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Written By shikha kaushik on मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011 | 1:38 am

गारंटी दीजिये

क्या रावन ने माता सीता क़ा हरण उनके परिधान देखकर किया था ?अथवा दुष्शासन ने देवी  द्रौपदी  क़ा चीर हरण उनके परिधान देखकर किया था ? या फूलन देवी के साथ अमानुषिक कुकृत्य करने वाले उसकी वेशभूषा को देखकर ऐसा करने के लिए प्रेरित हुए थे ?----सभी क़ा उत्तर मेरी द्रष्टि में ''नहीं'' है फिर क्यों हमारी पंचायतें बार-बार लड़कियों की वेशभूषा  को लेकर नए-नए फरमान निकाल रही हैं ?गाँव भैंसवाल  की बत्तीस खाप ने पूर्व में भी लड़कियों के मोबाईल फोन रखने को प्रतिबंधित कर एक बहस को जन्म दे दिया था वही गुरूवार [४-२-२०११] को पंचायत ने लड़कियों के जींस-टॉप व् मिनी स्कर्ट पहनने पर पाबन्दी लगाकर एक और नयी बहस को जन्म दे दिया .पंचायत क़ा मानना है कि  लड़कियों को पाश्चात्य   सभ्यता से प्रेरित होकर ऐसी वेशभूषा नहीं पहननी   चाहिए इससे छेड़छाड़   की घटनाये बढती है .ये बात तो मै भी मानती हूँ कि ''जैसा देश वैसा भेष ' के आधार पर हमारे गाँव में जींस-टॉप पहने लडकी को एक विचित्र   जीव की भांति देखा जाता है जबकि शहरों में यह स्थिति नहीं है .इसलिए लड़कियों को स्वयं   यह निर्णय लेने दे कि उन्हें कब -कहाँ-कैसे वस्त्र धारण करने हैं? कुछ लड़कियां मात्र आधुनिक दिखने की चाह में या अपने साथ की लड़कियों से अलग दिखनें के लिए ऐसी वेशभूषा धारण करती हैं जो उनके परिवार-समाज की आँखों में चुभने लगती है .लड़कियों को इस ओर खुद ध्यान देना होगा पर ऐसे तुगलकी  फरमान निकालने वाले क्या यह गारंटी दे सकते है कि जींस- टॉप -मिनी स्कर्ट की जगह साडी -सलवार-सूट पहनने वाली लड़की के साथ छेड़छाड़ नहीं होगी!     
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11 टिप्पणियाँ:

शालिनी कौशिक ने कहा…

वास्तव में ऐसे फरमान हमारे समाज की कमजोरी दिखाते हैं क्योंकि कपड़ों की गंदगी इन्हें चुभ जाती है नज़रों की गंदगी इनके दिल-ओ-दिमाग पर कोई असर नहीं कर पाती और उनपर इनकी चल भी नहीं पाती .बहुत सार्थक पोस्ट.

Atul Shrivastava ने कहा…

सही बात। इंसान की पहचान उसके विचारों से होती है। अगर मन में गलत विचार पनप रहे तो उससे कोई नहीं बच सकता। न सीता। न द्रौपदी। और न ही कोई और। ऐसे फरमान जारी करने वालों को पहले अपने गिरेबां में झांकना चाहिए।

Tarkeshwar Giri ने कहा…

Isme Sita aur Dropadi ka jikra kyon hain.

Dr. shyam gupta ने कहा…

नहीं पोस्ट-कार कन्फ़्यूज़्ड हैं----सीता व द्रोपदी आदि की व उनके समय ये घटनायें कम अनुपात में व कभी-कभी दुर्घटना के रूप में दुर्भाग्यवश होती थीं---- भड्कीले व अन्ग प्रदर्शक कपडों, मोबाइल पर व्यर्थ की बातें करने के मौके, अश्लील बातों के मौके से -आ बैल मुझे मार -की स्थितियां बनतीं हैं, और ये सब घटनायें जान बूझ कर ,प्रायोज़ित होने लगती हैं---क्या आप नहीं देख पारहे कि अधिकाधिक आधुनिक होने के साथ ये सारी घटनायें लगातार बढ रही हैं--- वास्तव में ये फ़रमान सही ही हैं--तुगलकी नहीं---हां कानून को हाथ में लेने का किसी को अधिकार नही है.( आखिर सरकार क्यों हेल्मेट पहनने का नियम बनातीं हैं--जिसे मरना है मरे..सरकार को क्या....

