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मजदूर दिवस का तमाशा

Written By Bisari Raahein on शुक्रवार, 1 मई 2026 | 9:21 am

 कविता: 

*"मजदूर दिवस का तमाशा"*

✍️ कृष्ण कायत, मंडी डबवाली।


पंडालों में शोर है, नारों का बाजार है,

आज फिर 'मजदूर' नेताओं का त्योहार है।

तय हुई है मजदूरी पर लंबी एक बहस आज,

मंच पर बैठा हुआ वो खुद ही जमींदार है।


एसी की ठंडक में 'धूप' पर कविता पढ़ी गई,

पसीने के नमक पर फिर चाशनी चढ़ी गई।

शिकागो के किस्सों से हॉल सारा गूँज उठा,

मजदूर की बदहाली पर सुर्खियाँ गढ़ी गई।


तस्वीरें खींची गईं, अखबारों में छपवा दी,

खैरात के लड्डू बांटे, और वाहवाही बटोर ली।

उधर लू के थपेड़ों में जो दीवार चिन रहा,

उसने तो सूखी रोटी पानी में भिगो कर तोड़ ली।


ना उसे कानून पता, ना सरकार का वादा है,

उसका बस भूख से लड़ने का ही इरादा है।

तुम मनाओ 'मई दिवस' रैलियों के शोर में,

उसकी किस्मत में आज भी बोझा ही ज्यादा है।


कैसी ये क्रांति है, कैसा ये बदलाव है?

ये मजदूरों का दिन नहीं, बुद्धिजीवियों का दांव है।

महल वाले जब भी 'कुटिया' की बात करते हैं,

समझ लो कि किसी पद की तरफ बढ़ा पाँव है।


✍️ कृष्ण कायत, मंडी डबवाली।

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