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ग़ज़लगंगा.dg: अंधी नगरी चौपट राजा

Written By devendra gautam on शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2012 | 11:21 pm

राखे बासी त्यागे ताज़ा.
अंधी नगरी चौपट राजा.

वो देखो लब चाट रहा है
खून मिला है ताज़ा-ताज़ा.

फटे बांस के बोल सुनाये
कोई राग न कोई बाजा.

अंदर-अंदर सुलग रही है
इक चिंगारी, आ! भड़का जा.

बूढा बरगद बोल रहा है
धूप कड़ी है छावं में आ जा.

जाने किस हिकमत से खुलेगा
अपनी किस्मत का दरवाज़ा.

हम और उनके शीशमहल में?
पैदल से पिट जाये राजा?

वक़्त से पहले हो जाता है
वक़्त की करवट का अंदाज़ा.

---देवेंद्र गौतम

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ग़ज़लगंगा.dg: अंधी नगरी चौपट राजा:

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2 टिप्पणियाँ:

Aziz Jaunpuri ने कहा…

behtareen,vkt ke pahle ho jata hai........andajz,

रविकर ने कहा…

गजब गजल गंगा पढ़ी, गौतम जी आभार |
ऐसी ही उत्कृष्ट नित, मिले गजल हर बार ||

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