नियम व निति निर्देशिका::: AIBA के सदस्यगण से यह आशा की जाती है कि वह निम्नलिखित नियमों का अक्षरशः पालन करेंगे और यह अनुपालित न करने पर उन्हें तत्काल प्रभाव से AIBA की सदस्यता से निलम्बित किया जा सकता है: *कोई भी सदस्य अपनी पोस्ट/लेख को केवल ड्राफ्ट में ही सेव करेगा/करेगी. *पोस्ट/लेख को किसी भी दशा में पब्लिश नहीं करेगा/करेगी. इन दो नियमों का पालन करना सभी सदस्यों के लिए अनिवार्य है. द्वारा:- ADMIN, AIBA

तम गहनतम हैं।

Written By Rahul Paliwal on शनिवार, 29 दिसंबर 2012 | 11:10 pm

तम आज, गहनतम हैं।
स्तब्ध आम जन हैं।
हौसले अभी टूटे तो नहीं,
हर आंख लेकिन नम हैं।

वो जो उसका राजा हैं।
अपना फ़र्ज़ भूल बैठा हैं।
आंखे, कर्ण बंद किये।
अपनी प्रजा से ऐंठा हैं।

क्या करे आमजन?
बैचैन और उदास हैं।
चल घर से निकलते हैं।
पास के नुक्कड़ पे पहुचते हैं।
दो और मिलेंगे , चार बनेंगे 
वहा राजपथ चलेंगे।
ले हाथो में हाथ चलेंगे।
दिए से दिया जलाएंगे।
तेरे मेरे उसके, जख्म सहलायेंगे।
भरोसा दिलाएंगे एकदूसरे को।
कि रखेंगे मानवता जिन्दा।
और इस आग को।
जो वो अपना जिस्म जला देके गई हैं।
और इसी आग से हरेंगे,
हर तम को।
कहेंगे सत्ता से।
या तो बदलो।
या हो जाओ, बेमानी होने को अभिशप्त।
बदलाव अब चाहिए। 
घर से दिल्ली तक।
मन से दिल तक।
मुझसे तुझ तक।
प्रजा से राजा तक।
दे साथी अब ये वचन हैं।

तम आज गहनतम हैं।
स्तब्ध आम जन हैं।
हौसले अभी टूटे तो नहीं,
हर आंख लेकिन नम हैं।
http://rahulpaliwal.blogspot.in/2012/12/blog-post_29.html

Written By तरूण जोशी " नारद" on सोमवार, 24 दिसंबर 2012 | 2:15 am

जनता आती हैं।

Written By Rahul Paliwal on रविवार, 23 दिसंबर 2012 | 4:28 pm


Life is Just a Life: जरुरत से डरो दरबारों Jarurat se Daro Darbaron

Life is Just a Life: जरुरत से डरो दरबारों Jarurat se Daro Darbaron: जरूरतें आसमानों को मजबूर कर सकती हैं बिजली बरसानें को तो इंसान को क्यों नहीं ? डरो जरुरत से डरो दरबारों , आज जरुरत यहाँ दिल...

आडवाणी चौधरी चरण सिंह की भूमिका निभाएंगे

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012 | 12:34 pm

सुना है आडवाणी ने मोदी को न बधाई दी और न कुछ कहा। पत्रकारों ने पूछा तो वे कार में बैठकर तुरंत चले गए।1992 में हमारे यहां एक पास के गांव से पाराशर जी आए थे। वे गैरसियासी थे, पेशे से शिक्षक, किंतु राजनीति का चश्मा जरूर अच्छा रहा होगा। उन्होंने एक कागज में लिखकर भार्गव की डिक्शनरी में लिखा था, अगर कभी भाजपा की सरकार केंद्र में बनी तो आडवाणी चौधरी चरण सिंह की भूमिका निभाएंगे, और सरकार धड़ाम हो जाएगी। जब भी मैं इस डिक्शनरी में घुसता मुझे यह पर्चा वहां मिलता था। 1996 में 13 दिन फिर 1998 में 13 महीने और फिर 1999 में 5 साल के लिए बनी भाजपा की सरकार में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। तो लगा पाराशर जी ने यूं ही लिख दिया था। मगर अब मैं उन्हें सलाम करता हूं, वे सही थे। बस उनका अनुमान था अटल और आडवाणी को लेकर पर वह साबित होगा मोदी और आडवाणी के मामले में।-सखाजी

Life is Just a Life: जीवन एक उत्थान-पतन Jeevan ek Utthan Patan

Written By नीरज द्विवेदी on गुरुवार, 20 दिसंबर 2012 | 6:44 pm

Life is Just a Life: जीवन एक उत्थान-पतन Jeevan ek Utthan Patan: छल छल बहती नदिया का , उत्थान-पतन   जीवन  है, सब कुछ  पाकर  खोने में , मशगूल  मगन जीवन  है। उगते  अंकुर   का  रोना , सर्पों  को...

Life is Just a Life: कब तक अंधा इतिहास पढ़ाओगे? Kab Tak Andha Itihas pa...

