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Life is Just a Life: मैं, तुम और हम Main Tum aur Hum

Written By नीरज द्विवेदी on बुधवार, 9 अप्रैल 2014 | 8:43 am

Life is Just a Life: मैं, तुम और हम Main Tum aur Hum: मैं, तुम और हम होने का एहसास उस वक्त जब हम, हम नहीं थे मैं और तुम थे, उस वक्त जब आसमां के टुकड़े टुकड़े हो चुके थे और हर टुक...

श्री रामचन्द्र जी के साथ यह अन्याय क्यों?

Written By DR. ANWER JAMAL on सोमवार, 7 अप्रैल 2014 | 12:17 pm

चाय के ठेले पर विकास पुरूष

के बाद अब एक अहम सवाल
श्री रामचन्द्र जी के साथ यह अन्याय क्यों?
सांप्रदायिक तत्व धर्म के झंडे लेकर चलते हैं लेकिन मक़सद अपने पूरे करते हैं जो कि धर्म के खि़लाफ़ होते हैं। इसीलिए ये धार्मिक सत्पुरूषों को पीछे धकेलते रहते हैं।
राम मंदिर का मुददा गर्माने और भुनाने वाालों ने प्रधानमंत्री पद के लिए रामचन्द्र जी के वंश में से किसी का नाम आगे क्यों नहीं बढ़ाया?
क्या इन सांप्रदायिक तत्वों को श्री रामचन्द्र जी की सन्तान में कोई योग्य व्यक्ति ही नज़र नहीं आया या फिर उन्हें गुमनामी के अंधेरे में धकेलने वाले यही तत्व हैं?
रामकथा के अनुसार सारी धरती मनु को दी गई थाी और इसी उत्तराधिकार क्रम में यह श्री रामचन्द्र जी को मिली थी लेकिन आज उनके उत्तराधिकारी वंशजों के नाम दुनिया वाले तो क्या स्वयं भारत में उनके श्रद्धालु भी नहीं पहचानते।
श्री रामचन्द्र जी के साथ यह अन्याय क्यों?
यही बात मुसलमानों को भी समझ लेनी चाहिए कि उनके लीडर किसी दीनदार आलिम को अपना रहबर क्यों नहीं मान लेते?
इसके पीछे भी यही कारण है कि ये लीडर दीन के मक़सद को नहीं जो कि अमन और भाईचारा है बल्कि अपने लालच को पूरा करने में जुटे हुए हैं।
चुनाव का मौक़ा इन मौक़ापरस्तों को पहचानने का महापर्व होता है। जनता इन्हें अच्छी तरह पहचान रही है।

Life is Just a Life: समर्पण Samarpan

Written By नीरज द्विवेदी on मंगलवार, 1 अप्रैल 2014 | 8:41 pm

Life is Just a Life: समर्पण Samarpan: समर्पण मैंने कभी नहीं चाहा कि तुम बदलो कभी रत्ती भर भी मेरे लिए, हाँ बुरा लगा है मुझे कई बार बताया भी तुम्हे खुद को समझा...

वीर जवानों को नमन

Written By Mithilesh dubey on सोमवार, 24 मार्च 2014 | 8:35 pm

कपकपाती ठण्ड में
जो कभी ठहरा नहीं
चिलचिलाती धूप में
जो कभी थमा नहीं

गोलियों की बौछार में
जो कभी डरा नहीं
बारूदी धमाकों से
जो कभी दहला नहीं

अनगिनत लाशों में
जो कभी सहमा नहीं
फर्ज के सामने
जो कभी डिगा नहीं

आंसुओं के सैलाब से
जो कभी पिघला नहीं
देश के आन ,मान ,शान में
मिटने से जो कभी पीछे हटा नहीं

ऐसे वीर जवानों को
शत -शत नमन ।।

प्रेम व चुइंग-गम

Written By मुकेश कुमार सिन्हा on शनिवार, 22 मार्च 2014 | 10:00 am



कल जब टहल रहा था सड़कों पर

तो मुंह में थी चुइंग-गम

और मन में उभरी एक सोच

क्या ढाई अक्षर का प्यार

और चुइंग-गम है नहीं पर्यायवाची ?

नवजीवन की नई सोच !

फिर चूंकि सोच को देनी थी सहमति

इसलिए मुंह में घुलने लगा चुइंग गम !


