष की शिकार होती है .कटाक्ष भी ऐसे कि पढ़ते-पढ़ते पेट दुःख जाये किन्तु ऐसा लगता है   कि मीडिया खुद इन बड़ी हस्तियों की ख़बरों की आदी हो चुकी है   इनसे सम्बंधित कोई खबर न मिले तो मीडिया का काम ठप सा ही हो जाता है .ऐसी ही एक बड़ी हस्ती है  "गाँधी परिवार"और  ये गाँधी परिवार कुछ करता है  तो मीडिया परेशान कुछ न करे तो मीडिया परेशान  .आजकल वरुण गाँधी के विवाह की ख़बरों से समाचार पत्र भरे पड़े हैं.कभी यामिनी से शादी पक्की होने की खबर,कभी ताई सोनिया को आमंत्रित करने की खबर,कभी वाराणसी में मंडप सजने की खबर ,तो कभी प्रियंका के जाने की खबर,तो कभी राहुल के हड्डी टूटने के कारण जाने न जाने के कयास की खबर आखिर क्या आज के समाचार पात्र इतने खाली पेज रखते हैं कि इनके समाचारों से ही भरे जाते हैं फिर देश की अन्य समस्याओं के लिए मीडिया इन बड़ी हस्तियों को क्यों दोषी ठहरता है  जबकि "लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ "के रूप में ख्यात मीडिया अपने कर्तव्यों को पूर्ण करने में कोताही बरतता है .आज देश समाज में अपराधों की बाढ़ सी आयी है  और  यह मीडिया ही है  जो इन ख़बरों को मुस्तैदी से देश में उठा सकता है .मीडिया का यदि ऐसे मामलों में सकारात्मक कार्य हो तो पीड़ित अपनी पीड़ा बताने व् उस पर कदम उठाने से नहीं चूकेगा किन्तु मीडिया द्वारा केवल अपने प्रचार हेतु जब खबर नयी नयी हो तो रूचि लेना और  मामला ठंडा पड़ते ही मुहं मोड़ लेना पीड़ित को होंठ सी लेने को मजबूर करता है  .
       हमारे ही क्षेत्र में विधायक महोदय ने एक पीड़ित महिला से जिसके घर पर एक फ्रॉड ने कब्ज़ा कर लिया था से कहा"कि यदि मीडिया में ये मुद्दा उठ जाये तो मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकता हूँ."अब इसमें कितनी सच्चाई है  ये तो वे ही जाने किन्तु ये तो मानना ही पड़ेगा कि मीडिया की ताक़त से वे भी अपने कदम को जायज़ ठहराने की ताक़त रखते हैं.ऐसे में मीडिया को देखना होगा कि वह इन मुद्दों को सामान्य मुद्दे मान कर ज्यादा तूल न दे और  आम आदमी जिन कारणों से त्रस्त है  ,प्रभावित है ,उन मुद्दों  को मजबूती से उठाये और  उन्हें न्यायपूर्ण अंत तक पहुंचाए.
    मीडिया के लिए अंत में यही कहूँगी-
"पूरी धरा भी साथ दे तो और  बात है ,
पर तू जरा भी साथ दे तो और  बात है  ,
चलने को तो एक पांव से भी चल रहे हैं लोग
ये दूसरा भी साथ दे तो और बात है."  
                 शालिनी  कौशिक
http://shalinikaushik2.blogspot.com/

प्रथम ब्लॉग पत्रकार बनने का गौरव पाएँ Anwer Jamal

http://blogkikhabren.blogspot.com
हिंदी ब्लॉग जगत का पहला अनोखा ब्लॉग समाचार पत्र है जिससे आपको मिलेंगी ब्लॉग जगत की घटनाओं और हलचल की जानकारी। ब्लॉग जगत में भी अहम घटनाएँ घटित होती रहती हैं लेकिन उनमें से ज्यादातर लोगों के सामने नहीं आ पातीं। उन सभी घटनाओं को इस ब्लॉग समाचार पत्र के जरिए अब आपके सामने लाया जाएगा। इस अनोखे ब्लॉग पत्र के जरिए आप अपने ब्लॉग और अपनी पोस्ट का प्रचार भी कर सकते हैं और वह भी पूरी तरह निःशुल्क। यह आपके लिए आपके द्वारा चलाया जाने वाला आपका ही ब्लॉग पत्र है।
अगर आप ब्लॉग पत्रकार बनने के इच्छुक हों तो कृप्या अपनी email id भेज दीजिए। इस प्रकार आप इतिहास बनाने वाले प्रथम दल के सदस्य बन जाएँगे और हमेशा ब्लॉग जगत के प्रथम पत्रकारों में आपका नाम लिया जाता रहेगा ।

नेता जी की परशानी ''म''

''म'' से मनमोहन बने ,''म'' से बने महंगाई ,
''म'' से मैडम की चले ,''म'' मुख कही न जाई ,
''म'' से मीडिया भी बने ,मंद-मंद मुस्काई ,
''म'' से हैं मजबूरियां ,''म'' मत पूछो भाई .
[नेता जी की और से ''म'' महाशिवरात्रि की बधाई ]
                                                     शिखा कौशिक
                   http://netajikyakahtehain.blogspot.com/

