नियम व निति निर्देशिका::: AIBA के सदस्यगण से यह आशा की जाती है कि वह निम्नलिखित नियमों का अक्षरशः पालन करेंगे और यह अनुपालित न करने पर उन्हें तत्काल प्रभाव से AIBA की सदस्यता से निलम्बित किया जा सकता है: *कोई भी सदस्य अपनी पोस्ट/लेख को केवल ड्राफ्ट में ही सेव करेगा/करेगी. *पोस्ट/लेख को किसी भी दशा में पब्लिश नहीं करेगा/करेगी. इन दो नियमों का पालन करना सभी सदस्यों के लिए अनिवार्य है. द्वारा:- ADMIN, AIBA

सत्‍यमेव जयते ! ... (?): इस पर बोलिए हुजूर...

Written By Atul Shrivastava on मंगलवार, 8 दिसंबर 2015 | 12:16 pm

सत्‍यमेव जयते ! ... (?): इस पर बोलिए हुजूर...: लोकसभा में सांसद अभिषेक सिंह बड़े दिनों बाद टीवी पर लोकसभा की कार्रवाई का सीधा प्रसारण देखा, देखने की वजह थी, सांसद (राजनांदगांव) कार्य...

बिहार चुनाव के बाद की चर्चा फुर्सत में

Written By अरविन्द शुक्ल on शनिवार, 28 नवंबर 2015 | 10:54 pm

बिहार के परिणाम आने के बाद कोई कुछ भी कहे लेकिन यह बात उन्हें खुले ह्रदय से माननी ही चाहिए कि ये मोदी जी की ही हार है। उन्होंने अपने चुनावी वादे पूरे न करने की जो कसम खायी है और यह हार मोदी जी के भक्तों के मुह में तमाचा है जो मोदी जी की कथनी और करनी का मूल्यांकन ही नहीं करना चाहते हैं और हाशिये से गायब लालू जी जैसे राजनेता जीत रहे हैं। यह देश के लिए दुर्भाग्य पूर्ण है लेकिन बिहार के वोटरों पर ऊँगली उठाने वाले तथाकथित लोग अपने आप में ही अपना मूल्यांकन करें। मतदाताओं पर अनर्गल टिप्पणी न करें क्योंकि नितीश जी ने बिहार में वास्तव में काम किया है और वह सभी को दिख भी रहा है यह एक सच्चाई है जो वहां की जनता जानती है। आज भूमंडलीकरण का युग है जो दिखता है वही बिकता है और अभी डेढ़ साल में मोदी जी का कुछ "अच्छे दिन" दिख नहीं रहा है। बिहार के चुनाव सिर्फ और सिर्फ मोदी जी के नाम पर  लड़े गए थे वह ही इस चुनाव के मुख्या चेहरा थे यह देश का बच्चा बच्चा जानता है। इसलिए यदि तठस्थ होकर विचार करेंगे तो ये सिर्फ और सिर्फ मोदी जी की ही हार है। वैचारिक सहमति और असहमति बौद्धिकता का एक आवश्यक कारक है। लेकिन मोदी जी यदि अपने चुनावी वादे पूरे नहीं करेंगे तो आगे के चुनावों में भी इसी तरह उनकी हार होगी और लोकसभा चुनावों में 2004 की तरह अटल जी से भी बुरी तरह हारेंगे क्योंकि भारत की जनता को उन्होंने 2014 में जो सपने दिखाए हैं उनसे आज अब वह मुकरने की स्थिति में नहीं है चाहे कितना ही मिडिया का दोहन किया जाये। प्रधानमंत्री पद का वही महत्व है जो उस पद पर बैठा व्यक्ति उसे प्रदान करें और देश की जनता जान गयी है की मोदी जी सिर्फ और सिर्फ आजकल गप्प बाजी कर रहे हैं। भारत के प्रधानमंत्री होकर चुनाव प्रचार में अमर्यादित भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। ठोस काम नहीं। वह हर रैली में नितीश जी से ढाई साल के काम का जवाब माग रहे थे लेकिन अपने डेढ़ साल के काम का जवाब नहीं दे रहे थे। भारत के प्रधानमंत्री केवल पिछड़े दलितों के लिए जान की बाजी लगा रहे हैं तो क्या दूसरों का ये देश नहीं है। अन्य धर्म के लोगों समेत सवर्णों की जिम्मेदारी क्या प्रधानमंत्री जी आपकी नहीं है? राजनीति की यही 'गंदी बातें' हैं जो लोकतंत्र को लंबे समय से गंधवा रही हैं ,  सत्ता पाने की लालसा या सत्ता शक्ति के प्रदर्शन का अहंकार कहीं न कहीं राजनीति का स्तर गिराता जा रहा है। अभी महगाई चरम में है और सरकार को महसूस नहीं हो रही और अनवरत महगाई के स्तर को नकारात्मक गिरावट  दिखाकर डेढ़ वर्ष से भाजपा सरकार डेटा में छेड़खानी करके कर्मचारियों को महगाई भत्ता कम देने का काम कर रही है और 7 वें वेतन आयोग की जब रिपोर्ट आ जायेगी तब सरकारी कर्मचारी और उनका परिवार भी मोदी से विमुख ही हो जायेगा क्योंकि वह कर्मचारियों को भी कुछ देने के मूड में प्रतीत नहीं हो रहे है, ये बात भी शायद मोदी जी भूल गए। इनकम टैक्स की लिमिट बढ़ानें में देरी मध्यवर्ग से भाजपा को दूर कर रही है और आम लोग तो महगाई से और भी परेशान ही हैं। शिक्षा का बजट कम कर दिया गया है ICSSR, UGC पैसे की कमी से जूझ रहे है केंद्र सरकार ने अकेले पेट्रोलियम उत्पादों से 34000 करोड़ का लाभ कमाया है गैस सब्सीडी छोड़ने के विज्ञापन में  करोड़ों रुपया खर्च किया है जबकि सब्सिडी छोड़ने से मात्र सरकार को लगभग 100 करोड़ का ही लाभ हुआ है। ऐसे और भी योजनाओं में हो रहा है । मीडीया को विज्ञापन देकर मोदीमय बनाया जा रहा है। लेकिन अब समय आ गया है। मोदी जी को विदेश भ्रमण छोड़कर देश में ही समय बिताना चाहिए और देश की समस्याओं को दूर करनें हेतु देश की समस्यायों का निरिक्षण कर कारक सम्बंधित लोगों पर कठोर कारवाही करनी चाहिए। जिससे लोग भ्र्ष्टाचार करनें से डरें। भ्रष्टाचारियों के मन में भय पैदा हो। देश में राजमार्ग टूटे हैं और सरकार पोषित गुंडों द्वारा टोल टैक्स लिया जा रहा है, लोग महगाई से परेशान हैं, जातिगत वैमनश्य दिन प्रतिदिन बढ़ रहा है,   समान नागरिक संहिता की पहल अब तो खुद कोर्ट कर रहा है फिर देरी क्यों आदि अनेक जमीनी सच्चाइयाँ हैं जिनका निदान हो। लोगों को भ्रस्टाचार मुक्त भारत महसूस हो। लोगों को वास्तव में अच्छा लगे अच्छे दिन आवें। अन्यथा उत्तर प्रदेश में इससे भी बड़ी हार से भाजपा को कोई नहीं बचा पायेगा और सारे मोदीभक्त सर पीटते रह जायेगे।।। दुर्भाग्य से लेखक भी मोदी जी का समर्थक है ।।।

