नियम व निति निर्देशिका::: AIBA के सदस्यगण से यह आशा की जाती है कि वह निम्नलिखित नियमों का अक्षरशः पालन करेंगे और यह अनुपालित न करने पर उन्हें तत्काल प्रभाव से AIBA की सदस्यता से निलम्बित किया जा सकता है: *कोई भी सदस्य अपनी पोस्ट/लेख को केवल ड्राफ्ट में ही सेव करेगा/करेगी. *पोस्ट/लेख को किसी भी दशा में पब्लिश नहीं करेगा/करेगी. इन दो नियमों का पालन करना सभी सदस्यों के लिए अनिवार्य है. द्वारा:- ADMIN, AIBA

तम गहनतम हैं।

Written By Rahul Paliwal on शनिवार, 29 दिसंबर 2012 | 11:10 pm

तम आज, गहनतम हैं।
स्तब्ध आम जन हैं।
हौसले अभी टूटे तो नहीं,
हर आंख लेकिन नम हैं।

वो जो उसका राजा हैं।
अपना फ़र्ज़ भूल बैठा हैं।
आंखे, कर्ण बंद किये।
अपनी प्रजा से ऐंठा हैं।

क्या करे आमजन?
बैचैन और उदास हैं।
चल घर से निकलते हैं।
पास के नुक्कड़ पे पहुचते हैं।
दो और मिलेंगे , चार बनेंगे 
वहा राजपथ चलेंगे।
ले हाथो में हाथ चलेंगे।
दिए से दिया जलाएंगे।
तेरे मेरे उसके, जख्म सहलायेंगे।
भरोसा दिलाएंगे एकदूसरे को।
कि रखेंगे मानवता जिन्दा।
और इस आग को।
जो वो अपना जिस्म जला देके गई हैं।
और इसी आग से हरेंगे,
हर तम को।
कहेंगे सत्ता से।
या तो बदलो।
या हो जाओ, बेमानी होने को अभिशप्त।
बदलाव अब चाहिए। 
घर से दिल्ली तक।
मन से दिल तक।
मुझसे तुझ तक।
प्रजा से राजा तक।
दे साथी अब ये वचन हैं।

तम आज गहनतम हैं।
स्तब्ध आम जन हैं।
हौसले अभी टूटे तो नहीं,
हर आंख लेकिन नम हैं।
http://rahulpaliwal.blogspot.in/2012/12/blog-post_29.html

Written By तरूण जोशी " नारद" on सोमवार, 24 दिसंबर 2012 | 2:15 am

जनता आती हैं।

Written By Rahul Paliwal on रविवार, 23 दिसंबर 2012 | 4:28 pm


Life is Just a Life: जरुरत से डरो दरबारों Jarurat se Daro Darbaron

Life is Just a Life: जरुरत से डरो दरबारों Jarurat se Daro Darbaron: जरूरतें आसमानों को मजबूर कर सकती हैं बिजली बरसानें को तो इंसान को क्यों नहीं ? डरो जरुरत से डरो दरबारों , आज जरुरत यहाँ दिल...

आडवाणी चौधरी चरण सिंह की भूमिका निभाएंगे

Written By बरुण सखाजी on शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012 | 12:34 pm

सुना है आडवाणी ने मोदी को न बधाई दी और न कुछ कहा। पत्रकारों ने पूछा तो वे कार में बैठकर तुरंत चले गए।1992 में हमारे यहां एक पास के गांव से पाराशर जी आए थे। वे गैरसियासी थे, पेशे से शिक्षक, किंतु राजनीति का चश्मा जरूर अच्छा रहा होगा। उन्होंने एक कागज में लिखकर भार्गव की डिक्शनरी में लिखा था, अगर कभी भाजपा की सरकार केंद्र में बनी तो आडवाणी चौधरी चरण सिंह की भूमिका निभाएंगे, और सरकार धड़ाम हो जाएगी। जब भी मैं इस डिक्शनरी में घुसता मुझे यह पर्चा वहां मिलता था। 1996 में 13 दिन फिर 1998 में 13 महीने और फिर 1999 में 5 साल के लिए बनी भाजपा की सरकार में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। तो लगा पाराशर जी ने यूं ही लिख दिया था। मगर अब मैं उन्हें सलाम करता हूं, वे सही थे। बस उनका अनुमान था अटल और आडवाणी को लेकर पर वह साबित होगा मोदी और आडवाणी के मामले में।-सखाजी

Life is Just a Life: जीवन एक उत्थान-पतन Jeevan ek Utthan Patan

Written By Neeraj Dwivedi on गुरुवार, 20 दिसंबर 2012 | 6:44 pm

Life is Just a Life: जीवन एक उत्थान-पतन Jeevan ek Utthan Patan: छल छल बहती नदिया का , उत्थान-पतन   जीवन  है, सब कुछ  पाकर  खोने में , मशगूल  मगन जीवन  है। उगते  अंकुर   का  रोना , सर्पों  को...

Life is Just a Life: कब तक अंधा इतिहास पढ़ाओगे? Kab Tak Andha Itihas pa...

Written By Neeraj Dwivedi on रविवार, 16 दिसंबर 2012 | 10:07 pm

Life is Just a Life: कब तक अंधा इतिहास पढ़ाओगे? Kab Tak Andha Itihas pa...: आखिर कब तक  उगते भारत को  अंधा इतिहास पढ़ाओगे ? कब तक बचपन में  कायरता भर  खद्दर के दिए जलाओगे ? कब तक प्रश्न पूँछते  नौनिहाल के सम्मु...

My Clicks ...: Flowers from my Lenses

Written By Neeraj Dwivedi on शनिवार, 15 दिसंबर 2012 | 10:32 pm

Life is Just a Life: अलविदा मैसूर Alvida Mysore

Life is Just a Life: अलविदा मैसूर Alvida Mysore: आज चल  पडा निर्दोष जीवन , रह गयीं निःशब्द राहें अनमनी , ये धरा , बादलों की  पालनाघर , इतिहास  और शौर्य की  जमीं। चांद तारे  खेल...

चार दशकों का सिलसिला थमा नहीं:

Written By बरुण सखाजी on सोमवार, 10 दिसंबर 2012 | 12:49 pm


चार दशकों का सिलसिला थमा नहीं:
1. सदी के आठवें दशक में देश को अपातकाल जैसी सरकारी दंगों को झेलने पड़ा।
2. नवे दशक में देश को इंदिरा एसेसिनेशन क चलते सिख दंगों को फेस करना पड़ा।
3. आखिरी दशक में बाबरी विध्वंस के बाद के दंगों का सामना करना पड़ा। और
4. इस सदी के पहले दशक में गुजरात दंगों का।
5. मौजूद दशक 2012 में असम हिंसा के नाम से जाने जाने वाले दंगों को भी हम भूल नहीं सकते।
आखिर यह दंगाई दशकों का सिलसिला कब तक थमेगा।
और आश्चर्य की बात है कि 2002 गुजरात दंगों को छोड़ दें तो शेष चारों के दौरान केंद्र में धर्म निरपेक्ष के पहरूआ दल कांग्रेस की ही सरकार रही है।

Life is Just a Life: खारे पानी का घडा Khare Pani Ka Ghada

Written By Neeraj Dwivedi on बुधवार, 5 दिसंबर 2012 | 10:13 am

Life is Just a Life: खारे पानी का घडा Khare Pani Ka Ghada: उस चोट ने  मुझे  शायद बडा कर दिया है , फिर एक ठोकर लगाकर  खडा कर दिया है। अनजाने  अनचाहे  किसी  एक  अपने  ने , मट मैले सुर्ख रंगो...

Life is Just a Life: दीवार को बहना पड़ेगा Deewar ko Bahna Padega

Written By Neeraj Dwivedi on सोमवार, 3 दिसंबर 2012 | 9:57 am

Life is Just a Life: दीवार को बहना पड़ेगा Deewar ko Bahna Padega: रौशन शहर के एक कोने में   मेरा भी घर बनेगा, फिर भी पतंगों को हमेशा आग में जलना पड़ेगा? हम तुम्हारी राह में  अनगिन सितारे गढ़ चलेंगे...

श्वेता के साथ -सच का 'हाथ'

श्वेता के साथ -सच का 'हाथ'
Shweta Bhatt, the wife of suspended IPS officer Sanjiv Bhatt. File Photo.

 कॉंग्रेस ने गुजरात के निलंबित आई.पी.एस.अधिकारी संजीव भट्ट की पत्नी श्वेता भट्ट को मणिनगर सीट पर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ उतारकर अपने विरोधियों का मुहं बंद कर दिया है . गुजरात दंगों का सच सामने लाने वाले बहादुर एवं ईमानदार अधिकारी संजीव भट्ट के परिवार को जो ज्यादती झेलनी पड़ी है -उसका जवाब जनता नरेंद्र मोदी को हराकर दे सकती है .जो लोग ''वन्दे मातरम'' का उद्घोष करते हुए एवं ''राष्ट्रीय ध्वज '' लहराते हुए दिल्ली में भ्रष्टाचार के विरुद्ध सीना तानकर खड़े थे और भ्रष्टाचार के लिए एकमात्र जिम्मेदार 'कॉंग्रेस 'को ठहराने की जिद पर अड़े थे क्या आज गुजरात में जाकर श्वेता के साथ  खड़े हो सकेंगें ?क्या वे भ्रष्टाचार से भी ज्यादा गंभीर मुद्दे साम्प्रदायिकता के खिलाफ श्वेता के कदम से कदम मिलाकर नरेन्द्र मोदी को हराने की मुहीम में शामिल होंगें ?पिछले दस साल से गुजरात में लोकतंत्र की धज्जिया उड़ाते इस तानाशाह के खिलाफ खड़े होने का साहस करने वाली श्वेता ने 'नेता के रूप में' मोदी से अपने को कमतर आंकते हुए कहा है की -''हालाँकि मैं मानती हूँ की मेरा और मोदी का मुकाबला बराबरी का नहीं है ''  लेकिन इस सन्दर्भ में ये उल्लेखनीय है की श्वेता और मोदी का मुकाबला बराबरी का हो ही नहीं सकता क्योंकि सच और झ्हूठ का कोई मुकाबला होता ही नहीं .गुजरात दंगों के मुख्य दोषी नरेंद्र मोदी को भले ही किसी अदालत द्वारा सजा न सुनाई गयी हो क्योंकि उनके आतंक के चलते   एक एफ.आई.आर.तक उनके खिलाफ किसी थाने   में दर्ज न हो सकी किन्तु बहादुर व् ईमानदार अधिकारी संजीव भट्ट ने उनके आतंक के आगे घुटने नहीं टेके .फिर भट्ट परिवार के सच और मोदी के झूठ  का मुकाबला कैसे हो सकता है ?श्वेता जिस सच का हाथ थामकर मोदी के खिलाफ चुनावी मैदान में उतरी हैं उस सच का ओहदा मोदी के झूठ और षड्यंत्रों से कहीं ऊँचा है .नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी को समझ लेना चाहिए की श्वेता का उनके खिलाफ खड़ा होना ''सत्यमेव जयते ''की एक शुरुआत भर है .ये सिलसिला अब दूर तक जारी रहेगा .गुजरात के प्रत्येक नागरिक से श्वेता जैसे बहादुर -ईमानदार उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान करने की अपील करते हुए मैं यही कहूँगी -
''आतंक के आगे घुटने मत टेको !
जिंदगी को मौत बनने से रोको !
हर हालत को सह  जाना  हौसला नहीं !
एक बार खिलाफत करके भी देखो !!
                                     शिखा कौशिक 'नूतन'

Life is Just a Life: अब चोटें दिल दुखातीं नहीं Ab Chotein Dil Dukhati N...

Written By Neeraj Dwivedi on गुरुवार, 22 नवंबर 2012 | 8:40 pm

Life is Just a Life: अब चोटें दिल दुखातीं नहीं Ab Chotein Dil Dukhati N...: इस ज़माने की चोटें, अब दिल दुखातीं नहीं , ये रूठीं बदलियाँ आह को आँसूं बनाती नहीं। मेरी जिंदगी बस ओस की एक बूँद है जैसे , ये प्...

Life is Just a Life: बासन्ती रंग लेकर निकलना था Basanti Rang Lekar Nikl...

Written By Neeraj Dwivedi on बुधवार, 21 नवंबर 2012 | 8:46 pm

Life is Just a Life: बासन्ती रंग लेकर निकलना था Basanti Rang Lekar Nikl...: निकल पडे पर असरार  संग लेकर निकलना था , साथ धरती का बासन्ती रंग लेकर निकलना था। आँख बन्द कर समर्थन तुम्हारा हमसे नही होता , तुम्ह...
 
