जाने क्यों अब ये कलम मेरी,
चलते चलते रुक जाती है |
तुम होती हो तो लिखने की ,
फुर्सत ही किसे मिल पाती है ||
इस दाल -भात के भावों ने ,
सारी स्याही को सोख लिया |
जब कभी उठाकर कलम चला,
तेरी बाहों ने रोक लिया ||
मन कैद है तेरे ख्यालों में,
फिर भला कौन क्या लिखता है ||
तेरी यादों में कभी कभी ,
मन बुझा बुझा सा रहता है |
और कभी तुम्हारे ख्वाबों से,
मन महका महका लगता है ||
ख्यालों के इन अम्बारों से,
तेरी ही सूरत ढलती है |
मन कैद है तेरे सवालों में,
फिर कलम कहाँ चल सकती है ||
दूरभाष ने प्रिये , तुम्हारी -
स्वर सरिता जब सुनवाई |
ख्वाबों के इन्हीं झरोखों से,
बह आई शीतल पुरवाई ||
तेरे आने के ख्यालों से ,
कुछ चेतनता सी छाई है |
इसलिए उठाकर कलम आज,
लिखने की हिम्मत पाई है ||
चलते चलते रुक जाती है |
तुम होती हो तो लिखने की ,
फुर्सत ही किसे मिल पाती है ||
इस दाल -भात के भावों ने ,
सारी स्याही को सोख लिया |
जब कभी उठाकर कलम चला,
तेरी बाहों ने रोक लिया ||
तेरे ना होने पर सब कुछ ,
यह सूना सूना लगता है |मन कैद है तेरे ख्यालों में,
फिर भला कौन क्या लिखता है ||
तेरी यादों में कभी कभी ,
मन बुझा बुझा सा रहता है |
और कभी तुम्हारे ख्वाबों से,
मन महका महका लगता है ||
ख्यालों के इन अम्बारों से,
तेरी ही सूरत ढलती है |
मन कैद है तेरे सवालों में,
फिर कलम कहाँ चल सकती है ||
दूरभाष ने प्रिये , तुम्हारी -
स्वर सरिता जब सुनवाई |
ख्वाबों के इन्हीं झरोखों से,
बह आई शीतल पुरवाई ||
तेरे आने के ख्यालों से ,
कुछ चेतनता सी छाई है |
इसलिए उठाकर कलम आज,
लिखने की हिम्मत पाई है ||