National Seminar on "SWACHH BHARAT CAMPAIGN

Dear Sir /Madam...It's a matter of great pleasure to inform you that DEPARTMENT OF POLITICAL SCIENCE
Govt. Girls P.G. College, Bindki, Fatehpur. UP is organizing two day (04-05 Jan 2016) National Seminar on "SWACHH BHARAT CAMPAIGN 2014: Administrative Perspectives Issues and Challenges" "स्वच्छ भारत अभियान, प्रशासनिक परिप्रेक्ष्य, मुद्दे और चुनौतियाँ" sponsored by ICSSR, Ministry Of HRD Government of India. Cordially you are invited.......Convener Mr. Arvind Shukla.. Call/Write...09236807279-9026809646/
arvinddbsk@gmail.com

INTRODUCTION

Theme of the Seminar:    ‘SWACHH Bharat Abhiyan (Clean India campaign) is a national campaign by the Government of  India, covering 4041 statutory towns,  to clean the streets, roads and infrastructure of the country. This campaign was officially launched on 2 October 2014 at Rajghat, New Delhi, where Prime Minister Narendra  Modi himself cleaned the road. It is India's biggest ever cleanliness drive and 3 million government employees and school and college students of India participated in this event. The mission was started by Prime Minister Modi, who nominated nine famous personalities for the campaign, and they took up the challenge and nominated nine more people and so on (like the branching of a tree). It has been carried forward since then with people from all walks of life joining it. This campaign aims to accomplish the vision of a 'Clean India' by 2 October 2019, the 150th birthday of Mahatma Gandhi. It is expected to cost over 62000 crore (US$9.8 billion). Fund sharing between the Central Government and the State Government and Urban Local Bodies (ULBs) is 75%:25% (90% : 10% for North Eastern and special category states).  The campaign has been described as "beyond politics" and "inspired by patriotism".
     
       Nearly 100 million people in India lack access to safe drinking water and over 700 million continue to defecate in the open. Over 600,000 children under 5 years lose their lives to water and sanitation related diseases like diarrhoea and pneumonia every year. Though we are making efforts in this direction since Gandhi Ji’s call for clean India. There are organizations like Sulabh International with a purpose to provide clean and hygienic defecation place, to innumerable other NGOs, central and state government departments of public health, child care etc. who are working to make the country a better living place. Big campaigns like Narmada Bachaao, Clean Ganga, Clean Yamuna are few other efforts which can be witnessed in this direction. Previous governments have also made attempts in these directions by allocating huge budgets to total sanitation drives, but we still are standing far behind the goal because of the challenges of controlling the usage of hazardous materials and their waste deposition in open and rivers.
     
       With Prime Minister’s appeal to the nation for Swachh Bharat Abhiyan, there has been an overzealous positive sentiment in organizations and individuals both. Many organizations have routed their CSR budgets in this direction. However, if the campaign is to go beyond symbolism and actually achieve the goal of making India open defecation free by 2019, it needs a multi-pronged strategy encompassing sustained involvement of multiple stakeholders, focusing on changing behavior, going beyond toilet construction and fund allocation.          
                It is an inclusive responsibility of not only the politicians and government officials, but each and every citizen of India. A lot has to be done to achieve this national goal. The present conference is an attempt to give a platform to these NGOs, Central and State Government Departments, Education Institutes, Public and Private Organizations, and various agencies to share their ideas of clean India with respect to Administrative perspectives they are adopting, challenges and issues faced and future roadmap for the success of the campaign.


SUB THEME:

*Human Resource Initiatives & Clean India campaign

*
Environmental challenges, Issues, monitoring & controlling process

*
Sanitation Issues, Legal Issues & waste management

*Strategies to market the concept of Swachh Bharat

*
Grey Area, Policies and Practices,  Social Marketing, Social Awareness and Sensitization
*
Role of NGOs ,  Social Volunteers, Public & Private organizations &  Especially Consituted Agencies.