योगेन्द्र पाल ने कहा…

मैं भी डॉ श्याम गुप्ता जी की बात से सहमत हूँ (कमाल हो गया हमारे विचार मिल गए), यदि इस तरह के कपडे पहनने ही हैं तो सही जगह पहने जैसे कि गोवा के बीच पर मन हो तो न के बराबर पहनो कोई परेशान नहीं करने वाला, पर गांव में पहनने का अर्थ सिर्फ लड़कियों के पागलपन की निशानी ही दे सकता है जो कि किसी फिल्म या नाटक से उनके दिमाग में स्थान्तरित हुई है,

कपड़ो में शालीनता होनी चाहिए, ऐसा नहीं होना चाहिए कि आपके आस-पास के लोग शर्मिंदा महसूस करें, और आप किसी टॉप मोडल को भी लेंगे तो देखेंगे कि अधिकतर अपने काम के दौरान ही जरूरत के हिसाब से कपडे पहनती हैं, पर उसके बाद अपने सामान्य कपड़ों में ही मिलेंगी|

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

aisa nahin hai, aaj kal sabhi gils's college men ladakiyon ko salavar suit hi pahane ka niyam ban chuka hai lekin manushya apani pravritti se majaboor hai isake baad bhi college se kuchh door shohadon ka jamavada mil jata hai aur phabtiyan kasane se baj nahin aate. isamen kaun doshi hai?

Dr. shyam gupta ने कहा…

तो क्या नन्गे घूमने से यह सब बन्द होजायगा ? घटेगा या बढेगा ??????????????

शिखा कौशिक ने कहा…

aap sabhi ne apne vicharon se avgat karaya iske liye hardik dhanywad .
giri ji ne poocha hai ki yahan sita v draupdi ka jikr kyon hai ? main poochti hun ki kya seeta ka haran unke vastron ke karan hua ya fir draupdi ka cheer haran prasang unke vastron ke karan hua tha.jahan taq main aur bharatiya itihas janta hai vahan taq iske peechhe purush varchasva ki mansikta thi.purush dwara purush ko harane ke liye nari par atyachar kiya gaya lekin yahan keval sandarbh roop me iska ullekh kiya hai .
dr. gupt ji mante hain ki sita v draupdi ke yug me ye ghatnaye kabhi kabhi hoti thi aur yah yug alag hai .mera manna hai ki yug koi bhi ho striyon ko sadav purush satak samaj me doyam darje ka prani mana gaya hai .isliye uske vastron-chal-dhal sabhi par aakshep kiya jata hai .purush kya pahan rahe hain kabhi is par vichar kiya jata hai ?
maine apni post me saaf likha hai ki ladkiyon ko swayam nirnay lene de kab-kahan-kaise vastr pahnne hain par shaleen vastr dharan karne valee striyon ke sath jab chhedchhad jari hai to keval vastron ko aadhar bana kar aise talibani farmaan sunana sahi nahi hai .