देखो न शुरुआत में अधिक मिठास

जैसे मुंह से निकलती मीठी “आई लव यू” की आवाज

अंतर तक जाते ठंडे-ठंडे प्यारे एहसास

वाह रे मिंट और मिठास


कुछ वक्त तक चुइंग-गम का मुंह में घुलना

जैसे कुछ समय तक प्यार का

दो दिलों के भीतर प्यारे से एहसास को

तरंगित करते हुए महसूसना ...


पर समय के साथ

यही मिठास और ठंडे एहसास

घूल कर रिस जाते हैं

रह जाती है इलास्टिक खिंचवाट

जो न देती है उगलने, न ही निगलने

उगलो तो कहीं चिपकेगा

निगले तो सितम ढाएगा


ऐसा ही कुछ गुल खिलता है

ये आज का प्यार

और मुंह में डाला हुआ चुइंग गम !


जो फिर भी होता है सबका पसंदीदा

आखिर वो पहला मिठास

और तरंगित खूबसूरत एहसास

है न सबकी जरूरत !!



अंत में मेरी छोटी बहन ने मेरी एक रचना "चाय का एक कप" को स्वर दिया है, आप सब के लिए : -





Life is Just a Life: जब अपना मोदी आयेगा Jab Apna Modi Ayega

Written By नीरज द्विवेदी on शुक्रवार, 21 मार्च 2014 | 9:14 pm

Life is Just a Life: जब अपना मोदी आयेगा Jab Apna Modi Ayega: जब अपना मोदी आयेगा वो चाँद उधारी लेकर निकला आम आदमी सा, भोले तारों को छलकर बन बैठा खास आदमी सा, भूल गया है समयचक्र रातों का अंत सु...

Life is Just a Life: मेरे विश्वास Mere Vishwas

Written By नीरज द्विवेदी on मंगलवार, 18 मार्च 2014 | 9:47 pm

Life is Just a Life: मेरे विश्वास Mere Vishwas: मेरे विश्वास अब नहीं गिनना चाहता मैं मात्राएँ बनाने को छंद, बुनने को अपने द्वंद, क्यों सहारा लूँ पन्नों का क्यों बहा दूँ अपनी ...

Life is Just a Life: गरजने वाले अक्सर बरसते नहीं Garjane wale aksar bar...

Written By नीरज द्विवेदी on सोमवार, 10 मार्च 2014 | 11:10 pm

Life is Just a Life: गरजने वाले अक्सर बरसते नहीं Garjane wale aksar bar...: गरजने वाले अक्सर बरसते नहीं मुझे पता है, गरजने वाले अक्सर बरसते नहीं, पर तुम्हें पता है, वो बरसते नहीं या बरस नहीं पाते? उनक...

जौनपुर की पहली अंग्रेजी वेबसाइट अब आपके सामने है |

Written By एस एम् मासूम on शनिवार, 15 फ़रवरी 2014 | 9:05 am


जौनपुर की website दो भाषाओँ में २०१० मई से आप सब के सामने है | इसे समय समय पे  जौनपुर वासियों की आवश्यकताओं को देखते हुए नवीनीकरण किया जाता रहा है |  हिंदी की website जहां पूर्वांचल में अधिक देखी जाती है तो अंग्रेजी की वेबसाइट की आवाज़ पूरे विश्व में अधिक पहुँचती है |

आज तक कई लाख लोग इन वेबसाइट को देख चुके हैं और जौनपुर वासियों के सहयोग से इसके पाठकों में हर दिन वृधि होती जा रही है |

अंग्रेजी की नयी website अपने आपमें बहुत से नए विकल्प ले के आयी है जिसे  समय के साथ साथ जौनपुर के लोगों की सुविधा को देखते हुए जोड़ा गया है | कुछ नए विकल्प आपके सामने हैं जिन्हें आप भी देखें | इनके बारे में लोगों को बताएं और इसका इस्तेमाल करके फायदा उठाएं और इस से जुड़ के जौनपुर का गौरव बढायें |

आपकी आवाज़ और जौनपुर का इतिहास पूरी दुनिया तक पहुंचाती इस website के नए आवरण को अवश्य देखें |
हिंदी http://www.hamarajaunpur.com/
English http://jaunpurcity.in/

1. जौनपुर वासियों की सुविधा के लिए हमेशा से एक डायरेक्टरी की कमी महसूस की जाती रही है | अंग्रेजी की website में इसे yellow page option में जोड़ा गया है |

