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Written By बरुण सखाजी on मंगलवार, 27 जून 2017 | 7:11 pm

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खेल- खेल मै खेल रहा हूँ


खेल- खेल मै खेल रहा हूँ
कितने पौधे हमने पाले
नन्ही मेरी क्यारी में
सुंदर सी फुलवारी में !
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सूखी रूखी धरती मिटटी
ढो ढो कर जल लाता हूँ
सींच सींच कर हरियाली ला
खुश मै भी हो जाता हूँ !
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छोटे छोटे झूम झूम कर
खेल खेल मन हर लेते
बिन बोले भी पलक नैन में
दिल में ये घर कर लेते !
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प्रेम छलकता इनसे पल-पल
दर्द थकन हर-हर लेते
अपनी भाव भंगिमा बदले
चंद्र-कला सृज हंस देते !
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खिल-खिल खिलते हँसते -रोते
रोते-हँसते मृदुल गात ले
विश्व रूप ज्यों मुख कान्हा के
जीवन धन्य ये कर देते
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इनके नैनों में जादू है
प्यार भरे अमृत घट से हैं
लगता जैसे लक्ष्मी -माया
धन -कुबेर ईश्वर मुठ्ठी हैं
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कभी न ऊबे मन इनके संग
घंटों खेलो बात करो
अपनापन भरता हर अंग -अंग
प्रेम श्रेष्ठ जग मान रखो
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कभी प्रेम से कोई लेता
इन पौधों को अपने पास
ले जाता जब दूर देश में
व्याकुल मन -न पाता पास !
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छलक उठे आंसू तब मेरे
विरह व्यथा कुछ टीस उठे
सपने मेरे जैसे उसके
ज्ञान चक्षु खुल मीत बनें
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फिर हँसता बढ़ता जाता मै
कर्मक्षेत्र पगडण्डी में
खेल-खेल मै खेल रहा हूँ
नन्ही अपनी क्यारी में
सुन्दर सी फुलवारी में !
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सुरेंद्र कुमार शुक्ल भ्र्मर ५
शिमला हिमाचल प्रदेश
२.३० - ३.०५ मध्याह्न
९ जून १७ शुक्रवार
सौ -सौ रूप धरे ये बादल





मेरी कलम रुक जाती है...

Written By Neeraj Kumar on शुक्रवार, 24 मार्च 2017 | 5:28 pm

मित्रों, 
पहली बार मैं इस ब्लॉग पर अपना योगदान दे रहा हूँ. मुझे माफ़ करेंगे आप सभी साथी और पाठकगण, ऐसी आशा है. 

जीवन की उलझनों में ऐसा उलझा कि कविता को समय ही नहीं दे पाया. जाने कहाँ गए वो दिन? जाने कहाँ गया वो जूनून? जाने कहाँ गयी वो लगन? शब्द ही खो गए मेरे ह्रदय के. 

एक नए जोश के साथ आया हूँ इस बार, इस संकल्प के साथ कि अब तो लिखूंगा, बहुत लिखूंगा, निरंतर लिखुंगा। हिंदी का दास हूँ चाहे अपने नाम से पूर्वजों के "दास" टाइटल को हटा दिया है मैंने. 

इस बार मैं एक पुरानी कविता "मेरी कलम रुक जाती है" को विडियो के रूप में पुनः जीवित किया है जो यहाँ शेयर कर रहा हूँ. विनम्र निवेदन है की इसे सुने, गुणे और मेरा मार्गदर्शन करें... 



मेरी कलम रुक जाती है

जब

कोई कहता है

भूख लगी है

पैसे दे दो...


मेरी कलम रुक जाती है

जब

मैं देखता हूँ

छोटे से बच्चे को

चाय की दूकान पे

काम करते...


मेरी कलम रुक जाती है

जब

कोई सिमटी सिकुडी लड़की

किनारे से गुजरती है

सर झुका कर

भीड़ से बचकर...


मेरी कलम रुक जाती है

जब

कोई रिक्शा वाला

दस के बदले पाँच पाकर

खड़े होकर

देखता है चमकते सूट को...


मेरी कलम रुक जाती है

जब

एक पुलिस वाला

सलाम करता है

किसी गाड़ी वाले को...


मेरी कलम रुक जाती है

जब

अखबार में छपती है

हत्या, लूट, बलात्कार की

युद्ध, राजनीति, उठा-पटक की

रोज-रोज खबरे एक-सी...


मेरी कलम रुक जाती है

जब

लगता है

शब्दों के बाण

कविता का मलहम

या गीत के सरगम

बदल नहीं सकते

तुझे, मुझे या उन्हें

न आत्मा, न परमात्मा

न भूत को, न भविष्य को...

Founder

Founder
Saleem Khan