*Startegic Initiatives by Government departments, PSUs, Private organizations etc

*Clean India campaign & Social Media,

*Clean Economy and sustainable development


Guidelines for abstract/paper submission:


 Participants are requested to submit papers/abstract for oral or poster presentations. Abstract should not exceed 300 words. The text should be typed in Times New Roman font (12 points) for English and Kruti Dev 10 font (14 point) for Hindi with single spacing in MS Word.Manuscripts should preferably not exceed 12 printed pages or between 2000-4000 words. The research paper should be preceded by an abstract, Maps, tables and charts should be in black and white only.
       
  They should be serially numbered, sequentially, following references to them in the text. The general format of the research paper should consist of : (i) Title (ii) Author(s) name and affiliation with email ID(s) (iii) Abstract with 4-8 keywords (iv) Introduction (v) Objectives (vi) Study area (vii) Data base and methodology (viii) Text-interpretation-analysis (ix) Conclusion (x) References (xi) Full corresponding address of author(s) with contact no.(s) and email ID(s).


 Note:
1.  The delegates will  be paid   TA/DA for participating in the Seminar as per ICSSR & UP Govt. Norms.
2.  Time allotted for each paper presentation – 10 minutes.

3.  The contents of invitation letter are available on the College website  www.gdcbindki.org
4. The manuscript should be accompanied by a declaration letter that the paper is original and has not
     been submitted elsewhere for publication.  


The abstract along with full length paper must be submitted to Organising Committee either in C.D. or through e-mail on or before 15th Dec 2016 to - E-mail : arvinddbsk@gmail.com


Kindly circulate the information among friends and colleagues for wide publicity.


Post Conference Publication:
       
  Selected papers presented in the seminar will be published in Special Volume-1 & 2, an edited book entitled “SWACHH BHARAT CAMPAIGN 2014: Administrative Perspectives  Issues and Challenges” with ISBN.


Accommodation:
 
       The delegates, who want to stay are requested to intimate the Organizing Secretary by 30 th Dec, 2015 so that comfortable arrangements for boarding and lodging can be made.

Important Dates:
Last  date  for  submitting  of  abstract and  full  papers: 15 /12/2015
.

REGISTRATION  FEE:
           Registration Fee will be paid in cash or by a Demand draft/Multi City Cheque  in  favour of  "Principal, Govt. Girls P.G. College Bindki, Fatehpur" payable at Bindki should be sent on or before 25th Dec 2015.

 Catanegory Registration
(on or before Dec 25th 2015) Registration on spot
 Academicians ₹500/-₹ 600/-
 Research Scholars ₹ 300/- ₹ 400/-

We look forward to welcome you at the Seminar.
 
  With warm regards,
Mr. ARVIND KUMAR SHUKLA
(M) 9026809646, 9236807279
Email: arvinddbsk@gmail.com
Organizing Secretary,
Postal Address:
DEPARTMENT  OF  POLITICAL  SCIENCE
GOVERNMENT  GIRLS  P.G. COLLEGE
BINDKI,  FATEHPUR -212635 (U.P.)

Written By हरीश सिंह on मंगलवार, 24 नवंबर 2015 | 2:54 pm

सभी ब्लॉगर मित्रों को नमस्कार
बहुत दिन बाद आप मित्रों के सम्मुख आने का मौका मिला , मित्रों नव प्रकाशित हिंदी मासिक पत्रिका "ह्यूमन टुडे " को सम्पादन करने की जिम्मेदारी मिली है. ऐसे में आपलोगों की याद आनी स्वाभाविक है. भले ही इतने दिनों तक गायब रहा लेकिन आपसे दूर नहीं , मैं चाहता हूँ की जो ब्लॉगर मित्र अपनी रचनाओ के माध्यम से मुझसे जुड़ना चाहते है , मै  उनका सहर्ष स्वागत करता हूँ।  सामाजिक सरोकारों से जुडी इस पत्रिका में आपकी रचनाओ का स्वागत है , जो मित्र मुझसे जुड़ना चाहते हैं वे अपनी रचनाएँ मुझे मेल करें। ।
humantodaypatrika@gmail.com
रचनाएँ राजनितिक , सामाजिक व् ज्ञानवर्धक हो। कविता , कहानी व विभिन्न विषयो पर लेख आमंत्रित।
harish singh ---- editor- Humantoday