यदि आप किसी तरह का व्यापार करते हैं या सामाजिक कार्य करते हैं तो उसे  यहाँ मुफ्त में जुड़वा के दुनिया को और जौनपुर के लोगों को बताएं | यह आपके व्यापार को बढाने में सहायक होगा |

आपके  व्यापार इत्यादि को जुड़ने के लिए आप संचालक श्री एस एम् मासूम को इ मेल या एस एम् एस कर सकते है या फिर जौनपुर बाज़ार के facebook पेज पे जा के उसे लिख दें | जल्द से जल्द उसे मुफ्त सेवा के वायदे के अनुसार जल्द से जल्द जोड़ दिया जायेगा |

२)  जौनपुर की इस दो भाषाओँ में शुरू की गयी वेबसाइट का मकसद धन कमाना नहीं बल्कि जौनपुर को दुनिया से जोड़ना है इसलिए विज्ञापन  की सुविधा अभी तक नहीं दी गयी थी लेकिन जौनपुर के लोगों के अनुरोध पे इसे अभी हिंदी की वेबसाइट पे शुरू किया जा रहा है जिसमे विज्ञापन के दर बहुत कम होंगे जिससे की इस सुविधा का लाभ छोटा व्यापारी भी उठा सके | आप यहाँ इसके बारे में जान सकते हैं |

३. अंग्रेजी की website पे पहले लोगों को पुराने लेख इत्यादि तलाशने में असुविधा हुआ करती थी जिसे देखते हुए इसमें बहुत से नए section जोड़े गए हैं जैसे history, news, society,lifestyle, notable jaunpuri इत्यादि जिस से अब आप एक क्लिक से ही बहुत से जानकारी पहले पेज पे ही पा सकते हैं |


४. जौनपुर की यह दोनों website को अब आप अपने मोबाइल से भी आसानी से देख सकते हैं |

5. आपका गाँव आपको अवश्य प्यारा होगा और दुनिया तक उसकी तस्वीरें वहाँ के लोगों के बारे में दुनिया को बताने का मन भी करता होगा तो इंतज़ार आपका अब ख़त्म हुआ | फ़ौरन लिखें संचालक एस एम् मासूम को और भेजें आने गाँव के बारे में तस्वीरों के साथ |

आपके सुझावों का स्वागत है और सहयोग की आशा | आभार संचालक - एस एम् मासूम
facebook

जौनपुर बाज़ार पेज : https://www.facebook.com/jaunpurbazaar

जौनपुर शहर पेज https://www.facebook.com/jaunpurshahar

जौनपुर के विडियो देखें http://www.youtube.com/user/payameamn

साभार - एस एम् मासूम

Life is Just a Life: क्षणिका – एहसास

Written By नीरज द्विवेदी on रविवार, 2 फ़रवरी 2014 | 1:21 pm

Life is Just a Life: क्षणिका – एहसास: क्षणिका – एहसास

बापस कर दो मुझे
मेरे एहसास
मेरी स्वांस
थक चुका हूँ मैं
नाचते नाचते
शब्दों के इशारों पर
पन्नों के सहारों पर
कठपुतली की तरह … नीरज 

खबरगंगा: आदिवासी पंचायतों की वैधानिकता का सवाल

Written By devendra gautam on शनिवार, 1 फ़रवरी 2014 | 10:43 pm

आदिवासी पंचायतों की वैधानिकता का सवाल

वीरभूम जिले में पंचायत के  आदेश पर घटित सामुहिक बलात्कार कांड पर पश्चिम बंगाल के  राज्यपाल एमके० नारायणन ने देश भर में इस तरह के गैर कानूनी अदालत को  बंद करने की अपील की है। 