 
मित्रों नमस्कार,
 
मेरा चर्चित काव्य संग्रह "उम्मीदें क्यों?" 40% छूट के साथ उपलब्ध है। घर बैठे पुस्तक प्राप्त करने के लिए आप निम्न लिंक पर क्लिक करके पुस्तक मंगा सकते हैं।
शीघ्रता करें कहीं ऐसा न हो कि आप बाद में पश्चाताप करें कि पुस्तक नहीं पढ़ पाए। निश्चित ही यह काव्य संग्रह आपको पसंद आएगा।  
 

लेकिन ध्यान रहे, इंफीबीम द्वारा यह छूट केवल 25 नवम्बर तक दी जा रही है। अपने मित्रों को यह सूचना भी अवश्य दें।

Life is Just a Life: लम्हें Lamhein

Written By Neeraj Dwivedi on सोमवार, 19 नवंबर 2012 | 8:29 pm

Life is Just a Life: लम्हें Lamhein: ये लम्हें तोड  देते हैं, कभी ये  जोड देते हैं , बेहद शख्त जान हूँ, जो जिन्दा छोड देते हैं। लम्हें सब्ज सुर्ख रंगी , कटारों  से कतर ...

मेरी राय: सिनेमा और गांधी जी


गांधीजी का होना और फिल्मों का विकास यह दोनों ही घटनाएं एक भारत में अलग-अलग हैं। किंतु यह लेखक की कामयाबी है कि वह इन्हें आपस में जुड़ी सी साबित कर पाया है। दरअसल लेखक यह दावा भी नहीं करता कि गांधीजी फिल्मों को लेकर कोई भी दृष्टि रखते ही थे, और यह भी नहीं कहता कि वे फिल्मों से दूर थे। गांधी के समकाल में बन रहीं फिल्मों में उनके दर्शन और विचार की परोक्ष या अपरोक्ष गं्रथि पुस्तक गांधी और सिनेमा की अधोसंरचना तय करती है। अंत में लेखक एक साधारण पंक्ति में यह स्वीकार भी कर लेता है, कि गांधीजी का फिल्म को लेकर कोई विचार नहीं था। कई बार ऐसा भी महसूस होता है कि गांधी और नेहरू की सोच में संयुक्तता सी है। कला के प्रेमी और नम्र स्वभाव के जादूगर नेहरू का फिल्मों की तरफ सहज रुझान था, लेखक इस बात का जिक्र करके गांधीजी की विचारधारा के प्रतिनिधि के रूप में नेहरू का बहुत ही सफाई से प्रतिपादित करता है। लगभग 200 पेजों की इस रोमांचक यात्रा में यह जानने कि गांधी फिल्म को लेकर क्या सोचते थे, से ज्यादा रुचि इस बात की जागती है कि समकालीन फिल्म जगत में स्वतंत्रता के लिए झगड़े, लड़ाइयां या सतत संग्राम कितना रिफ्लैक्ट हो रहा था। इस बात को बताने में पुस्तक कामयाबी की पराकाष्ठा छूती है।
सिनेमाई विविध और देश का सियासी सांचा किसी देशकाल में मेल नहीं खाता। किसी राजनैतिक घटना पर एकदम सत्य स्वरूपित कोई फिल्म बनना मुमकिन भी नहीं, तभी प्रतीक और घटनाओं में समानता को पेश किया जाता है। पुस्तक की यात्रा में लेखक एक विचार को एकाधिक बार कहता है वह है इस विविधता प्रधान देश को चलाने के लिए कोई चमत्कारिक व्यक्तित्व चाहिए। यह सत्य है, परंतु मौजूदा उदाहरणों और खांचों के बरक्स सटीक नहीं बैठता। यह बिल्कुल परम सत्य है कि गांधीजी ने जिस धीमी किंतु स्थायी लड़ाई अपनी जीत के लिए चुनी थी, वह आसान नहीं थी। और यह भी सत्य है कि गांधी महज देश को आजाद कराने की कोई भी पंगू जंग नहीं लडऩा चाहते थे। वे तो संपूर्ण मानव को स्वतंत्र, नैतिक, विचारोत्पादकता से भरी कर्म प्रधान सोच देना चाहते थे। इसकी ही प्रक्रिया में देश खुदबखुद आजाद हो जाता।
और पुस्तक में गांधी पर समर्पित सिनेमा की कुछ चुनिंदा फिल्मों की चर्चा में कुछ कंजूसी हो गई। बैन किंज्सले का गांधी बनना कई बार लेखक को अखरा है, किंतु वह विकल्प न देने की टीस से यह आरोप सतह पर नहीं लगाता। आमिर खान की सत्यमेव जयते की कड़ीवार चर्चा सामान्य सी बात है। इसमें विषयानुकूलता कमतर जान पड़ती है। यह कहना सही भी है कि आमिर के इस कार्यक्रम में गांधी की 80 साल पुरानी सोच भी परिलक्षित होती है, किंतु कहीं भी कार्यक्रम में इस बात का श्रेयीकरण नहीं किया गया।
किसी का कोई भी विचार तब तक ही क्रिया और प्रतिक्रिया से परे है, जब तक कि वह विचार रखने वाले के जेहन की कैद में है। और तब तक भी वह महफूज हो सकता है जब तक कि वह इसे नॉनरिकॉर्ड माध्यमों से अभिव्यक्त करता है, लेकिन जैसे ही वह रिकॉर्ड माध्यमों का सहारा लेकर अभिव्यक्त होता है, तो वह क्रिया और प्रतिक्रिया के मुहाने पर आ खड़ा होता है। इस बात को यकीनी तौर पर मानते हुए यह कहना गलत न होगा कि सत्य मेव जयते में एंकर की मुक्तकंठ से तारीफ करते हुए लेखक मंत्रमुज्ध है, किंतु छोटे परदे की हसीन स्वप्न गलियां दिखाने वाला साकार तरीका कौन बनेगा करोड़पति को आधी पंक्ति में खत्म कर देता है। जैसा कि कहा जा चुका है विचार जेहन में है तभी तक क्रिया और प्रतिक्रियाओं की सूलियों से महफूज है, साकार होकर वह इनसे मुक्त नहीं रह सकता। नतीजतन लेखक का यह पूर्वाग्रह अजीब सा लगता है।
इस सबके बाद। अतिश्रेष्ठ बात। पहली तो 100 साल के इस सिनेमा और 150 साल के गांधी के बीच इत्तेफाक से निकाले गए साम्य अद्भुत हैं। मसलन फाल्के और गांधी का जन्म वर्ष एक होना, दोनों को अपने क्षेत्रों में सक्रिय होने का वक्त कमोबेश एक होना आदि आदि। दूसरी बात पुस्तक इस बात की ताकीद करती है कि 100 बरस के सिनेमा वाले दुनिया के दूसरे सबसे बड़े फिल्म उद्योग में अबतक सिनेमा पर कोई समग्र किताब हिंदी में नहीं लिखी गई। तीसरी फिल्मों की मूलभूत जानकारी पाठ्यक्रमों में शामिल करने जैसी बातें सुखद एहसास जैसी हैं। चौथी मनोरंजन उद्योग को नवक्रांत और उत्साह का जरिया सा महसूस करना भी लेखक का दूरगामी विजन और नजरिया है।
अंत में सबसे अच्छी बात कि पूरी किताब इस बात को कहती है बल्कि यूं कहें कि पुख्तगी से कहती है कि मनोरंजन भी रोटी की तरह अनिवार्य है। इसके अभाव में आदमी भूख की तरह शरीर से नहीं मरता लेकिन विचारों और रचनात्मकता से वह कौमा में रहता है। कौमा इसलिए कि वह रचनात्मकता को समझता है, सुनता है, अच्छा मानता है किंतु स्वयं में नहीं पनपा पाता। और किसी भी मनोरंजन माध्यम पर लिखी पुस्तक का यह राष्ट्र विचार होना भी चाहिए। और शायद इसीलिए सालों से मध्यम वर्ग में टीवी को परीक्षा के समय पूरी तरह से डिस्कनेक्ट करने की परंपरा है। कई घरों में तो केबल तक कटवा दिए जाते हैं। और कुछ लोगों का तो यहां तक आरोप है कि अच्छी फिल्में और कार्यक्रम भी इसी दौर में टीवी वाले दिखाते हैं। जैसे कहीं संसार में कोई एक विचार का टीवी वाला बैठा, जैसे साइकल पर कोई कुल्फी वाला कुल्फियां बेचने की लंबी टेर लगा रहा है और घरों में बैठे बच्चे ललचा रहे हैं। और इनके घरों में टीवी वाला बच्चों को भ्रमित करने वाले कार्यक्रम चला रहा है। अच्छा यह सिलसिला यहीं नहीं थमता, आगे चलकर दूरदर्शन भाई सबके बाप साबित होते हैं, वे मनोरंजन को इतना दूर धकेल देते हैं, कि प्रकांड टीवी दर्शक भी उनकी बातों को अपलक देखे तो ही समझ पाए। वे इतनी कठिन विषय वस्तु पेश करते हैं, मसलन ज्ञानदर्शन पर कठिनतम विज्ञानी प्रयोगों को अधिकतम किस्सागोई से परे करके। अरोचक ढंग से।
वरुण के सखाजी
(गांधी और सिनेमा पुस्तक जयप्रकाश चौकसे, फिल्म और भारतीय सामाजिक आदत, दर्शन, विचार और रवैया पर गहराई से चिंतन करने वाले शख्स द्वारा लिखी गई है।)

