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हिन्दू बड़े दिलवाले - Marry Christmas 🌲🌹🌲

Written By Shalini kaushik on शनिवार, 24 दिसंबर 2022 | 2:35 pm

   


 व्हाटसएप और ट्विटर पर आज राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में लगभग हर किसी के खाते नज़र आते हैं और इसीलिए मन की हर बात को इन पर साझा किया जाना एक आम चलन बनता जा रहा है और इसी कारण ये अकाउंट सामाजिक सौहार्द और भारतीय संस्कृति के लिए काफी हद तक, अगर सच ही कहा जाए तो, खतरनाक बनते जा रहे हैं. 

     पिछले कुछ दिनों से ट्विटर और व्हाटसएप के स्टेटस पर 25 दिसंबर के लिए कट्टर हिन्दुत्व, स्वयंसेवक बनने और तुलसी पूजन जैसे संदेश प्रसारित किए जा रहे हैं और वह मात्र इसलिए कि 25 दिसंबर को ईसाई धर्मावलंबियों का पवित्र त्यौहार "क्रिसमस" मनाया जाता है. ऐसी ट्वीट, ऐसे स्टेटस एक चिंता सी पैदा कर रहे हैं कि क्या यही लिखा है हमारे महान भारत की महान संस्कृति में कि हम दूसरे की खुशियों में आग लगाने का कार्य करें. वह संस्कृति जो कबीरदास की पन्क्तियों में हमें प्रेरित करती है 

"ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोए, 

  औरन को सीतल करे, आपहु सीतल होय." 

      आज उसी भारतीय संस्कृति को मैला करने का, दूषित करने का आगाज हो रहा है और यह कहना भी देरी ही होगी कि आज ऐसा करना आरंभ किया गया है जबकि बीते भारत के कुछ साल एक खास वर्ग इसी साज़िश को अंजाम दे रहा है जिससे निबटने के लिए देश के एक प्रमुख राजनेता श्री राहुल गांधी जी ने कन्याकुमारी से कश्मीर तक भारत जोड़ो यात्रा की सफल शुरूआत की है. 

       भारतीय संस्कृति के महान विद्वान् डाॅ. रामधारी सिंह जी दिनकर ने भारतीय संस्कृति की व्याख्या करते हुए लिखा है, कि भारतीय संस्कृति का महत्व स्वयं सिद्ध है। यह व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की धरोहर है। संस्कृति के वरदहस्त से ही हमारा राष्ट्र निरंतर प्रगति के पथ पर प्रशस्त है। भारतीय संस्कृति आंतरिक भावना है। इसके अंतर्गत व्यक्ति के आचार विचार उसके जीवन मूल्य, उसकी नैतिकता, संस्कार, आदर्श, शिक्षा, धर्म, साहित्य और कला का समावेश होता है अतः भारतीय संस्कृति एक व्यापक तत्व है। निश्चित ही भारतीय संस्कृति मानव की साधना की सर्वोत्तम परिणति है।"

‘‘भारतीय संस्कृति में धर्म की स्वीकृति है, किन्तु धर्म किसी संकीणर्ता या अंधविश्वास का पर्याय नहीं है।’’ वर्तमान समय ही नहीं बल्कि प्राचीनकाल से ही भारतीय संस्कृति का आधार धार्मिक एकता व सहिष्णुता रहा है। राम, कृष्ण, शिव तथा बुद्ध, महावीर इत्यादि की मान्यताओं के अलावा भारत में देवी-देवताओं की संख्या अनगिनत है। फिर भी इनकी विचारधाराओं में एकता का मूल है, क्योंकि विभिन्न रूप स्वीकार करने पर भी एक-ईश्वर में भारतीय मानस का विश्वास सुदृढ़ है। 

