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कुली की आत्मकथा

Written By बरुण सखाजी on शुक्रवार, 19 जून 2015 | 11:09 pm

मैंने अपनी हड्डियों का चूरा बनाया है
जब कहीं आपका
अमेरिकन टूरिस्टर का बैग उठाया है
भीड़ को चीरकर आपको कोच तक पहुंचाया है
अगर इसे मेरी मनमानी कहो तो कहो
हमें तो कोई जानता भी नहीं
अगर
अमिताभ ने कुली का रोल निभाया न होता
सौ रुपये महज दो पचास-पचास किलो के बैग बहुत लगते होंगे
मगर तुम जरा इनको टस से मस तो कर दिखाओ
फिर हमें सिखाओ
चीलगाड़ी में बीस किलो के ऊपर
पर केजी दोगे
मशीन के श्रम को श्रम मानते हो
मेरी हड्डियों का चूरा
कोई उड़ती धूल जानते हो
-सखाजी

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2 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (21-06-2015) को "योगसाधना-तन, मन, आत्मा का शोधन" {चर्चा - 2013} पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
अन्तर्राष्ट्रीय योगदिवस की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Onkar ने कहा…

सटीक रचना

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