सरकार के मंत्री के पति सांसद ने हथियार उठाये

सांसद और मंत्री डोक्टर किरोड़ी बंदूक लेकर डकेतों से मुकाबला करने जंगलों में पहुंचे

राजस्थान में दोसा के सांसद ,राजस्थान की सरकार को बनाने वाले मुख्य सूत्रधार और राजस्थान सरकार में खादी ग्रामोद्ध्योग मंत्री श्रीमती गोलमा देवी के पति निर्दलीय सांसद डोक्टर किरोड़ी मीणा ने राजस्थान में डकेतों से निपटने में सरकार को अक्षम बताया हे और खुद ही अपने साथियों के साथ बंदूके लेकर जंगलों में निकल पढ़े हें ।
सांसद किरोड़ी प्रति माह एक राजनीति और रचनात्मक राजनीति जिससे जनता उनसे जुड़ते हे करते रहे हें पहले भाजपा के दिग्गज कहलाने वाले जब भाजपा छोड़ कर निर्दलीय चुनाव लढे तो इनके प्रभाव से राजस्थान की १७ विधानसभा सीटें प्रभावित हुई हे और राजस्थान की सरकार बनाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही हे इसी लियें आज किरोड़ी सरकार के बंगले में ही रहते हें पत्नी सरकार में मंत्री हे और राजस्थान सरकार के मंत्री के इसी बंगले में सरकार के खिलाफ सभी आन्दोलन की रणनीति बनाई जाती हे कभी बंद ,कभी धरना ,कभी रेली .कभी दंडवत रेली तो कभी कोई हंगामा किरोड़ी राजस्थान में चर्चा में रहते हें लेकिन आज वोह सरकार पर डकेतों से साठ गाँठ के आरोप लगा कर जब जंगलों में हथियार लेकर निकले हें तो सरकार को उन्होंने शर्मसार कर दिया हे ।
किरोड़ी का आरोप हे के अब तक पुलिस और डकेतों की मिली भगत से राजस्थान में डकेत जनता पर ज़ुल्म कर रहे हें निर्दोष लोगों की हत्याएं कर रहे हे लेकिन अब डकेतों को राजनितिक शरण मिल जाने से राजनीती उनके खिलाफ कुछ नहीं कर रही हे और उन डकेतों को जिन्होंने कई घर बर्बाद किये के महिलाओं को विधवा किया उनेक खिलाफ कोई कार्यवाही सरकार नहीं कर रही हे इसलियें अब जंगलों में डकेतों से निपटने के लियें उन्हें खुद को अपने साथियों के साथ मुकाबला करने के लियें हथियार लेकर निकलना पढ़ रहा हे ।
डोक्टर किरोड़ी सांसद की इस डकेतों के खिलाफ यात्रा में कई उनके साथी हे और कई पुलिस कर्मी उनकी सुरक्षा कर रहे हें सवाल यह हे के अगर किरोड़ी केवल राजनीती कर रहे हें तो फिर सरकार उनकी सुरक्षा क्यूँ कर रही हे हथियार लाइसेंसी हें या नहीं इसकी जांच क्यूँ नहीं कर रही और अगर वास्तव में जंगल में डकेत हें तो फिर अभियान चला कर इन डकेतों को खत्म क्यूँ नहीं कर रही । अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