ऋग्वदे की प्रसिद्ध ऋचा - ‘एक सद्धिप्रा बहुधा वदन्ति’ के अनुसार एक शक्ति के स्वरूप अनेक है। सगुण रूप मे इष्टदेव के नामभेद होने पर भी निराकार ब्रह्म की सत्ता सब हिन्दू मतो में मान्य है। अहिंसा, दया, तप आदि सभी गृहस्थ और वैराग्य धर्मों का सिद्धान्त है। चाहे वे बौद्ध, जैन या वैष्णव किसी भी मत के मानने वाले हों। 

भारतीय संस्कृति मे सहनशीलता का भी बड़ा विशिष्ट गुण है। इसी का परिणाम है कि देश में अनेक जातियाँ और धर्मों के लोग आपस में मिलजुल कर रहते हैं फिर भी भारतीय संस्कृति विलीन नहीं हुई है। आदान-प्रदान की प्रक्रिया द्वारा भारतीय संस्कृति अपने स्वरूप को संजोये हुए ‘अनेकता में एकता’ की स्थापना प्रकट करती है। भारत की धर्म परायणता से न तो इस्लाम को ठेस पहुँची और न ईसाईयत को कोई हानि हुई। हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई भारत में केवल एक धर्म ही नहीं हैं बल्कि भारत की पहचान के चार मजबूत स्तंभ हैं. धर्म और अध्यात्म द्वारा भारतीय संस्कृति जन-जीवन को आश्वस्त बनाने में सफल हैं। 

        भारतीय संस्कृति के इस गुण को बताते हुए पृथ्वी कुमार अग्रवाल लिखते हैं - ‘आपसी भेद का कारण भारतीय संस्कृति में धर्म कभी नहीं बन सका। एक-दो उदाहरण हो तो उसके मूल में अन्य तथ्य प्रमुख है। संस्कृति की एक विशेषता को न केवल विचारक दार्शनिकों ने स्थापित किया, बल्कि राजनयिकों और सम्राटो ने भी समझा। 

स्वयं अशोक का कथन है कि उसने धार्मिक मेल-जोल को बढ़ावा देने का सफल प्रयत्न किया है। इस सहिष्णुतापूर्ण समन्वय भावना को मुगल बादशाह अकबर ने भी स्वीकार किया और तदनुसार इस्लाम जैसा विपरीत मत भी भारतीयता का अंग बन गया।’ विश्व इतिहास में हम धर्म के नाम पर अनेक अत्याचारों का होना पाते हैं। यूनान में सुकरात, फिलिस्तीन में ईसा मसीह को बलि होना पड़ा। परन्तु भारतीय संस्कृति में हिंसा धर्मान्धता के वशीभूत नही हुई। सहिष्णुता भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है।

   खुली दृष्टि और ग्रहण शीलता भारतीय संस्कृति का एक मन्त्र है। बाह्य संस्कृतियों और जातियों से आदान-प्रदान प्रभावों को आत्मसात करना, नए लक्ष्य की प्राप्ति आदि उसी विचारधारा के अंग है। सामाजिक व्यवस्था की उदारता और ग्रहण क्षमता उसके लक्षण है। डॉ विजयेन्द्र स्नातक लिखते हैं कि भारतीय संस्कृति का मूलाधार - ‘‘जीयो और जीने दो है। हमारी संस्कृति की यही खुली विचारधारा है। समय-समय पर अनेक जातियाँ भारतवर्ष में आकर यही  घुल-मिल गई। राजनीतिक विजय के बावजूद भी ये भारत की संस्कृति पर विजय नहीं पा सकी। इनकी अच्छी विचारधारा को भारतीय संस्कृति ने अपने अन्दर समाहित कर लिया।

इसी प्रकार की विचारधारा को दिनकर जी ने भी व्यक्त किया है - ‘भारतीय संस्कृति में जो एक प्रकार की विश्वसनीयता उत्पन्न हुई, वह संसार के लिए सचमुच वरदान है। इसके लिए सारा संसार उसका प्रशंसक रहा है। निःसंदेह वर्तमान में भी यही विचारधारा भारतीय संस्कृति को संपोषित कर रही है।

