नियम व निति निर्देशिका::: AIBA के सदस्यगण से यह आशा की जाती है कि वह निम्नलिखित नियमों का अक्षरशः पालन करेंगे और यह अनुपालित न करने पर उन्हें तत्काल प्रभाव से AIBA की सदस्यता से निलम्बित किया जा सकता है: *कोई भी सदस्य अपनी पोस्ट/लेख को केवल ड्राफ्ट में ही सेव करेगा/करेगी. *पोस्ट/लेख को किसी भी दशा में पब्लिश नहीं करेगा/करेगी. इन दो नियमों का पालन करना सभी सदस्यों के लिए अनिवार्य है. द्वारा:- ADMIN, AIBA

Home » » वाह बस्तर वाह

वाह बस्तर वाह

Written By बरुण सखाजी on रविवार, 31 मई 2015 | 1:15 am

आदिवासियों का क्या यही इस्तेमाल है। मैंने उनके साथ फोटो खिंचवा ली। बस्तर के जिस रास्ते में ये लोग चमकदार पोशाक में मिले वहां ये किसी सवर्ण के भव्य विवाह समारोह में बैंड बजाने आए थे। फिर आप इनकी युवतियों के अर्धनग्न चित्र ड्राॅइंग रूम में सजा लीजिए। कुछ आर्ट दीवार पर टांग लीजिए। कुछ राॅट आयरन इत्यादि के बस्तर आर्ट शोभायमान कर लीजिए। लेकिन इनकी जिंदगी में कोई मुकम्मलियत मत दीजिए। सरकारों के हेल्पिंग हैंड भी भरोसे के साथ नहीं जाते। वे एक हाथ में दूध भात तो दूसरे हाथ में इनके जीवन का सहारा जंगल छीन लेना चाहते हैं। बैलाडीला खोखला हो रहा है। टाटा, एस्सार, एनएमडीसी आदि बस्तर की कोख से सब निकाल बेच देना चाहते हैं। प्रेस, गैर सरकारी संगठन, समाजसेवी अपने अलग ही मकसद से यहां दाखिल होते हैं। बड़ी भारी होटलों में सेफ घुसकर मीडिया बस्तर के बीहड़ का ग्राउंड जीरो दिखाता है। चंद गांवों में लकड़ियों की झौंपड़ियों में विपन्नता में दो पाव धान ले देकर गैर सरकारी संगठन चले जाते हैं और वस्त्र विहीन बुड्ढे आदिवासियों को सत्यनारायण की कथा वाली धोती देते हुए फोटो खिंचवाकर समाजसेवी चले जाते हैं।
ऐसे में इनके साथ तपती धरती, जलते सूरज और उफनते नालों व बीहड़ जंगल के खूंखार जानवरों के बीच माओवादी ही रहते हैं। हर कदम पर हमकदम। तब न तो आदिवासियों की किस्मत बदलनी है और न ही माओवाद खत्म होना है।
-सखाजी
(पहली बस्तर यात्रा के अनुभव)

Share this article :

2 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (01-06-2015) को "तंबाखू, दिवस नहीं द्दृढ संकल्प की जरुरत है" {चर्चा अंक- 1993} पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

रचना दीक्षित ने कहा…

विधि की विडम्बना प्रशासन की नक्कारी व मक्कारी

एक टिप्पणी भेजें

Thanks for your valuable comment.