DEVENDRAउन्होंने यह अपील राज्यपाल की हैसियत से की है अथवा एक संवेदनशील भारतीय नागरिक की हैसियत से अपने अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का प्रयोग करते हुए यह तो  पता नहीं लेकिन इसके  अंदर प्रशासनिक नज़रिये की जगह इस घटना से उपजा हुआ क्षोभ और आक्रोश ही दिखाई  पड़ रहा है। यदि उनकी अपील पर देश के  तमाम राज्यों  की सरकारें  अमल करती हैं तों ¨ यह सत्ता के विकेन्द्रीकरण की अवधारणा और पंचायती राज व्यवस्था की परिकल्पना के  विपरीत होगा ।
निश्चित रूप से यह घटना अ्त्यंत निंदनीय, अमानवीय और  शर्मनाक है। इसकी जितनी भी भर्त्सना  की जाये कम है। लेकिन इस एक फैसले से किसी एक पूरी संस्था के  वजूद के   नकारा जाना उचित नहीं है। बल्कि इस संस्था की गड़बडियों के  दुरुस्त करने पर विचार किया जाना चाहिए। भुक्तभोगी आदिवासी युवती का दोष सिर्फ इतना था कि वह समुदाय के  बाहर के  युवक से प्रेम करती थी। प्रेम करना किसी मायने में अपराध की श्रेणी में नहीं आता। इक्कीसवीं सदी में भी इतनी दकियानुसी सोच  का विद्यमान होना  इस बात की अलामत है कि पिछड़े समाजों के  ऊपर उठाने की अबतक की तमाम सरकारी गैर सरकारी को¨शिशें व्यर्थ गई हैं।
युवती का मां-बाप का दोष यह था कि वे गरीब थे और पंचायत के  25 हजार रुपये का दंड भरने की उनकी हैसियत नहीं थी। जाहिर तौर  पर पंच स्थानीय थे और उन्हें भुक्तभोगी परिवार की माली हालत की जानकारी रही होगी। फिर इतनी बड़ी रकम का दंड  लगाना उनकी कुत्सित मानसिकता का ही परिचायक था। माता पिता के  दंड भरने में असमर्थता जताने पर पंचायत ने आदिवासी युवती के  साथ सामुहिक बलात्कार का फरमान जारी कर दिया गया और  उसके आस पडोस के  ग्रामीण इसे अंजाम देने लगे। यह फरमान गैर कानूनी ही नहीं क्रूर और  पूरी तरह आपराधिक माना जाना चाहिए। इसे सामंती दबंगई का एक नमूना ही कहा जा सकता है। घटना के  कई दिन¨ बाद इस अपराध के लिए बलात्कार के 13 आरोपियों  के¨ न्यायिक हिरासत में लिया गया।
गिरफ्तारी में विलंब होने पर जिले के पुलिस कप्तान का तबादला कर दिया गया। लेकिन उन पंचों के कटघरे में खड़ा नहीं किया गया जिन्होंने यह शर्मनाक फैसला सुनाया था। उनकी भी गिरफ्तारी हो¨नी चाहिए। उनपर भी मुकदमा चलाया जाना चाहिए। इस घटना के लिए वे भी उतना ही दोषी हैं जितना उनके फैसले के अमली जामा पहनाने वाले युवती के आस-पडोस  के ग्राणीण। यदि राज्यपाल महोदय ने फरमान जारी करने वाले पंचों  की भी गिरफ्तारी का आदेश दिया होता तो  इसका स्वागत किया जाता। इसका संदेश दूर-दूर तक जाता। पंचायती राज के लिए यह एक नज़ीर बनता। तमा्म जातीय पंचायतों  के गैर कानूनी करार दिया जाना कहीं से भी उचित नहीं है।
आदिवासियों  की पड़हा पंचायत और  मानकी मुंडा प्रशासन के  ब्रिटिश सरकार के  जमाने में ही कानूनी मान्यता मिल गई थी। इसके लिए आदिवासी इलाके में कितने ही आंदोलन हुए। कुर्बानियां दी गईं। उन्हें एक सिरे से गैरकानूनी कहकर प्रतिबंधित कर देना न उचित है न संभव। जिस पंचायत ने यह क्रूर फैसला दिया उसकी कुछ न कुछ वैधानिक हैसियत तो अवश्य रही होगी। वे आदिवासियों  की पारंपरिक व्यवस्था के  तहत मान्यता प्राप्त पंच रहे हैं अथवा पंचायती राज व्यवस्था के  तहत चुने हुए मुखिया सरपंच। गांव समाज के खुद मुख्तार नेता रहे है अथवा ज¨ भी रहे है। उनका जो  भी स्वरूप रहा हो  लेकिन उन्हें पूरी तरह गैरकानूनी तो  नहीं करार दिया जा सकता।
आदिवासी पंचायतें कठोर  दंड देने के  लिए जरूर चर्चे में रही हैं। उनके  यहां डायन-विसाही के आरोप  में महिलाओं  को  मैला पिलाने, नंगा घुमाने का चलन रहा है लेकिन स्त्रियों की आबरू से खेलना उनकी संस्कृति या पारंपरिक दंड संहिता में शामिल नहीं रहा है। संभवतः यह पहला मौका है जब पूर्वांचल के किसी आदिवासी पंचायत ने हरियाणा की खाफ पंचायतो  की तर्ज पर फैसला किया है। इसके  पीछे कौन सी मानसिकता काम कर रही थी। आदिवासी समाज के  अंदर यह विकृति किधर से आयातित है रही है, इस पर गंभीरतापूर्वक विचार किये जाने की जरूरत है।