Written By नीरज द्विवेदी on रविवार, 16 दिसंबर 2012 | 10:07 pm

Life is Just a Life: कब तक अंधा इतिहास पढ़ाओगे? Kab Tak Andha Itihas pa...: आखिर कब तक  उगते भारत को  अंधा इतिहास पढ़ाओगे ? कब तक बचपन में  कायरता भर  खद्दर के दिए जलाओगे ? कब तक प्रश्न पूँछते  नौनिहाल के सम्मु...

My Clicks ...: Flowers from my Lenses

Written By नीरज द्विवेदी on शनिवार, 15 दिसंबर 2012 | 10:32 pm

Life is Just a Life: अलविदा मैसूर Alvida Mysore

Life is Just a Life: अलविदा मैसूर Alvida Mysore: आज चल  पडा निर्दोष जीवन , रह गयीं निःशब्द राहें अनमनी , ये धरा , बादलों की  पालनाघर , इतिहास  और शौर्य की  जमीं। चांद तारे  खेल...

चार दशकों का सिलसिला थमा नहीं:

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on सोमवार, 10 दिसंबर 2012 | 12:49 pm


चार दशकों का सिलसिला थमा नहीं:
1. सदी के आठवें दशक में देश को अपातकाल जैसी सरकारी दंगों को झेलने पड़ा।
2. नवे दशक में देश को इंदिरा एसेसिनेशन क चलते सिख दंगों को फेस करना पड़ा।
3. आखिरी दशक में बाबरी विध्वंस के बाद के दंगों का सामना करना पड़ा। और
4. इस सदी के पहले दशक में गुजरात दंगों का।
5. मौजूद दशक 2012 में असम हिंसा के नाम से जाने जाने वाले दंगों को भी हम भूल नहीं सकते।
आखिर यह दंगाई दशकों का सिलसिला कब तक थमेगा।
और आश्चर्य की बात है कि 2002 गुजरात दंगों को छोड़ दें तो शेष चारों के दौरान केंद्र में धर्म निरपेक्ष के पहरूआ दल कांग्रेस की ही सरकार रही है।

Life is Just a Life: खारे पानी का घडा Khare Pani Ka Ghada

Written By नीरज द्विवेदी on बुधवार, 5 दिसंबर 2012 | 10:13 am

Life is Just a Life: खारे पानी का घडा Khare Pani Ka Ghada: उस चोट ने  मुझे  शायद बडा कर दिया है , फिर एक ठोकर लगाकर  खडा कर दिया है। अनजाने  अनचाहे  किसी  एक  अपने  ने , मट मैले सुर्ख रंगो...

Life is Just a Life: दीवार को बहना पड़ेगा Deewar ko Bahna Padega

Written By नीरज द्विवेदी on सोमवार, 3 दिसंबर 2012 | 9:57 am

Life is Just a Life: दीवार को बहना पड़ेगा Deewar ko Bahna Padega: रौशन शहर के एक कोने में   मेरा भी घर बनेगा, फिर भी पतंगों को हमेशा आग में जलना पड़ेगा? हम तुम्हारी राह में  अनगिन सितारे गढ़ चलेंगे...

श्वेता के साथ -सच का 'हाथ'

श्वेता के साथ -सच का 'हाथ'
Shweta Bhatt, the wife of suspended IPS officer Sanjiv Bhatt. File Photo.

 कॉंग्रेस ने गुजरात के निलंबित आई.पी.एस.अधिकारी संजीव भट्ट की पत्नी श्वेता भट्ट को मणिनगर सीट पर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ उतारकर अपने विरोधियों का मुहं बंद कर दिया है . गुजरात दंगों का सच सामने लाने वाले बहादुर एवं ईमानदार अधिकारी संजीव भट्ट के परिवार को जो ज्यादती झेलनी पड़ी है -उसका जवाब जनता नरेंद्र मोदी को हराकर दे सकती है .जो लोग ''वन्दे मातरम'' का उद्घोष करते हुए एवं ''राष्ट्रीय ध्वज '' लहराते हुए दिल्ली में भ्रष्टाचार के विरुद्ध सीना तानकर खड़े थे और भ्रष्टाचार के लिए एकमात्र जिम्मेदार 'कॉंग्रेस 'को ठहराने की जिद पर अड़े थे क्या आज गुजरात में जाकर श्वेता के साथ  खड़े हो सकेंगें ?क्या वे भ्रष्टाचार से भी ज्यादा गंभीर मुद्दे साम्प्रदायिकता के खिलाफ श्वेता के कदम से कदम मिलाकर नरेन्द्र मोदी को हराने की मुहीम में शामिल होंगें ?पिछले दस साल से गुजरात में लोकतंत्र की धज्जिया उड़ाते इस तानाशाह के खिलाफ खड़े होने का साहस करने वाली श्वेता ने 'नेता के रूप में' मोदी से अपने को कमतर आंकते हुए कहा है की -''हालाँकि मैं मानती हूँ की मेरा और मोदी का मुकाबला बराबरी का नहीं है ''  लेकिन इस सन्दर्भ में ये उल्लेखनीय है की श्वेता और मोदी का मुकाबला बराबरी का हो ही नहीं सकता क्योंकि सच और झ्हूठ का कोई मुकाबला होता ही नहीं .गुजरात दंगों के मुख्य दोषी नरेंद्र मोदी को भले ही किसी अदालत द्वारा सजा न सुनाई गयी हो क्योंकि उनके आतंक के चलते   एक एफ.आई.आर.तक उनके खिलाफ किसी थाने   में दर्ज न हो सकी किन्तु बहादुर व् ईमानदार अधिकारी संजीव भट्ट ने उनके आतंक के आगे घुटने नहीं टेके .फिर भट्ट परिवार के सच और मोदी के झूठ  का मुकाबला कैसे हो सकता है ?श्वेता जिस सच का हाथ थामकर मोदी के खिलाफ चुनावी मैदान में उतरी हैं उस सच का ओहदा मोदी के झूठ और षड्यंत्रों से कहीं ऊँचा है .नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी को समझ लेना चाहिए की श्वेता का उनके खिलाफ खड़ा होना ''सत्यमेव जयते ''की एक शुरुआत भर है .ये सिलसिला अब दूर तक जारी रहेगा .गुजरात के प्रत्येक नागरिक से श्वेता जैसे बहादुर -ईमानदार उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान करने की अपील करते हुए मैं यही कहूँगी -
''आतंक के आगे घुटने मत टेको !
जिंदगी को मौत बनने से रोको !
हर हालत को सह  जाना  हौसला नहीं !
एक बार खिलाफत करके भी देखो !!
                                     शिखा कौशिक 'नूतन'

