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कुर्सी चरित्रम***

Written By बरुण सखाजी on गुरुवार, 7 मई 2015 | 2:34 am

कुर्सी ताकत है, तो कुर्सी कमजोरी भी है। कुर्सी अदावत है तो यह नजाकत भी है। कुर्सी कथा है तो यह नाटक भी है। कुर्सी वक्त है तो यह बुरा वक्त भी है। कुर्सी सपना है तो यह श्याह हकीकतत भी है। कुर्सी विरासत है तो यह समरथ भी है। कुर्सी कल है तो यह आज भी है। कुर्सी कर्म है तो नसीब भी है। कुर्सी अहम है तो उपेक्षित भी है। कुर्सी नर्म है तो कुर्सी गर्म भी है। कुर्सी के आगे अच्छे-अच्छे झुके हैं। कुर्सी कमाल है। कुर्सी के कई रूप हैं। कुर्सी पर बैठकर नीचे चटाई पर बैठना भी कुर्सी ही का ही एक रूप है। कुर्सी से उतरकर कुर्सी के लिए काम करना भी कुर्सी ही है। कुर्सी जो है वह कुर्सी ही है। उसके समकक्ष न टेबल है न स्टूल। बनने को अपने मुंह मियां मिट्ठू बना करें। टेबल अपना ओहदा ऊंचा माना करे, स्टूल अपनी जरूरत जताता रहे, मगर हैं सब कुर्सी के इर्दगिर्द ही। कुर्सी लालच है तो कुर्सी निरमोह भी है। कुर्सी तेरे कितने चरित्र हैं, कुर्सी तू क्यों इतने सत्चरित्रा है, तू क्यों इतना वैश्या है। कुर्सी तेरी लीला तू ही जाने। कितने नाचें, कितने आएं, कितने जाएं, कितनों को कितने ही श्रम करने पड़ जाएं, तुझ पर बैठे को नीचे उतारने में। कुर्सी यूं तो अभिमान है, लेकिन अपमान भी है। कुर्सी यूं तो क्रोध है, लेकिन विरोध भी है। कुर्सी पर डटकर जो चिपक जाए, कुर्सी उसे ही आहार बना लेती है। उसे निगल जाती है। कहने को वह कुर्सी में समा जाता है, लेकिन कुर्सी उसमें कभी नहीं समाती। कुर्सी फिर नई तशरीफों की तलाश में रहती है। कुर्सी कर्ज है, तो कुर्सी मर्ज भी है। कुर्सी आफत है तो राहत भी है। कुर्सी के लिए न जाने किस-किसने क्या न किया। कुर्सी ने अपने पर चढ़ाकर किसको न दचका, किसको न गिराया, किसको न उठाया। कुर्सी पर बैठकर न जाने कितने गौरवान्वित हुए, कुर्सी पर बैठकर न जाने कितने अपमानित हुए। कुर्सी ने रंग नहीं बदला। कुर्सी ने चाल नहीं बदली। कुर्सी ने चरित्र नहीं बदला। किसी के लिए यह वैश्या रही तो किसी ने इसे पूजा। अयोध्या में कुर्सी राम की पादुकाएं पाकर गौरवान्वित हुई, तो दिल्ली में भ्रष्टों के पिछवाड़ों से आहत रही। अपानवायु से नाक सिकोड़ती, त्योरियां ताने, नथुनों से आग बरसाती सी। कुर्सी आंगन का एक ओंटा भी है। कुर्सी आंगन की एक टिपटी भी है। कुर्सी राख का ढेर भी है, तो कुर्सी कर्तव्यों की करताल भी है। कुर्सी खुद में कुछ नहीं, लेकिन सबकुछ भी है। कुर्सी तू गजब है। कुर्सी से निकले चार पायों में इतना अभिमान है कि वह नितंबों को जमीन से मिलने नहीं देते। हमेशा रखते हैं दूर, ऊपर, चार पायों पर कुछ इस तरह से जैसे चलता है कोई मुर्दा चार कांधों पर। कुर्सी पर बैठे बख्तरबंद, दस्तरखानों पर भोजन करने वाले शाहों की भी नहीं है कुर्सी। कुर्सी गजब है। कुर्सी गलत फहमी है तो कुर्सी हकीकत भी। कुर्सी जवाब है तो कुर्सी सवाल भी। कुर्सी अदावत है, तो कुर्सी नजाकत भी। कुर्सी हाल तो कुर्सी चाल भी है। कुर्सी यूं न चलेगी अपने इशारों पर कुर्सी यूं न घूमेगी आपके सहारों पर। कुर्सी पर बैठकर इठलाना, पतली डाल पर चढ़कर फल तोड़ने जैसा है। टूटी तो धड़ाम न टूटी तो मीठा फल। पर गारंटी कुछ भी नहीं। स्थाई कुछ भी नहीं। कुर्सी कल्पना है, तो कुर्सी वास्तविकता भी है। कुर्सी कसम है तो कुर्सी वादाखिलाफी भी है। कुर्सी दौड़ है तो कुर्सी ठहराव भी है। कुर्सी कलम है तो कुर्सी कलाम भी है। कुर्सी किसी की नहीं, कुर्सी सबकी है। कुर्सी पर कोई नहीं बैठ पाया, तो कुर्सी पर हर कोई चढ़ा हुआ है।
- सखाजी

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1 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (08-05-2015) को "गूगल ब्लॉगर में आयी समस्या लाखों ब्लॉग ख़तरे में" {चर्चा अंक - 1969} पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
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