गांधीजी का होना और फिल्मों का विकास यह दोनों ही घटनाएं एक भारत में अलग-अलग हैं। किंतु यह लेखक की कामयाबी है कि वह इन्हें आपस में जुड़ी सी साबित कर पाया है। दरअसल लेखक यह दावा भी नहीं करता कि गांधीजी फिल्मों को लेकर कोई भी दृष्टि रखते ही थे, और यह भी नहीं कहता कि वे फिल्मों से दूर थे। गांधी के समकाल में बन रहीं फिल्मों में उनके दर्शन और विचार की परोक्ष या अपरोक्ष गं्रथि पुस्तक गांधी और सिनेमा की अधोसंरचना तय करती है। अंत में लेखक एक साधारण पंक्ति में यह स्वीकार भी कर लेता है, कि गांधीजी का फिल्म को लेकर कोई विचार नहीं था। कई बार ऐसा भी महसूस होता है कि गांधी और नेहरू की सोच में संयुक्तता सी है। कला के प्रेमी और नम्र स्वभाव के जादूगर नेहरू का फिल्मों की तरफ सहज रुझान था, लेखक इस बात का जिक्र करके गांधीजी की विचारधारा के प्रतिनिधि के रूप में नेहरू का बहुत ही सफाई से प्रतिपादित करता है। लगभग 200 पेजों की इस रोमांचक यात्रा में यह जानने कि गांधी फिल्म को लेकर क्या सोचते थे, से ज्यादा रुचि इस बात की जागती है कि समकालीन फिल्म जगत में स्वतंत्रता के लिए झगड़े, लड़ाइयां या सतत संग्राम कितना रिफ्लैक्ट हो रहा था। इस बात को बताने में पुस्तक कामयाबी की पराकाष्ठा छूती है।
सिनेमाई विविध और देश का सियासी सांचा किसी देशकाल में मेल नहीं खाता। किसी राजनैतिक घटना पर एकदम सत्य स्वरूपित कोई फिल्म बनना मुमकिन भी नहीं, तभी प्रतीक और घटनाओं में समानता को पेश किया जाता है। पुस्तक की यात्रा में लेखक एक विचार को एकाधिक बार कहता है वह है इस विविधता प्रधान देश को चलाने के लिए कोई चमत्कारिक व्यक्तित्व चाहिए। यह सत्य है, परंतु मौजूदा उदाहरणों और खांचों के बरक्स सटीक नहीं बैठता। यह बिल्कुल परम सत्य है कि गांधीजी ने जिस धीमी किंतु स्थायी लड़ाई अपनी जीत के लिए चुनी थी, वह आसान नहीं थी। और यह भी सत्य है कि गांधी महज देश को आजाद कराने की कोई भी पंगू जंग नहीं लडऩा चाहते थे। वे तो संपूर्ण मानव को स्वतंत्र, नैतिक, विचारोत्पादकता से भरी कर्म प्रधान सोच देना चाहते थे। इसकी ही प्रक्रिया में देश खुदबखुद आजाद हो जाता।
और पुस्तक में गांधी पर समर्पित सिनेमा की कुछ चुनिंदा फिल्मों की चर्चा में कुछ कंजूसी हो गई। बैन किंज्सले का गांधी बनना कई बार लेखक को अखरा है, किंतु वह विकल्प न देने की टीस से यह आरोप सतह पर नहीं लगाता। आमिर खान की सत्यमेव जयते की कड़ीवार चर्चा सामान्य सी बात है। इसमें विषयानुकूलता कमतर जान पड़ती है। यह कहना सही भी है कि आमिर के इस कार्यक्रम में गांधी की 80 साल पुरानी सोच भी परिलक्षित होती है, किंतु कहीं भी कार्यक्रम में इस बात का श्रेयीकरण नहीं किया गया।
किसी का कोई भी विचार तब तक ही क्रिया और प्रतिक्रिया से परे है, जब तक कि वह विचार रखने वाले के जेहन की कैद में है। और तब तक भी वह महफूज हो सकता है जब तक कि वह इसे नॉनरिकॉर्ड माध्यमों से अभिव्यक्त करता है, लेकिन जैसे ही वह रिकॉर्ड माध्यमों का सहारा लेकर अभिव्यक्त होता है, तो वह क्रिया और प्रतिक्रिया के मुहाने पर आ खड़ा होता है। इस बात को यकीनी तौर पर मानते हुए यह कहना गलत न होगा कि सत्य मेव जयते में एंकर की मुक्तकंठ से तारीफ करते हुए लेखक मंत्रमुज्ध है, किंतु छोटे परदे की हसीन स्वप्न गलियां दिखाने वाला साकार तरीका कौन बनेगा करोड़पति को आधी पंक्ति में खत्म कर देता है। जैसा कि कहा जा चुका है विचार जेहन में है तभी तक क्रिया और प्रतिक्रियाओं की सूलियों से महफूज है, साकार होकर वह इनसे मुक्त नहीं रह सकता। नतीजतन लेखक का यह पूर्वाग्रह अजीब सा लगता है।
इस सबके बाद। अतिश्रेष्ठ बात। पहली तो 100 साल के इस सिनेमा और 150 साल के गांधी के बीच इत्तेफाक से निकाले गए साम्य अद्भुत हैं। मसलन फाल्के और गांधी का जन्म वर्ष एक होना, दोनों को अपने क्षेत्रों में सक्रिय होने का वक्त कमोबेश एक होना आदि आदि। दूसरी बात पुस्तक इस बात की ताकीद करती है कि 100 बरस के सिनेमा वाले दुनिया के दूसरे सबसे बड़े फिल्म उद्योग में अबतक सिनेमा पर कोई समग्र किताब हिंदी में नहीं लिखी गई। तीसरी फिल्मों की मूलभूत जानकारी पाठ्यक्रमों में शामिल करने जैसी बातें सुखद एहसास जैसी हैं। चौथी मनोरंजन उद्योग को नवक्रांत और उत्साह का जरिया सा महसूस करना भी लेखक का दूरगामी विजन और नजरिया है।
अंत में सबसे अच्छी बात कि पूरी किताब इस बात को कहती है बल्कि यूं कहें कि पुख्तगी से कहती है कि मनोरंजन भी रोटी की तरह अनिवार्य है। इसके अभाव में आदमी भूख की तरह शरीर से नहीं मरता लेकिन विचारों और रचनात्मकता से वह कौमा में रहता है। कौमा इसलिए कि वह रचनात्मकता को समझता है, सुनता है, अच्छा मानता है किंतु स्वयं में नहीं पनपा पाता। और किसी भी मनोरंजन माध्यम पर लिखी पुस्तक का यह राष्ट्र विचार होना भी चाहिए। और शायद इसीलिए सालों से मध्यम वर्ग में टीवी को परीक्षा के समय पूरी तरह से डिस्कनेक्ट करने की परंपरा है। कई घरों में तो केबल तक कटवा दिए जाते हैं। और कुछ लोगों का तो यहां तक आरोप है कि अच्छी फिल्में और कार्यक्रम भी इसी दौर में टीवी वाले दिखाते हैं। जैसे कहीं संसार में कोई एक विचार का टीवी वाला बैठा, जैसे साइकल पर कोई कुल्फी वाला कुल्फियां बेचने की लंबी टेर लगा रहा है और घरों में बैठे बच्चे ललचा रहे हैं। और इनके घरों में टीवी वाला बच्चों को भ्रमित करने वाले कार्यक्रम चला रहा है। अच्छा यह सिलसिला यहीं नहीं थमता, आगे चलकर दूरदर्शन भाई सबके बाप साबित होते हैं, वे मनोरंजन को इतना दूर धकेल देते हैं, कि प्रकांड टीवी दर्शक भी उनकी बातों को अपलक देखे तो ही समझ पाए। वे इतनी कठिन विषय वस्तु पेश करते हैं, मसलन ज्ञानदर्शन पर कठिनतम विज्ञानी प्रयोगों को अधिकतम किस्सागोई से परे करके। अरोचक ढंग से।
वरुण के सखाजी
(गांधी और सिनेमा पुस्तक जयप्रकाश चौकसे, फिल्म और भारतीय सामाजिक आदत, दर्शन, विचार और रवैया पर गहराई से चिंतन करने वाले शख्स द्वारा लिखी गई है।)

जिज्ञासा(JIGYASA) : सेन राजवंश

Written By mark rai on सोमवार, 12 नवंबर 2012 | 9:06 pm

जिज्ञासा(JIGYASA) : सेन राजवंश: पाल वंश के पतन के बाद सेन राजवंश ने बंगाल में शासन स्‍थापित किया। इस राजवंश के स्‍थापक सामंत सेन थे। इस राजवंश के महानतम शासक विजय सेन थे। ...

भगवान किसका ?

Written By safat alam taimi on बुधवार, 7 नवंबर 2012 | 4:43 pm


भारत वह देश है जहां विभिन्न विश्वास रखने वाले लोग विधमान हैं. इसके बावजूद वे परस्पर मिलजुल कर रहते हैं और यही इस देश की सराहनीय विशेषता है. लेकिन कभी कभी ऐसी दुर्घटनाएं भी सामने आती हैं जो प्रश्न चिन्ह खड़ा कर देती हैं. ऐसा नहीं है कि यह घटना अचानक उत्पन्न होती है, बल्कि उनका प्राचीन पृष्ठभूमि है. इसी प्रकार की एक घटना झुंझुनूं में खेतड़ी थाना क्षेत्र के बड़ाऊ गांव का है. जहां दलित जाति के दो नवविवाहित जोड़ों को मंदिर से धक्केमार कर बाहर निकालने का मामला प्रकाश में आया है। पीड़ितों का आरोप है कि विरोध करने पर उनके साथ गाली गलौच भी किया गया. इस संबंध में मंदिर के पुचारी एवं तीन महिलाओं सहित 8 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। पुलिस ने बताया कि बड़ाउ गांव का निवासी अशोक कुमार मीघवाल और छोटे भाई गुलाब की बारात माधव गढ़ गई थी. 25 अक्तूबर को वे शादी कर के लौटे 26 अक्तूबर की सुबह लगभग 10 बजे दोनों नवविवाहित जोड़े धोक लगाने गांव के मंदिर गए। मंदिर में पुजारी घीसाराम स्वामी सहित कुछ लोगों ने उनको पूजा अर्चना करने से रोका. नवविवाहित जोड़ों और उनके साथ आए लोगों ने जब इस बात का विरोद्ध किया तो पुजारी और अन्य लोगों ने उनके साथ गाली गलौच की और धक्के मार कर मंदिर से बाहर निकाल दिया।
रविवार रात इस सिलसिले में पीड़ित अशोक कुमार मेघवाल ने मंदिर के पुजारी घीसाराम स्वामी, गंगा स्वामी, अनिल स्वामी, पप्पू शर्मा तथा सियाराम स्वामी के साथ ही महिलाओं के खिलाफ मामला दर्ज कराया. इस मामले में फिलहाल किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है. पुलिस मामले की जांच कर रही है.
घटना की पृष्ठभूमि में यह बड़ा सवाल उठता है कि मंदिरों में "भगवान" किसके हैं? मानव के या विशेष वर्ग के? जब आस्था द्वार आप हिंदू हैं और वह भी जिनको धक्के मार कर बाहर किया जा रहा है तो ऐसा मआमला क्यों ? पता यह चला कि यह "भगवान" हिंदुओं के नहीं बल्कि विशेष जाति के हैं जो दिन रात उनकी सेवा में लगे रहते हैं. जिनको चाहें पूजा करने की अनुमति दें और जिनको चाहें पूजा करने से रोक दें।
ऐसी ही स्थिति में इस्लाम की ज़रूरत महसूस होती है जो यह नारा देता है कि प्रत्येक मानव का पैदा करने वाला एक है और एक ही माता पिता से सब की रचना हुई है। ईश्वर भी एक और माता पिता भी एक...तो फिर जातिवाद क्यों कर। इस्लाम सारे संसार का धर्म है जहाँ कोई भेदभाव नहीं। जो हर प्रकार के जातिवाद का खंडन करता है। जो इनसान के माथा का भी सम्मान करता है कि इसे मात्र अपने रचयिता और पालनकर्ता के सामने टेका जाए किसी अन्य के सामने नहीं।    

Life is Just a Life: पिता: एक आकाश Pita: A Sky

Written By Neeraj Dwivedi on मंगलवार, 6 नवंबर 2012 | 2:45 pm

Life is Just a Life: पिता: एक आकाश Pita: A Sky: कुछ सर्द लम्हों   की किताबें, जिन्दगी   गाती रही, उसके बाल भी पकते रहे और  झुर्रियां चढती रही। फ़िर चाहे रात दिन  खटता रहा हो  बाप ...

.WELCOME RAHUL JI AS CONGRESS PARTY NEW WORKING PRESIDENT.

Written By shikha kaushik on बुधवार, 31 अक्तूबर 2012 | 9:39 pm



.WELCOME  RAHUL JI AS CONGRESS PARTY NEW WORKING PRESIDENT.

RAHUL GANDHI WITH A VISION FOR COMMON PEOPLE
[http://www.facebook.com/pages/RAHUL-GANDHI-WITH-A-VISION-FOR-COMMON-PEOPLE]

YESTERDAY I WAS SURE THAT SHRI RAHUL GANDHI WOULD TAKE OATH AS A CABINET MINISTER BUT HE DID'NT .ONE THING IS CERTAIN THAT ONLY A LEADER LIKE RAHUL JI CAN DO SO IN PRESENT INDIAN POLITICS .HE HAS CHOSEN THE PATH OF PUBLIC SERVICE DIRECTLY .RAHUL JI HAS PROVED AGAIN THAT WHY IS HE AN IDEAL LEADER .HE IS REALLY A YOUTH ICON .HE PREFERS TO STRENGTHEN PARTY ORGANIZATION .MESSAGE IS CLEAR HE BELIEVES IN HARD WORK .I APPRECIATED HIS BOLD DECISION AND CONGRATULATE HIM FOR HIS FIRM DETERMINATION .RAHUL JI HAS GIVEN RIGHT ANSWER TO OPPOSITION'S IRRELEVANT ALLEGATIONS THAT GANDHI FAMILY IS HUNGRY FOR POWER .
                                               I PRAY INDIA MUST ACHIEVE NEW HEIGHTS OF PROGRESS IN HIS GREAT LEADERSHIP .WELCOME  RAHUL JI AS CONGRESS PARTY NEW WORKING PRESIDENT.


[[http://www.facebook.com/pages/RAHUL-GANDHI-WITH-A-VISION-FOR-COMMON-PEOPLE]

IF INDIAN POLITICS IS A VAST DESERT 
HE IS A DROP OF WATER .

[यदि भारतीय राजनीति एक विशाल रेगिस्तान है 
तो राहुल जी जल की एक बूँद  है ]

IF INDIAN POLITICS IS DARK NIGHT 
HE IS A SHINING STAR.

[यदि भारतीय राजनीति एक अँधेरी निशा है 
तो राहुल जी एक चमकता हुआ सितारा हैं ]

IF INDIAN POLITICS IS AUTUMN 
HE IS SPRING .

[यदि भारतीय राजनीति पतझड़ है 
तो राहुल जी बसंत  हैं ]

IF INDIAN POLITICS IS A KINGDOM 
HE IS THE KING .

[यदि भारतीय राजनीति एक साम्राज्य है 
तो राहुल जी राजा हैं ]

IF INDIAN POLITICS IS AN OYSTER 
HE IS A PEARL .