एक कड़वा सच यह भी है कि हमारे देश की न्याय व्यवस्था इतनी पेंचीदी है कि छोटे –छोटे  मामलें  का फैसला आने में भी कई-कई साल लग जाते हैं। न्याय मिलता भी है त¨ इतने विलंब से कि उससे संतुष्टि या असंतुष्टि के  भाव ही तिर¨हित ह¨ जाते हैं। फरियादी अदालते  के चक्कर लगाता-लगाता पूरी जवानी काटकर बूढ़ा है जाता है।
कभी-कभी तो  फैसला आने तक उसकी आयु ही समाप्त है  जाती है। आरो¨पी भी जमानत पर घूमते-घूमते दंड पाने से पहले ही स्वर्ग सिधार जाते हैं। न मुद्दई बचता है न मुदालय। बच जाते हैं सिर्फ मुकदमें ज¨ तारीख दर तारीख खिंचते चले जाते हैं। क¨यलांचल क¢ बहुर्चिर्चत दास हत्याकांड का फैसला आने आने में कई दशक निकल गए थे। तब तक सारे मुख्य आरोपियों का देहांत हो  चुका था। उनकी जगह परिवादियों  की सूची में शामिल किये उनके  भाई बंधु आजीवन कारावास के  भागी बने। ऐसे सैकडों उदाहरण हैं।
हमारी विलंबित न्याय प्रणाली के कारण ही नक्सल प्रभावित इलाका  में त्वरित फैसला करने वाली नक्सलियों  की जन अदालतें लगाकर  मान्य होती रही हैं। लोग अपनी फरियाद लेकर थाना और कोर्ट -कचहरी का चक्कर लगाने की जगह नक्सलियों  की कमेटियों  में अर्जी देने लगे हैं। उनका कई  वैधानिक अस्तित्व भले नहीं है  लेकिन उनके  इलाके में उनके प्रति एक किस्म की आस्था दिखाई देती है तो  यह हमारी न्याय प्रणाली की कमियों के  कारण ही। नक्सली न भारतीय संविधान के  मानते हैं न दंड संहिता के । उनका अपना अलग जंगल का कानून चलता है।
ग्राम स्तर पर मिल बैठकर मामलों  के  निपटाने की यह क¨ई नई व्यवस्था नहीं है। यह परंपरा प्राचीन काल से ही भारत में प्रचलित रही है। यहां पंच के  परमेश्वर का दर्जा दिया जाता रहा है। महात्मा गांधी भी पंचायती राज व्यवस्था क¨ ग्राम स्वराज का आधार मानते थे। वे सत्ता के  विकेद्रीकरण के हिमायती थे। तमाम राजनैतिक पार्टियां ग्राम पंचायतों को शक्ति संपन्न बनाने की वकालत करती हैं।
राज्यपाल महोदय ने जिस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त की है वह सत्ता के केंद्रीकरण की दिशा में संकेत देता है। यह राजतंत्र अथवा तानाशाही की व्यवस्था में ही संभव है। ल¨कतांत्रिक व्यवस्था में विकेद्रीकरण का महत्व है। तब यह जरूरी है कि सत्ता की छो¨टी से छोटी इकाइयां भी एक नियम के तहत चलें। एक दंड विधान है  जिसका हर स्तर पर पालन है। अपराध और  सज़ा के बीच एक तारतम्य है । तमाम फैसले समाज के मान्य है ।
गलत, पक्षपातपूर्ण, मनमाने और  विधान के विरुद्ध फैसले सुनाने वालों  पर कार्रवाई का प्रावधान भी होना चाहिए। मेहनत मजदूरी करके  गुजारा करने वालों  पर छोटी-छोटी गल्ती के लिए बड़ी-बड़ी राशियों  का आर्थिक दंड लादा जाना अराजकता और मनमानी का प्रतीक है।
निश्चित रूप से विकेद्रीकरण अच्छी चीज है लेकिन इसके  नाम पर अराजकता और  वर्वरता के ¨ प्रश्रय नहीं दिया जा सकता। किसी युवती के  साथ सामुहिक बलात्कार करने का आदेश मध्ययुगीन बर्बर समाज¨ में भी नहीं दिया जाता था। यह पूरी तरह आपराधिक कृत्य है। ऐसा फरमान जारी करने करने वाले के  खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई तो  भविष्य में भी इस तरह के  फरमान जारी किये जा सकते हैं।
लेकिन यदि किसी एक पंचायत ने अपने ही पंचायत की बेटी के साथ इस तरह का अमानुषिक फैसला दिया तो इसके  कारण आदिवासियों  की पूरी परंपरागत स्वशासन की व्यवस्था का  गैरकानूनी करार देकर प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता। उस पंचायती इकाई क¨ भले भंग कर दिया जाए लेकिन पूरी व्यवस्था के  ध्वस्त नहीं किया जा सकता।
देवेंद्र गौतम 