Life is Just a Life: अब चोटें दिल दुखातीं नहीं Ab Chotein Dil Dukhati N...

Written By नीरज द्विवेदी on गुरुवार, 22 नवंबर 2012 | 8:40 pm

Life is Just a Life: अब चोटें दिल दुखातीं नहीं Ab Chotein Dil Dukhati N...: इस ज़माने की चोटें, अब दिल दुखातीं नहीं , ये रूठीं बदलियाँ आह को आँसूं बनाती नहीं। मेरी जिंदगी बस ओस की एक बूँद है जैसे , ये प्...

Life is Just a Life: बासन्ती रंग लेकर निकलना था Basanti Rang Lekar Nikl...

Written By नीरज द्विवेदी on बुधवार, 21 नवंबर 2012 | 8:46 pm

Life is Just a Life: बासन्ती रंग लेकर निकलना था Basanti Rang Lekar Nikl...: निकल पडे पर असरार  संग लेकर निकलना था , साथ धरती का बासन्ती रंग लेकर निकलना था। आँख बन्द कर समर्थन तुम्हारा हमसे नही होता , तुम्ह...
 
 
मित्रों नमस्कार,
 
मेरा चर्चित काव्य संग्रह "उम्मीदें क्यों?" 40% छूट के साथ उपलब्ध है। घर बैठे पुस्तक प्राप्त करने के लिए आप निम्न लिंक पर क्लिक करके पुस्तक मंगा सकते हैं।
शीघ्रता करें कहीं ऐसा न हो कि आप बाद में पश्चाताप करें कि पुस्तक नहीं पढ़ पाए। निश्चित ही यह काव्य संग्रह आपको पसंद आएगा।  
 

लेकिन ध्यान रहे, इंफीबीम द्वारा यह छूट केवल 25 नवम्बर तक दी जा रही है। अपने मित्रों को यह सूचना भी अवश्य दें।

Life is Just a Life: लम्हें Lamhein

Written By नीरज द्विवेदी on सोमवार, 19 नवंबर 2012 | 8:29 pm

Life is Just a Life: लम्हें Lamhein: ये लम्हें तोड  देते हैं, कभी ये  जोड देते हैं , बेहद शख्त जान हूँ, जो जिन्दा छोड देते हैं। लम्हें सब्ज सुर्ख रंगी , कटारों  से कतर ...