[यदि भारतीय राजनीति एक सीप है 
तो राहुल जी मोती हैं ]

HE IS SENSIBLE ,HONEST AND PATIENT 
I AM HIS ADMIRER , DO'NT THINK ME SYCOPHANT .

[राहुल जी समझदार हैं ,ईमानदार हैं  और धैर्यवान हैं ,
मैं उनकी प्रशंसक हूँ ,मुझे चापलूस न समझें ]

                                                   JAY HIND ! JAY BHARAT 
                                                     SHIKHA KAUSHIK 

जिज्ञासा(JIGYASA) : अजंता के अंदर जो मानव और जंतु रूप चित्रित किए गए ह...

Written By mark rai on रविवार, 28 अक्तूबर 2012 | 5:09 pm

जिज्ञासा(JIGYASA) : अजंता के अंदर जो मानव और जंतु रूप चित्रित किए गए ह...: यूनेस्‍को द्वारा 1983 से विश्‍व विरासत स्‍थल घोषित किए जाने के बाद अजंता और एलोरा की तस्‍वीरें और शिल्‍पकला बौद्ध धार्मिक कला के उत्‍कृष्‍ट ...

मसाल

Written By बरुण सखाजी on बुधवार, 24 अक्तूबर 2012 | 10:27 pm

लेकर मसाल हाथ में,
चिन्गारियों का ख्याल साथ में,
भींचकर मु_ियां मैं रावण खोजता हूं।
रिमझिम सा बूंदों से बना
इल्जामों का सावन खोजता हूं।
- सखाजी

रावण ने लगाई पीआईएल

,
रावण ने लगाई पीआईएल
कइयों को हो गई जेल
वकीलों के कोट फट गए
अफसर फिर जैसे कह कर नट गए
जज बोला रावण सही
उसने अच्छी बात कही
न जलाओ मुझे बार
कि जलन होती है वदन में
अगर जलाना है तो मन से
जलाओ क्यों रखते हो मुझे मन में
हू हू हू करके चिल्लाते हो
दशहरा मैदानों को कब्जाते हो
मुझे करते हो बदनाम
खुद ही तो रावण से लच्छन बताते हो
सदियों से देख रहा था
कोई मंच नहीं मिल रहा था
मीडिया को बुलाया तो कोई नहीं आया
सबने मेरे नाम का दशहरे पर खूब खाया
तब कोर्ट में आया हूं
वहां भी पर्सनल केस नही लगा पाया हूं
तब मिला मुझे विधुर सा वकील
तो मैं आ गया भारत को कोर्ट में
लगा दी है पीआईएल
देखता हूं क्या होता है इसका हाल
- सखाजी

खुशी-खुशी खुशी को अपना लिया

खुशी-खुशी खुशी को अपना लिया
दफ्न कर गमों को झुठला दिया
कब्र में मगर भूल गया नमक डालना
लौटकर भुतहा सा रूह ने कंपा दिया
दफ्न गमों का पिंजर न गल सका
अक्ल में फिर-फिर वह आ खड़ा
महफूज नहीं इन खुशियों के बीच भी
अफसोस फिर भी खुश नहीं ताउम्र
अटपटा लगे, तो न कहना
यह दस्तूर ए जहां है
चाहो खुशी तो मिलती है वो जरूर
पर मगर गमों के चादर में लिपटी हुई
अस न बस खोलोगे खुशी फिर भी गमों को उकेर कर।
-सखाजी

Life is Just a Life: जीवन - एक तारा Jeevan - ek tara

Life is Just a Life: जीवन - एक तारा Jeevan - ek tara: जीवन अनजानी  राहों पर  चलता एक  तारा है , कब टूट  गिरे मर  जाये पर  सबको  प्यारा है। नहीं दिशा का ज्ञान जरा भी , नहीं ज्ञात है  ल...

यही मेरा भारत ( तांका )

राम का पात्र 
मुहम्मद ने खेला 
रामलीला में 
यही ढंग यहाँ का 
यही मेरा भारत ।

***********

कब निखरेगा ये बछड़ा

Written By बरुण सखाजी on बुधवार, 17 अक्तूबर 2012 | 12:39 pm

किसान अपने बछड़े को बैल बनाने से पहले दो युक्तियां करता है। पहली तो मैं बता नहीं सकता दूसरी निखारने की। इसके लिए वह नाथ डालकर बछड़े को बलात बैलगाड़ी में लगाकर खेतों में घुमाता है। पूरा गांव उस गाड़ी के पीछे मजे करता घूमता है। खासकर बच्चे। और जब बछड़ा नहीं निखरता तो दूसरी युक्ति के रूप में उसके गले पर बेवजह एक लकड़ी डाल दी जाती है, ताकि उसकी आदत है। तब भी नहीं निखरता तो बछड़े को खेत में गहरे हल गड़ाकर निखारा जाता है। और फिर भी नहीं निखरा तो किसान उसे गर्रा कहकर बेचने की कवायद में जुट जाता है। और कई बार वह कसाइयों के हात्थे भी चढ़ जाता है। मोरल ऑफ द स्टोरी श्रमवीर, कर्मवीर बनो वरना कसाई के चाक पर गर्दन रखो। संसार कहता है कर्म करो या मरो।
ऐसा ही राहुल बाबा के साथ सोनिया कर रही हैं। उन्हें 25 साल के बाद तो निखारने के लिए मना पाईं। फिर लोकसभा के आम चुनाव 2009 में नाथ डाली गई। पहला काम जो किसान करता है वह तो शादी के इतने लेट होने से अपने आप हो गया। (एक विधि से किसान बछड़े का मर्दानापन कम करता है)। फिर उन्हें रिएक्टिवेट करके बैलगाड़ी में नुहाया (लगाया) गया। यानी महासचिव बनाया गया। फिर भी नहीं निखरे तो यूपी में प्रपंच करवाया गया। फिर भी नहीं निखर रहे तो अब सोनिया उन्हें केबिनेट में लाने की तैयारी में हैं। पीएम सीधे न सही तो बेटा केबिनेट में अंकल लोगों से कुछ सीखकर बिजनेस में हाथ बटा। मगर राहलु बाबू हैं कि चिगते (हिलते) ही नहीं है। अब किसान करे तो क्या। कसाई को बेचेगा तो भगवान मार डालेंगे, नहीं तो जिंदगीभर खिलाएगा तो बोझ पड़ेगा। और फिर बछड़ा बड़ा होकर दो लाइन में किसी एक में जाता है, पहली तो किसान के साथ बैल बन कर सालों सेवाओं के बाद ससम्मान सेवनिवृत्ति की तरफ जाती है। कुछ-कुछ आदमी के नौकरी करने जैसा। और दूसरी लाइन सांड बनने की होती है, यह रिस्की है किंतु मजेदार है। इसमें भी एक लाभ है अगर सांड के रूप में आपकी पोस्टिंग गांव में हुई तब तो लोग पूज भी सकते हैं और पेट भी पाल लेंगे, लेकिन अगर शहर में हुई तो समस्या होगा, यहां तो सब्जियों के ठेलों पर लट्ठ ही मिलते हैं। और गाहेबगाहे मौका मिलते ही सकाई भी लपक सकते हैं। अब राहुल बाबा को सोनिया सियासी सेवानिवृत्ति तो देंगी नहीं। केबिनेट में और लाकर देखती हैं, अगर वे सुबह जल्दी उठकर मंत्रालय (मनी फैक्ट्री) जाने लगे तो ठीक वरना फिर किसान को खेती के लिए अपनी दूसरी बछिया पर निर्भर रहना पड़ेगा, वह खेतों में जा नहीं सकेगी तो फिर कौन बचा.....वा.......ड्रा ! वरुण के सखाजी

वक्त


वक्त के पन्ने उड़ते जाते हैं.
जो लिखे नहीं, खाली रह जाते हैं.
वक्त के पन्ने उड़ते जाते हैं.

आंधीया तो गुजरी हैं, मेरे भी घर से.
कुछ चिराग हैं, फिर भी जले रह जाते हैं.
वक्त के पन्ने उड़ते........

मैने तो कुछ पन्ने सिर्फ काले किये.
वो खुदा ही हैं, जो कुछ कह जाते हैं.
वक्त के पन्ने उड़ते........

बड़ी मुद्दत के बाद ये यकीं हुआ हैं.
पराये शहर में, अपने भी मिल जाते हैं.
वक्त के पन्ने उड़ते........


जिज्ञासा(JIGYASA) : हाइड्रोकार्बन क्षेत्र के सामने बहुत चुनौतियां हैं....

Written By mark rai on मंगलवार, 16 अक्तूबर 2012 | 2:29 pm

जिज्ञासा(JIGYASA) : हाइड्रोकार्बन क्षेत्र के सामने बहुत चुनौतियां हैं....: सरकार कोयला खानों से निकलने वाली मिथेन गैस, शेल गैस, भूमिगत कोयला गैस और जैव ईंधनों आदि की पूरी क्षमता का उपयोग करने को प्राथमिकता दे रही ह...

जिज्ञासा(JIGYASA) : इन्सैट प्रणाली की क्षमता का संवर्धन

Written By mark rai on रविवार, 14 अक्तूबर 2012 | 5:34 pm

जिज्ञासा(JIGYASA) : इन्सैट प्रणाली की क्षमता का संवर्धन: जीसैट-12, इसरो द्वारा निर्मित नवीनतम संचार उपग्रह का भार उत्थापन समय में लगभग 1410 कि.ग्रा. है। जीसैट-12 का संरूपण कम प्रत्यावर्तन समय में द...

जिज्ञासा(JIGYASA) : राष्ट्रीय ई- शासन योजना

Written By mark rai on गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012 | 7:26 pm

जिज्ञासा(JIGYASA) : राष्ट्रीय ई- शासन योजना: राष्ट्रीय ई- शासन योजना (एनईजीपी)के अंतर्गत देशभर में ई-शासन के लिए की जा रही कार्रवाई का एक सामूहिक विचार, एक साझा विषय के रूप में एकीकृत क...

Life is Just a Life: मरते हुये दीप की आशा Marte Huye Deep Ki Asha

Written By Neeraj Dwivedi on बुधवार, 10 अक्तूबर 2012 | 10:27 pm

Life is Just a Life: मरते हुये दीप की आशा Marte Huye Deep Ki Asha: इस मरते हुये दीप की आशा , चल लेकर भाग चलें। निःशब्द हवाएँ व्याकुल अंकुर , शब्दों के इस बहिर्जाल में , भाव हुये सुने क्षणभंगुर ,...

जिज्ञासा(JIGYASA) : वेनेज़ुएला की जनता ने ह्यूगो चावेज़ के नेतृत्व में...

Written By mark rai on मंगलवार, 9 अक्तूबर 2012 | 2:42 pm

जिज्ञासा(JIGYASA) : वेनेज़ुएला की जनता ने ह्यूगो चावेज़ के नेतृत्व में...: वेनेज़ुएला में 1958 से लोकतांत्रिक सरकार थी और देश की दो मुख्य पार्टियों पर लगातार भ्रष्टाचार और तेल संसाधनों के ग़लत इस्तेमाल के आरोप लगते ...

Life is Just a Life: देश अपना मर रहा है Desh Apna Mar raha hai

Written By Neeraj Dwivedi on सोमवार, 8 अक्तूबर 2012 | 9:44 am

Life is Just a Life: देश अपना मर रहा है Desh Apna Mar raha hai: चल रही शब्दों  की  कोशिश , अर्थ  देखो डर रहा है , तुम मगर  समझे न समझे , देश अपना मर रहा है। कुछ कार्टूनों की नजर में , संविधान सड़...

ग़ज़लगंगा.dg: अंधी नगरी चौपट राजा

Written By devendra gautam on शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2012 | 11:21 pm

राखे बासी त्यागे ताज़ा.
अंधी नगरी चौपट राजा.

वो देखो लब चाट रहा है
खून मिला है ताज़ा-ताज़ा.

फटे बांस के बोल सुनाये
कोई राग न कोई बाजा.

अंदर-अंदर सुलग रही है
इक चिंगारी, आ! भड़का जा.

बूढा बरगद बोल रहा है
धूप कड़ी है छावं में आ जा.

जाने किस हिकमत से खुलेगा
अपनी किस्मत का दरवाज़ा.

हम और उनके शीशमहल में?
पैदल से पिट जाये राजा?

वक़्त से पहले हो जाता है
वक़्त की करवट का अंदाज़ा.