भारतवर्ष में भौगोलिक व सांस्कृतिक विविधता होते हुए भी यह देश अपनी एकता के लिए विख्यात है। इस देश को ’संसार का संक्षिप्त प्रतिरूप’ कहा गया है। यह धरती अनेक जनो वाली विविध भाषा, अनेक धर्म और यथेच्छ घरो वाली है। भाषा और धर्म देश में विविधता के आज भी लक्षण है। किन्तु वे एक सूत्रबद्ध है। भारतीय संस्कृति की ‘विविधता में एकता’ की विचारधारा पर रामधारी सिंह दिनकर लिखते हैं - ‘‘भारतवर्ष मे सभी जाति मिलकर एक अलग समाज का निर्माण करती हैं जैसे - कई प्रकार की औषधियों को कड़ाही में डालकर जब काढ़ा बनाते हैं तब उस काढ़ा  का स्वाद दूर एक औषधि के अलग स्वाद से सर्वथा भिन्न हो जाता है। असल में उस काढ़ा  का स्वाद सभी औषधियों के स्वादों के मिश्रण का परिणाम होता है। 

     भारतीय संस्कृति ने विश्व की किसी भी संस्कृति को हेय दृष्टि से नहीं देखा है। किसी को भी स्वयं से तुच्छ आंकना हमारी संस्कृति में सिखाया ही नहीं गया है. इसने अन्य सभ्यताओं के गुणों को आत्मसात करने के साथ-साथ उनके अवगुणों का परिष्कार भी किया है। यह हमारी ही संस्कृति है जो सच्चाई के लिए अगर मिटना जानती है तो अपनों का साथ देने के लिए मिटा देना भी जानती है. शायद यही कारण है कि हमारी संस्कृति वर्तमान में भी ज्यो की त्यों अपनी प्रसिद्धि बनाये हुए हैं। इस प्रकार हमारी संस्कृति विश्व की ओजस्वी संस्कृति है।

      

       डाॅ. हरिनारायण दुबे ने भारतीय संस्कृति पर प्रकाश डालते हुए लिखा है, कि ‘‘भारतीय संस्कृति का प्राणतत्व आध्यात्मिक है। इसमें ऐहिक एवं भौतिक सुखों की तुलना में आत्मिक अथवा पारलौकिक सुख के प्रति आग्रह देखा जा सकता है। भारतीय संस्कृति में धर्मान्धता का कोई स्थान नहीं है। इस संस्कृति की मूल विशेषता यह रही है कि व्यक्ति अपनी परिस्थितियों के अनुरूप मूल्यों की रक्षा करते हुए कोई भी मत, विचार अथवा धर्म अपना सकता है।"

" भारतीय संस्कृति की महत्वपूर्ण विरासत इसमें अंतर्निहित सहिष्णुता की भावना मानी जा सकती है। यद्यपि प्राचीन काल से ही भारत में अनेक धर्म एवं सम्प्रदाय रहे हैं किंतु इतिहास साक्षी है कि धर्म के नाम पर अत्याचार और रक्तपात प्राचीन भारत में नहीं हुआ. इस प्रकार भारत भूमि का यह सतत् सौभाग्य रहा है कि यहां अनादिकाल से मानवमात्र को ही नहीं वरन प्राणिमात्र को एकता एवं भाईचारे की भावना में जोड़ने की प्रबल संस्कृति प्रवाहमान है।"

   महान् साहित्यकार कवि और विद्वान् श्री रवींद्रनाथ टैगोर के अनुसार ‘‘भारतीय संस्कृति की आध्यात्म और मानवता की भावना अनुकरणीय है। भारतीय संस्कृति का दृष्टिकोण उदार और विशाल है क्योंकि मूलतः उसका विकास प्रकृति के स्वच्छन्द वातावरण में और उसके साथ सहयोग करते हुए हुआ है। इसी कारण भारतीय संस्कृति में सहयोग समन्वय, उदारता तथा समझौते की प्रवृत्ति मूलरूप से विद्यमान है।"