मेरी राय: सिनेमा और गांधी जी


गांधीजी का होना और फिल्मों का विकास यह दोनों ही घटनाएं एक भारत में अलग-अलग हैं। किंतु यह लेखक की कामयाबी है कि वह इन्हें आपस में जुड़ी सी साबित कर पाया है। दरअसल लेखक यह दावा भी नहीं करता कि गांधीजी फिल्मों को लेकर कोई भी दृष्टि रखते ही थे, और यह भी नहीं कहता कि वे फिल्मों से दूर थे। गांधी के समकाल में बन रहीं फिल्मों में उनके दर्शन और विचार की परोक्ष या अपरोक्ष गं्रथि पुस्तक गांधी और सिनेमा की अधोसंरचना तय करती है। अंत में लेखक एक साधारण पंक्ति में यह स्वीकार भी कर लेता है, कि गांधीजी का फिल्म को लेकर कोई विचार नहीं था। कई बार ऐसा भी महसूस होता है कि गांधी और नेहरू की सोच में संयुक्तता सी है। कला के प्रेमी और नम्र स्वभाव के जादूगर नेहरू का फिल्मों की तरफ सहज रुझान था, लेखक इस बात का जिक्र करके गांधीजी की विचारधारा के प्रतिनिधि के रूप में नेहरू का बहुत ही सफाई से प्रतिपादित करता है। लगभग 200 पेजों की इस रोमांचक यात्रा में यह जानने कि गांधी फिल्म को लेकर क्या सोचते थे, से ज्यादा रुचि इस बात की जागती है कि समकालीन फिल्म जगत में स्वतंत्रता के लिए झगड़े, लड़ाइयां या सतत संग्राम कितना रिफ्लैक्ट हो रहा था। इस बात को बताने में पुस्तक कामयाबी की पराकाष्ठा छूती है।
सिनेमाई विविध और देश का सियासी सांचा किसी देशकाल में मेल नहीं खाता। किसी राजनैतिक घटना पर एकदम सत्य स्वरूपित कोई फिल्म बनना मुमकिन भी नहीं, तभी प्रतीक और घटनाओं में समानता को पेश किया जाता है। पुस्तक की यात्रा में लेखक एक विचार को एकाधिक बार कहता है वह है इस विविधता प्रधान देश को चलाने के लिए कोई चमत्कारिक व्यक्तित्व चाहिए। यह सत्य है, परंतु मौजूदा उदाहरणों और खांचों के बरक्स सटीक नहीं बैठता। यह बिल्कुल परम सत्य है कि गांधीजी ने जिस धीमी किंतु स्थायी लड़ाई अपनी जीत के लिए चुनी थी, वह आसान नहीं थी। और यह भी सत्य है कि गांधी महज देश को आजाद कराने की कोई भी पंगू जंग नहीं लडऩा चाहते थे। वे तो संपूर्ण मानव को स्वतंत्र, नैतिक, विचारोत्पादकता से भरी कर्म प्रधान सोच देना चाहते थे। इसकी ही प्रक्रिया में देश खुदबखुद आजाद हो जाता।
और पुस्तक में गांधी पर समर्पित सिनेमा की कुछ चुनिंदा फिल्मों की चर्चा में कुछ कंजूसी हो गई। बैन किंज्सले का गांधी बनना कई बार लेखक को अखरा है, किंतु वह विकल्प न देने की टीस से यह आरोप सतह पर नहीं लगाता। आमिर खान की सत्यमेव जयते की कड़ीवार चर्चा सामान्य सी बात है। इसमें विषयानुकूलता कमतर जान पड़ती है। यह कहना सही भी है कि आमिर के इस कार्यक्रम में गांधी की 80 साल पुरानी सोच भी परिलक्षित होती है, किंतु कहीं भी कार्यक्रम में इस बात का श्रेयीकरण नहीं किया गया।