मनमाने फेसले देने वाले जजों के खिलाफ क्या कार्यवाही होना चाहिए

क्या मनमाना फेसला देने वाले जज के खिलाफ कार्यवाही होना चाहिए

हाल ही में गुजरात और पुरे देश को हिला देने वाली खतरनाक घटना गोधरा काण्ड के आरोपियों को फांसी और कुछ को ऊमर केद की सजा सुनाई गयी हे और कुछ को बरी कर दिया गया हे फेसला सही हे या गलत इस मामले में अपील न्यायालय इसकी जांच करेगी लेकिन जरा सोचो जिन मास्टर माइंड बनाये गये लगों को बरी किया गया हे अगर उन्हें हाईकोर्ट सजा के लायक मानता हे या जिन्हें सजा दी गयी हे उन्हें बरी के लायक मानता हे तो किया हाईकोर्ट अपने अधीनस्थ जज के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही करेगा यह एक सवाल हे जो देश की न्याय व्यवस्था और उससे ट्रस्ट लोगों के लियें महत्वपूर्ण बन गया हे ।
देश में कानून हे नीचे की अदालत अगर बरी करती हे तो उस के खिलाफ अपील होगी ,अगर नीचे की अदालत सज़ा देती हे तो हाईकोर्ट में अपील होगी और कई फेसले ऐसे भी होते हें जो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जाकर उल्ट जाते हें या फिर बदल जाते हें जो लोग जेल में सिसकते रहते हें उन्हें सालों बाद बरी कर दिया जाता हे या जो लोग बाहर न्याय व्यवस्था का मखोल उड़ाते रहते हें उन्हें बाद में जेल भेज दिया जाता हे लेकिन इस मामले में एक गलत फेसला देने वाले अधीनस्थ जज के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जाती और हालात यह हें के मिडिया में छाने के लियें कई जज अजीबोगरीब फेसले दे रहे हें जिनका कोई विधिक अस्तित्व नहीं हे , न्यायिक व्यवस्था के बारे में राजस्थान की स्थिति यह हे के यहाँ मजिस्ट्रेटों को बिना किसी विधिक प्रक्रिया के फास्ट ट्रेक जज बना दिया गया जो मजिस्ट्रेट तीन वर्ष तक की ही सज़ा दे सकता हे उस मजिस्ट्रेट को फांसी की सजा दें का अख्तियार दे दिया कोटा में कई मामलों में फास्ट ट्रेक जज जिसकी मानसिकता केवल मजिस्ट्रेट की थी उन्होंने लोगों को फांसी की सज़ा सुनाई लेकिन हाईकोर्ट ने अपील पेश होते ही दुसरे दिन फांसी की सजा खारिज कर दी तो जिन मामलों में फांसी की सजा एक तमाशा बनाई जाती हो वहां अगर सजा उलटी जाये तो ऐसे जज को बख्शना नहीं चाहिए उनके खिलाफ कार्यवाही होना चाहिए , राजस्थान में फिर ऐ डी जे की परीक्षाएं हुईं क्योंकि यह फास्ट ट्रेक जज कार्यवाहक जज थे इनको मजिस्ट्रेट का ही दर्जा था इसलियें यह भी जज बनना चाहते थे इन्होने राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा ली गयी जज की परीक्षा में हिस्सा लिया ओर सभी जज के पद पर कार्यरत मजिस्ट्रेट फेल हो गये यानि हाईकोर्ट राजस्थान ने जिन लोगों को जज का काम देकर फांसी की सज़ा देने का अख्तियार दे रखा हे वोह जज हाईकोर्ट ने फेल कर दिए और उन्हें जज बनने लायक नहीं माना लेकिन सिस्टम देखिये फिर भी वही मजिस्ट्रेट जज का काम गेर कानूनी तरीके से कर रहे हे ।
ऐसी अनियमितताओं में देश की न्यायिक व्यवस्था में अराजकता तो आ ही रही हे सब जानते हें हाईकोर्ट के जज की नियुक्ति केसे होती हे अभी राजस्थान में जज की नियुक्तियों में भ्रस्ताचार का भंडा फोड़ हुआ हे रिटायर होने के बाद यह जज साहब कहा केसे राजनेताओं के तलवे चाट कर खुद को किसी आयोग में कुछ बना दें के प्रयासं में रहते हे यह कहानिया किसी से छुपी नहीं हे ऐसे में न्यायिक अराजकता को सूधारने के लियें अगर फेसला बदलता हे तो निचली अदालत के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही होना चाहिए ताकि प्रारम्भ से ही फेसला अंदाज़े और जज्बात के आधार पर नहीं न्यायिक गुणवत्ता के आधार पर हो ।
गोधरा मामले में बचाव पक्ष के वकील आई एम मुंशी ने जब मिडिया को बताया की अभी फेसले की कोपी उन्हें नहीं मिली हे तो देश के किसी भी कानून के जानकार या मिडिया ने या हाईकोर्ट सुप्रीमकोर्ट ने गोधरा के जज साहब से यह सवाल नहीं किया के हमारे देश के संविधान हमारे देश के दंड विधान दंड प्रक्रिया संहिता में किसी भी अभियुक्त को सज़ा देने पर तुरंत मुफ्त नकल दिया जाना आवश्यक हे लेकिन इस गम्भीर मामले में अगर नकल वक्त पर नहीं दी गयी तो विधि नियमों का उल्न्न्घन तो क्या ही गया हे आखिर कोनसी मजबूरी थी जो दोषी लोगों को तुरंत फेसले की नकल नहीं दी गयी फेसले की इतनी लम्बी तारीख प्रावधान के तहत हाईकोर्ट से फांसी के फेसले की पुष्ठी फिर भी नकल वक्त पर नहीं यह अनियमितता नहीं तो और क्या हे ।
देश की अदालतें फेसला कुछ भी दे किसी को कोई एतराज़ नहीं लेकिन हाईकोर्ट में समीक्षा के बाद अगर फेसले में मनमानी ,लापरवाही या जज्बात या अंदाज़े के आधार पर फेसला देने का मामला प्रमाणित होता हे तो ऐसे बेपरवाही से गम्भीर फेसले देने वाले जजों का फेसला उलटते वक्त ऐसे जजों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही का प्रावधान होना चाहिए क्योंकि देश की जनता इतनी सस्ती नहीं के सालों जेल में रहने के बाद उसे पता चले के उस पर गलत आरोप हे उसे बरी कर दिया गया हे और जज साहब मजे करते रहें तो दोस्तों न्यायिक व्यवस्था के सुधर के लियें इस प्रश्न को आगे बढाये देश बचाएं देश में निष्पक्ष गुणवत्ता वाली न्यायिक व्यवस्था लायें । अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

कुंडलिया छंद ----- दिलबाग विर्क

Written By डॉ. दिलबागसिंह विर्क on मंगलवार, 1 मार्च 2011 | 7:33 pm


हम हिंदू ,तुम मुस्लमान, क्यों सोच है ऐसी
  भाई - भाई  क्यों  नहीं , बने  भारतवासी  .
  बने  भारतवासी , एक - दूसरे के दुश्मन 
  धर्म मिलाता सदा , यहाँ बाँट रहा है मन .
  छोडो संकीर्णता , सबसे बड़ा मानव धर्म 
  कहता ' विर्क ' सबसे , पहले इन्सान हैं हम .

