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बेचारे मजबूर प्रधानमंत्री ...

Written By महेन्द्र श्रीवास्तव on शनिवार, 24 दिसंबर 2011 | 12:05 pm

सेवा में
प्रधानमंत्री जी
भारत सरकार

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी, मैं पिछले कई दिनों से नहीं बल्कि महीनों से देख रहा हूं कि गल्ती कोई और कर रहा है, लेकिन निशाने पर आप हैं। इसके कारणों पर नजर डालें, तो लगता है कि है इन सबके लिए जिम्मेदार भी आप खुद ही हैं। दरअसल आप देश के पहले प्रधानमंत्री हैं जो आज तक खुद स्वीकार ही नहीं कर पाया है कि वो देश का प्रधानमंत्री है। आपकी कार्यशैली से लगता है, जैसे "प्रधानमंत्री" एक सरकारी पद है, जिस पर आपको तैनात किया गया और आप प्रधानमंत्री का महज कामकाज निपटा रहे हैं। आपको डर भी लगा रहता है कि कहीं कोई गल्ती ना हो जाए। इसलिए कदम इतना ज्यादा फूंक फूंक कर रख रहे हैं कि आपके अधीनस्थ आपको डरपोक कहने लगे हैं।

प्रधानमंत्री जी आपकी कुछ मजबूरियों को मैं समझ सकता हूं, जिसकी वजह से आप पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहे हैं। आपके हाव भाव से ये लगता है कि आप इस बात का हमेशा ध्यान रखते हैं कि आपको देश ने तो प्रधानमंत्री बनाया नहीं, प्रधानमंत्री तो सोनिया गाधी ने बनाया है। इसीलिए आप देश से कहीं ज्यादा सोनिया के प्रति वफादार रहते हैं। देखता हूं कि जब आप सोनिया गांधी के साथ होते हैं तो बिल्कुल निरीह दिखाई देते हैं। कई बार तो सच में ऐसा लगता है कि आपसे प्रधानमंत्री का काम जबर्दस्ती लिया जा रहा है। वैसे भी आपको मुश्किल तो होती ही होगी, क्योंकि जो वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी आज आपके मंत्रिमंडल के सदस्य हैं, कभी आप उनके अधीन काम कर चुके हैं। इस सच्चाई को भले आप स्वीकार ना करें, लेकिन मुश्किल तो होती ही है। मुझे तो लगता है कि इन्हीं सब वजहों से आप मजबूत नहीं हो पा रहे हैं और देश को मजबूर प्रधानमंत्री से काम चलाना पड़ रहा है।

प्रधानमंत्री जी अन्ना की अगुवाई में कुछ लोग सड़कों पर आकर देश में आराजकता की स्थिति पैदा कर रहे हैं। आपको पता है ना कि भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहा जाता है, जिनको हम सब पूजते हैं। मर्यादा को मानने वाला भगवान राम से बढ़कर मुझे कोई और नजर नहीं आता। लेकिन भगवान राम को ही अगर हम उदाहरण मान लें तो हम देखते हैं कि वो भी तानाशाही को ज्यादा दिन बर्दाश्त नहीं कर पाए। लंका पर चढाई करने जा रहे भगवान श्रीराम ने समुंद्र से रास्ता मांगा, भगवान राम को लगा कि शायद मैं समुद्र से प्रार्थना करुं तो वो मान जाएं और हमें खुद ही रास्ता दे दे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ..

विनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीत।
बोले राम सकोप तब, भय बिन होत ना प्रीत ।। 