---देवेंद्र गौतम

Read more: http://www.gazalganga.in/2012/09/blog-post_30.html#ixzz28SheNRrv

ग़ज़लगंगा.dg: अंधी नगरी चौपट राजा:

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जिज्ञासा(JIGYASA) : 'गुरिल्ला ट्रेक'

जिज्ञासा(JIGYASA) : 'गुरिल्ला ट्रेक': अमरीकी लेखक अलोंजो लियोंस के साथ निकाली गई इस किताब में एक नक्शा भी है.इस गाइड में उन पहाड़ों, गुफाओं, गाँवों और नदियों का जिक्र है जहाँ एक ...

Life is Just a Life: तब तक भाग्य नहीं बदलेगा Tab tak bhagy nahi badlega...

Life is Just a Life: तब तक भाग्य नहीं बदलेगा Tab tak bhagy nahi badlega...: जब तक  भारत का  आँसू , बस केवल  आँसू बना रहेगा , जब तक  आर्द भाव का  झोंका , केवल झोंका बना रहेगा , जब  तक  भारत का  टुकड़ा , केवल टु...

खबरगंगा: पछताते रह जायेंगे .

Written By devendra gautam on गुरुवार, 4 अक्तूबर 2012 | 4:34 pm

... चलिए एक कहानी सुनाती हूँ ..एकदम सच्ची कहानी..एक बिटिया और उसके पापा की कहानी ..मेरी दादी कहा करती  थी कि हमारे खानदान की  परंपरा है 'पान खाना'. ख़ुशी का मौका हो या गम का, 'पान खाना' ही पड़ता .परीक्षा देने जाना हो, यात्रा करनी हो, शुभ काम होनेवाला हो या  हो चूका हो, लगभग  हर मौके पर 'पान' हाज़िर होता .बाबा और दादी तो बड़े शौक से पान खाते थे. ये उनकी दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा था.दादी तो बाकायदा  पान मंगवाती.. साफ़ करती ... अपने साफ़-सफ़ेद बिस्तर (जिनपर हमारा चढ़ना मना था) पर सूखाती ..काटती  - छांटती ....कत्था पकाती..पान लगाती .. खाती और खिलाती..बचपन में हमें भी पान खूब पसंद आया करता. असल में इसे खाने के बाद जीभ एकदम लाल हो जाती. हम बच्चों को बहुत मज़ा आता. बात इन खुशिओं तक  सीमित  रहती तो अच्छा था पर  'अति सर्वत्र वर्ज्यते' यू ही नहीं कहा गया. अत्यधिक जर्दा के घुसपैठ ने 'पान खाने' जैसी परंपरा को भयावह रूप दे दिया.और हमने अपने पापा को खो दिया .. 
जैसा कहा मैंने 'पान खाना' हमारे खानदान कि अभिन्न परंपरा थी. पापा भी पान खाया करते . हाँ, उनके पान में जर्दा (तम्बाकू) की मात्रा बहुत ज्यादा होती थी.मम्मी मना करती पर वो नहीं मानते. मम्मी ने हम बच्चो से भी कहा कि पापा को जर्दा मत खाने दो.अब  हमारे लिए ये एक खेल बन गया.  पापा के जर्दा (तम्बाकू) का डिब्बा अक्सर छिपा दिया करते थे ..पापा हमसे मांगते...हम भी मनुहार करवाते, पर दे देते ...जर्दा (तम्बाकू) की मात्रा कम करने का हमारा आदेश होता  ..पापा भी  दिखाने  के लिए मान जाते, कहते आज खाने दो, कल से नहीं खायेंगे...हम भी खुश और पापा भी खुश . .देखते ही देखते समय निकलता गया.पापा का पान और जर्दा (तम्बाकू) खाना नहीं छूटा. हम बड़े हो गए...व्यस्तताएं बढ़ गयी...पापा को बार बार टोकना बंद हो गया..पर कभी-कभार जरुर शोर मचाते ..मम्मी की तबीयत ख़राब रहने लगी.उनको लेकर हम बहुत परेशां रहते..बार-बार खून चढ़ाना, जगह-जगह दिखाना...पापा पर ध्यान देना थोडा कम हो गया था...इसी बीच पापा के भी मूह में दर्द रहने लगा...आशंका हुई पर बेटी का मन, गलत बातो को क्यों कर मान जाता .अब  पापा ने  पान खाना छोड़ दिया, पर तबतक बहुत देर हो चुकी थी. एक दिन उन्हें जबरदस्ती  डॉक्टर के पास ले जाया गया. उसने देखते ही कह  दिया -इन्हें ओरल कैंसर है. पटना में बायोप्सी  करा ले .कैंसर ही निकला. हालाँकि मन ये मानने को तैयार ही नहीं था. अब भी लग  रहा था कि रिपोर्ट झूठी है .  यकीं था , पापा ठीक हो जायेंगे.  असल में उन्हें कभी बड़ी बीमारी से जूझते नहीं देखा था. और हमारे लिए तो वो 'सुपरमैन' थे , उन्हें क्या हो सकता था .

खैर , महानगरो की दौड़ शुरू हुई . कई अस्पतालों के चक्कर काटे गए. पता चला कि फीड-कैनाल में भी  कैंसर है, फेफड़ा भी काम नहीं कर रहा. डॉक्टर ने बताया कि 'ओपरेशन' और 'कीमो' नहीं हो सकता.' रेडियेशन'  ही एकमात्र उपाय है . सेकाई शुरू हुई, पापा कमज़ोर होने लगे. खाना छूट गया.' लिक्विड  डायट' पर रहने लगे. रेडियेशन पूरा होने के बाद गले का कैंसर ठीक हो गया पर 'ओरल'  ने भयावह  रूप ले लिया. डॉक्टरों  ने भी हाथ खड़े कर लिए. बीमारी बढ़ने लगी.  पहले होठ गलना शुरू हुआ . गाल में गिल्टियाँ  निकलने  लगीं और वो भी गलने लगा. धीरे-धीरे पूरा बाया गाल और दोनों होठ गल गए. घाव नाक तक पंहुचा..साँस लेने में परेशानी होने लगी. खाना पूरी तरह छुट चूका था. शरीर एकदम कमज़ोर हो गया. दावा-दारू काम न आया. ईश्वर ने हमारी 'बिनती' पर  ध्यान नहीं दिया. मित्रो-रिश्तेदारों की शुभकामनाओं की एक न चली. एक दिन  पापा हमें छोड़ कर चले गए. हम अवाक् से थे. सही है कि सबके माता-पिता जाते है पर हम अभी इसके लिए बिलकुल तैयार नहीं थे. वैसे भी 'अडसठ साल' की  उम्र मौत के लिए बहुत ज्यादा नहीं होती, खासतौर पर तब, जब कभी- भी कोई बीमारी न रही हो. पर मौत आयी ..जल्द आयी..समय से पहले आयी, क्यूंकि जर्दा (तम्बाकू)  के सेवन ने उनकी उम्र को दस साल कम कर दिया था. हम रोते रहे, बिलखते रहे, छटपटाते रहे पर क्या हासिल ...पिता का साया उठ जाना बहुत बड़ी बात होती है..हम अनाथ हो गए ..बेसहारा से..

एक साल के अन्दर एक बिटिया के प्यारे से पापा उसे छोड़कर हमेशा के लिए चले गए. पापा के जाने के बाद हर पल याद आया कि कैसे पापा से जर्दा छोड़ देने का  आग्रह करते और पापा हमें फुसला देते ..काश कि पापा ने उसी वक़्त हमारी बाते मान ली होती ... काश कि अपनी बीमारी को बढ़ने न दिया होता.. काश कि... पर 'काश' कहने और सोचने मात्र से कुछ नहीं संभव था . छोडिये, अब  कुछ आंकड़े देखिये --- टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के अनुसार हर साल कैंसर के नए मरीजों की संख्या लगभग सात लाख होती है जिसमे तम्बाकू से होनेवाले कैंसर रोगियों की संख्या तीन लाख है और इससे हुए कैंसर से मरनेवाले मरीजो की संख्या है प्रति वर्ष दो हज़ार है ...बी. बी. सी. के अनुसार भारत में हर दस कैंसर मरीजों में से चार ओरल कैंसर के है..

पापा ने जबतक  'जर्दा' छोड़ा,  समय हाथ से निकल चूका था . पर बाकि लोग ऐसा क्यूँ कर रहे है? क्यूँ अपनी मौत खरीदते और खाते है? कल खबर देखा कि यू. पी. सरकार ने भी गुटखा  (तम्बाकू) प्रतिबंधित कर दिया ...बिहार और देलही में ये पहले से lagu है. इसके अनुसार गुटखा  (तम्बाकू) बनाने, खरीदने  और बेचने पर प्रतिबन्ध है...बावजूद इसके गुटखा (तम्बाकू) खुले आम धड़ल्ले से बेचा-ख़रीदा जाता है...कम से कम अपने राज्य बिहार में तो यही देख रही हूँ...लोग आराम से  खरीदते  है...कोई रोक-टोक नहीं..पाबन्दी नहीं..सरकारे सिर्फ नियम बनाकर कर्त्तव्य पूरा कर देती है.. इसे लागू करने कि उसकी कोई मंशा नहीं होती. तभी तो कही कोई सख्ती नहीं बरती जाती. पुलिस और प्रशाशन के लोग स्वयं इसका सेवन करते है. भाई  लोग,  तम्बाकू का हर रूप हानिकारक है. इसका सेवन करनेवाले अपनी 'मृत्यु' को आमंत्रित करते है.  क्या आप  अपने अपनों से प्यार नहीं करते? फिर  इसकी लत जान से ज्यादा प्यारी कैसे बन जाती है जो  छूटती ही नहीं!  या फिर इच्छाशक्ति का घोर अभाव है, मन से बेहद कमज़ोर, लिजलिजे से हैं . यदि नहीं तो छोड़ दीजिये इस 'आदत' को .  मित्रों  आप तो समझदार है . चेत जाइये.  अरे,   जिम्मेदार नागरिक बने . तम्बाकू का किसी भी रूप में सेवन छोड़े . अपने रिश्तेदारों और मित्रो को भी रोके. कही बिकता देखे तो शिकायत करे . अन्यथा पछताते रह जायेंगे ....
खबरगंगा: पछताते रह जायेंगे .:

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Life is Just a Life: ढलता सूरज dhalta suraj

Written By Neeraj Dwivedi on मंगलवार, 2 अक्तूबर 2012 | 4:08 pm

Life is Just a Life: ढलता सूरज dhalta suraj: डगमगाती चाल , टूटी अस्थियों की ढाल , कुछ बुदबुदाते होंठ , कुछ सहेज रक्खीं चोट , कांपती जर्जर जरा , हर श्वांस  में अनुभव भरा , ...

किया जा रहा है 'वास्तु' के नाम पर एक धोखा -Praveen Shah

सुनिये मेरी भी....: किया जा रहा है एक धोखा, नाम 'वास्तु' है !...

आपके घर में रोशनी आये, हवा का आना जाना न रूके, बारिश व सीलन से घर बचा रहे व कीमती सामान सुरक्षित रहे... यदि आपका घर यह सब कर रहा है तो उसमें कोई वास्तु दोष नहीं... बेफिकर उसमें रहिये... जीवन की अपनी सफलताओं व विफलताओं व अपने आसपास के लोगों से अपने अच्छे-बुरे संबंधों के कारण अपने अंदर ढूंढिये... और कोई स्वयंभू वास्तु विशेषज्ञ यदि आपको फिर भी  घर के वास्तुदोष गिना रहा है तो आप सीना तान के उस से कहिये...
बंधु, 
कर रहे हो एक धोखा, तुम सबसे, नाम वास्तु है !
http://praveenshah.blogspot.com/2012/10/blog-post.html

उनकी पोस्ट पर हमारा विचार यह है-
विचार भी वास्तु मात्र हैं. घर-दूकान और वस्तुओं का वास्तु ठीक करने के बाद भी समस्या से नजात न मिले तो अपने विचार का वास्तु ठीक कर लीजिये आपकी समस्या दूर हो जायेगी.
आप चिंता, नफ़रत और ग़ुस्सा छोड़ दीजिये, आपके शरीर में फ़ालतू एसिड नहीं बनेगा. आप दुश्मनों को माफ़ कर दीजिये. आपका मन निर्मल हो जाएगा. साड़ी मनोग्रंथियाँ विलीन हो जायेंगी. आप लोगों से मुस्कुरा कर मिलें, हर जगह आपका स्वागत किया जाएगा. आप नौकरी कर रहे हैं तो स्किल्ड लेबर है. आप हमेशा तंगदस्त और क़र्ज़दार रहेंगे. ५० साल में आप जो बचायेंगे उसे आप से किसी अस्पताल में ५० दिन में ले लिया जाएगा. आप अपना छोटा सा बिजनेस शुरू करें. समय के साथ वह बढ़ता जाएगा और दो चार साल में ही आप धनवान हो जायेंगे.
यह सब तब होगा जब आप अपने विचार का वास्तु ठीक कर लेंगे.