एक मृत मजदूर से साक्षात्कार

Written By बरुण सखाजी on शुक्रवार, 3 जुलाई 2015 | 2:43 am

ये जो सफेद स्वीमिंग पूल है
पूल समझने की तुम्हारी भूल है
इसे मैंने मेरे ख़ून से रंगा है
तब कहीं ये इतना झकाझक है
तुम्हारी ज़िंदगी दौड़ रही है
लेकिन मुझे मौत खचोड़ रही है
ये दूधिया बल्ब
ये चमचमाती ट्यूबलाइटें
ये मेहराब सा कोई बुलंद दरवाजा
बड़ा से गेट
अंदर क़ैद नीला गहरा तलछटी तक
पारदर्शी पानी
वो मुसटंड डंडधारी गार्ड
मेरी आत्मा को बाहर से ही भगा देते हैं
भटकता हूं मैं जब रात को
कहते हुए इंसाफ़ की बात को
कभी ऑडी को तो कभी लैंड रोवर को
छूता, तलाशता इनके भीतर आदमियों को
बेरहम क़ातिलों से चेहरे वाले
तैरने आते हैं यहां
कभी वे भावुक हो इंसां भी बन जाते हैं
टिप जब मुसटंड कोई गार्ड पाते हैं
मुझे इल्म नहीं था
मरकर भी जो सुकूं न पाऊंगा
वो दिन याद तो होगा नहीं तुम्हें
बेशक नहीं होगा
मेरी मौत का दिन
जब ये पूल बन रहा था
तीसरी मंजिल पर एक लोह पिंज्जर तन रहा था
मैं वहीं बिना सेफ्टी मेजर टंगा था
काम के रंग में रंगा था
दूर कहीं रायगढ़ के बीहड़ गांव में
राखड़ की आग में जिंदल की छांव में
मेरी दुधमुंही कलेजे से मां के चिपकी थी
बस चंद रुपये लेकर दूध की बोटल लेता
एक झगला, टोपी और
पौं-पौं बोलता कोई खिलौना भी
शाम होने को थी
काम होने को था
रुपया बंटने को था
मगर बदकिस्मती से मेरा पैर फिसला
तिमंजिला रायपुर के पूल से पत्थर पर जा गिरा
पौंद के बल
चकनाचूर हो गईं हड्डियां
चंद मिनट भी न जीया
बस बन गया था एक मेहतर के लिए लाश
पुलिस के लिए अनसुलझा केस
आरोपियों की तलाश
ठेकेदार के लिए आपदा और अपशकुन
और पत्रकार दीपक तुम
तुम्हारे लिए एक ख़बर
इन जनाब के लिए एक कविता
मंच पर संवेदनाओं का जखीरा लूटने की
मार्क्स, नक्सल सा अंदर से टूटने की
दो साल से खोज रहा हूं
मेरे हत्यारे को
जेब में कोई पहचान का कागज न था
पत्नी आज भी आस में है
अंबेडकर की मर्च्युरी में रहा
फिर दफ्न हुआ
अब अकाल मरा हूं तो ईश्वर भी आने नहीं देता
सो इस पूल के आसपास ही रहता हूं
हर व्यक्ति से अपनी कहानी कहता हूं
मगर न उनके पास कान हैं
न मेरे पास आवाज़
भूत बन बस यहीं बस रहा हूं
कोई महसूस कर ले
मेरी उस दो साल की
सालों से नहाई नहीं बार्बी को बता दे
रायगढ़ स्टेशन पर खेलती वो
भीख मांगना-भीख मांगना
कोई बता दे उसे भी
मेरी राह में सिंदूरी मांग काढ़े
वो पर पुरुषों की जांघ पर बैठी है
ज़िंदगी में दग्ध
मेरी वाट जोहती
दीपक तुम्ही बता दो
तुम तो पत्रकार हो
मेरी शहादत ने तुम्हें
एक मजदूर की मौत का एंकर शाॅट दिया था
उसी का कर्ज़ लौटा दो
किससे मांगू इंसाफ
ठेकेदार
पुलिस
पत्रकार
या
कविराज तुमसे
ईश्वर ने ख़ुद ही रख छोड़ा है भूत योनि में
भटकने को उम्र पूरी होने तक
- सखाजी
(साल 2013 में रायपुर संस्कृत काॅलेज परिसर में निर्माणाधीन भव्य अंतरराष्ट्रीय स्वीमिंग पूल की तीसरी मंजिल से गिरकर मृत एक मज़दूर की आत्मा से साक्षात्कार)

कुली की आत्मकथा

Written By बरुण सखाजी on शुक्रवार, 19 जून 2015 | 11:09 pm

मैंने अपनी हड्डियों का चूरा बनाया है
जब कहीं आपका
अमेरिकन टूरिस्टर का बैग उठाया है
भीड़ को चीरकर आपको कोच तक पहुंचाया है
अगर इसे मेरी मनमानी कहो तो कहो
हमें तो कोई जानता भी नहीं
अगर
अमिताभ ने कुली का रोल निभाया न होता
सौ रुपये महज दो पचास-पचास किलो के बैग बहुत लगते होंगे
मगर तुम जरा इनको टस से मस तो कर दिखाओ
फिर हमें सिखाओ
चीलगाड़ी में बीस किलो के ऊपर
पर केजी दोगे
मशीन के श्रम को श्रम मानते हो
मेरी हड्डियों का चूरा
कोई उड़ती धूल जानते हो
-सखाजी

जिजीविषा - Neeraj Dwivedi: पाषाढ़ पुरूष Pashad Purush

Written By Neeraj Dwivedi on शुक्रवार, 5 जून 2015 | 5:03 pm

जिजीविषा - Neeraj Dwivedi: पाषाढ़ पुरूष Pashad Purush: मैं पुरूष पाषाढ़ कह कर, मुझको ठुकराओ न तुम आसमां का रंग गुलाबी यदि तुम्हारे होंठ से है घुमड़कर घन घन बरसना पत्थरों की चोट से...

वाह बस्तर वाह

Written By बरुण सखाजी on रविवार, 31 मई 2015 | 1:15 am

आदिवासियों का क्या यही इस्तेमाल है। मैंने उनके साथ फोटो खिंचवा ली। बस्तर के जिस रास्ते में ये लोग चमकदार पोशाक में मिले वहां ये किसी सवर्ण के भव्य विवाह समारोह में बैंड बजाने आए थे। फिर आप इनकी युवतियों के अर्धनग्न चित्र ड्राॅइंग रूम में सजा लीजिए। कुछ आर्ट दीवार पर टांग लीजिए। कुछ राॅट आयरन इत्यादि के बस्तर आर्ट शोभायमान कर लीजिए। लेकिन इनकी जिंदगी में कोई मुकम्मलियत मत दीजिए। सरकारों के हेल्पिंग हैंड भी भरोसे के साथ नहीं जाते। वे एक हाथ में दूध भात तो दूसरे हाथ में इनके जीवन का सहारा जंगल छीन लेना चाहते हैं। बैलाडीला खोखला हो रहा है। टाटा, एस्सार, एनएमडीसी आदि बस्तर की कोख से सब निकाल बेच देना चाहते हैं। प्रेस, गैर सरकारी संगठन, समाजसेवी अपने अलग ही मकसद से यहां दाखिल होते हैं। बड़ी भारी होटलों में सेफ घुसकर मीडिया बस्तर के बीहड़ का ग्राउंड जीरो दिखाता है। चंद गांवों में लकड़ियों की झौंपड़ियों में विपन्नता में दो पाव धान ले देकर गैर सरकारी संगठन चले जाते हैं और वस्त्र विहीन बुड्ढे आदिवासियों को सत्यनारायण की कथा वाली धोती देते हुए फोटो खिंचवाकर समाजसेवी चले जाते हैं।
ऐसे में इनके साथ तपती धरती, जलते सूरज और उफनते नालों व बीहड़ जंगल के खूंखार जानवरों के बीच माओवादी ही रहते हैं। हर कदम पर हमकदम। तब न तो आदिवासियों की किस्मत बदलनी है और न ही माओवाद खत्म होना है।
-सखाजी
(पहली बस्तर यात्रा के अनुभव)