       " डाॅ. एल. पी. शर्मा ने भारतीय संस्कृति की व्याख्या करते हुए उसकी निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख किया है-          

भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम् संस्कृति है। 

भारतीय संस्कृति में विविधता होते हुए भी एकता विद्यमान है। 

भारतीय संस्कृति में धार्मिक सहिष्णुता सदैव रही है।

 भारतीय संस्कृति एक धर्म प्रधान संस्कृति है। 

भारतीय संस्कृति सदैव प्रगतिशील रही है। 

भारतीय संस्कृति में भौतिक और आध्यात्मिक प्रगति का मिश्रण है। 

भारतीय संस्कृति में विश्व बंधुत्व की भावना निहित है। 

भारतीय संस्कृति की प्रकृति सहयोगात्मक है.   

       

           इस प्रकार, विश्व बंधुत्व का संदेश देने वाली, वसुधैव कुटुंबकम की भावना संजोने वाली भारतीय संस्कृति आज स्वार्थ की राजनीति का शिकार होकर क्या इतना नीचे गिर जाएगी कि दूसरे की खुशियों को आग लगाकर अपनी दुनिया को रोशन करेगी. जिस संस्कृति में अतिथि तक को देवता का स्थान दिया गया है, उस संस्कृति में अपनी आने वाली पीढ़ी को अपने भाइयों के ही साथ भेदभाव की सीख दी जाएगी. तुलसी पूजन दिवस कह कर हिन्दुओं की भावनाएं उद्वेलित करने वाले धर्म के ठेकेदारों ने क्या अभी कार्तिक माह के पूरे महीने में माँ तुलसी की आराधना नहीं की है और फिर तुलसी हमारे लिए पूजनीय पौधा है क्या इसके लिए हम मात्र 25 दिसंबर को ही चुनेंगे और वो भी इसलिए कि क्रिसमस पर एक ट्री को सजा कर ईसाई अपनी खुशियाँ मनाते हैं. क्यूँ छोटा कर रहे हैं हिन्दू अपने हृदय की विशालता को, जो साल भर सत्कार पाने वाली माँ तुलसी को एक क्रिसमस ट्री के समक्ष खड़ा कर छोटा कर रहे हैं. संता के रूप में ईसाईयों के छोटे मासूम बच्चों की मासूमियत को क्यूँ अपनी राजनीति के लिए अपमानित करने की कोशिश कर रहे हैं? कहाँ तो विद्यालयों में राजनीति के प्रवेश तक का विरोध किया जाता था और कहां आज सत्ता के लिए, अपनी राजनीति चमकाने के लिए छोटे छोटे मासूम बच्चों की मासूमियत को कट्टरता में बदलने की कोशिश की जा रही है. इस तरह खतम हो जाएगा ये बचपन, ये समाज, ये देश और इस तरह ये सारी सभ्यता. 

          इसलिए मत संकीर्ण कीजिए खुद की सोच को, खुद के दिल के दरवाजे बंद मत कीजिए, हवाओं को आने दीजिए और सामाजिक समरसता, धार्मिक सौहार्दपूर्ण वातावरण बना रहने दीजिए, हिन्दू धर्मावलंबियों ने अभी श्री कृष्ण जन्माष्टमी, नवरात्रि, विजयादशमी, दीपावली आदि बहुत से त्योहार मनाए हैं और उसमें अपने ईसाई, मुस्लिम, सिख भाई - बहनों से बहुत सी हार्दिक शुभकामनाएं प्राप्त की हैं. तो अब अपना भी दिल खुला रखिए और खुले दिल से अपने ईसाई भाई बहनों को भी क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनाएं प्रेषित कीजिए. 

🌲🌹HAPPY CHRISTMAS 🌹🌲

द्वारा 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली)






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