मुहब्बतों को सलीक़ा सिखा दिया मैंने -Anjum Rahber.mp4

जिज्ञासा(JIGYASA) : इंदिरा गांधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार

Written By mark rai on शनिवार, 29 सितंबर 2012 | 5:35 pm

जिज्ञासा(JIGYASA) : इंदिरा गांधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार: गीतकार, लेखक एवं फिल्म निर्देशक गुलजार को 27 वें इंदिरा गांधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार से अलंकृत किया जाएगा।राष्ट्रीय एकता एवं सदभावना के वि...

जिज्ञासा(JIGYASA) : यहाँ सिस्टर निवेदिता का अस्थि कलश विश्राम कर रहा ह...

Written By mark rai on बुधवार, 26 सितंबर 2012 | 2:16 pm

जिज्ञासा(JIGYASA) : यहाँ सिस्टर निवेदिता का अस्थि कलश विश्राम कर रहा ह...: यहाँ सिस्टर निवेदिता का अस्थि कलश विश्राम कर रहा है, जिन्होंने अपना सर्वस्व भारत को दे दिया--उनकी समाधि (दार्जिलिंग) पर अंकित है.

जिज्ञासा(JIGYASA) : राष्ट्रीय युवा दिवस

Written By mark rai on शनिवार, 22 सितंबर 2012 | 5:10 pm

जिज्ञासा(JIGYASA) : राष्ट्रीय युवा दिवस: स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।(जन्म- 12 जनवरी, 1863)विवेकानंद ने 1897 में कलकत्ता में राम...

बड़ा अजीब पीएम है देश का

प्रधानमंत्री सच कह रहे हैं, किंतु तरीका ठीक नहीं। वे बिल्कुल भी एक जिम्मेदार व्यक्ति की तरह नहीं बोले। न ही एक देश के जिम्मेदार प्रधानमंत्री की तरह ही बोले। वे एक प्रशासक और गैर जनता से कंसर्न ब्यूरोक्रैट की तरह बोले। पैसे पेड़ पर नहीं लगते? 1991 याद है न? महंगी कारों के लिए पैसा है डीजल के लिन नहीं? और सबसे खराब शब्द सिलेंडर जिसे सब्सिडी की जरूरत है वह 6 में काम चला लेता है और गरीबों के लिए कैरोसीन है? अब जरा पीएम साहेब यहां भी नजर डालिए। देश में गरीबों को कैरोसीन मिलता कितना मशक्कत के बाद है और मिलता कितना है यह भी तो सुनिश्चि कीजिए। सिलेंडर जो यूज करते हैं वह 6 में काम चला लेते हैं, तो जनाब क्या यह मान लें कि गरीब कम खाते हैं या फिर मध्यम वर्ग कभी अपनी लाचारी और बेबसी से बाहर ही न आ पाए। सिलेंडर पर अगर आप कर ही रहे हैं कैपिंग तो इसके ऊपर के सिलेंडर एजेंसियों के चंगुल से मुक्त कर दीजिए। पीएम साहब1991 याद दिलाकर देशपर जो अहसान आप जता रहे हैं, वह सिर्फ आपका अकेले का कारनामा नहीं था। और ओपन टू ऑल इकॉनॉमी की ओर तो भारत इंदिरा गांधी के जमाने से बढ़ रहा था। 1991 से पहले जैसे जिंदगी थी ही नहीं? जनाब जरा संभलकर बोला कीजिए। पैसे पेड़ पर नहीं उगते यह एक ऐसी बात है जो किसी को भी खराब लग सकती है। ममता को रिडिक्यूल कीजिए, जनता को नहीं। यूपीए आप बचा लेंगे मगर साख नहीं बचा पाएंगे। और पैसे तो पेड़ पर नहीं लगते कुछ ऐसा जुमला है जो गरीब या भिखारियों को उस वक्त दिया जाता है जब वे ज्यादा परेशान करते हैं, क्या जनता से पीएम महोदय परेशान हो गए हैं। जब भी किसी विधा का शीर्ष उस विधा का गैर जानकार व्यक्ति बनता है तो उस विधा को एक सदी के बराबर नुकसान होता है। मसलन नॉन आईपीएस को डीजीपी, नॉन जर्नलिस्ट को एडिटर, नॉन एक्टर को फिल्म का मुख्य किरदार बना दिया जाए। वह उद्योग सफर करता है जिसमें ऐसी शीर्ष होते हैं। और हुआ भी यही जब पीएम डॉ. मनमोहन सिंह बनाए गए? - सखाजी

जिज्ञासा(JIGYASA) : चौथी शताब्दी के इस दस्तावेज में ईसा मसीह की पत्नी ...

Written By mark rai on शुक्रवार, 21 सितंबर 2012 | 2:40 pm

जिज्ञासा(JIGYASA) : चौथी शताब्दी के इस दस्तावेज में ईसा मसीह की पत्नी ...: चौथी शताब्दी के इस दस्तावेज में ईसा मसीह की पत्नी का जिक्र होने का दावा किया गया है.ये भोजपत्र कूड़े के एक ढेर में मिला था. शोधकर्ताओं ने इन...

Life is Just a Life: कैसे स्वर्णिम स्वप्न बुने कविता

Life is Just a Life: कैसे स्वर्णिम स्वप्न बुने कविता: अब पसर गयी हँस  अधरों पर  चूर थक हार उदासी है , आँखों के पोरों पर लूटे पिटे सपनों की ओस जरा सी है। पेट गए पथराये  जहाँ खाने को  खून ब...

ओ.....ओ....जाने जाना, ढूंढे तुझे दीवाना

Written By बरुण सखाजी on मंगलवार, 18 सितंबर 2012 | 11:15 pm

देश में अचानक एक बड़ा राजनैतिक तूफान आ गया। ममता ने यूपीए से नाता तोडऩे की घोषणा कर दी। कांग्रेस के माथे पर ज्यादा सलवटें नहीं आईं। जैसे वे यह खबर सुनने के लिए तैयार से थे। बीजेपी को सांप सूंघ गया। अभी तक कोई न बयान न राय? सपा, बसपा के अपने राग और अपने द्वेष हैं। मुलायम पर कोई भरोसा करने तैयार नहीं, वे दिल से चुनाव चाहते हैं, तो माया अभी इंतजार के मूड में हैं। दिल मुलायम, चाल खराब: मुलायम पर कोई भरोसा करने तैयार नहीं। मुलायम भी ऐसे हैं कि जानते हैं, कल को कोई भी नतीजे आए, वे बिना कांग्रेस के पीएम नहीं बन पाएंगे। बीजेपी तो उन्हें हाथ भी नहीं रखने देगी। तब वे कांग्रेस से सीधा भी मुकाबिल नहीं होना चाहते। जबकि चुनाव के लिए आतुर हैं, दरअसल समाजवादियों का कोई भरोसा नहीं कब कहां गुंडई कर दें और अखिलेश बाबू परेशान में पड़ जाएं और चुनाव तो दूर की कोड़ हो जाए। ऐसे में उनके पास अब एक अवसर आया है कि कुछ टालमटोल करें और सरकार गिरा दें। अब देखना यह है कि वे इस काबिल शतरंजी चाल को कैसे चलते हैं? माया मंडराई: माया से दूर रहना ही ठीक लगता है। क्योंकि यह लोग बड़े महंगे होते हैं। न जाने कितने तो पैसे लेंगे और कितने मामले वापस करवाएंगे। ऊपर से तुर्रा यह होगा कि यूपी को परेशान करो, ताकि अखिलेश माया के चिर शत्रु परेशा हो जाएं। अब सोनिया की यह होशियारी है कि चुनाव में जाएं या फिर इन दुष्टों को लें। ममता न पसीजेगी: ममता नाम की ममता हैं। वे नहीं पसीजेंगी। चूंकि वे पंचायत में कांग्रेस से हटकर लडऩा चाहती थी। वे यह खूब जानती हैं कि कांग्रेस के बिना बंगाल में बने रहना कठिन है। वह यह भी जानती हैं, कि इस बार भले ही वे वाम की खामियों से जीत गईं, लेकिन कांग्रेस अगर साथ में रही तो वे अगली लड़ाई इसी से लड़ेंगी। इसलिए पहले तो इन्हें राज्य से बेदखल किया जाए। शरद, करुणा: शरद पवार ईमानदार हैं। वे चाहते हैं हमेशा रहेंगे कांग्रेस के साथ। चूंकि महाराष्ट्र के समीकरण कहते हैं, कांग्रेस के साथ वे नहीं जीतेंगे। शिवसेना के साथ जाएं। तो मन ही मन वे भी चाहते हैं कि विधानसभा और लोकसभा एक साथ ही हो जाएं, तो उन्हें कुछ लाभ मिलना होगा तो जल्द मिल जाएगा। हां देर सवेर यह जरूर सोचते हैं कि उनकी छवि के अनुरूप कांग्रेस बीजेपी के सत्ता से दूर रखने के लिए समर्थन देकर पीएम बनवा सकती है। मगर शिवसेना के साथ गए तो क्या करेंगे? यह वे सोचेंगे यही उनकी काबिलियत भी है। क्या अब आएगा नो कॉन्फिडेंस: बीजेपी इस पूरे मामले में अभी कुछ नहीं बोलेगी। वह शुक्रवार के बाद जब औपचारिक रूप से यह तय हो जाएगा तभी वह कॉन्फिडेंस वोट के लिए कहेगी। मगर सीधे नहीं, बल्कि ममता को अपने हाथ में लेकर। बीजेपी अपनी पुरानी सहयोगी बीएसपी को भी साथ में ले सकती है। बीएसपी एक ही कीमत पर जाएगा, कि अग कांग्रेस उसे उपेक्षित कर दे। चलिए अब देखते हैं भाजपा क्या करती है? हाल फिलहाल देश की राजनीति में यह बड़ी उथल-पुथल है। कांग्रेस अगर इस वक्त चुनाव में गई तो कम से कम 5 केंद्रीय मंत्री और 6-7 सांसद समेत 40 से ज्यादा विधायक इनके दूसरी पार्टियों से चुनाव लड़ेंगे। इतना ही नहीं बीजेपी बिल्कुल भी तैयार नहीं है फिर भी गाहेबगाहे उसके हत्थे सत्ता चढ़ सकती है। हालांकि कांग्रेस यह जानती है कि थर्ड, फोर्थ जो भी फ्रंट बने बीजेपी को बाहर रखने के लिए किसी को भी पीएम बनाने में सहयोग देगी। अंत में लेफ्ट राइट: लेफ्ट इस समय राजनीति के मूड में नहीं, वे ममता से चिढ़ते हैं। मगर ग्राउंड वास्तव में उनके भी विचारों के उलट जा सकता है। इसलिए वे कांग्रेसी समानांतर दूरी बनाए रखते हुए अपनी तीसरी दुनिया की ताकत जुटाएंगे, ताकि भूले भटके ही सही कहीं वाम का पीएम बन गया तो? वरुण के सखाजी