परलोक में सैटेलाइट: व्यंग्य का जीवंत नायक

Written By बरुण सखाजी on शुक्रवार, 29 मई 2015 | 2:19 am

डॉ. सुभद्रा राठौर,
बी-81,  वीआईपी इस्टेट, खम्हारडीह, रायपुर (छत्तीसगढ़)
विज्ञान और विश्वास के अद्भुत मणिकांचनीय योग से पैदा हुई बरुण सखाजी की कृति ''परलोक में सैटेलाइट'' साहित्य जगत के साथ-साथ आम पाठक को भी अच्छी खासी दस्तक देती है। एक ओर ''परलोक'' है, जिसका संबंध मिथक से है, पौराणिक गल्प से है तो दूसरी ओर है ''सैटेलाइट'', जो विशुद्ध वैज्ञानिक युग की देन है। शीर्षक पर नजर फेरते ही तत्काल समझ में आ जाती है यह बात कि लेखक की दृष्टि सरल नहीं बंकिम है।आलोच्य कृति व्यंग्य है, जिसे हास्य की पांच तार की चासनी में खूब डुबोया, लपेटा गया है। व्यंग्य पितामह हरिशंकर परसाई की परंपरा के अनुपालक व ज्ञान चतुर्वेदी की शैली के परम भक्त सखाजी के भीतर विसंगतियों के प्रति भरपूर असहमतियां हैं। आक्रोश यह है कि मनुष्य अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनैतिक, मूल्यहीन, पापमय हो गया है। कहीं शुचिता नहीं, कहीं प्रतिबद्धता नहीं। मनुजता लुप्त हो रही है। क्यों? क्योंकि उसमें किसी भी प्रकार का भय नहीं रहा। इहलोक का सिस्टम उसके आगे पानी भरता है, उसमें इतनी कठोरता नहीं रह गई है कि वह मनुष्य को अनुशासित रख सके। ऐसे में एक सार्थक डंडे की तलाश है कृति, जिसका मंतव्य और गंतव्य मानुष-मन है, उसे झिंझोड़ा-जगाया जाए। कर्मफल के दर्शन को आधार बनाकर लेखक ने मानव समुदाय को ''परलोक'' दिखाते हुए वस्तुत: भविष्य के प्रति न सिर्फ सचेत किया है, वर्तमान को सुधारने का संदेश भी दिया है। खूबी यह है कि गहनतम संदेश गंभीर होकर भी बोझिल नहीं होता, पाठक को आद्यांत गुदगुदाते हुए लक्ष्य की ओर ले चलता है।
प्रारंभिक अंशों में साइंस-फिक्शन सा अहसास देते इस व्यंग्य उपन्यास का प्रसार पौराणिक कथा की भूमि पर होता है। लेखक ने अपने ''कंफर्ट जोन'' से प्लॉट का चयन किया है, उसकी चिर-परिचित भूमि है गरुड़ पुराण की। गरुड़ पुराण इसलिए माफिक था क्योंकि इसमें कर्मफल के अनुसार सुख-दुख भोगने के विधान वर्णित हैं। इसलिए ही लेखक का ''सैटेलाइट'' किसी अन्य धर्म के परलोक में गमन नहीं करता, भारतीय संस्कृति की डोर पकड़कर यमपुरी ही चला जाता है। पाठकों को प्रथम दृष्टया यह उपन्यास काल्पनिक प्रतीत होगा किंतु यह सुखद आश्चर्य है कि कल्पना की जमीन पर रोपी गई कथा में लेखक ने अपनी ही तरह का ''जादुई यथार्थवाद'' पैदा कर लिया है। कल्पना में भी मानवीय जीवन का घोर यथार्थ। यहां तक कि धरती में तो यथार्थ वर्णित है ही, परलोकवासियों के कृत्यों में भी धरतीवासियों के क्रियाकलाप, छल-छद्म पूरी सत्यता के साथ उकेरे गए हैं। समाज में व्याप्त कदाचार, भ्रष्टाचार, अनैतिक कार्य व्यापार, अधर्म, पापाचार पर तीखे कटाक्ष हैं यहां। राजनाति, समाज, धर्म, ज्योतिष, अर्थ, विज्ञान, पुलिस, प्रशासन, अफसरशाही, अवसरवादिता, प्रकृति, पर्यावरण, मीडिया, कानून, गांव, शहर, कौन-सा क्षेत्र छूटा? लेखक की टोही नजरें उन्हें देखती हैं, दिखाती हैं और कर्मदंड की भागी भी बनाती चलती हैं। उपन्यास में यत्र-तत्र संकेत हैं कि धरती पर पाप बढ़ गए हैं, फलत: स्वर्ग सूना-सूना सा है, यहां कोई आता ही नहीं। जबकि नरक में रेलमपेल है। पापकर्म अनुसार नरक में दी जाने वाली यातनाओं के दृश्य भी खूभ उभारे गए हैं ताकि पाठक को उनसे वितृष्णा हो। देखा जाए तो कृति का उद्देश्य सीधे तौर पर ''लोक शिक्षण'' ही है। लोक मानस यदि पापिष्ठ हो गया है, तो उसे यह भी समझना होगा कि ''जो जस करहिं सो तस फल चाखा''। धरती पर फैलने वाली नई-नई बीमारियों, आपदाओं,  विपदाओं, कष्टों का कारक लेखक कर्म को ही बताता चलता है, नरक की भीड़ कम करने के लिए ऊपरवाले ने धरती को ही नरक बना देने की योजना बना ली है। ''जैसी करनी वैसी भरनी'' ही नहीं, जहां किया, वहीं भुगतो, यह भी।