किसी का कोई भी विचार तब तक ही क्रिया और प्रतिक्रिया से परे है, जब तक कि वह विचार रखने वाले के जेहन की कैद में है। और तब तक भी वह महफूज हो सकता है जब तक कि वह इसे नॉनरिकॉर्ड माध्यमों से अभिव्यक्त करता है, लेकिन जैसे ही वह रिकॉर्ड माध्यमों का सहारा लेकर अभिव्यक्त होता है, तो वह क्रिया और प्रतिक्रिया के मुहाने पर आ खड़ा होता है। इस बात को यकीनी तौर पर मानते हुए यह कहना गलत न होगा कि सत्य मेव जयते में एंकर की मुक्तकंठ से तारीफ करते हुए लेखक मंत्रमुज्ध है, किंतु छोटे परदे की हसीन स्वप्न गलियां दिखाने वाला साकार तरीका कौन बनेगा करोड़पति को आधी पंक्ति में खत्म कर देता है। जैसा कि कहा जा चुका है विचार जेहन में है तभी तक क्रिया और प्रतिक्रियाओं की सूलियों से महफूज है, साकार होकर वह इनसे मुक्त नहीं रह सकता। नतीजतन लेखक का यह पूर्वाग्रह अजीब सा लगता है।
इस सबके बाद। अतिश्रेष्ठ बात। पहली तो 100 साल के इस सिनेमा और 150 साल के गांधी के बीच इत्तेफाक से निकाले गए साम्य अद्भुत हैं। मसलन फाल्के और गांधी का जन्म वर्ष एक होना, दोनों को अपने क्षेत्रों में सक्रिय होने का वक्त कमोबेश एक होना आदि आदि। दूसरी बात पुस्तक इस बात की ताकीद करती है कि 100 बरस के सिनेमा वाले दुनिया के दूसरे सबसे बड़े फिल्म उद्योग में अबतक सिनेमा पर कोई समग्र किताब हिंदी में नहीं लिखी गई। तीसरी फिल्मों की मूलभूत जानकारी पाठ्यक्रमों में शामिल करने जैसी बातें सुखद एहसास जैसी हैं। चौथी मनोरंजन उद्योग को नवक्रांत और उत्साह का जरिया सा महसूस करना भी लेखक का दूरगामी विजन और नजरिया है।
अंत में सबसे अच्छी बात कि पूरी किताब इस बात को कहती है बल्कि यूं कहें कि पुख्तगी से कहती है कि मनोरंजन भी रोटी की तरह अनिवार्य है। इसके अभाव में आदमी भूख की तरह शरीर से नहीं मरता लेकिन विचारों और रचनात्मकता से वह कौमा में रहता है। कौमा इसलिए कि वह रचनात्मकता को समझता है, सुनता है, अच्छा मानता है किंतु स्वयं में नहीं पनपा पाता। और किसी भी मनोरंजन माध्यम पर लिखी पुस्तक का यह राष्ट्र विचार होना भी चाहिए। और शायद इसीलिए सालों से मध्यम वर्ग में टीवी को परीक्षा के समय पूरी तरह से डिस्कनेक्ट करने की परंपरा है। कई घरों में तो केबल तक कटवा दिए जाते हैं। और कुछ लोगों का तो यहां तक आरोप है कि अच्छी फिल्में और कार्यक्रम भी इसी दौर में टीवी वाले दिखाते हैं। जैसे कहीं संसार में कोई एक विचार का टीवी वाला बैठा, जैसे साइकल पर कोई कुल्फी वाला कुल्फियां बेचने की लंबी टेर लगा रहा है और घरों में बैठे बच्चे ललचा रहे हैं। और इनके घरों में टीवी वाला बच्चों को भ्रमित करने वाले कार्यक्रम चला रहा है। अच्छा यह सिलसिला यहीं नहीं थमता, आगे चलकर दूरदर्शन भाई सबके बाप साबित होते हैं, वे मनोरंजन को इतना दूर धकेल देते हैं, कि प्रकांड टीवी दर्शक भी उनकी बातों को अपलक देखे तो ही समझ पाए। वे इतनी कठिन विषय वस्तु पेश करते हैं, मसलन ज्ञानदर्शन पर कठिनतम विज्ञानी प्रयोगों को अधिकतम किस्सागोई से परे करके। अरोचक ढंग से।
वरुण के सखाजी
(गांधी और सिनेमा पुस्तक जयप्रकाश चौकसे, फिल्म और भारतीय सामाजिक आदत, दर्शन, विचार और रवैया पर गहराई से चिंतन करने वाले शख्स द्वारा लिखी गई है।)