रिझाती है अल्पिन तुम्हारी मासूमियत

Written By बरुण सखाजी on सोमवार, 17 सितंबर 2012 | 10:56 pm

बचपन में जब अल्पिन को देखता तो लगता था यह कमाल की चीज है। यूं तो अल्पिन में बहुत कुछ ऐसा होता भी नहीं कि कोई कमाल उसमें लगे। पर न जाने क्यों यह मुझे आकर्षित करती थी। इसके दो सिरों को गोलाकार सा ऐंठकर बना वृत जैसे कोई फूले कपोल सी युवती हो जान पड़ता। तो वहीं कंटोप में ढंकी इसका नुकीला सिरा आज्ञाकारिता के गुण को लक्षित करता। कैसे वह एक इशारे पर कंटोप में ठंक जाता। जरा सा दबाओ तो बाहर फिर वैसे ही अंदर। कालांतर में सोच बढ़ी, समझ बढ़ी तो अल्पिन जो कभी मेरे जीवन की बड़ी इंजीनियरी थी, वह इंजीनियरी की सबसे निचले ओहदे की कमाल साबित हुई। आज भी जब मुझे घर पर कहीं अल्पिन दिखती है तो खुशी होती है। लगता है अपनी बिछड़ी माशूका को देख रहा हूं। स्कूल गया तो वहां पर एक अलग तरह की पिन देखी, जिसे भी लोग कई बार अल्पिन कहते थे। मुझे इस बात से बड़ी कोफ्त थी कि लोग छोटी सी इस पिन को अल्पिन कहकर अल्पिन जैसी महान इंजीनियरिंग टूल को अपमानित करते हैं। कितनी खूबसूरती से वह अपने टिप (नोक) को छोटे से कवर में ढांप लेती है। जब काम नहीं होता तो वहां आराम करती है। यह इसलिए भी वहां चली जाती है कि बिना काम के मेरी नोक खराब हो जाएगी। चूंकि खुली रहेगी तो कोई न कोई उसे छेड़ेगा जरूर। अल्पिन की यह सोच मुझे बहुत प्रेरित करती थी। उस वक्त तो इस अल्पिन को लेकर सिर्फ एक मोहब्बत थी, वो भी बेशर्त। न कुछ और न कुछ और। पर जब सोचने की ताकत बढ़ी तो इस मोहब्बत के कारण समझ में आए। दरअसल यह अल्पिन अपनी नोक पर कंटोप इसलिए पहन लेती थी, ताकि भोथरी होने से बची रही तो वक्त पर काम आ सके। ठीक एक बुद्मिान और समझदार व्यक्ति की तरह। ऐसा व्यक्ति अपनी दिमागी शार्पनेस को बेवजह नहीं जाया करते। वे खुद के ही बनाए एक कंटोप में सारी समझदारी और शक्ति के संभालकर रखते हैं। लेकिन इस अल्पिन से इतर, इसी की हमशक्ल एक और पिन होती है। इस पिन का इस्तेमाल अक्सर कागजों को नत्थी करने में किया जाता है। लेकिन प्यारी अल्पिन तो नारी श्रृंगार के दौरान यूज की जाती है। वह कागजों की नहीं, सौंदर्य की चेरी है। हमशक्ल वाली पिन ने इस अल्पिन को तेजी से खत्म करने की कोशिश की। मगर अपने नुकीले स्वभाव को न छिपा पाने और नुकसान पहुंचाने को लेकर बिना नैतिकता की सोच वाली होने के कारण इसे समाज में वह स्थान नहीं मिल पाया। जबकि अल्पिन, पिन, सुई, कांटा समाज की सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली पिन ही है। मगर अल्पिन तो जैसे आम लोगों में बैठी खूबसूरत विशिष्ट चीज है, सुई जैसे समाज की कारिंदा सोच की प्रतिनिधि है। तो वहीं कांटे नैतिकता से परे बेझिझक, गंवार टाइप के दुर्जन लोग हैं। अल्पिन ने महज अपनी मोहब्बत ही नहीं दी, मुझे तो कई आयामों पर सोचने की शक्ति भी दी है। विद्वानों की तरह मूर्खों में ऊर्जा न खपाना कोई विमूढ़ता नहीं। और इन बेवकूफों के बीच प्रतिष्ठा न पा सकने का कोई अफसोस भी नहीं। एक दिन जब अल्पिन ने बाजार के फेरे में आकर अपना रूप बदला तो मैं भौंचक रह गया। वह अब आकर्षक शेप में थी। अपनी असलियत को कहीं अंदर ढंके हुए बाहर तितलीनुमा कवच के साथ आई। इस रूप को देखकर तो मुझे और भी इसकी ओर आकर्षित होना चाहिए था। मगर हुआ उल्टा। मुझे इसका यह रूप बिल्कुल भी नहीं भाया। चूंकि मैं तो इसके असली रूप से ही मोहब्बत करता हूं, कैसे इसे अनुमोदन दे दूं। और जब प्यार निस्वार्थ भाव से होता है, तो फिर उसमें कोई भी तब्दीलगी इसे भौंडा बना देती है। प्यार की इस परिभाषा को सर्वमान्य तो नहीं कहा जा सकता, हां मगर एन एप्रोप्रिएट एंड अल्मोस्ट एडमायर्ड एक्सेप्टीबल काइंड ऑफ लाव जरूर कहा जा सकता है। और मोहब्बत का यह प्रकार ऐसा होता है कि लाख बदलावों के बाद भी अपनी माशूका में खोट नहीं देखता। अल्पिन की इस भंगिमा को देखकर भले ही पलभर के लिए क्रोध घुमड़ा हो, मगर यह वसुंधरा सा उड़ भी गया। सबकुछ जानकर भी यह यकीं नहीं हुआ, कि मेरी प्यारी अल्पिन ने जान बूझकर अपनी मासूमियत को इस नकल से ढांप लिया होगा। बार-बार जेहन में यही लगता रहता है कि अल्पिन को जरूर सुई, कांटा, पिन, स्टेप्लर की नन्ही दुफनियांओं ने मिलकर साजिश की होगी। अल्पिन की मासूमियत और उनकी उपयोगिता दोनों को बरक्स रखा जाए तो भी अल्पिन बीस ही निकलती। इसी ईष्र्या ने शायद अल्पिन को बलात ऐसा रूप दे दिया गया हो। यह अल्पिन के लिए मेरा जेहनी पागलपन से सना प्यार है, या फिर उसपर भरोसा। यह तो नहीं पता, पर यह जरूर समझ आता है कि आपकी मोहब्बत कई बुराइयों को भी अच्छाइयों में बदल सकती है, फिर वह चाहे अल्पिन से हो या हाड़ मांस के हम और आपसे। वरुण के सखाजी

जिज्ञासा(JIGYASA) : ओंकारेश्वर बांध

Written By mark rai on शुक्रवार, 14 सितंबर 2012 | 1:34 pm

जिज्ञासा(JIGYASA) : ओंकारेश्वर बांध: मध्यप्रदेश में ओंकारेश्वर बांध के विस्थापितों के जल सत्याग्रह को अत्यंत गंभीरता से लेते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें जमीन के...

जिज्ञासा(JIGYASA) : धर्म

Written By mark rai on बुधवार, 12 सितंबर 2012 | 12:56 pm

जिज्ञासा(JIGYASA) : धर्म: आज धर्म का उपयोग हर व्यक्ति अपनी अस्मिता और निजी पहचान को बनाए रखने तथा अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए कर रहा है। राजनीतिक दलों के लिए तो ...

जिज्ञासा(JIGYASA) : मार्कण्डेय पुराण

Written By mark rai on सोमवार, 10 सितंबर 2012 | 11:31 am

जिज्ञासा(JIGYASA) : मार्कण्डेय पुराण: मार्कण्डेय पुराण दुर्गा चरित्र एवं दुर्गा सप्तशती के वर्णन के लिए प्रसिद्ध है। इसे शाक्त सम्प्रदाय का पुराण कहा जाता है. आयुर्वेद के सिद्धा...

ग़ज़लगंगा.dg: चांद निकला भी नहीं था और सूरज ढल गया.

एक लम्हा जिंदगी का आते-आते टल गया.
चांद निकला भी नहीं था और सूरज ढल गया.

अब हवा चंदन की खुश्बू की तलब करती रहे
जिसको जलना था यहां पर सादगी से जल गया.

धीरे-धीरे वक़्त ने चेहरे की रौनक छीन ली
होंठ से सुर्खी गयी और आंख से काजल गया.

आज मैं जैसा भी हूं तेरा करम है और क्या
तूने जिस सांचे में ढाला मैं उसी में ढल गया.

फिर उसूलों की किताबें किसलिए पढ़ते हैं हम
जिसको जब मौक़ा मिला इक दूसरे को छल गया.

अपना साया तक नहीं था, साथ जो देता मेरा
धूप में घर से निकलना आज मुझको खल गया.

बारहा हारी हुई बाज़ी भी उसने जीत ली
चलते-चलते यक-ब-यक कुछ चाल ऐसी चल गया.

---देवेंद्र गौतम

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ग़ज़लगंगा.dg: चांद निकला भी नहीं था और सूरज ढल गया.:

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खबरगंगा: खुश रहो न !

कई दिनों की बारिश के बाद बादल एकदम चुप से थे..न गरजना न बरसना ... ठंडी हवाएं जरुर रह-रह कर सहला जाती थी...धूली, निखरी प्रकृति की सुन्दरता अपने चरम पर थी ....मुझे पटना जाना था ...ट्रेन में खिड़की वाली सीट मिली (मेरा सौभाग्य )...हमारा सफ़र शुरू हुआ .... दूर तक पसरे हरे-भरे खेत, पेड़ो की  कतारें, बाग़-बगीचे दिखने लगे....मैं  बिलकुल 'खो' सी गयी थी ...कि एक जगह ट्रेन 'शंट' कर दी गयी...माहौल में ऊब और बेचैनी घुलने लगी.. बचने के लिए इधर-उधर देखना शुरू किया कि 'निगाहे' पटरी के पार झाड़ियों में कुछ खोजती औरत पर गयी.....इकहरा बदन ..सांवली रंगत...वह बेहद परेशान दिख रही थी ...पास ही बैठा उसका छोटा सा बच्चा रोये जा रहा था, पर वह, अपनी ही धुन में थी ...मुझे कुछ अजीब सा लगा इसलिए  उन्हें ध्यान से देखने लगी..अचानक उसके हाथ में एक सूखी टहनी नज़र आयी...अब उसके चेहरे पर राहत थी...धीरे-धीरे उसने कई लकड़ियों को इकट्ठा किया ...उसका गठ्ठर बनाया..बच्चे को उठाया और चली गयी...
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जिज्ञासा(JIGYASA) : ट्रेन आरक्षण टिकट प्रणाली- 1 फरवरी 2012

Written By mark rai on रविवार, 9 सितंबर 2012 | 5:04 pm

जिज्ञासा(JIGYASA) : ट्रेन आरक्षण टिकट प्रणाली- 1 फरवरी 2012: ट्रेन आरक्षण टिकट प्रणाली को यात्रियों के लिए और सुविधाजनक बनाने के लिए रेल मंत्रालय ने सार्वजनिक क्षेत्र की अपनी इकाई भारतीय रेल जलपान व पर...

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जिज्ञासा(JIGYASA) : 'बाघा जतीन'

Written By mark rai on शनिवार, 8 सितंबर 2012 | 12:08 pm

जिज्ञासा(JIGYASA) : 'बाघा जतीन': जतीन्द्रनाथ मुखर्जी के बचपन का नाम 'जतीन्द्रनाथ मुखोपाध्याय' था। अपनी बहादुरी से एक बाघ को मार देने के कारण ये 'बाघा जतीन' के नाम से भी प्र...

जिज्ञासा(JIGYASA) : 'सुधारक' को गोखले ने अपनी लड़ाई का माध्यम बनाया.

जिज्ञासा(JIGYASA) : 'सुधारक' को गोखले ने अपनी लड़ाई का माध्यम बनाया.: 'सुधारक' को गोखले ने अपनी लड़ाई का माध्यम बनाया. 'सर्वेन्ट ऑफ़ सोसायटी' की स्थापना गोखले द्वारा किया गया महत्त्वपूर्ण कार्य था. उनका मानना थ...

सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ

जिज्ञासा(JIGYASA) : सुभद्रा कुमारी चौहान की पहली कविता प्रयाग से निकल...

Written By mark rai on शुक्रवार, 7 सितंबर 2012 | 1:23 pm

जिज्ञासा(JIGYASA) : सुभद्रा कुमारी चौहान की पहली कविता प्रयाग से निकल...: 1913 में नौ वर्ष की आयु में सुभद्रा कुमारी चौहान की पहली कविता प्रयाग से निकलने वाली पत्रिका 'मर्यादा' में प्रकाशित हुई थी। यह कविता ‘नीम...

जिज्ञासा(JIGYASA) : किशोर कुमार रिकॉर्डिंग के समय ही बोल देते थे कि गा...

जिज्ञासा(JIGYASA) : किशोर कुमार रिकॉर्डिंग के समय ही बोल देते थे कि गा...: किशोर न सिर्फ़ गायक थे बल्कि एक एक्टर, प्रोड्यूसर, निर्देशक, निर्माता, लेखक, म्यूज़िक कम्पोज़र सभी कुछ थे.किशोर लोगों को रिकॉर्डिंग के समय ब...