मतलब साफ है कि विनय यानि प्रार्थना से काम नहीं बनने वाला है, ये सोच कर जब भगवान राम ने चेतावनी दी अगर अब रास्ता नहीं दिया तो एक वाण चलाकर पूरे समुद्र को सुखा दूंगा। जैसे ही भगवान ने क्रोध धारण किया, समुद्र देव प्रगट हुए और भगवान राम से माफी मांगने के साथ ही तुरंत रास्ता देने को तैयार हो गए। मेरा सवाल प्रधानमंत्री जी आप से ये है कि भगवान राम को तीन दिन में गुस्सा आ गया और आप को तेरह दिन में गुस्सा नहीं आया। कुछ लोग देश में आराजकता का माहौल बनाए हुए हैं, आप उनसे सख्ती से क्यों नहीं निपट पा रहे हैं। अगर आपने  शुरू  में ही सख्त रुख अपनाया होता, तो ये नौबत ना आती। आपकी पार्टी के एक युवा सांसद जब भी जनता के बीच में होते हैं, वो गुस्से की बात करते हैं, उन्हें देश की हालात पर गुस्सा आता है, लेकिन जिस बात पर गुस्सा आता है , उसका निराकरण करने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं होती।
प्रधानमंत्री जी देश में ऐसा संदेश जा रहा है कि ये सरकार भ्रष्ट तो है ही, कमजोर भी है। कुछ लोगों की बंदरघुड़की से पूरा मंत्रिमंडल घुटनों पर नजर आता है। आप प्रधानमंत्री हैं और आपकी छवि साफ सुथरी है, आप पर किसी को शक भी नहीं है, फिर आप किस दबाव में हैं जो सही गलत का फैसला नहीं कर पा रहे हैं। अब समय आ गया है कि आप इस पर ध्यान ना दें कि कौन सड़क पर उतर रहा है, कौन जेल भर रहा है, इससे निपटने के लिए कानून में व्यवस्था है, वो अपना काम करेगी। आप सिर्फ ये देखें की कौन सा कानून देश के हित मे है। मैं तो इस बात के भी खिलाफ हूं कि देश के प्रधानमंत्री को इसके दायरे में लाया जाए।

प्रधानमंत्री जी दरअसल आपका काफिला जब सड़क पर आता है तो लोगों से रास्ता खाली करा लिया जाता है, इसलिए आपको पता नहीं है, जनता क्या चाहती है। जो जनता  रामलीला मैदान और जंतर मंतर पर आती है, उसमें ज्यादातर लोग तफरी के लिए आते हैं। ये ऐसे लोग है, जो वोटिंग का महत्व भी नहीं जानते और चुनाव के दौरान दिल्ली से बाहर घूमने चले जाते हैं। देश के लोग भ्रष्टाचार से ज्यादा मंहगाई से परेशान हैं। आज जरूरत है मंहगाई को कैसे नियंत्रित किया जाए।

प्रधानमंत्री जी पूरा मंत्रिमंडल चार ऐसे लोगों को मनाने में जुटा है, जिनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा है। वो एक राजनीतिक लड़ाई लड़ रहे हैं। विपक्षी दल खासतौर पर बीजेपी की इस पूरे आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका है। जब सरकार लोकपाल  बिल पर काम करती नजर आ रही थी, उस समय भी टीम अन्ना एक राजनीति के तहत कांग्रेस का विरोध करती रही। इस टीम की स्क्रिप्ट कहीं और लिखी जा रही है, इसलिए आप टीम को संतुष्ट करने के बजाए देश को संतुष्ट करने के लिए काम करें।

प्रधानमंत्री जी आपको तो पता है ना टीम अन्ना संघर्ष तेज करने और जब तक शरीर में जान है, तब तक लड़ने की बात करती हैं। लेकिन दिल्ली से महज इसलिए भाग खड़े हुए कि यहां ठंड बहुत है। जो लड़ाके ठंड़ से डरते हों, वो जान की बाजी की बात करते हैं तो हंसी ही आती है।  लोग संघर्ष की शुरुआत अपने गांव से करते हैं, फिर जिले, राज्य से  होते हुए केंद्र यानि दिल्ली आते हैं। अन्ना की लड़ाई उल्टी शुरू हुई। सीधे दिल्ली आ गए, यहां से अब अपने राज्य महाराष्ट्र वापस चले गए, अब जिले में जेल भरते हुए अपने गांव पहुंच जाएंगे। देश की जनता भी इस टीम की हकीकत को समझने लगी है। मैं गारंटी के साथ आपको बताना चाहता हूं कि लोकपाल के मामले में इनकी पूरी बातें मान भी ली जाएं तो ये दूसरी मांग को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ सड़कों पर रहेंगे।