               * * * * *
                ----- sahityasurbhi.blogspot.com

महा शिवरात्रि पर गूंजेगा हर हर बम बम

दोस्तों देश के सबसे बढ़े त्यौहार महा शिवरात्रि पर देश के सभी नागरिकों को मुबारकबाद , कल महाशिवरात्रि हे आस्था का दिन हे पूजा अर्चना ,उपवास ,व्रत का दिन हे इस दिन देश और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सभी मन्दिरों पर महाशिवरात्रि की गूंज होगी हर हर बम बम का नारा होगा और इस दिन कई लोग भांग के मजे भी लेंगे ।
कोटा में इस अवसर पर कर्णेश्वर महादेव पर मेला लगेगा ,नीलकंठ महादेव पर अभिषेक होगा,शिव पूरी धाम में शिवलिंग की प्रतिष्ठा होगी ,गो कर्णेश्वर महादेव के मन्दिर पर रुद्रभिशिक होगा ,पंच मुखी महादेव मन्दिर समिति में ३२ जोड़ों का सामूहिक विवाह होगा तो देश भर के मन्दिरों में इस अवसर पर झांकियां जमेंगी ।
सभी ब्लोगर भाईयों बहनों को इस शुभ अवसर पर मुबारकबाद बधाई । अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

बजट को समझें, फिर घिसें कलम

हिंदी समाचार पत्रों में संपादक की कुर्सी ऐसी बांबी बन गई है जहां से समाचारों का उदय और अस्त दोनों होता है. बहुत अच्छी बात है, यही होना भी चाहिए लेकिन ज़रा इन होनहार संपादकों की समझ तो देखिए...केंद्रीय बजट पर जितने मुंह, उतनी बातें कह दी गईं - पूरी तरह बिना सोचे और बिन विचारे. किसके पास इतना समय है और कौन बेवज़ह के बजट विश्लेषण का झमेला उठाए...इससे भी बड़ा सवाल यह की अपनी बांबी में बैठकर २४/७ का राग गुनगुनाने वालों को इतना शऊरकहाँ जो बजट की सही समझ विकसित कर सकें?

ज़रा जागरण के संपादक की हालत देखिये...उन्होंने लिखा, बड़ी शिद्दत से, 
आम बजट आम आदमी की उम्मीदों पर मुश्किल से ही खरा उतरता है और जब अपेक्षाएं बहुत अधिक हों तो इसके आसार और भी कम हो जाते हैं। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने यह स्पष्ट कर दिया कि केंद्र सरकार से नाखुश आम जनता को बजट के जरिये खुश करने का उनका कोई इरादा नहीं था। उनकी ज्यादातर रियायतें एक हाथ से देने और दूसरे हाथ से लेने वाली हैं। बेलगाम महंगाई को देखते हुए आयकर में दी गई छूट एक तरह से न के बराबर ही है। लगता है कि वित्त मंत्री अपने सहयोगियों की इस धारणा से सहमत नहीं कि बढ़ती महंगाई से बुरा और कोई टैक्स नहीं या फिर वह चाहकर भी अपेक्षित रियायतें नहीं दे सके। सच्चाई जो भी हो, इस बजट से केंद्र सरकार के प्रति आम आदमी की नाराजगी दूर होने की संभावना शून्य है। हालांकि वित्त मंत्री ने महंगाई थामने के कुछ उपाय किए हैं, लेकिन समस्या यह है कि इन उपायों के नतीजे मिलने में समय लगेगा और यदि मध्य एशिया में उथल-पुथल के कारण पेट्रोलियम पदार्थो के दाम बढ़े तो इन उम्मीदों पर पानी ही फिरेगा। वित्त मंत्री ने जिन उपायों के जरिये लंबे समय से उपेक्षित कृषि क्षेत्र को सुधारने की पहल की है वे अभी भी अपर्याप्त नजर आ रहे हैं। अच्छा होता कि सरकार कृषि क्षेत्र में आमूल-चूल बदलाव करने का साहस जुटाती और साथ ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नया आयाम प्रदान करती। जिस तरह कृषि क्षेत्र में सुधार के उपाय उल्लेखनीय होते हुए भी अपर्याप्त हैं उसी तरह अन्य क्षेत्रों में भी सुधार की झलक ही पेश की गई है. 
साफ़ है वे एक दिन पहले से ही संपादकीय लिखकर तैयार बैठे थे...काम तो काम है, कल करन को आज कर...इस फेर में वे इस जानकारी की कमी नहीं छिपा सके कि केंद्रीय बजट जो है वह सिर्फ कंसोलिडेटेड फंड के आय-व्यय का लेखा-जोखा होता है. इससे उम्मीदें सड़क पर खड़े होकर नहीं की जा सकती हैं. जागरण की बजाय दैनिक भास्कर ने बेहतर किया  कि जल्दबाजी में बजट विचार देने से परहेज किया. 
अमर उजाला ने अपने पहचान के अनुरूप काम किया लेकिन वह जाने-अनजाने में बजट प्रस्तावों के कुछेक सन्दर्भों की अनदेखी की. इसने लिखा, 
अगर साढ़े बारह लाख करोड़ रुपये से ऊपर के बजट में नए करों, करों की दर में बदलाव और माफी का हिसाब-किताब आकर मात्र 200 करोड़ रुपये पर टिक जाए, तो इसे वित्त मंत्री की आर्थिक बाजीगरी भर मानना गलत होगा। कोई भी वित्त मंत्री सिर्फ आंकड़ों का हेर-फेर नहीं करता और प्रणब मुखर्जी जैसा अनुभवी और तेज वित्त मंत्री हो, तो यह उम्मीद और भी नहीं की जा सकती। फिर क्या यह चुनाव के मौसम के बगैर चुनावी बजट है? एक अर्थ में ऐसा भी लगता है, क्योंकि सबके लिए कुछ न कुछ करने के साथ लोक लुभावन कार्यक्रमों के लिए खजाना खोल दिया गया है। सामाजिक क्षेत्र और ग्रामीण विभाग के कई मदों में तो बजट का प्रावधान 30-40 फीसदी तक बढ़ा है। शिक्षा, स्वास्थ्य और खेती के लिए सरकार की चिंता साफ दिखती है। पौने पांच लाख करोड़ के ऋण के इंतजाम के साथ समय पर ऋण चुकाने वालों को मात्र चार फीसदी के प्रभावी दर पर ऋण उपलब्ध कराना बड़ी बात है। 