गांधीजी का होना और फिल्मों का विकास यह दोनों ही घटनाएं एक भारत में अलग-अलग हैं। किंतु यह लेखक की कामयाबी है कि वह इन्हें आपस में जुड़ी सी साबित कर पाया है। दरअसल लेखक यह दावा भी नहीं करता कि गांधीजी फिल्मों को लेकर कोई भी दृष्टि रखते ही थे, और यह भी नहीं कहता कि वे फिल्मों से दूर थे। गांधी के समकाल में बन रहीं फिल्मों में उनके दर्शन और विचार की परोक्ष या अपरोक्ष गं्रथि पुस्तक गांधी और सिनेमा की अधोसंरचना तय करती है। अंत में लेखक एक साधारण पंक्ति में यह स्वीकार भी कर लेता है, कि गांधीजी का फिल्म को लेकर कोई विचार नहीं था। कई बार ऐसा भी महसूस होता है कि गांधी और नेहरू की सोच में संयुक्तता सी है। कला के प्रेमी और नम्र स्वभाव के जादूगर नेहरू का फिल्मों की तरफ सहज रुझान था, लेखक इस बात का जिक्र करके गांधीजी की विचारधारा के प्रतिनिधि के रूप में नेहरू का बहुत ही सफाई से प्रतिपादित करता है। लगभग 200 पेजों की इस रोमांचक यात्रा में यह जानने कि गांधी फिल्म को लेकर क्या सोचते थे, से ज्यादा रुचि इस बात की जागती है कि समकालीन फिल्म जगत में स्वतंत्रता के लिए झगड़े, लड़ाइयां या सतत संग्राम कितना रिफ्लैक्ट हो रहा था। इस बात को बताने में पुस्तक कामयाबी की पराकाष्ठा छूती है।
सिनेमाई विविध और देश का सियासी सांचा किसी देशकाल में मेल नहीं खाता। किसी राजनैतिक घटना पर एकदम सत्य स्वरूपित कोई फिल्म बनना मुमकिन भी नहीं, तभी प्रतीक और घटनाओं में समानता को पेश किया जाता है। पुस्तक की यात्रा में लेखक एक विचार को एकाधिक बार कहता है वह है इस विविधता प्रधान देश को चलाने के लिए कोई चमत्कारिक व्यक्तित्व चाहिए। यह सत्य है, परंतु मौजूदा उदाहरणों और खांचों के बरक्स सटीक नहीं बैठता। यह बिल्कुल परम सत्य है कि गांधीजी ने जिस धीमी किंतु स्थायी लड़ाई अपनी जीत के लिए चुनी थी, वह आसान नहीं थी। और यह भी सत्य है कि गांधी महज देश को आजाद कराने की कोई भी पंगू जंग नहीं लडऩा चाहते थे। वे तो संपूर्ण मानव को स्वतंत्र, नैतिक, विचारोत्पादकता से भरी कर्म प्रधान सोच देना चाहते थे। इसकी ही प्रक्रिया में देश खुदबखुद आजाद हो जाता।
और पुस्तक में गांधी पर समर्पित सिनेमा की कुछ चुनिंदा फिल्मों की चर्चा में कुछ कंजूसी हो गई। बैन किंज्सले का गांधी बनना कई बार लेखक को अखरा है, किंतु वह विकल्प न देने की टीस से यह आरोप सतह पर नहीं लगाता। आमिर खान की सत्यमेव जयते की कड़ीवार चर्चा सामान्य सी बात है। इसमें विषयानुकूलता कमतर जान पड़ती है। यह कहना सही भी है कि आमिर के इस कार्यक्रम में गांधी की 80 साल पुरानी सोच भी परिलक्षित होती है, किंतु कहीं भी कार्यक्रम में इस बात का श्रेयीकरण नहीं किया गया।
किसी का कोई भी विचार तब तक ही क्रिया और प्रतिक्रिया से परे है, जब तक कि वह विचार रखने वाले के जेहन की कैद में है। और तब तक भी वह महफूज हो सकता है जब तक कि वह इसे नॉनरिकॉर्ड माध्यमों से अभिव्यक्त करता है, लेकिन जैसे ही वह रिकॉर्ड माध्यमों का सहारा लेकर अभिव्यक्त होता है, तो वह क्रिया और प्रतिक्रिया के मुहाने पर आ खड़ा होता है। इस बात को यकीनी तौर पर मानते हुए यह कहना गलत न होगा कि सत्य मेव जयते में एंकर की मुक्तकंठ से तारीफ करते हुए लेखक मंत्रमुज्ध है, किंतु छोटे परदे की हसीन स्वप्न गलियां दिखाने वाला साकार तरीका कौन बनेगा करोड़पति को आधी पंक्ति में खत्म कर देता है। जैसा कि कहा जा चुका है विचार जेहन में है तभी तक क्रिया और प्रतिक्रियाओं की सूलियों से महफूज है, साकार होकर वह इनसे मुक्त नहीं रह सकता। नतीजतन लेखक का यह पूर्वाग्रह अजीब सा लगता है।
इस सबके बाद। अतिश्रेष्ठ बात। पहली तो 100 साल के इस सिनेमा और 150 साल के गांधी के बीच इत्तेफाक से निकाले गए साम्य अद्भुत हैं। मसलन फाल्के और गांधी का जन्म वर्ष एक होना, दोनों को अपने क्षेत्रों में सक्रिय होने का वक्त कमोबेश एक होना आदि आदि। दूसरी बात पुस्तक इस बात की ताकीद करती है कि 100 बरस के सिनेमा वाले दुनिया के दूसरे सबसे बड़े फिल्म उद्योग में अबतक सिनेमा पर कोई समग्र किताब हिंदी में नहीं लिखी गई। तीसरी फिल्मों की मूलभूत जानकारी पाठ्यक्रमों में शामिल करने जैसी बातें सुखद एहसास जैसी हैं। चौथी मनोरंजन उद्योग को नवक्रांत और उत्साह का जरिया सा महसूस करना भी लेखक का दूरगामी विजन और नजरिया है।
अंत में सबसे अच्छी बात कि पूरी किताब इस बात को कहती है बल्कि यूं कहें कि पुख्तगी से कहती है कि मनोरंजन भी रोटी की तरह अनिवार्य है। इसके अभाव में आदमी भूख की तरह शरीर से नहीं मरता लेकिन विचारों और रचनात्मकता से वह कौमा में रहता है। कौमा इसलिए कि वह रचनात्मकता को समझता है, सुनता है, अच्छा मानता है किंतु स्वयं में नहीं पनपा पाता। और किसी भी मनोरंजन माध्यम पर लिखी पुस्तक का यह राष्ट्र विचार होना भी चाहिए। और शायद इसीलिए सालों से मध्यम वर्ग में टीवी को परीक्षा के समय पूरी तरह से डिस्कनेक्ट करने की परंपरा है। कई घरों में तो केबल तक कटवा दिए जाते हैं। और कुछ लोगों का तो यहां तक आरोप है कि अच्छी फिल्में और कार्यक्रम भी इसी दौर में टीवी वाले दिखाते हैं। जैसे कहीं संसार में कोई एक विचार का टीवी वाला बैठा, जैसे साइकल पर कोई कुल्फी वाला कुल्फियां बेचने की लंबी टेर लगा रहा है और घरों में बैठे बच्चे ललचा रहे हैं। और इनके घरों में टीवी वाला बच्चों को भ्रमित करने वाले कार्यक्रम चला रहा है। अच्छा यह सिलसिला यहीं नहीं थमता, आगे चलकर दूरदर्शन भाई सबके बाप साबित होते हैं, वे मनोरंजन को इतना दूर धकेल देते हैं, कि प्रकांड टीवी दर्शक भी उनकी बातों को अपलक देखे तो ही समझ पाए। वे इतनी कठिन विषय वस्तु पेश करते हैं, मसलन ज्ञानदर्शन पर कठिनतम विज्ञानी प्रयोगों को अधिकतम किस्सागोई से परे करके। अरोचक ढंग से।
वरुण के सखाजी
(गांधी और सिनेमा पुस्तक जयप्रकाश चौकसे, फिल्म और भारतीय सामाजिक आदत, दर्शन, विचार और रवैया पर गहराई से चिंतन करने वाले शख्स द्वारा लिखी गई है।)

