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सुगंधा मिश्रा को तीसरा तोहफा

Written By Pappu Parihar Bundelkhandi on शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011 | 5:38 am




तेरे इस नए,
अंदाज़ की,
तारीफ़,
मिलेगी तुझे,

तेरी काबलियत पे,
यकीन,
पक्का है,
मुझे,

तेरा अंदाज़,
अनोखा है,
तुझे आज,
शायरी करते,
देखा है,

इतनी आदयें,
हैं तुझमें,
तेरी अदाकारी,
का फन,
आज देखा है,

कायल हुआ,
घायल हुआ,
आवाज़ के साथ,
अंदाज़ के साथ,
मिमिक्री के साथ,
हंसने के साथ,
हंसाने के साथ,
आदकारी के साथ,
लाज़बाब हुआ,
खुश-ओ-आब हुआ,

.

कण्ठ इनका सुरीला है

Written By Pappu Parihar Bundelkhandi on सोमवार, 22 अगस्त 2011 | 10:57 pm




कण्ठ इनका सुरीला है,
मिसरी की डली से गीला है,
माता सरस्वती का आशीर्वाद है इनको,
बड़े बुजुर्गों का साथ है इनको,

तालीम इनकी हुई है अच्छी,
मेहनत भी इन्होने की है सच्ची,

किसी रूह की खास पहचान होती है,
दिल साफ़, मीठी जुबान होती है,

इनको तो नाद की सिद्धि हुई है,
नाभि से उठकर, कण्ठ तक वृद्धि हुई है,


.



एक तोहफा - 2

Written By Pappu Parihar Bundelkhandi on सोमवार, 25 जुलाई 2011 | 2:49 pm


सुगंधा मिश्रा को एक तोहफा
Sugandha Mishra

बात जज्बातों की सुरों में पिरोना |
आवाज़ से सजाना, उसको गाना |
अंदाज़ ये तुम्हारा, दिल पे छाना |
सबको है भाता तुम्हारा यूँ  गाना || १ ||

हुश्न भी पाया है, आवाज़ भी पायी है |
अदा भी पायी है, अदाकारी भी पायी हैं || २ ||

सबसे बड़ी बात है की, जज्बातों की कदर करती हो |
दूसरों के दिल की बात को, अपने दिल से सुनती हो || ३ ||

ये नवाजिस खुदा सबको नहीं देता है |
किसी खास को ही यह तोहफा देता है || ४ ||

तुम पर खुदा की मेहर बनी रहे |
हम पर तुम्हारी नज़र बनी रहे || ५ ||

इदरिसे हसन्नुम, उसका तरन्नुम, क्या सुना |
वक्त-ए-हाल, मुनासिब ख्याल, उसका क्या सुना |
आदि-से-हलक, उसका हलकान क्या सुना |
सुर-ए-नाज़ुक, गले-ए-सुरमाई, उसका क्या सुना || ६ ||
नाभि से सुर उठा, नाद होकर |
छुआ दिल को, अहसास होकर |
कंठ से निकला, सुरीला होकर |
सुगंधा ने गाया,  सुगन्धित होकर |
सबने ने सुना, आनंदित होकर || ७ ||

खता माफ़ करना, यूँ अब रुका जाता नहीं है |
बरबस तेरी तारीफ़ में, शेर निकल आता है || ८ ||

क्या करून तू है ऐसी, तेरी खूबसूरती तेरी शोखी |
तारीफ़ तेरी करून, ऐसा एक जोश-सा देती तोखी || ९ ||

तारीफ़ करता हूँ, तू वफादार है अपने हुनर से |
रोज़ करती है रियाज़, बिना किसी न नुकर से || १० ||
खुसबू बिखेरती हो, सभी के आँगन में, सुगंधा नाम है, तुम्हारा |
आवाज़-ए-सुगन्ध और फुहार-ए-हंसी पर इख्तियार है, तुम्हारा || ११ ||
.

एक तोहफा - 1

Written By Pappu Parihar Bundelkhandi on शुक्रवार, 8 जुलाई 2011 | 9:49 pm



सुगंधा मिश्रा को एक तोहफा
Sugandha Mishra

बा खुदा तुझे उसने आवाज़ से जो नवाज़ा |
खूबसूरत भी बनाया, अंदाज़ से भी नवाज़ा |
सोखी दी, सरगोशी भी दी, अदा से नवाज़ा |
निगाहों से आबाद किया, अदब से नवाज़ा || १ ||


तुझे हुश्न बक्शा खुदा ने और नजाकत भी दी है |
तेरी आवाज़ भी खुदा ने तुझे एक तोहफे में दी है || २ ||

ए हुश्न तुझे किस पर नाज़ है |
तेरी आवाज़ भी लाज़वाब है |
बस प्यार की एक नज़र की दरकार है |
तुझे देखने का अरमा बेक़रार है || ३ ||

आवाज़ सुनी है तेरी, जबसे |
भूल गया आलम को, तबसे |
जहाँ में कहूं मैं ये, किससे |
तभी तो कह रहा हूँ, तुझसे || ४ ||

आवाज़ की खनक भी पायी है |
बेपनाह हुश्न भी पाया है |
शोखी और अदा भी पायी है |
तुम्हें तो खुदा ने बड़े नाज़ों से बनाया है || ५ ||

हर तरफ किस्से हैं, तेरी सोखी के, तेरी आवाज़ के |
तेरे हुश्न के और तेरी अदा के, तेरी अदावत के |
जमाना बात करता है, कि तू सबके दिल का हाल जान लेती है |
वक्त को तू पहचान लेती है, तभी तो तू सबको मान देती है |
ऐसी बात सभी में नहीं होती है, पर बात तेरी अनोखी है |
क्यूँकि खुदा ने तुझको, खूबसूरती और आवाज़ दोनों एक साथ बक्शी है || ६ ||

तेरे दीवानों में, एक मेरा भी नाम लिख ले |
दीवाना हूँ, दीवानगी का परवाना हूँ, चाहे तो परख ले |
कभी मुलाकात की तो, जुस्तजू पूरी होगी नहीं |
हम तो हैं बहुत दूर, और तू बहुत दूर होगी कहीं || ७ ||

पर तेरी आवाज़ और तेरी तस्वीर पास है मेरे |
ताउम्र, जिन्दगी गुज़ार लूँगा, उसी के सहारे |
आवाज़ तेरी, सब गम भुला देती है |
इस जहां से, किसी और जहाँ में पंहुचा देती है || ८ ||

तू गाती रहे, इसी तरह ये दुआ करता हूँ खुदा से |
तेरी खूबसूरती बनी रहे, ये दुआ करता हूँ खुदा से |
तेरी सूरत खूबसूरत है, पर तेरी सीरत उससे भी ज्यादा खूबसूरत है |
तेरे दिल के साफ़, आईने में, सब की दिल की बात नज़र आती है || ९ ||

सुन लेता हूँ तेरी आवाज़, काट लेता हूँ दिन और रात |
दोस्त पूछते, क्या है तेरी, बेतल्खी के राज़ की बात || १० ||

बहुत सुलझी हो और बहुत समझदार हो |
वक्त को पहचानती हो और बहुत मददगार हो || ११ ||


तेरी सोखी का, तेरी अदा का,
तेरी पैमाइश का, तेरी मुश्कान का,
तेरी फनकारी का,
दाद देता है जमाना |
तू महकती रहे, तू चहकती रहे,
तू खुसबू बिखेरती रहे,
तेरी आवाज़ की मिठास से प्यास बुझाता है जमाना || १२ ||
 

Founder

Founder
Saleem Khan