इस समाचार पत्र के संपादक को लगा  कि इस बजट में लोक लुभावन कार्यक्रमों के लिए खजाना खोल दिया गया है। अव्वल तो यह पूरी तरह सच नहीं और अगर यह सच भी होता तो यह सच कहने का कौन सा तरीका है? जब सामाजिक और ग्रामीण विकास के बजटीय प्रावधानों में ३५-४० फीसदी वृद्धि की गयी है तो फिर नज़र तत्काल राज्यों की सरकारों पर केन्द्रित करनी चाहिए थी. इस स्टार पर विकास कार्यों के क्रियान्वयन की ज़िम्मेदारी राज्यों की होती है. क्या अमर उजाला को यह उम्मीद है  कि बजट में कार्यपालिका से सम्बंधित घोषनाए की जाएं जबकि बजट पूरी तरह एक आर्थिक-वित्तीय कवायद है? 


हिंदी भाषा के ऐतिहासिक समाचार पत्र नई दुनिया से बजट के बेहतर विश्लेषण की उम्मीद थी. उसके पहले पृष्ठ का समाचार देखा, जिसमें शीर्षक ही था दादा की बाजीगरी तो संपादकीय पृष्ठ से छेड़-छाड़ करने का मन नहीं हुआ. इस समाचार पत्र के पहले ही पेज पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के हवाले से कहा गया था, बजट किसान विरोधी. क्या संपादक की सोच उससे कुछ अलग रही होगी? पता नहीं, कृपया आप नै दुनिया पढ़ते हों तो संपादकीय पेज की खबर हमें भी देने का कष्ट करें. 


देश की आर्थिक राजधानी मुंबई से प्रकाशित होने के कारण बजट पर नवभारत टाइम्स की प्रतिक्रिया  औरों से बेहतर है. हालांकि यह अखबार अपनी कांग्रेस समर्थक सोच के कारण बजट की भूल-चूक, लेनी-देनी का हिसाब नहीं मांगता है फिर भी अन्य हिन्दी अखबारों के चमत्कार और पूर्वाग्रह ग्रस्त सम्पादकीय पढने के बाद यह एक संतुलित विचार देता है. नवभारत टाइम्स लिखता है, 

सरकार से जनम की अदावत रखने वाले आलोचकों के लिए यूपीए-द्वितीय के तीसरे बजट में जिक्र करने लायक कुछ भी नहीं है। लेकिन जो लोग इस बार के बजट की मुश्किलों से वाकिफ हैं, वे प्रणव मुखर्जी के इस प्रयास को इज्जत की नजर से देखेंगे। पूरी दुनिया में रोलबैक का हल्ला मचा है। खुद भारत सरकार के इकनॉमिक सर्वे में फिस्कल डेफिसिट और करेंट अकाउंट डेफिसिट को लेकर गंभीर चिंता जताई गई थी। 
ऐसे में आशंका यह थी कि इस बार का बजट हर किसी के लिए कुनैन की टिकिया साबित होगा। लेकिन प्रणव दा ने बजट बनाने में सचमुच मेहनत की है और अर्थव्यवस्था के दूरगामी हितों का ध्यान रखने के अलावा समाज के सबसे पिछड़े, उपेक्षित तबकों तक भी इसका कुछ न कुछ फायदा पहुंचाने की कोशिश की है। 
बहरहाल, इस समाचार पत्र के शीर्षक से विरोध जताया जा सकता है. इसका शीर्षक है, गरीबों का बजट जो सच्चाई से परे है. बांबी में बैठे सम्पादक को किसने यह भ्रामक शीर्षक सुझाया?