खबरगंगा: आदिवासी पंचायतों की वैधानिकता का सवाल

Life is Just a Life: क्षणिका – खून भारत का

Written By नीरज द्विवेदी on शुक्रवार, 31 जनवरी 2014 | 10:16 pm

Life is Just a Life: क्षणिका – खून भारत का: क्षणिका – खून भारत का काश ... अश्रु निकलने और मोमबत्तियां बननी बंद हो जायें ... तब तो भारत का खून जलेगा, उबलेगा, खौलेग...

Life is Just a Life: क्षणिका – घुंघुरू

Written By नीरज द्विवेदी on सोमवार, 27 जनवरी 2014 | 10:57 pm

Life is Just a Life: क्षणिका – घुंघुरू: क्षणिका – घुंघुरू बाँध दिए मेरे पैरों में घुंघुरू शब्दों के और उसने जाते जाते छीन लिए एहसास कहा अब नाचों और मैं नाचने भी ल...

Life is Just a Life: क्षणिका – महँगी धरती

Written By नीरज द्विवेदी on रविवार, 26 जनवरी 2014 | 6:14 pm

Life is Just a Life: क्षणिका – महँगी धरती: क्षणिका – महँगी धरती कल धरती पर जो लुट जाती थी वो जान लूट ली जाती आज ... कल भी धरती महँगी थी आज भी धरती...

Life is Just a Life: क्षणिका – महँगी धरती

Life is Just a Life: क्षणिका – महँगी धरती: क्षणिका – महँगी धरती कल धरती पर जो लुट जाती थी वो जान लूट ली जाती आज ... कल भी धरती महँगी थी आज भी धरती...

अपनी पहचान बड़ी बात है

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on शनिवार, 25 जनवरी 2014 | 3:15 pm

इन्सान अगर मिर्च खाता है तो वह ये सोच कर ही खाता है कि इसमें मिर्च होगी. शक्कर भी यही सोच के खाई जाती है. सोचिये अगर मिर्च खाने के बाद हमे स्वाद आये शक्कर का या नमकीन का या खारा या कोई और, तब क्या होगा? हम फिर शक्कर क्यों खायेंगे. कोई दूसरी चीजें खोजेंगे, स्वाद के हिसाब से.

तो फिर इनमें क्या बुराई थी

अरविन्द केजरीवाल इन दिनों यही कर रहे हैं. १२० साल पुरानी कांग्रेस, २९ साल पुरानी भाजपा को, नित नए उगते क्षेत्रीय राजनैतिक कुकुरमुत्ते दलों को लोगों ने यूं ही खारिज नहीं किया था. अगर उन्हें ऐसे ही हुडदंग, झूठ, बयानों में तोड़ मरोड़ करने वालों को चुनना था तो फिर पुराने जाने हुए नेताओं में क्या बुराई थी. केजरीवाल का मैं भी समर्थक रहा, इसलिए नहीं कि वे उभरते सितारे हैं, बल्कि इसलिए कि वे पारंपरिक, सड रही सियासत को साफ़ करने की कोशिश कर रहे हैं. दिक्कत इस कार्य में आना लाजिमी था, किन्तु करना ज़रूरी था. लोगो ने वोट महज दिल्ली से शीला राज ख़त्म करने उन्हें नहीं दिया था. ये कार्य तो भाजपा को चुन के भी किया जा सकता था. असल में जिस बदलाव के लिए अरविन्द को चुना गया अब ये उसका वक्त था. खांटी सियासी तीर चलाने का ये वक्त नहीं था. नए साल में दो बदलाव लोगों को करना हैं, एक करके देख लिया दूसरा बाकी है. पर क्या इस नतीजे के बाद कोई दूसरे बदलाव को लेकर भी उतना ही आशावान होगा?