उपन्यास की अंतर्वस्तु जितनी गंभीर है, उसका ताना-बाना उतना ही सरल-सहज और हल्का फुल्का है। कहें तो ''गुड़ लपेटी कुनैन''। शैली में रोचकता, चुटीलापन है; व्यंग्य इसका प्राण है तो हास्य देह। फलत: धीर-गंभीर विषय को भी पाठक सहज ही हंसता-मुस्कुराता गटकने को तत्पर हो जाता है, प्रारंभ से ही। लेखक हास्य का एक भी क्षण छोड़ने को तैयार नहीं, सदैव लपकने को तत्पर, ''मत चूको चौहान''। कठोर चट्टान को फाड़कर भी कुटज की तरह इठलाने को तैयार। उदाहरण के तौर पर वह दृश्य लीजिए, जहां धरती पर ही नाना प्रकार के कष्ट झेल आई गरीब की आत्मा को नरक की वैतरणी भी कहां कष्टप्रद लगती है, वह वैतरणी में भी चहक रही है। वैतरणी का मतलब तो खूब समझते हैं आप, वही नदी जिसे पार करने को प्रेमचंद का ''होरी'' जीते जी एक अदद गाय तक न खरीद सका था। वैतरणी अर्थात् खून, पीब, बाल, अस्थि, मज्जा और हिंसक जीव-जंतुओं से भरी वीभत्स नरक की नदी, जिसे पापी आत्मा को पार करना होता है। तो कृति में वह गरीब आत्मा इस वैतरणी को भी खुशी-खुशी पार कर रही है, कभी मगर की पीठ पर चढ़ जाती है, कभी उसकी पूंछ से ही खेलने लग जाती है। ऐसे स्थलों पर छलककर आता हास्य और व्यंग्य वस्तुत: हास्य-व्यंग्य से आगे बढ़कर करुण में तब्दील हो जाता है, अचानक और अनायास। वैसे, हास्य उपजाने में लेखक बेजोड़ है, कई बार आपको भ्रम होगा कि आप कहीं हास्य ही तो नहीं पढ़ रहे।
इस व्यंग्य कृति में एक ओर हास्य की विपुलता है तो दूसरी ओर गंभीर स्थलों की भी कमी नहीं है। यहां सूक्तियां हैं, तो कई प्रोक्तियां भी। जहां भी अवसर आया, लेखक पूरे धैर्य के साथ, ठहरकर चिंतन-मनन करता दीख पड़ता है। संदर्भों, अर्थों, भावों को सहेजे यह अंश सूझ-विवेक से भरे हुए हैं। धर्म पर कटाक्ष करते हुए लेखक का यह कथन देखिए- ''धर्म की यही विकलांगता है, यह अजीब है। जो नहीं मानता, वो नहीं मानता, मगर वो भी मानता है। यानी जो नास्तिक है, वह भी आस्तिक है और जो आस्तिक है वह तो आस्तिक है ही''। इसी प्रकार यह कथन भी गूढ़ संदेशों के साथ आकर्षित करता है- ''जब सफलता मिलती है तो वह अपने साथ मद मस्ती भी लोटाभर  लेकर आती है। जब असफलता आती है तो अपने प्रहार से आत्मबल को रगड़ती है तो सतर्क भी करती है''।
कृति की भाषा सहज-सरल, ग्राह्य अर्थात् आमफहम है। भाषा में, कहन में एक रवानी है, गति है। भाषा कथा के लिए सप्रयास जुटाई गई हो, ऐसा प्रतीत नहीं होता। बोलचाल की भाषा है, फलत: इस दौर की हिंदी, जिसमें अंग्रेजी के शब्द बहुतायत में आ गए हैं, लेखक ने उसे अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है। कुछ शब्द व्यंग्य और हास्य के बहाव में डूबते-उतराते लेखक ने खुद ही गढ़ लिए हैं, जो फुलझडियां ही बिखेरते हैं। यथा- ''अनयकीनेबल'',  ''अप्सराईजेशन''। इसी तरह हिंदी-अंग्रेजी के ''स्लो मौत'' जैसे संकर प्रयोग भी भाषा को चमक ही देते हैं, अवरोध नहीं बनते। हां, कथारंभ में पाठक को आंचलिकता के दर्शन अवश्य होंगे, जहां रामसेवक और अन्ना जैसे पात्र बुंदेली बोलते नजर आएंगे। यह आंचलिकता भी रोचक है, पात्रानुकूल है और अर्थ में किसी प्रकार की बाधा भी उत्पन्न नहीं करती। चूंकि बुंदेली हिंदी की ही बोली है, सहज समझ में आती है।
कुल मिलाकर, कैसी है सखाजी की यह रचना? कथानक की दृष्टि से देखें तो कथावस्तु अच्छी है, रोचक है। उद्देश्य भी ऊंचा है। कथा की बनावट-बुनावट भी ठीक है, यह अवश्य है कि इसे शत-प्रतिशत अंक दिया जाना भले ही संभव नहीं है, पर लेखक की तारीफ की जानी चाहिए इसलिए कि उसमें संभावनाएं परिलक्षित हो रही हैं। ''पूत के पांव पालने में''। पहली ही कृति है, पूर्णता की अपेक्षा करना बेमानी होगी, किंतु लेखक में क्षमता है कि वह पूरी सुगठता और कसाव के साथ ऐसी कई कृतियों को आगे भी जन्म दे सकेगा। लेखन में प्रकृति झांक रही है, अकृत्रिमता का यह गुण अच्छी कृति की पूर्वपीठिका बनेगा। देश को, समाज को तीखी और तिरछी नजर की बेतरह आवश्यकता है, जो उसकी चीर-फाड़ करे, पड़ताल करे, उसकी खामियों को उजागर करे और तिलमिला देने वाली वाणी से जगा सके। सन्मार्ग दिखाने के लिए अभी कई कबीर अपेक्षित हैं, सखाजी का मानव-समाज में स्वागत है, वे ऊंघते-उनींदे मानुष को जाग्रत करें। हमारी शुभकामनाएं।