Dr. shyam gupta ने कहा…

---नहीं शिखा जी , लडकियां स्वयं निर्णय ले रहीं हैं तब ही तो नन्गी घूम रहीं हैं, सामाजिक नियम, राज्य के कानून, कायदे, अदालतें क्यों होते हैं क्योंकि व्यक्ति स्वयं निर्णय नहीं ले पाता, अन्यथा अपराध होते ही क्यों....
--निश्चय ही स्त्रियां,अर्थात शक्ति, ऊर्ज़ा,कार्यकारी शक्ति- दोयम दर्ज़े पर ही रहनी चाहिये--मूल स्रज़क-तत्व,भाव-विचार तत्व, पुरुष, भाव-शक्ति से जो शक्ति,ऊर्ज़ा, कार्यकारीशक्ति को कार्य में प्रयोग में लाता है निश्चय ही प्रथम भाव होना चाहिये...तभी समाज में संतुलन रहेगा..
--- वास्तव में यदि रामायण व महाभारत के निहितार्थ व गूढ अर्थ देखे जायं तो--->द्रौपदी-अपने उद्दन्ड कर्म के कारण अपमानित हुई और महायुद्ध का कारण बनी---सीता..अपने संदेह व मर्यादा पार करने के कारण अपहरित हुई ...नारी का मर्यादा पार करना सदा ही विछोभ का कारण बना है...
---जहां तक पुरुषों की बात है उन्हें भी कौन नन्गा घूमने देता है, अभद्र आचरण वाले पुरुषॊं को कौन सा समाज प्रताडित नहीं करता...आज भी बिचित्र वेश-भूषा बाले पुरुषों का कौन मज़ाक नहीं बनाता...
---आप लोग अत्यधिक भ्रम में हैं--यह कोई स्त्री-पुरुष का प्रश्न नहीं है अपितु...मानव आचरण का , लालच का, अति-सुविधाभोगी जीवन स्तर का प्रश्न है..

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

कमबख़्तो ! सीता माता को इल्ज़ाम न दो
@ शिखा जी ! सबसे पहले तो मैं आपको मुबारकबाद देना चाहता हूँ एक अच्छी पोस्ट ब्लाग जगत को देने के लिए और निंदा करता हूँ उन लोगों की जो औरत को समाज में कमजोर और मर्द का गुलाम देखना चाहते हैं जैसे कि हिंदू सभ्यता के जानकार श्री श्याम गुप्ता जी औरत को समाज में दोयम दर्जे पर देखना ही नहीं चाहते बल्कि रखे हुए भी हैं ।
इसके बाद मैं यह कहना चाहता हूँ कि हमारे समाज और हमारे कानून ने लड़कियों को यह अधिकार दे रखा है कि वे अपनी मर्जी से कपड़े पहन ही नहीं सकतीं बल्कि उतार भी सकती हैं ।
गाँव का समाज अपनी जरूरतों के हिसाब से चलता है और चाहता है कि जहाँ तक हो सके सीता सुरक्षित रहे ।
श्याम जी ने मेरी सीता माता को मर्यादा का उल्लंघन करने वाली कहकर महापाप किया है ।

'हा लक्ष्मण !' की आवाज सुनकर उन्होंने वही किया जो एक ऐसी औरत ही कर सकती है जिसे अपने पति से अपने प्राणों से भी ज्यादा प्यार हो ।

अफ़सोस ! श्री श्याम जी डाक्टर होने के बावजूद सीता माता के त्याग और बलिदान को न समझ पाए।

इन बातों की समझ सिर्फ़ अनवर जमाल जैसे मुसलमानों को होती ही है।

योगेन्द्र पाल ने कहा…

शिखा जी मैं माफी चाहूँगा कि मैंने आपके दुसरे ब्लॉग पर यह सोच कर कमेन्ट किया कि आपने मेरे कमेन्ट को प्रकाशित नहीं किया, असल में एक लेख को २ जगह पोस्ट किया है इसलिए मुझे समझ में नहीं आया कि मैंने कहाँ पर कमेन्ट किया था?

पर एक बात मुझे जरूर समझ में नहीं आती है क आखिर क्यूँ कुछ ब्लोगर अपनी पोस्ट को दो जगह लिखते हैं?

क्या आपको नहीं लगता कि all india bloggers association के कर्तव्य को निश्चित किये जाने की जरूरत है, क्यूंकि ब्लोगर अपना ब्लॉग तो खुद ही बना सकते हैं, क्या आप (रविन्द्र प्रभात) कुछ और करने वाले हैं? जैसे कि ब्लोगरों के अधिकारों के लिए कुछ या उनके भले के लिए कोई और कार्य? यदि नहीं तो ऐसी एसोसिअशन का भला क्या फायदा जो एक ही लेख को तीन-तीन जगह लिखवाये?

रविन्द्र जी इस बारे में सोचें या फिर ये नियम बनाएँ कि कोई भी सिर्फ वही लेख यहाँ दे सकता है जो उसने कहीं ऑर नहीं लिखा हो- कुछ कीजिये मैं एक ही लेख को कई जगह नहीं देखना चाहता और शायद मेरे जैसे ऑर भी होंगे

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