एक अपील


दोस्तों,

मैं सलीम खान जी की हार्दिक आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे AIBA के अध्यक्ष पद के काबिल समझा और इतनी गरिमा प्रदान की जिसके मैं काबिल नहीं ...............आप सबकी तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ कि आप सबने मुझे इतना प्यार , सम्मान और स्नेह दिया और मुझे ये पद दिए जाने पर दिल से स्वागत किया .

एक नयी पहल का सम्मान करना सबका फ़र्ज़ बनता है और सबने अपना फ़र्ज़ बखूबी निभाया मगर मुझे नहीं लगता कि ये कोई इतना बड़ा कदम है कि इसे किसी भी तरह का मुद्दा बनाया जाये ........मैं पहले भी कह चुकी हूँ कि ब्लॉगजगत में बंटवारा नहीं होना चाहिए .........खासतौर पर स्त्री पुरुष सन्दर्भ में ............मैंने तो आज तक यही देखा कि यहाँ चाहे स्त्री हो या पुरुष दोनों को बराबर सम्मान दिया गया और सभी ने अपनी गरिमा के अनुरूप काम किया अब सिर्फ ये सोचना कि स्त्री को मान देकर या पद देकर बहुत बड़ा काम कर लिया तो ये गलत बात है .........हर काम स्त्री और पुरुष दोनों के सहयोग से ही  संभव है और हम यहाँ कोई स्त्री पुरुष में भेदभाव के लिए इकट्ठे नहीं हुए हैं ..........हमारा कर्त्तव्य है कि कहीं भी कुछ गलत हो रहा है तो उसे रोका जाये और ब्लॉगिंग को सही दिशा दी जाए ना कि सिर्फ एक ब्लॉग  को जिससे हम जुड़े हैं...........इसके लिए एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाना कहाँ तक उचित होगा? हम सब एक परिवार की तरह हैं और उसी की मर्यादा के अनुरूप रहना चाहिए ना कि एक दूसरे पर छींटा कशी की जाये और ब्लॉगिंग का राजनीतिकरण किया जाये जो ब्लॉगिंग के लिए सबसे दुखद पहलू होगा .............अभी ब्लॉगिंग अपने शैशव काल में है और इसी में इस तरह की बातें करना गलत है .........देखिये कितने सम्मान की बात है कि हमारे ब्लॉगर दोस्त श्री अजित वडनेकर जी को ब्लॉगिंग के लिए सम्मान प्राप्त हुआ ...........ये सम्मान ब्लॉगिंग की दुनिया में मील का पत्थर साबित होगा और आगे बाकी ब्लोगर्स  के लिए नए रास्ते खुलेंगे .........इस तरह के आयोजनों का तहेदिल से स्वागत करना चाहिए ..........मेरी सभी ब्लोगर दोस्तों से एक ही अपील है कि सभी मिलजुलकर मोहब्बत के साथ अपने कार्य में लगें और एक दूजे को उचित मान सम्मान दें अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो आपकी छवि ही ब्लॉगजगत में धूमिल होगी ..........और जहाँ  तक मेरा सवाल है जब मुझे ये लगेगा कि यहाँ राजनीति खेली जा रही है मैं उसी दिन उसी वक्त इस पद को छोड़ दूंगी क्योंकि मैं किसी भी तरह की राजनीति की हिस्सा नहीं बन सकती ...........हाँ ब्लोगर दोस्तों के लिए हमेशा तैयार हूँ .......उनकी समस्याओं के लिए जहाँ तक हो सकेगा कोशिश करुँगी निदान करने का मगर ब्लॉगिंग में राजनीति मुझे पसंद नहीं.

इसलिए उम्मीद करती हूँ कि कोई भी AIBA का सदस्य कहीं भी ऐसी कोई बात नहीं करेगा जिससे इसकी गरिमा को ठेस पहुंचे .

धन्यवाद !

-वन्दना गुप्ता
अध्यक्षा, AIBA

- शूर्पणखा काव्य उपन्यास----सर्ग -१-चित्रकूट......रचयिता -डा श्याम गुप्त

        




   शूर्पणखा काव्य उपन्यास-- नारी विमर्श पर अगीत विधा खंड काव्य .....रचयिता -डा श्याम गुप्त  
                                            