जिज्ञासा(JIGYASA) : सेन राजवंश

Written By mark rai on सोमवार, 12 नवंबर 2012 | 9:06 pm

जिज्ञासा(JIGYASA) : सेन राजवंश: पाल वंश के पतन के बाद सेन राजवंश ने बंगाल में शासन स्‍थापित किया। इस राजवंश के स्‍थापक सामंत सेन थे। इस राजवंश के महानतम शासक विजय सेन थे। ...

भगवान किसका ?

Written By Safat Alam Taimi on बुधवार, 7 नवंबर 2012 | 4:43 pm


भारत वह देश है जहां विभिन्न विश्वास रखने वाले लोग विधमान हैं. इसके बावजूद वे परस्पर मिलजुल कर रहते हैं और यही इस देश की सराहनीय विशेषता है. लेकिन कभी कभी ऐसी दुर्घटनाएं भी सामने आती हैं जो प्रश्न चिन्ह खड़ा कर देती हैं. ऐसा नहीं है कि यह घटना अचानक उत्पन्न होती है, बल्कि उनका प्राचीन पृष्ठभूमि है. इसी प्रकार की एक घटना झुंझुनूं में खेतड़ी थाना क्षेत्र के बड़ाऊ गांव का है. जहां दलित जाति के दो नवविवाहित जोड़ों को मंदिर से धक्केमार कर बाहर निकालने का मामला प्रकाश में आया है। पीड़ितों का आरोप है कि विरोध करने पर उनके साथ गाली गलौच भी किया गया. इस संबंध में मंदिर के पुचारी एवं तीन महिलाओं सहित 8 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। पुलिस ने बताया कि बड़ाउ गांव का निवासी अशोक कुमार मीघवाल और छोटे भाई गुलाब की बारात माधव गढ़ गई थी. 25 अक्तूबर को वे शादी कर के लौटे 26 अक्तूबर की सुबह लगभग 10 बजे दोनों नवविवाहित जोड़े धोक लगाने गांव के मंदिर गए। मंदिर में पुजारी घीसाराम स्वामी सहित कुछ लोगों ने उनको पूजा अर्चना करने से रोका. नवविवाहित जोड़ों और उनके साथ आए लोगों ने जब इस बात का विरोद्ध किया तो पुजारी और अन्य लोगों ने उनके साथ गाली गलौच की और धक्के मार कर मंदिर से बाहर निकाल दिया।
रविवार रात इस सिलसिले में पीड़ित अशोक कुमार मेघवाल ने मंदिर के पुजारी घीसाराम स्वामी, गंगा स्वामी, अनिल स्वामी, पप्पू शर्मा तथा सियाराम स्वामी के साथ ही महिलाओं के खिलाफ मामला दर्ज कराया. इस मामले में फिलहाल किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है. पुलिस मामले की जांच कर रही है.
घटना की पृष्ठभूमि में यह बड़ा सवाल उठता है कि मंदिरों में "भगवान" किसके हैं? मानव के या विशेष वर्ग के? जब आस्था द्वार आप हिंदू हैं और वह भी जिनको धक्के मार कर बाहर किया जा रहा है तो ऐसा मआमला क्यों ? पता यह चला कि यह "भगवान" हिंदुओं के नहीं बल्कि विशेष जाति के हैं जो दिन रात उनकी सेवा में लगे रहते हैं. जिनको चाहें पूजा करने की अनुमति दें और जिनको चाहें पूजा करने से रोक दें।
ऐसी ही स्थिति में इस्लाम की ज़रूरत महसूस होती है जो यह नारा देता है कि प्रत्येक मानव का पैदा करने वाला एक है और एक ही माता पिता से सब की रचना हुई है। ईश्वर भी एक और माता पिता भी एक...तो फिर जातिवाद क्यों कर। इस्लाम सारे संसार का धर्म है जहाँ कोई भेदभाव नहीं। जो हर प्रकार के जातिवाद का खंडन करता है। जो इनसान के माथा का भी सम्मान करता है कि इसे मात्र अपने रचयिता और पालनकर्ता के सामने टेका जाए किसी अन्य के सामने नहीं।    

Life is Just a Life: पिता: एक आकाश Pita: A Sky

Written By नीरज द्विवेदी on मंगलवार, 6 नवंबर 2012 | 2:45 pm

Life is Just a Life: पिता: एक आकाश Pita: A Sky: कुछ सर्द लम्हों   की किताबें, जिन्दगी   गाती रही, उसके बाल भी पकते रहे और  झुर्रियां चढती रही। फ़िर चाहे रात दिन  खटता रहा हो  बाप ...

.WELCOME RAHUL JI AS CONGRESS PARTY NEW WORKING PRESIDENT.

Written By Shikha Kaushik on बुधवार, 31 अक्टूबर 2012 | 9:39 pm



.WELCOME  RAHUL JI AS CONGRESS PARTY NEW WORKING PRESIDENT.