चलते चलते एक गुजारिश है प्रधानमंत्री जी,  आप लोकपाल बिल में एनजीओ को जरूर शामिल करें। क्योंकि देश में एक बड़ा तपका खासतौर पर सफेद पोश लोग एनजीओ की आड़ में गोरखधधा कर रहे हैं। ये कुछ विदेशी संस्थाओं से जुड़ कर बाहर से पैसे लाते हैं और उनका दुरुपयोग किया जाता है। इसी पैसे से ये राजनेताओं, सरकारी तंत्र को कमजोर करते हैं। मुझे पक्का भरोसा है कि इस मामले में भी एक ग्रुप आफ मीनिस्टर का गठन कर देशहित में आप सही निर्णय लेंगे। आज बस इतना ही।

धन्यवाद

महेन्द्र श्रीवास्तव
दिल्ली 

ईमानदारी की बात में भी ईमानदारी नहीं...

Written By महेन्द्र श्रीवास्तव on शनिवार, 3 दिसंबर 2011 | 12:28 pm


अब टीम  अन्ना ईमानदारी की नई परिभाषा गढ़ रही है । लोकपाल में एनजीओ को शामिल किए जाने से ना जाने क्यों उनकी परेशानी बढ़ गई है । लोकपाल में और किसे किसे शामिल किया जाए, इससे ज्यादा जोर टीम  अन्ना का इस पर है कि कैसे एनजीओ को इससे  बाहर किया जाए । अब आंदोलन की हकीकत इसी बात से सामने आती है । मेरा मानना है कि आप ये मांग तो कर सकते हैं कि लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री, जजों को भी शामिल किया जाना चाहिए, लेकिन आप ये मांग भला कैसे कर सकते हैं कि एनजीओ को इसके दायरे में नहीं लाया जाना चाहिए ।
मेरी समझ में तो नहीं आ रहा है, आप अगर समझ रहे हैं तो मुझे भी बताएं । इस मांग का मतलब तो यही है ना  कि " ए "  को चोरी करने की छूट होनी चाहिए, लेकिन   " बी " को चोरी करने का बिल्कुल हक नहीं होना चाहिए । एनजीओ को लोकपाल में लाने की खबर से टीम अन्ना की हवाइयां उड़ गईं । टीम के सबसे ईमानदार और मजबूत सहयोगी अरविंद केजरीवाल ने तो आनन फानन में  सरकार को रास्ता भी सुझा दिया, उनका कहना है कि चलो अगर एनजीओ को लोकपाल के दायरे में लाया ही जाना है तो सबको ना लाया जाए, सिर्फ उसे ही लाएं जो एनजीओ सरकारी पैसों की मदद लेते हैं । हाहाहाहहाहा हंसी आती इस ईमानदार सामाजिक कार्यकर्ता पर ।
अरे केजरीवाल साहब हम एनजीओ से तो ये उम्मीद करते हैं ना कि वो ईमानदारी से काम करते होंगे । फिर आपकी छटपटाहट की वजह क्या है ? अन्ना जी तो बेचारे हर जांच खुद अपने से शुरू करने की मांग करते हैं ।  वो कहते हैं कि सबसे पहले उनकी ही जांच हो , लेकिन आपको ऐसा करने में दिक्कत क्यों है । मैं दूसरे एनजीओ की चर्चा नहीं करुंगा,  पहले आपकी दूसरी सहयोगी किरन बेदी की बात कर लेते हैं । उनके एनजीओ को सरकार से पैसा मिला या नहीं, मै ये तो नहीं जानता , लेकिन पुलिस कर्मियों के बच्चों को कम्प्युटर और कम्प्युटर ट्रेनिंग के लिए माइक्रोसाप्ट कंपनी ने 50 लाख रुपये लिए गए । अब आरोप लग रहा है कि उन्होंने इस पैसे का दुरुपयोग किया । ये सरकारी पैसा भले ही ना हो, लेकिन सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के नाम पर लिया गया पैसा था, अगर इसमें बेईमानी  हुई है तो शर्मनाक है और दोषी लोगों को सख्त सजा होनी ही चाहिए । आप  चाहते  हैं कि ऐसे लोगों  को हाथ  में तिरंगा लेकर ईमानदारी की बात करने की छूट होनी  चाहिए ।