                                 विषय व भाव भूमि
              स्त्री -विमर्श  व नारी उन्नयन के  महत्वपूर्ण युग में आज जहां नारी विभिन्न क्षेत्रों में पुरुषों से कंधा मिलाकर चलती जारही है और समाज के प्रत्येक क्षेत्र में प्रगति की  ओर उन्मुख है , वहीं स्त्री उन्मुक्तता व स्वच्छंद आचरण  के कारण समाज में उत्पन्न विक्षोभ व असंस्कारिता के प्रश्न भी सिर उठाने लगे हैं |
             गीता में कहा है कि .."स्त्रीषु दुष्टासु जायते वर्णसंकर ..." वास्तव में नारी का प्रदूषण व गलत राह अपनाना किसी भी समाज के पतन का कारण होता  है |इतिहास गवाह है कि बड़े बड़े युद्ध , बर्बादी,नारी के कारण ही हुए हैं , विभिन्न धर्मों के प्रवाह भी नारी के कारण ही रुके हैं | परन्तु अपनी विशिष्ट क्षमता व संरचना के कारण पुरुष सदैव ही समाज में मुख्य भूमिका में रहता आया है | अतः नारी के आदर्श, प्रतिष्ठा या पतन में पुरुष का महत्त्वपूर्ण हाथ होता है | जब पुरुष स्वयं  अपने आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक, धार्मिक व नैतिक कर्तव्य से च्युत होजाता है तो अन्याय-अनाचार , स्त्री-पुरुष दुराचरण,पुनः अनाचार-अत्याचार का दुष्चक्र चलने लगता है|
                 समय के जो कुछ कुपात्र उदाहरण हैं उनके जीवन-व्यवहार,मानवीय भूलों व कमजोरियों के साथ तत्कालीन समाज की भी जो परिस्थिति वश भूलें हुईं जिनके कारण वे कुपात्र बने , यदि उन विभन्न कारणों व परिस्थितियों का सामाजिक व वैज्ञानिक आधार पर विश्लेषण किया जाय तो वे मानवीय भूलें जिन पर मानव का वश चलता है उनका निराकरण करके बुराई का मार्ग कम व अच्छाई की राह प्रशस्त की जा सकती है | इसी से मानव प्रगति का रास्ता बनता है | यही बिचार बिंदु इस कृति 'शूर्पणखा' के प्रणयन का उद्देश्य है |
                   स्त्री के नैतिक पतन में समाज, देश, राष्ट्र,संस्कृति व समस्त मानवता के पतन की गाथा निहित रहती है | स्त्री के नैतिक पतन में पुरुषों, परिवार,समाज एवं स्वयं स्त्री-पुरुष के नैतिक बल की कमी की क्या क्या भूमिकाएं  होती हैं? कोई क्यों बुरा बन जाता है ? स्वयं स्त्री, पुरुष, समाज, राज्य व धर्म के क्या कर्तव्य हैं ताकि नैतिकता एवं सामाजिक समन्वयता बनी रहे , बुराई कम हो | स्त्री शिक्षा का क्या महत्त्व है? इन्ही सब यक्ष प्रश्नों के विश्लेषणात्मक व व्याख्यात्मक तथ्य प्रस्तुत करती है यह कृति  "शूर्पणखा" ; जिसकी नायिका   राम कथा के  दो महत्वपूर्ण व निर्णायक पात्रों  व खल नायिकाओं में से एक है , महानायक रावण की भगिनी --शूर्पणखा | अगीत विधा के षटपदी छंदों में निबद्ध यह कृति-वन्दना,विनय व पूर्वा पर शीर्षकों के साथ  ९ सर्गों में रचित है |
            पिछ्ले  वन्दना,विनय व पूर्वा पर शीर्षकों में कृति के मूल भाव व सन्दर्भ का वर्णन किया गया था
 प्रस्तुत सर्ग -१-चित्रकूट से  इस काव्य-उपन्यास की मूल कथा प्रारम्भ होती है...महाकाव्यों व खंडकाव्यों की रीति के अनुसार मूल नायक के चरित्र को उभारने के क्रम में उसके चारों ओर की परिस्थियों ,अन्य पात्रों , स्थानों, घटनाओं के वर्णन की आवश्यकता होती है ..अतः यह कृति राम के चित्रकूट निवास व वहां की घटनाओं से प्रारम्भ होती है......कुल छंद २५ जो दो भागों में प्रस्तुत किया जायगा  --प्रस्तुत है सर्ग एक चित्रकूट का भाग एक ---छंद -१ से १२ तक ....