क़ब्रिस्तान की ज़मीन पर जाने से रोका, अल्पसंख्यक आयोग से शिकायत

Written By Saleem Khan on गुरुवार, 6 सितंबर 2012 | 6:43 pm

उत्तर प्रदेश में मुलायम राज है या मोदी राज ! बीते वक्तों में हुए अल्पसंख्यक विरोधी माहौल और  कृत्यों को देखते हुए तो यही लगता है। कहने को तो यूपी में अखिलेश यादव की सरकार है जिसके चलते आभासी तौर पर मुस्लिम तबके में 'फील गुड' का संचार व्यापी है परन्तु हकीकत बिलकुल ही इसके उलट होती जा रही है। 

जी हां  !  उत्तर प्रदेश के महाराजगंज ज़िला के तहसील निचलौल में थाना कोठीभार स्थित ग्राम कमता टोला नह्छोरी में जो ज़मीन सरकारी तौर पर क़ब्रिस्तान हेतु है उस पर क़ब्रों के दफनाने का सिलसिला भी जारी है परन्तु विगत कुछ वर्षों से गाँव में कुछ साम्प्रदायिक मानसिकता वाले निवासियों ने क़ब्रों के दफनाने में रोड़े अटकाने शुरू कर दिए लेकिन जैसे तैसे मामला ज्यादा तूल नहीं पकड़ता था। पिछले ग्राम पंचायत की चुनाव के बाद तो उग्र मानसिकता वाले ग्राम निवासियों (समय आने पर नाम उजागर हो जायेगा) ने खूब ग़दर काटनी शुरू कर दी। उक्त क़ब्रिस्तान में जब स्थानीय मुस्लिम समुदाय के निवासियों ने जब कब्रिस्तान के चारो और पिलर लगा कर मामले को शांत करने का प्रयास किया तो उग्र मानसिकता से ग्रसित दुसरे समुदाय के ग्राम निवासियों ने रात में पिलर को तोड़ डाला जिससे वहां दहशत का माहौल उत्पन्न हो चुका है और अब वहां पर न तो मुर्दे को दफनाया जाता है और न ही वहां  मुस्लिम समुदाय का कोई सदस्य जा पाता है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए मुस्लिम समुदाय के समझदार लोगों ने सरकार से इस मामले की लिखित शिकायत की (सभी प्रति AIBA के पास सुरक्षित ) और उस शिकायत पर सत्यता की जांच कर डी एम् एवं एस डी एम् साहब ने कब्रिस्तान की भूमि की खसरा खतौनी, नक्शा इत्यादि को निर्गत कर सत्यापित करते हुए पुलिस बल एवं ग्राम प्रधान श्री दुर्विजय मिश्रा की मौजूदगी में पिलर लगवाने के आदेश दिनांक 11.05.2011 को पारित हुए (प्रति AIBA के पास सुरक्षित) जिसका अमल पुलिस महकमें ने और प्रधान ने किया लेकिन उसी रात दिनांक 12.05.2011 को फिर से साम्रिदयिकता के झंडाबरदारों ने सारे पिलर्स जिसकी कीमत 1 लाख से ज्यादा थी, को तोड़ दिया। जिससे वहां अति साम्प्रदायिक और दहशत का माहौल संचारित हो गया।

मामले की अति गंभीरता को देखते हुए मुस्लिम समुदाय के समझदार लोगों ने पुनः सरकार से इस मामले की लिखित शिकायत की ( प्रति AIBA के पास सुरक्षित) जिसमें पुराने फैसले को अमल करने की ताकीद की गयी यही नहीं  राज्य अल्पसंख्यक आयोग, प्रमुख सचिव गृह, मानवाधिकार आयोग, मंडलायुक्त गोरखपुर, आई जी, डी आई जी, पुलिस कमिश्नर  सहित सभी सम्बंधित प्रशासकों एवं अधिकारीयों को ज्ञापन एवं शिकायत किया गया   परन्तु अभी तक डी.एम्., एस डी एम् एवं पुलिस व स्थानीय प्रशासन की तरफ से कोई ऐसी कार्यवाही नहीं हुयी।

र्तमान में स्थानीय मुस्लिम तबके में भय और असुरक्षा का माहौल कायम हो चुका है और समझदार मुस्लिम समुदाय के लोगों की वजह से अभी तक हालाँकि इस मुद्दे के चलते कोई अप्रिय घटना नहीं हुई लेकिन यदि प्रशासन का रवैया इसी तरह उदासीन रहा तो थाना कोठीभार स्थित नह्छोरी ग्राम में कुछ भी हो सकता है।

'ल इंडिया ब्लॉगर्स एसोशियेशन' की तहकीकात ने उक्त समस्या की गंभीरता को देखते हुए सभी तरह के साक्ष्यों एवं गवाहों को देखकर आपके सम्मुख प्रस्तुत किया है। अब बस न्याय के सिवा कुछ और नहीं चाहिए !

कौन है यह वाशिंगटन पोस्ट और क्यों मच रहा है हल्ला

यह नहीं कि वाशिंगटन पोस्ट या टाइम गलत हैं या सही हैं। बस सवाल सिर्फ इतना है कि वे जो कुछ भी कह रहे हैं वह उनकी खबर क्यों है? व्यावसायिक परिदृश्य में देखें तो मीडिया के नाम पर विदेशी मीडिया की मनमानी कतई लोक की आवाज नहीं है। यह नितांत विदेशी कूटनीति का हिस्सा है। इसलिए दुनिया के मंच पर जब देश के संदर्भ में कोई बात की जाए, तो सावधानी रखना जरूरी हो जाता है।
कायदा ए कायनात में भी इंसान को अपनी आवाज पेश करने की इजाजत हक के बतौर बख्सी गई है। यह अच्छी बात भी है। आदिकाल से इंसानी बिरादरी को अनुशासित और गवर्न करने के लिए बनाई गईं व्यवस्थाएं सबसे ज्यादा डरती भी इसी से हैं। आवाजों को अपने-अपने कालखंडों में मुख्य बादशाही ताकतों ने कुचलने की कोशिश की है। कभी कुचली भी गई हंै, तो कभी सालों कैदखानों में बंद भी कर दी गईं हैं। किंतु फिर अचानक अगर कैद करने वाली बादशाही ताकत को किसीने उखाड़ा भी, तो वह यही कैदखानों में बंद आवाजें थीं। लोकतंत्र में इसका अपना राज और काज है। काज इसलिए कि यह अपनी स्वछंदता और स्वतंत्रता के बीच के फर्क से परे प्रचलन में रहती है। और असल में गलती इस आवाजभर की भी नहीं है, दरअसल आवाज को नियंत्रित करने वाले भी इसे गवर्न के नाम पर दबोच देना चाहते हैं, तो आवाजें बुलंद करने वाले आजादी के नाम पर अतिरेक कर डालते हैं। ऐसे में न तो आवाज की ककर्शता ही खत्म हो पाती है और न ही इसकी ईमानदारी ही बच पाती है। कहने का कुल जमा मायना इतना है कि माध्यमों की सक्रियता के चलते होने वाली उथल-पुथल और अर्थ स्वार्थ पर चिंता की जानी चाहिए। साथ ही यह भी ख्याल रखा जाना चाहिए कि वह आखिरकार कहीं कैद न होकर रह जाए। मौजूदा सिनेरियो में आवाज को बकौल टीवी, प्रिंट और वेब मीडिया देखा जाना चाहिए। हर देशकाल में यह तो माना गया कि आवाज महत्वपूर्ण है। और यह भी जान लिया गया कि यह सर्वशक्तिमान से कुछ ही कम है। किंतु कहीं कोई मुक्कमल योजना नहीं बनाई जाती कि इसका इस्तेमाल कैसे करें। हर उभरते हुए लोक राष्ट्र में आवाजें भी समानांतर उभरती हैं। सरकारी व्यवस्थाएं भी सक्रिय होती हैं। किंतु दोनों ही एक खिंचाव के साथ आगे बढ़ती हैं। आवाजें उठती और बैठती रहती हैं। परंतु व्यवस्थाओं का एक ही मान रहता है कि वह इन जोर-जोर से सुनाई दे रहीं लोक ध्वनियों को सुनकर मान्यता नहीं देंगे। और यही दोनों की जिद अंतिम रूप में अतिरेक में बदल जाती है। आवाजें अपनी राह लाभ, हानि के विश्लेषण से परे होकर नापती रहती हैं, तो व्यवस्थाएं लोक सेवक का लड्डू हाथ में लिए निर्धुंध कानों में रूई ठूंसे हुई जो बन पड़ता है अच्छा बुरा काम किए जाती हैं। आवाजों का शोर और आवाजों की उपेक्षा दोनों ही इस काल में अपने चरम पर हैं। समूची दुनिया से नितनई सनसनीखेज बातें होती रहती हैं। एक माध्यम ने तो लीबिया के गद्दाफी को ही उखाड़ फेंका, तो असांज ने मुखौटे पहने हुए लोगों के गंदे चेहरे सबके सामने रखे। आवाजें अपना काम कर रही हैं। लेकिन यह इसलिए और ज्यादा कर रही हैं, कि इनकी ताकत को बादशाही शक्तियां या तो पहचानती नहीं है या फिर पहचानकर मान्यता देने के मूड में नहीं हैं। भारत में भी स्टिंग ऑपरेशन के जरिए सियासी दलों के नेता बेनकाब होते रहे हैं और कालांतर में हाफ शर्ट पहनकर नीति, रीति और व्यवस्था को कब्जाए बैठे नौकरशाह भी चाल, चरित्र में बेढंगेपन के साथ सबके सामने आए। यह कारनामा किया इन्हीं आवाजों ने। राजतंत्र में आवाजों को नहीं आने दिया जाता था। और अगर किसी तरह से कहीं से आ भी गई तो कुचलने की ऐसी वीभत्स प्रक्रिया अपनाई जाती थी, कि लोगों की रूह कांप जाए। मगर जब दुनिया को लोकतंत्र की नेमत मिली तो व्यवस्थाओं के सामने खूबसूरत विकल्प था। एक ऐसा तंत्र ऐसी व्यवस्था, जिसे लोक ही चलाएगा, लोक ही बनाएगा और लोक के लिए ही यह बनी रहेगी। किंतु लोकतंत्र, जिसे भारी खून खराबे के जरिए बरास्ता यूरोप इंसानों ने पाया उसके मूल में आखिर यही आवाज व्यवस्था की नाक में दम करने फिर हाजिर थी। और इस बार यह आवाज कुछ ऐसी है कि इसे छाना नहीं जा सकता। बादशाही ताकतों को इसे अपने कानों में बिना किसी फिल्ट्रेशन के ही सुनना पड़ेगा। कर्कशता, गालियां, मनमानापन, बेझिझकी, बेसबूतियापन और सच्चाई, शांति, समझदारी से मिश्रित रहेगी। वाशिंगटन पोस्ट ने हमारे पीएम के बारे में जो भी लिखा, टाइम ने जो भी संज्ञा दी थी। यह सब कुछ इसी आवाज से निकलने वाली कर्कश ध्वनियां हैं। इन्हें रोका नहीं जा सकता है, किंतु उपेक्षित किया जा सकता है। संसार में सबसे बड़ी ताकत या तो दमन है या उपेक्षा। दमन जब नहीं किया जा सकता तो उपेक्षा कर देनी चाहिए। यह नहीं कि वाशिंगटन पोस्ट या टाइम गलत हैं या सही हैं। बस सवाल सिर्फ इतना है कि वे जो कुछ भी कह रहे हैं वह उनकी खबर क्यों है? व्यावसायिक परिदृश्य में देखें तो मीडिया के नाम पर विदेशी मीडिया की मनमानी कतई लोक की आवाज नहीं है। यह नितांत विदेशी कूटनीति का हिस्सा है। इसलिए दुनिया के मंच पर जब देश के संदर्भ में कोई बात की जाए, तो सावधानी रखना जरूरी हो जाता है। वक्त आ गया है कि इन आवाजों को बादशाही ताकतें मान्यता दें। वक्त आ गया है कि आवाजों को नीति, रीति और योजनाओं में शामिल किया जाए। मुमकिन है फिर वाशिंगटन पोस्ट का कमेंट किसी देश के पीएम के लिए पूरी जिम्मेदारी के साथ आएगा और उसपर प्रतिक्रिया भी राष्ट्रीय सीमाओं की गरिमा के अनुकूल होगी। यह नहीं कि अपने शत्रु पड़ोसी की बुराई दूसरे मुहल्ले वाले करें तो हम भी दुंधभियां बजा-बजाकर करने लग जाएं। वरुण के सखाजी चीफ रिपोर्टर, दैनिक भास्कर, रायपुर

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Saleem Khan