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कत्रीना कैफ - 1

Written By Pappu Parihar Bundelkhandi on शनिवार, 8 अक्टूबर 2011 | 6:25 am

कत्रीना कैफ - Katrina Kaif
  
उफ़ ये अदा,
हो गए जिस पर फ़िदा,
न रहा गुमान,
न रहा इमान,

ये जुल्फें ये नजरें,
ये होंठ ये अदा,
ये चेहरा या खुदा,
या खुदा या खुदा,

रब यह कैसी नजाकत है,
रब यह कैसी हुश्न परि है,
रब यह कैसी तुफ्लिश है,
रब यह कैसी मोहब्बत है,

हाय यह तेरा नाज़ुक बदन,
आखों की सोखियों का चमन,
लहराती जुल्फों का दामन,
मदमस्त जावानी की उफन,

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फलसफा-ए-हुश्न का

Written By Pappu Parihar Bundelkhandi on शनिवार, 20 अगस्त 2011 | 2:44 pm


फलसफा-ए-हुश्न का, तेरे अफसाने से शुरू होगा |
तू ख़ूबसूरत इतनी है, कि जमाना तेरे हुश्न का कायल होगा |
उस पर तेरी सोखी का आलम, इस कदर समां गया है |
तू महफूज़ रहे, तेरे भीतर खुदा का नूर
गया है || १ ||

मुर्बते हुश्न, कि तेरे दायरे से, न निकल पायेंगे |
मर जायेंगे, मिट जायेंगे, तुझे खुश कर जायेंगे || २ ||

खुश है जमाना तेरे दीदार से, क्यूँ तू छिपा रही है अपने हुश्न को |
दुआयें देंगे तुझको,
ज़माने कि नज़रों से गुजरने दे, अपने हुश्न को || ३ ||

छुरियां चल जाती हैं, सरे बाज़ार तेरे हुश्न कि खातिर |
दोस्तों मैं भी जंग, छिड जाती है तेरे हुश्न कि खातिर |
तेरे हुश्न पर जवानी इस कदर छाई है |
तू बस मेरे लिए ही, इस दुनिया में आयी है || ४ ||

बदस्तूर तेरा यह जुल्म, हम सह न सके |
अब तो दीदार करा दे, तेरे बिना हम रह न सके || ५ ||

तुझे देखे जमाना हो गया |
मस्ताने से तेरा दीवाना हो गया |
पल-पल तेरी याद में |
दर-दर भटकने वाला बेगाना हो गया || ६ ||
 
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Founder

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Saleem Khan