आप खुद सोचें कि जो ईमानदारी की बडी बड़ी बातें कर रहे हैं, उनके दामन साफ नहीं है,  कोर्ट ने सुनवाई के बाद उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर जांच करने के आदेश दिए हैं, तो फिर और एनजीओ का क्या हाल होगा । आखिर अरविंद केजरीवाल को  इससे दिक्कत  क्यों है ? वो किसे बचाना चाहते हैं ? मेरा अनुभव रहा है कि बहुत सारे सामाजिक संगठन विदेशों  से पैसे लेते हैं, मकसद होता है का गरीबों को मुफ्त इलाज, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा,  गांव का विकास, बाल श्रम पर रोक, महिला सशक्तिकरण,  पर  क्या ईमानदारी से सामाजिक संगठन ये काम करते हैं, दावे के साथ कह सकता हूं.. नहीं । ऐसे में अगर इन्हें  लोकपाल के दायरे में लाने की बात हो रही है तो आखिर इसमे बुराई क्या है, क्यों केजरीवाल आग बबूला हैं  ?

मित्रों वैसे भी  एनजीओ पर शिकंजा कसना जरूरी  है,  क्योंकि यहां बडे पैमाने  पर धांधली हो रही है । मैं इस बात का जवाब टीम अन्ना  से चाहता हूं  कि तमाम लोग आयकर  में छूट पाने के लिए सामाजिक संगठनों को चंदा देते हैं और यहां से रसीद हासिल करके आयकर रिटर्न में उसे दर्ज करते हैं । जब आयकर में एनजीओ की रसीद महत्वपूर्ण अभिलेख है तो क्यों नहीं एनजीओ को लोकपाल  के दायरे में आना चाहिए । मैं देखता हूं कि कारपोरेट जगत ही नहीं बडे बडे नेताओं और फिल्म कलाकार अपने पूर्वजों के नाम पर सामाजिक संस्था बनाते हैं और पैसे को काला सफेद करते रहते हैं ।

यहां एक शर्मनाक वाकये की  भी चर्चा कर दूं । देश में बड़े बड़े साधु संत धर्मार्थ संगठन के नाम पर धोखाधड़ी  कर रहे हैं । साल भर पहले आईबीएन 7 के कैमरे पर कई बडे नामचीन साधु पकड़े गए थे, जो कालेधन को सफेद करने के लिए सौदेबाजी कर रहे थे । वो दस लाख रुपये लेकर 50 रुपये की रसीद दिया करते थे । धर्मार्थ संगठन गौशाला,  पौशाला, धर्मशाला, पाठशाला समेत कई अलग अलग काम के लिए सामाजिक संस्था बनाए हुए हैं । मेरा मानना है कि सामाजिक संस्थाओं  को सरकारी और गैरसरकारी जितनी मदद मिलती  है, अगर इसका ईमानदारी से उपयोग किया जाता तो आज देश  के गांव  गिरांव की सूरत बदल जाती । ये चोरी का एक आसान रास्ता  है, इसलिए पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी सेवा में रहते हुए एक  एनजीओ जरूर बना लेते हैं और सेवाकाल  के दौरान पद का दुरुपयोग करके इसे आगे बढाने में लगे रहते हैं, जिससे  सेवानिवृत्ति के बाद इसका स्वाद उन्हें मिलता रहे ।