अरविन्द ने ५ पाप किये हैं

अरविन्द ने अपने इस छोटे से शुद्ध राजनैतिक जीवन को ख़त्म करके बहुत ख़राब किया. इससे उनके हाथों जाने अनजाने ही ५ पाप हो गये.

१. भरोसा गया

बदलाव को लेकर थ्रिल महसूस कर रहे नौजवान निराश हुए. वे अब जब भी बदलाव की बात की जाएगी, अरविन्द के घटिया मानस में खदकते स्वार्थ की बात करेंगे, अब सच्चे आदमी को भी भारी दिक्कत होने वाली है. सामान पाप अन्ना हजारे ने भी किया था, अनशन ख़त्म करके, अब वे दिखाए लोगों को जोड़ के, तभी हर कुछ लोकपाल पारित हुआ नहीं की शाम तक अन्ना सेब खाने लगे.

२. सियासत बुरी है, हम न कहते थे

उन लोगों को फिर आधार मिल गया, जो समेष कहते थे की सियासत सबसे गन्दी चीज है. नेताओं को गालियां देते हुए अपने गृहस्थी में मशरूफ रहते हैं.

३. वे फिर घुटते रहेंगे

पुराने दलों में कुछ अच्छे लोग आप के अंदाज से खुश हुए, उन्हें भी लगा नहीं यार सियासत चुनके उन्होंने कोइ गलत नहीं किया, उनके बच्चे भी आदर्शवाद की राजनीति करने वाले विफल बाबूजी नहीं कहेंगे. वे फिर डरे हुए सियासत में घुसे रहेंगे.

४. पुराने फिर चीखेंगे

जो पुराने दलों में बूथ केप्चरिंग, दलित, पिछडा, मुसलमान आदि को ही सियासत मानते थे, वे कहेंगे हम सही हैं. देख लो आप को, उन्हें भी तो वही करना पड़ेगा.

५. अफसर जो चाहते हैं कुछ करना

अफसरानों में यूं तो खतरनाक दिमाग से भारी लेस कई अफसर हैं, मगर कुछ अच्छे भी हैं, वे सोचते हैं अब शायद काम करने का मौका मिलगा. वे फिर से अपनी फाइलों में घुस जायेंगे, अपने वरिष्ठ की चापलूसी में मस्त हो जायेंगे. चूँकि वही तो होता है आगे बढ़ने का तरीका.
इन पापों की ज़िम्मेदारी अरविन्द ले न ले, बहरहाल लोकसभा से उनको अब ज्यादा उम्मीद नहीं करना चाहिए. श्रेष्ठ होता की दिल्ली की अपेक्षाओं पर ज़रा खरा उतर लेते पहले.
- सखाजी.

Life is Just a Life: भारत और रेल का जनरल डब्बा Bharat aur Rail ka ganar...

Written By नीरज द्विवेदी on गुरुवार, 16 जनवरी 2014 | 10:29 pm

Life is Just a Life: भारत और रेल का जनरल डब्बा Bharat aur Rail ka ganar...: भरी ठसी बोगी में अक्सर मेरा देश चला करता है, जनरल के डब्बे में जीकर बचपन रोज पला करता है। हो चाहे व्यवसाय दुग्ध का, रोज रोज का ऑफि...

अद्भुत भारत तुझे नमन। घटना एक, नजरिए अनेक।

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on बुधवार, 18 दिसंबर 2013 | 5:53 pm