RAHUL GANDHI WITH A VISION FOR COMMON PEOPLE
[http://www.facebook.com/pages/RAHUL-GANDHI-WITH-A-VISION-FOR-COMMON-PEOPLE]

YESTERDAY I WAS SURE THAT SHRI RAHUL GANDHI WOULD TAKE OATH AS A CABINET MINISTER BUT HE DID'NT .ONE THING IS CERTAIN THAT ONLY A LEADER LIKE RAHUL JI CAN DO SO IN PRESENT INDIAN POLITICS .HE HAS CHOSEN THE PATH OF PUBLIC SERVICE DIRECTLY .RAHUL JI HAS PROVED AGAIN THAT WHY IS HE AN IDEAL LEADER .HE IS REALLY A YOUTH ICON .HE PREFERS TO STRENGTHEN PARTY ORGANIZATION .MESSAGE IS CLEAR HE BELIEVES IN HARD WORK .I APPRECIATED HIS BOLD DECISION AND CONGRATULATE HIM FOR HIS FIRM DETERMINATION .RAHUL JI HAS GIVEN RIGHT ANSWER TO OPPOSITION'S IRRELEVANT ALLEGATIONS THAT GANDHI FAMILY IS HUNGRY FOR POWER .
                                               I PRAY INDIA MUST ACHIEVE NEW HEIGHTS OF PROGRESS IN HIS GREAT LEADERSHIP .WELCOME  RAHUL JI AS CONGRESS PARTY NEW WORKING PRESIDENT.


[[http://www.facebook.com/pages/RAHUL-GANDHI-WITH-A-VISION-FOR-COMMON-PEOPLE]

IF INDIAN POLITICS IS A VAST DESERT 
HE IS A DROP OF WATER .

[यदि भारतीय राजनीति एक विशाल रेगिस्तान है 
तो राहुल जी जल की एक बूँद  है ]

IF INDIAN POLITICS IS DARK NIGHT 
HE IS A SHINING STAR.

[यदि भारतीय राजनीति एक अँधेरी निशा है 
तो राहुल जी एक चमकता हुआ सितारा हैं ]

IF INDIAN POLITICS IS AUTUMN 
HE IS SPRING .

[यदि भारतीय राजनीति पतझड़ है 
तो राहुल जी बसंत  हैं ]

IF INDIAN POLITICS IS A KINGDOM 
HE IS THE KING .

[यदि भारतीय राजनीति एक साम्राज्य है 
तो राहुल जी राजा हैं ]

IF INDIAN POLITICS IS AN OYSTER 
HE IS A PEARL .

[यदि भारतीय राजनीति एक सीप है 
तो राहुल जी मोती हैं ]

HE IS SENSIBLE ,HONEST AND PATIENT 
I AM HIS ADMIRER , DO'NT THINK ME SYCOPHANT .

[राहुल जी समझदार हैं ,ईमानदार हैं  और धैर्यवान हैं ,
मैं उनकी प्रशंसक हूँ ,मुझे चापलूस न समझें ]

                                                   JAY HIND ! JAY BHARAT 
                                                     SHIKHA KAUSHIK 

जिज्ञासा(JIGYASA) : अजंता के अंदर जो मानव और जंतु रूप चित्रित किए गए ह...

Written By mark rai on रविवार, 28 अक्टूबर 2012 | 5:09 pm

जिज्ञासा(JIGYASA) : अजंता के अंदर जो मानव और जंतु रूप चित्रित किए गए ह...: यूनेस्‍को द्वारा 1983 से विश्‍व विरासत स्‍थल घोषित किए जाने के बाद अजंता और एलोरा की तस्‍वीरें और शिल्‍पकला बौद्ध धार्मिक कला के उत्‍कृष्‍ट ...

मसाल

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on बुधवार, 24 अक्टूबर 2012 | 10:27 pm

लेकर मसाल हाथ में,
चिन्गारियों का ख्याल साथ में,
भींचकर मु_ियां मैं रावण खोजता हूं।
रिमझिम सा बूंदों से बना
इल्जामों का सावन खोजता हूं।
- सखाजी

रावण ने लगाई पीआईएल

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रावण ने लगाई पीआईएल
कइयों को हो गई जेल
वकीलों के कोट फट गए
अफसर फिर जैसे कह कर नट गए
जज बोला रावण सही
उसने अच्छी बात कही
न जलाओ मुझे बार
कि जलन होती है वदन में
अगर जलाना है तो मन से
जलाओ क्यों रखते हो मुझे मन में
हू हू हू करके चिल्लाते हो
दशहरा मैदानों को कब्जाते हो
मुझे करते हो बदनाम
खुद ही तो रावण से लच्छन बताते हो
सदियों से देख रहा था
कोई मंच नहीं मिल रहा था
मीडिया को बुलाया तो कोई नहीं आया
सबने मेरे नाम का दशहरे पर खूब खाया
तब कोर्ट में आया हूं
वहां भी पर्सनल केस नही लगा पाया हूं
तब मिला मुझे विधुर सा वकील
तो मैं आ गया भारत को कोर्ट में
लगा दी है पीआईएल
देखता हूं क्या होता है इसका हाल
- सखाजी

Founder

Founder
Saleem Khan