स्मार्ट फोन चलेगा, अफसर नहीं

Written By बरुण सखाजी on शुक्रवार, 15 मई 2015 | 4:10 pm

हमें स्मार्ट सिटी चाहिए, स्मार्ट सरकार, स्मार्ट कार्ड, स्मार्ट फोन, स्मार्ट पत्नी, स्मार्ट क्लास और स्मार्ट टीवी समेत और भी न जाने क्या-क्या स्मार्ट चाहिए। मगर अफसर वही चाहिए। सफारी सूट या तपती धूप में भी गलेबंद टाई, सूट में कैद कांख में फाइल दबाए कोई मुनीम सा। ऐसा क्यों?
छत्तीसगढ़ कैडर के आईएएस अफसर और जगदलपुर के जिला कलक्टर अमित कटारिया से राज्य सरकार ने सिविल सर्विस के सिविल कोड की किसी अ, ब, स, द धारा के उपबंध ढिमका के तहत फलां के उल्लंघन का दोषी मानते हुए जवाब तलब किया है। अफसर की चूक सिर्फ इतनी है कि उसने प्रधानमंत्री से मिलते वक्त ब्रांडेड चश्मा और रंगीन चटक शर्ट पहन रखी थी। बेचारे कमअकल अफसर ने भारत की आम आदमी की पहचान बांह से फटी शर्ट नहीं पहनी, अस्पतालों में मिलने वाला मोतियाबिंद ऑपरेशन वाला चश्मा नहीं लगाया था। मोदी के दो घंटे के कार्यक्रम में दो शर्ट भी बदल ली थी। इसलिए अफसर बहुत दोषी है।
न जाने क्यों ये देश नंगों पर ही भरोसा करता है। बाबा, वैराग्य के चोले को ही क्यों मान्यता देता है। हाथी पर बैठकर भीख मांगने वाले को क्यों संत कहता है और पैदल चलकर तल्ख धूप में सब्जी बेचने वाले को ठग्गू क्यों मानता है।
इक्कसवीं सदी में प्रधानमंत्री के सूट पर बवाल, अफसर के ब्रांडेड चश्मे पर सवाल गले में फंस जाते हैं। क्या इस देश को गंगा किनारे के पंडा चलाएं, जो पहनें तो भरोसे का प्रतीक भगवा, मगर ठगी में चंबल के डाकुओं के बाप हों। क्यों किसी अफसर को हम भिनका सा ही देखना चाहते हैं। क्या छत्तीसगढ़ में ही ऐसे अफसर नहीं हैं, जो अरबों की संपत्ति के मालिक हैं, जिनके पैसे स्विस बैंक में जमा हैं। दुबई में इंटरनेशनल कंपनी में भागीदारी है। कइयों मंत्रियों की अकूत संपदा देश-विदेश में है। नसबंदी कांड के दोषी मंत्री अमर अग्रवाल के दामादों की दवा कंपनियों के ही कितने ठेके राज्य के स्वास्थ्य विभाग में हैं। लेकिन वे सामान्य खादी का कुर्ता पहनते हैं, इसलिए हमें ऐतराज नहीं। वे सामान्य पोशाक में आते हैं तो हमें दिक्कत नहीं है। बस कोई स्टाइल में नजर न आए। मजे की बात तो ये है कि समकक्ष और वरिष्ठ अफसर तो वेतन वृद्धि तक रोकने की बात कह रहे हैं। अमित कटारिया कोई दूध के धुले नहीं हैं। मगर इस मामले में आम आदमी उनके साथ है। ऐसे तो युवा अफसर लाॅबी डिमॅरलाइज हो जाएगी। जरा मुक्त रखिए इन्हें बकवासों से। कितने ऊर्जावान हैं छत्तीसगढ़ के युवा अफसर ओमप्रकाश चौधरी, अमित कटारिया, सारांश मित्तर, रजत कुमार, किरण कौशल, सिद्धार्थ कोमल परदेशी। इन्हें यूं डिमॅरलाज न कीजिए।
-सखाजी

