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कांटे फूल सदा ही संगी

Written By SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR5 on गुरुवार, 24 दिसंबर 2020 | 11:03 pm


कांटे फूल सदा ही संगी

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मेरा मन भी भ्रमित बहुत है

गिरगिट जैसा रंग बदलता

स्वागत को जब फूल बहुत हैं

कैक्टस फूल उगाऊं कहता

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घर आंगन फुलवारी प्यारी

खुशियों से आह्लादित सारी

और लालसा की चाहत में

बढ़ता जाऊं कंटक पथ में

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सीधी सादी भोली भाली

' तुलसी आंगन की दिवाली

कौन लगा घुन मन में मेरे

ना भाए कुछ ' दर्द ' सिवा रे !

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बहुत लोग हैं मेरे जैसे 

खुशियों का जो दंश हैं झेले,

भांति भांति के कांटे चुनते

' कैक्टस  की दीवार बनाते

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सीमित साधन या हो मरूथल,

वीराने भी सजता कैक्टस,

धैर्य और साहस का परिचय,

कांटों फूल सजाता कैक्टस

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मेहनत कांटों की शैय्या चल,

प्यारे फूल हैं लगते मनहर,

जीवन की पगडंडी ऐसी,

कांटे - फूल सदा ही संगी

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बुरा नहीं कांटा भी यारों

कांटे से कांटे को निकालो

घर अंगना जो न मन भाए

सीमा पर आ बाड़ लगाएं

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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर5

प्रतापगढ़,

उत्तर प्रदेश, भारत

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