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तीसरे मोर्चे की कवायद

Written By बरुण सखाजी on गुरुवार, 1 अगस्त 2013 | 9:53 pm

Third front rehearsal in CG is dangerous.
छत्तीसगढ़ सियासी तौर पर बाई पोलर ही है। ऐसा रहना किसी भी डेमोक्रेसी के लिए सशर्त अच्छा है। सशर्त यानी अमेरिका जैसा टू पार्टी सिस्टम नहीं, बल्कि टू पावरफुल पार्टीज सिस्टम, जहां पर तीसरी और चौथी शक्तियां भी हो सकती हैं, किंतु वह महीन और कमजोर हों। लेकिन उनमें भी यह संभावना हमेशा बनी रहनी चाहिए कि वे कभी, किसी भी वक्त इन दो पॉवरफुल पार्टीज में से किसी एक का स्थान हासिल कर सकती हैं। छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांग्रेस के अलावा तीसरी शक्ति का कोई उदय नहीं है, कहने को भले ही 2003 में एक सीट एनसीपी और दो सीटें बीएसपी के पास थीं, ऐसे ही 2008 में भी एनसीपी की सीट नहीं रही, लेकिन बीएसपी बरकरार रही। किंतु इसका तब तक कोई मायना नहीं, जब तक कि यह 4-5 का आंकड़ा क्रॉस नहीं करती।
इन दिनों तीसरे मोर्चे की कवायद देखने को मिल रही है। इसमें तमाम मुहल्ला और उधारी सियासी दल जोरआजमाइश कर रहे हैं। यह राज्य के लिए खराब है। चूंकि इन दिनों जोगी भी मार्जनाइज हैं। ऐसे में कहीं इस तथाकथित तीसरे मोर्चे ने ताकत पकड़ ली और हर पार्टी कहीं न कहीं बीजेपी कांग्रेस की वोट काटू बन गईं, तब जोगी अपने परिवार के बूते 3 सीटों के साथ कांग्रेस से अलग होकर इनसे जुड़ सकते हैं। और कहीं अगर तीसरे मोर्चे की तमाम पार्टियों में से एक या दो दलों ने भी सीटें हासिल कर लीं, तब फिर देखिए राज्य में न होने लगें सियासी सौदे। और फिर जब इस तीसरे मोर्चे का गुरु और महात्मा सियासत के चतुर सुजान जोगी होंगे, तब तो और भी खतरनाक हालात यहां बन जाएंगे। यूं शांत कहे जाने वाले इस राज्य में सियासी उखाड़ फेंक ठीक नहीं है।
मीडिया के कवरेज और तवज्जो को देखते हुए तीसरे मोर्चे की कम से कम विजुएलिटी तो बढ़ ही रही है। यह अलहदा बात है कि वह कनेक्टिविटी लेवल पर वह कितना क्या कर पाते हैं। मीडिया का आज का तवज्जो, कल पर भारी पड़ सकता है।
-सखाजी
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