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पार्ट टाइम दलित की बेटी

Written By बरुण सखाजी on शनिवार, 27 अप्रैल 2013 | 10:41 pm

जब वे अभेद्य किले में रहती हैं, पचासियों ब्लैक कमांडोज के बीच चलती हैं, सैकड़ों गाडिय़ों के काफिले के बीच होकर चलती हैं और जब वे रुपयों से गुथी माला पहनती हैं। तब वे दलित नहीं होती। जैसे ही सीबीआई उनपर आंखे तररेती है, किसी सुरक्षा कारण से तलाशी देती हैं या फिर जैसे ही उनके ऐशो आराम की कोई सियासतदां निंदा करता है तो वे दलित हो जाती हैं। जैसे ही उनकी कार से लाख रुपये चुनाव आयोग खंगालता है तो वे दलित हो जाती हैं। न जाने क्यों यूपी जैसे प्रबुद्ध प्रदेश की वे ऐसी चालाक  नेता हैं, जो जब-तब हारकर जीत जाती हैं। मुख्यमंत्री बन जाती हैं, देश की सरकार को चलाने की खिवैया बन जाती हैं। दलित की यह बेटी इतनी पीडि़त है कि समूचा देश दुनिया के सामने शर्मिंदा है। यह इतनी पीडि़त है जितना कि खुद दलित वर्ग नहीं। अहो। गजब है। माया। वे कहती हैं जैसा उनके साथ कर्नाटक के गुलबर्गा में हुआ वैसा सोनिया गांधी के साथ क्यों नहीं? साफ है माया की नजरों में सोनिया ब्राह्मण हैं (...लेकिन भाजपाई उन्हें क्रिश्चिन कहते हैं)...फिरोज गांदी के खानदान की कुल बहू हैं। माया कहां। दलित। कांशी राम को बंधक बनाकर बनीं नेता। वे कहां सौदेबाज, ताज के रास्ते को चबाने वाली जिम्मेदारी दलित की बेटी। बहुत खूब। और शर्मिंदा हूं, दो चीजों पर एक तो यूपी पर, जो उन्हें फिर-फिर चुनता है तो दूसरा बीजेपी और कांग्रेस पर। कैसे नेशनल दल हो, यूपी के 16 करोड़ लोगों की नजरों में इतनी भी औकात नहीं कि सरकार को समर्थन देकर बनवा सको। यह तो पार्ट टाइम दलित की बेटी बन जाती हैं। फिर ऐश्वर्य की महामाया। खैर।
- सखाजी
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