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आई. ऐ. यस. पी. सी. यस.पढ़ के

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on शनिवार, 3 दिसंबर 2011 | 9:16 pm


आई. ऐ. यस. पी. सी. यस.पढ़ के
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कच्चा पीतल हो जब राजा
सोने का कवि हो दरबारी
बीच दन्त ज्यों जिह्वा डोले
कटते पिसते निभती यारी
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उनसे क्या उम्मीद लगायें
हो नंगे जो अब भी घूमें
“माया” के ही तलवे चाटें
मिले “कटोरे” में जो -चूमें !
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“माया” मोहिनी है जालिम ये
रानी सिंहासन -पहचानो
भूख -समस्या -न्याय की खातिर
महल घुसो तब परखो-जानो
कितने बुद्धि विवेक लिए हैं
धूल धूसरित “दरी ” बिछाए बैठे
कहीं द्रौपदी कहीं जुआ है
हाथ मलें सब बैठे !
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राजा ही क्यों दोषी मानें
हम तुम ही दरबारी
बनो पूर्णिमा चाँद सा चमको
कहाँ निशा -अंधियारी ??
मन्त्र-मंत्रणा राज-नीति सब
तुम ही तो समझाते
माँ ने क्या सब बुरा सिखाया
गुरु यही हैं क्या समझाते ??
तेरा भी ये घर है यारों
यहीं तुम्हे इज्जत से रहना
young-man-looking_~x30677732
आई. ऐ. यस. पी. सी. एस. पढ़ पढ़ के
मान नहीं खो देना
गौरव, मान, दर्द ना समझे
क्या मानव -मानवता ??
जितनी शक्ति अरे ! लगा दो
ला समाज में समता !!
शुक्ल भ्रमर ५
५.११.२०११- ७.१५-७.५५ पूर्वाह्न
यच पी
(फोटो साभार गूगल नेट से )

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