अच्छा हास्यास्पद लगता है कि प्रधानमंत्री को लोकपाल  के दायरे में लाने की बात की जा रही है, जबकि देश में आज तक  कोई ऐसा प्रधानमंत्री नहीं  हुआ है, जिसके लूट खसोट से जनता परेशान हो गई हो । अब आज की केंद्र सरकार को ही ले लें, सब कहते हैं कि आजाद भारत की ये सबसे भ्रष्ट्र सरकार है, लेकिन प्रधानमंत्री को सभी  ईमानदार बताते हैं । इसलिए अगर  लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को  एक बार ना भी शामिल किया जाए तो कोई पहाड़ टूटने वाला नहीं है, लेकिन जब सामाजिक  संगठनों की करतूतें सामने आने लगी हैं तो कोई कारण नहीं जो इन्हें लोकपाल  से अलग रखा  जाए । टीम अन्ना  से बस इतना ही कहूंगा  कि जनता देख रही है, कम से कम ईमानदारी की बात तो ईमानदारी से करो ।

बहस : जेपी बनाम अन्ना

Written By महेन्द्र श्रीवास्तव on शनिवार, 12 नवंबर 2011 | 3:38 pm


मित्रों, देश में एक नई बहस शुरू  हो  चुकी हैजेपी आंदोलन बनाम अन्ना का आंदोलन । मैं हैरान इस बात से  हूं कि  लोग  आंदोलन की समीक्षा निष्पक्ष होकर नहीं कर रहे हैं और कुछ  लोग जेपी  को नीचा  दिखाने की कोशिश कर रहे हैं तो कुछ अन्ना को।
पहले मैं संक्षेप में दूसरों के विचारों से  आपको अवगत करा दूं। कहा जा रहा है कि जेपी ने आंदोलन की शुरूआत नहीं  की थी । देश में 1974 में बेरोजगारी, मंहगाई और भ्रष्ट्राचार को लेकर युवा वर्ग खुद ही आगे आया और देश भर में एक  अभियान की शुरुआत  हुई । बाद में इसी आंदोलन को जेपी  ने नेतृत्व दिया ।  जेपी आंदोलन की ये कहकर भी आलोचना की जा रही है कि  उनका  आंदोलन हिंसात्मक  हो चुका था ।  उस आंदोलन ने देश में अस्थिरता का माहौल  बना दिया था । आगजनी, रास्ता जाम, हिंसा आम बात हो चुकी थी । जेपी की आलोचना करने वाले  यहां तक कह रहे हैं कि आंदोलन के दौरान हिंसा में तमाम लोग मारे गए, लेकिन जेपी  ने इसके लिए कभी  खेद नहीं जताया ।
अन्ना की प्रशंसा में कहा जा रहा है कि देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना और उनकी टीम ने पूरा आंदोलन खड़ा किया है । ये  आंदोलन हिंसात्मक भी नहीं है । खुद अन्ना लगातार लोगों से अपील करते हैं कि  आंदोलनकारी किसी तरह की हिंसा से दूर रहें । इस आंदोलन को सिविल  सोसायटी के  लोगों ने आमजनता का आंदोलन बना दिया है । अब देश भर से भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठने लगी है । मैं भी  अन्ना तू भी अन्ना के नारे देश भर में लग रहे हैं ।
मित्रों दोनों की बातें आपके  सामने है । इसी आधार पर कुछ  लोग जेपी को छोटा और अन्ना को बड़ा बताने की कोशिश कर रहे हैं , लेकिन जेपी को छोटा बताने वालों से मेरा एक सवाल  है ।  दोस्तों क्या आप बता सकते  हैं कि जिस दौरान जेपी का आंदोलन चल रहा था क्या उस समय भी इलेक्ट्रानिक मीडिया इतनी ही मजूबत थी ? आज अन्ना को  कोई संदेश लोगों तक पहुंचाना हो तो  वो टीवी चैनलों के जरिए वो  देशवासियों से सीधा संवाद कर सकते हैं, पर उस दौरान ऐसा नहीं  था ।   जेपी आंदोलन से जुडे लोगों को अपनी बात ही लोगों तक पहुंचाने में पसीने छूट जाते थे ।