 १-
 प्रियजन परिजन मातु सहित सब,
सचिव , सैन्यगण और शत्रुहन; 
श्वसुर जनक के सहित सभी को,
कर अभिवादन यथायोग्य फिर;
गुरुजन गुरुतिय पद वंदन कर,
विदा भरत को किया राम ने ||
२-
सखा निषाद-राज को प्रभु ने,
विदा किया सम्मान सहित फिर |
पर्णकुटी सम्मुख बट-छाया,
सीता-अनुज सहित प्रभु बैठे;
और भरे मन बातें  करते ,
भरत के निश्छल प्रेम भाव की ||
३-
लक्षमण ! यह प्रेम भाव जग में,
सुन्दरतम, अनुपम, अतुल भाव |
जीवन-जग की सब परिभाषा,
है निहित इसी के अंतर में  |
यह प्रेम बसा है कण कण में,
इसलिए ईश  कण कण बसता ||
४-
लक्षमण बोले ,'प्रभु कण कण में,
है राम नाम की ही माया |'
जो नाम आपका एक बार,
लेता है, भव तर जाता है |
है प्रेम आपका ही प्रभुवर!
जो सरसाता है कण कण को ||
५-
पर भ्रात भरत के अतुल प्रेम,
की लक्ष्मण  कोइ परिधि नहीं |
वह निश्छल निस्पृह भ्रातृ-प्रेम,
सब सीमाओं की सीमा है  |
इस प्रेम-भाव का हे लक्ष्मण !
प्रभु स्वयं भक्त बन जाता है ||
६-
बन भक्ति, प्रेम और धर्मं-ध्वजा,
लक्ष्मण यह नेह-भक्ति जग में;
फहरेगी बन कर नाम -'भरत' |
भ्रातृ, सेव्य और  भक्ति प्रेम,
का होगा जग में नाम -भरत;
यश गाथा गायें दिग-दिगंत ||
७-
सीता बोलीं , ’लक्ष्मण तुम क्यों,
हो चुप चुप से उर में अधीर ?’
क्या भरत-प्रेम पर राम-कृपा -
से मन द्विधा के भाव भरे |
'माता मैं तो अति पुलकित मन',
लक्ष्मण बोले , पद गहि सिय के ||
८-
बड़भागी भरत,बसे उर प्रभु,
मैं अति बडभागी जो प्रभु की ; 
नित नित सेवा-सुख पाता हूँ | 
सुर मुनि व जगत को जो दुर्लभ,
सिय मातु सहित जो रघुवर की;
छवि के दर्शन नित नित पाऊँ ||
९- 
क्या भला चाह कर मुक्ति-मोक्ष,
प्रत्येक जन्म में हे माता!
इन चरणों का अनुगामी बन,
बस भक्ति मिले श्रेयस्कर है |
प्रभु-सुधा कृपा के वर्षण की,
अमृत-बूंदों का पान करूँ ||
१०-
मंदाकिनी-तट जल धारा में,
पद निरखि सिया के प्रभु पूछें -
बतलाएं प्रिये! ये पैर भला,
हम दोनों में किसके सुन्दर ?
बोलीं सिय,'भव्य चरण प्रभु के'-
इन चरणों से समता किसकी ||
११-
"जग-वन्दित पद जग-जननी के,
रति के भी पाँव लजाते हैं |''-
फिर भी हम कहते सत्य, नाथ !
'सुन्दर पद कमल आपके हैं ' |
विहँसे रघुनाथ न मानो तो,
तुम कहो उसी को बुलवाएँ ||
१२-
लक्ष्मण को दोनों ही प्रिय हैं,
हम दोनों के ही प्रिय लक्ष्मण |
वे सत्य-भाव से ही निर्णय ,
लेकर  के  हमें बताएँगे |
हँसि, राम बुलाये लक्ष्मण तब,
हे भ्रात ! करो निर्णय इसका ||   .......क्रमश:  चित्रकूट भाग दो....

c.m. ka daura


सी.एम्.जब प्रदेश की करने निकली सैर ;
अधिकारी थे खौफ में ,मांगे रब से खैर ;
पर जनता को मिल गयी मुंह मांगी सौगात ;
बिजली दर्शन दे रही ,सारे दिन और रात .
                                                     शिखा कौशिक
http://netajikyakahtehain.blogspot.com/

आख़िर मुझ पर बेवजह इल्ज़ाम क्यों ? Due to prejudice

http://ahsaskiparten-sameexa.blogspot.com
पर आप मेरा यह कमेँट देख सकते हैं।
इसमें मुझ पर बेवजह लगाए गए कई झूठ इल्ज़ामों का खंडन है । आप देख सकते हैं कि लोग महज़ सरसरी नज़र से मेरे लेख पढ़कर कैसे ग़लतफ़हमियाँ पालते भी हैं और फिर फैलाते भी हैं ?
@ भाई समीक्षा सिंह जी ! आप लोग मेरी रचनाओं को ठीक ढंग से नहीं पढ़ते इसीलिए आप मुझसे बदगुमान और परेशान रहते हैं । अपर्णा पलाश बहन का कोई भी शेर मैंने अपने ब्लाग 'अहसास की परतें' के कमेँट बॉक्स के साथ नहीं लगाया है , तब आप मुझे चोरी का झूठा इल्ज़ाम क्यों दे रहे हैं ?
जो इस जगत का रचनाकार है वही एक ईश्वर है मैं उसी को मानता हूँ और आप भी उसी को मानते होंगे।
अगर आपकी नज़र में आपके धर्मग्रंथ प्रक्षिप्त नहीं हैं तो आप उनका पालन कीजिए।
आप खुद कहते हैं कि हिंदू धर्म के ग्रंथों से आपकी आस्था हिली चुकी है।

1. क्या आप आज के युग में विधवा को सती कर सकते हैं ?
2. क्या आप आज की व्यस्त जिंदगी में तीन टाइम यज्ञ कर सकते हैं ?
3. क्या आप आज अपने बच्चों को वैदिक गुरूकुल में पढ़ाते हैं ?
4. क्या आपके पिताजी 50 वर्ष पूरे करके वानप्रस्थ आश्रम का पालन करते हुए जंगल में जा चुके हैं ?
5. और अगर मुसलमानों की तरह वह जंगल नहीं जाते तो क्या अब आप उनसे अपने धर्मग्रंथों के पालन के लिए कहेंगे ?

Founder

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Saleem Khan