''परलोक में सैटेलाइट'' की समीक्षा

Written By बरुण सखाजी on बुधवार, 13 मई 2015 | 1:47 pm

व्यंग्य उपन्यास ''परलोक में सैटेलाइट'' हास्य व्यंग्य का जीवंत नायक है। इसके जरिए लेखक ने समाज के हर वर्ग को संबोधित किया है। गहन विज्ञान और मनोविज्ञान का इस्तेमाल नजर आता है। कथानक की शुरुआत ही बुंदेलखंड के एक ऐसे पात्र से होती है, जो अपनी कुर्सी बचाने और उसे जस्टीफाई करने के लिए अपने मातहतों को तौलता रहता है। व्यंग्य सरकारी दफ्तरान में ''साहबवाद'' को भी एड्रेस करता है। सबसे मौजू और महत्वपूर्ण व्यंग्य के भीतर छुपा वह विचार है, जिसमें लेखक दुनियाभर की स्पेस एजेंसियों के अलग-अलग मिशनों पर कटाक्ष करता है। वह यहां सार्वभौमवाद जैसे अतिगंभीर टाॅपिक पर भी पाठक से वार्तालाप सा करता हुआ हास्य अंदाज में चर्चा करता है।
भूखे देश में अरबों रुपये विफल सैटेलाइट पर खर्चने के बाद स्पेस एजेंसी के डायरेक्टर की राजनैतिक खुरफातों का व्यंग्य में जीवंत चित्रण है। गंभीर से गंभीर बात बेहद सरल और हास्य के जरिए ऐसे कर दी गई  है, जैसे पाठक से आमने-सामने तादातम्य बिठाकर बात की जा रही हो।
सैटेलाइट का परलोक से दृश्य भेजना। पृथ्वी के मानव समाज की प्रतिक्रियात्मकता अद्भुत है। कई बातें ऐसी हैं, जिनकी बहुत ढंग से व्याख्या की जा सकती है। कई नये शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। मुद्दों पर विस्तृत राय है।
व्यंग्य दो कारणों से जरूर पढ़े। पहला तो एक संपूर्ण व्यंग्य, जहां कहीं भी आपको गंभीर होने की जरूरत नहीं और एक बार भी बचकाना या हल्कापन नहीं लगेगा। दूसरा कारण इसकी शैली है। पाठक को कहीं भी उलझना नहीं पड़ता। एक पैरा सवाल खड़ा करता तो दूसरा ही पैरा जवाब दे देता है।
व्यंग्य की दो खामियां भी हैं। पहली तो यह अश्लील गालियों से गुरेज नहीं करता दूसरी इसमें किसी तरह की व्यावसायिकता की परवाह नहीं की गई। इससे प्रकाशक खोजने में दिक्कत हुई। वहीं  इतनी स्पष्टवादिता बरती गई है, कि कोई भी सरकारी पुस्तकालय इस विस्फोटक को अपने यहां रखने से भी गुरेज कर रहा है।

परलोक में सैटेलाइट अब pothi.com पर भी

Written By बरुण सखाजी on मंगलवार, 12 मई 2015 | 2:28 am

व्यंग्य उपन्यास ''परलोक में सैटेलाइट'' अब notnul.com के साथ  pothi.com पर भी।
http://pothi.com/pothi/preview?pFile=51294#preview-top

व्यंग्य उपन्यास ''परलोक में सैटेलाइट'' विमोचित

Written By बरुण सखाजी on गुरुवार, 7 मई 2015 | 2:37 am

रायपुर.
तकनकी युग में ई-पुस्तकों का दौर है। आने वाला वक्त पूरी तरह से ऑनलाइन हो जाएगा। यह अच्छा है। एक  छोटे से टैब में सैकड़ों पुस्तकों को पढ़ स·ते हैं। यह कहना है वरिष्ठ साहित्यकर रमेश नैयर का श्री नैयर बरुण सखाजी के पहले व्यंग्य उपन्यास परलोक में सैटेलाइट के विमोचन अवसर पर बोल रहे थे। यह छत्तीसगढ़ का  ऐसा पहला उपन्यास है जो ईबुक के तौर पर विमोचित किया गया है। वृंदावन हॉल में २७ अप्रैल २०१५, सोमवार को आयोजित कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि साहित्यकार सुभद्रा राठौर ने कहा कि व्यंग्य में नई शब्दावली गढ़ी गई है। जैसे यकीनेबल। अप्सराइजेशन आदि। नई और नई ऐसी बातें भी की गईं हैं, जो जुमले की तरह हैं। जैसे भगवान विष्णु ही क्यों सर्वोच्च हैं, क्योंकि वे ही इकलौते ऐसे भगवान हैं, जो अपनी पत्नी से पैर दबवा सकते हैं। उनके अलावा कोई  और नहीं जो इतना बड़ा साहस कर सकता। लेकिन व्यंग्य में गालियों का इस्तेमाल गैरज़रूरी लगता है.
विज्ञान और धर्म के रोचक कथानक
विशिष्ट अतिथि व्यंग्यकार प्रभाकर चौबे ने कहा कि नए लोगों में जबरदस्त ऊर्जा दिखाई देती है। परलोक में सैटेलाइट में विज्ञान और धर्म की मिलीजुली फंतासी है। यह प्रज्ञ और परिपूर्ण लेखन की निशानी है।
हास्य की परिधि तोड़ता है परलोक में सैटेलाइट
अन्य विशिष्ट अतिथि और वरिष्ठ पत्रकार अभय किशोर ने कहा कि परलोक में सैटेलाइट हास्य की परिधि को तोड़कर नश्तर से मौजूदा व्यवस्था पर करारा व्यंग्य करता है। विशिष्ट अतिथि दूरदर्शन केंद्र के निदेशक संजय प्रसाद ने कहा कि यह बेहद खुशी की बात है कि लेखन के मामले में रायपुर समृद्ध है। परलोक में सैटेलाइट के जरिए जिस हास्य को छूने की कोशिश की गई है, वह लाजबाव है। वहीं विशष्ट अतिथि महेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि परलोक में सैटेलाइट एक तरह से अंतरिक्ष, विज्ञान और धर्म के बीच त्रिकोण बनाता है। कार्यक्रम का संचालन अनिल द्विेदी ने किया। अंत में अतिथियों और आगुंतकों का आभार वरिष्ठ भाजपा नेता प्रकाश बजाज ने किया।
नॉटनल डॉट काम से क रें डाउनलोड
इस व्यंग्य उपन्यास को नॉटनल डॉट काम से डाउनलोड किया जा सकता है। वहीं यह जल्द ही न्यूजहंट मोबाइल एप पर भी जारी होने जा रहा है। इसके अलावा उपन्यास की हार्डकाही के लिए ९००९९८६१७९ पर एसएमएस करके मंगाई जा सकती है।
यहां से करें डाउनलोड।
http://notnul.com/Pages/ViewPort.aspx?Shortcode=eAVycMqD

Founder

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Saleem Khan