जेपी जिस सशक्त सरकार और मजबूत प्रधानमंत्री स्व. इंदिरागांधी से संघर्ष कर रहे थे, क्या अन्ना की लड़ाई उतनी मजबूत सरकार और तेजतर्रार प्रधानमंत्री से  है । अन्ना का आंदोलन मजबूत ही इसलिए है कि देश में कमजोर  प्रधानमंत्री है और  सरकार डायलिसिस पर है । इस सरकार को हर दिन डायलिसिस पर रखा  जाता है, तब जाकर इसकी सांसे चलती हैं।  इदिरा जी सरकार मे अरविंद केजरीवाल जैसे लोग हिम्मत जुटा पाते प्रधानमंत्री कार्यालय को   जुर्माने की राशि भेजने की ।  हवाई यात्रा के किराए में चोरी करने वाली किरन वेदी की हिम्मत होती कि वो रामलीला मैदान में सिर पर डुपट्टा डाल कर सांसदों की नकल करतीं ।  इस आंदोलन को मजबूत करने में सबसे बडा योगदान कमजोर प्रधानमंत्री का ही है।
मुझे ये कहने में कत्तई संकोच  नहीं है कि आजाद हिंदुस्तान की ये सबसे भ्रष्ट सरकार है । लोग प्रधानमंत्री को क्यों ईमानदार कहते हैं, ये तो वही जानें । मेरा मानना है कि  टूजी के मामले में ज्यादातर फैसले प्रधानमंत्री और ग्रुप आफ मिनिस्टर की जानकारी में थी, इसलिए इस चोरी के लिए सभी बराबर के जिम्मेदार हैं । वैसे मनमोहन  सिंह की स्थिति  भी सरकार में बेचारे की है। संविधान के  मुताबिक देश का प्रधानमंत्री वो होगा, जो  चुने हुए  सांसदों का नेता होगा । मनमोहन बेचारे  नेता तो हैं नहीं, वो तो प्रधानमंत्री की कुर्सी नहीं बल्कि  सोनिया गांधी की खडाऊं से संभाल रहे हैं।
इस सबके बाद कुछ लोग अन्ना  को जेपी से बड़ा और काबिल बता रहे हैं । कई साल तक जेल में रहकर  जेपी और उनके समर्थकों ने देश में कांग्रेस सरकार का सूपड़ा साफ कर दिया । मोरारजी  भाई  देसाई के अगुवाई में यहां पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने मे जेपी कामयाब रहे । और अन्ना की टीम ने हिसार में कांग्रेस उम्मीदवार के खिलाफ पूरी ताकत झोंक दी, इसके बाद भी कांग्रेस उम्मीदवार को डेढ लाख से  ज्यादा वोट मिले । अन्ना और केजरीवाल अपनी पीठ खुद थपथपाते रहे, लेकिन आप हिसार मे किसी से भी पता कर लें, कांग्रेस ने जिसे उम्मीदवार बनाया था, वो पहले दिन से ही तीसरे नंबर पर था और चुनाव नतीजे भी उसी के अनुरुप रहा । हां अगर कांग्रेस  उम्मीदवार यहां चौथे  स्थान पर चला जाता तो मैं ये मानने को तैयार हो  जाता कि अन्ना की टीम के विरोध का कुछ असर हुआ ।  
मित्रों मुझे लगता है कि जो लोग  जेपी आंदोलन को नीचा दिखा रहे हैं, उनकी मंशा लोकनायक जयप्रकाश के आँदोलन को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि उस आंदोलन  से अन्ना की तुलना कर अन्ना को बडा बनाने की साजिश  है । सच तो ये है कि आजाद भारत में अगर सबसे  बडा कोई आंदोलन है तो वो जेपी  आंदोलन ही है, और अगर हम उससे किसी दूसरे आंदोलन की तुलना करें  तो जाहिर है कि दूसरे आंदोलन का कद बढता है । वैसे  मैं लेखकों से आग्रह करुंगा का ऐसा  कुछ ना  लिखें कि इतिहाल  कलंकित हो ।
  

Founder

Founder
Saleem Khan