भारतीय राजनयिक की अमेरिका में तलाशी और उन पर केस दर्ज।
एक असली कमेंट----
बसपा: वह शिड्यूल कास्ट की हैं, इसलिए भारत सरकार कुछ नहीं कर रही। (असली कमेंट)
अब काल्पनिक
आआपा: वह न्यूयॉक में बिजली कनेक्शन काट रही थी।
भाजपा: वह अमेरिका में रामलला का मंदिर बनवा रही थी।
कांग्रेस: वह सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ लड़ रही थी।
वाम दल: अमेरिकी पूंजीवादी हैं होता ही है ऐसा, राजनयिक को चीन जाना चाहिए था।
अन्ना: वह अमेरिका में लोकपाल के लिए अनशन पर जाने वाली थी।
बॉलीवुड: उनका अमेरिकी सीनेटर से चक्कर था।
सपा: वह कंप्यूटर शिक्षा का विरोध कर रही थी।
एनसीपी: वह अमेरिकी शुगर मिलों के साथ काम नहीं कर पा रही थी।
टीआरएस: वह पृथक छोटा टैक्सॉस मांग रही थी।
शिवसेना: वह अमेरिका से ब्रिटिश भैया को भगाने का काम कर रही थी।
आरजेडी: वह अमेरिका में चारागाहों पर कब्जा कर रही थी।
जदयू: वह भाजपा के साथ मिलकर अराजकता फैला रही थी।
डीएमके: उसे अमेरिकी सेतु समुद्रम का ठेका नहीं मिला था।
एआईडीएमके: वह तमिलों का साथ दे रही थी।
जय भारत, जय हिंद।
-सखाजी

कांग्रेस की एक और परीक्षा

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देश की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी कांग्रेस की सेहत पर दिल्ली नतीजों से ज्यादा असर नहीं पड़ता। चूंकि वह इतनी बड़ी और इतनी पुरानी पार्टी है कि उसे आप नहीं मिटा सकते। बहरहाल एक परीक्षा हुई, जिसके नतीजों में कांग्रेस पूरी तरह से तहत नहस सी नजर आई। इससे अभी वह उबरी भी नहीं थी, कि दूसरी परीक्षा उसके सामने है। कांग्रेसी पहली परीक्षा में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान और दिल्ली में सफाए के बाद थोड़ा आत्म चिंतन की मुद्रा में जरूर दिख रही है, लेकिन अभी भी अपनी 127 सालों पुराने तजुर्बे को वह कमतर नहीं मान रही। अभी दूसरी परीक्षा फिर उसकी होने जा रहा है। शकील अहमद इसे परीक्षा भले न मानें, सोनिया तो खैर क्या मानेंगी। मगर है तो कांग्रेस की ही परीक्षा। अब आआपा ने दिल्ली की जनता से पूछने के लिए २५ लाख लोगों तक सीधे पहुंचने की बात की है। उनसे एक बार फिर से यह पूछा जाएगा, कि वे सरकरा कांग्रेस के साथ बनाएं या नहीं। अगर इसमें बिल्कुल उल्टे नतीजे आते हैं, जिनमें जनता मना कर देती है। ऐसा हो भी रहा है, कई मीडिया, टीवी, अखबारों ने ऐसे सर्वे करवाएं हैं, जिनमें सरकार बनाने के लिए मना किया गया है। अगर ऐसे ही नतीजे आआपा के इस सर्वे में आते हैं, तो समझिए कांग्रेस एक और परीक्षा में फैल हो गई। वह कांग्रेस प्री पोल सर्वे में फैल होती है, वह एग्जिट पोल में फैल होती है, संवैधानिक चुनावी प्रक्रिया में फैल होती है, वह लोगों की आशाओं पर फैल होती है, वह कांग्रेस एक बार फिर से अगर इस सर्वे में भी फैल होती है, तो फिर क्या कांग्रेस को गंभीरता से सोचना नहीं चाहिए। आआपा ने भले ही सरकार बनाने के इस मसले को बेहद रोचक, गंभीर और नाटकीय बना दिया हो, लेकिन मसला सिर्फ सरकार बनाने का नहीं है न। इस पूरी प्रक्रिया में जहां भाजपा आआपा को दिल्ली से बाहर निकलने नहीं देना चाहती, ताकि वह देश में दिल्ली का सक्सेस कार्ड दिखाकर मोदी का रथ न रोके, तो वहीं कांग्रेस इन्हें हर शर्त पर एक्पोज करना चाहती है। आआपा से यूं तो कोई बड़ी भूल नहीं हुई, लेकिन एक भूल हो गई, वह यह कि 28 सीटों के साथ विपक्ष में बैठने की। उसे यह कहना था, कि हम सरकार बनाएंगे। लोगों में उत्साह जगता और जिन्होंने इन्हें वोट दिया है वह खुश होते, जिन्होंने नहीं दिया वह भी सोचते अबकी बार देंगे। मगर वह थोड़ा घूम गई, चूंकि उसके सामने थी ही इतनी बड़ी और तजुर्बेदार पार्टियां सामने।
- सखाजी

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