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क्या केवल प्रशासनिक पद पर बैठी बेटी ही मजबूत है - मिशन शक्ति अभियान पर सुलगता सवाल शालिनी कौशिक एडवोकेट का

Written By Shalini kaushik on शुक्रवार, 1 मई 2026 | 10:10 am

    


    उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के मार्गदर्शन में ''महिलाओं तथा बच्चों की सुरक्षा, सशक्तिकरण व सम्मान'' के उदद्देश्यों के साथ ''मिशन शक्ति'' के रूप में वृहद अभियान की शुरुआत की गई. मिशन शक्ति अभियान के पहले चरण की शुरूवात 17 अक्टूबर 2020 को की गई थी. मिशन शक्ति अभियान के 4 चरणों में सफल संचालन के पश्चात् मिशन शक्ति फेज-5, उत्तर प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान, स्वावलंबन, स्वास्थ्य और सशक्तिकरण के लिए शुरू किया गया, जिसकी शुरुआत 20 सितंबर 2025 को हुई थी। यह अभियान महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और समाज में उनकी भागीदारी को बढ़ाने पर केंद्रित है, जिसमें स्वास्थ्य हेल्पलाइन का शुभारंभ, 'बीसी सखी' जैसी योजनाओं से जोड़ना और पुलिस द्वारा जागरूकता कार्यक्रम चलाना शामिल है।

       अभी तक के मिशन शक्ति अभियान के यदि हम पांचो चरणों की बात करें तो हम पाते हैं कि इस अभियान में महिला शक्ति को प्रशासनिक क्षेत्र में ही आगे बढ़ाने का आदर्श स्थापित किया गया है -

✒️ अमरोहा: मिशन शक्ति के तहत, एमएस सीनियर सेकेंडरी स्कूल की छात्रा निष्ठा एक दिन की थानेदार बनीं. उन्होंने महिला अपराधों पर सख्त कार्रवाई करने का निर्देश दिया.

✒️ जौनपुर: कक्षा 10 की छात्रा दिव्या यादव ने मिशन शक्ति के तहत एक दिन के लिए थानाध्यक्ष का पद संभाला और महिला सशक्तिकरण का संदेश दिया.

✒️ शाहजहांपुर: टियारा अरोरा को एक दिन के लिए मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) बनाया गया. उन्होंने स्वास्थ्य विभाग का निरीक्षण किया और फरियादियों की समस्याएं सुनीं.

✒️ रायबरेली (सलोन): कन्या पूर्व माध्यमिक विद्यालय की छात्रा सोनाली जोशी ने एक दिन के लिए नगर पंचायत की कार्यकारी अधिकारी (EO) का पद संभाला और बालिकाओं को सशक्त बनाने के उद्देश्य से कार्य किया.

✒️ रायबरेली (महाराजगंज): उच्च प्राथमिक विद्यालय सलेथू की कक्षा सात की छात्रा अंशिका वर्मा को एक दिन के लिए खंड शिक्षा अधिकारी (BEO) बनाया गया, और उन्होंने विभागीय योजनाओं की जानकारी ली.

✒️ मिर्जापुर: पटेहरा कला के कंपोजिट विद्यालय की कक्षा 7 की छात्रा सुनैना को एक दिन के लिए खंड विकास अधिकारी (BDO) बनाया गया. उन्होंने स्वयं सहायता समूहों को जोड़ने पर जोर दिया.

✒️ शामली : उत्तर प्रदेश सरकार के 'मिशन शक्ति' अभियान के मद्देनजर शामली जनपद में सराहनीय और अनूठी पहल करते हुए महिलाओं को सशक्त और जागरूक बनाने के लिए ज़िले की 21 प्रतिभाशाली बेटियों को एक दिन के लिए प्रशासनिक पदों की जिम्मेदारी सौंपी गई। अभियान के तहत बेटियों के उम्दा प्रदर्शन ने न केवल जनपद का मान बढ़ाया, बल्कि होनहार बेटियों ने प्रशासनिक अनुभव प्राप्त कर सशक्त भारत का चेहरा भी प्रस्तुत किया।

         मिशन शक्ति अभियान उत्तर प्रदेश में अपने पांच चरण पूर्ण कर चुका है. पांचो अभियान में बेटियों को डी एम, एस पी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी जैसे वरिष्ठ प्रशासनिक पदों की जिम्मेदारी ही सौंपी गई. ये एक सराहनीय पहल है बेटियों में शक्ति व ऊर्जा भरने के संबंध में, किन्तु ये मिशन शक्ति अभियान सम्पूर्ण नहीं कहा जा सकता जब तक कि इसमें नारी शक्ति के आरम्भ से लेकर आज तक के स्वरूप को अनदेखा कर दिया जायेगा.

नारी पर आरम्भ से लेकर आज तक दो दो परिवारों की जिम्मेदारी रही है, इसलिए उसकी शक्ति को अनदेखा या उपेक्षित किया ही नहीं जा सकता. नारी सबसे पहले गृहणी होती है, 

वह ही प्रथम शिक्षिका का मानद दर्जा पाती रही है. कहा भी जाता रहा है कि एक नारी का शिक्षित होना दो परिवारों का शिक्षित होना है. सावित्री बाई फुले की जयंती 3 जनवरी को पूरा देश मनाता है और वे प्रथम शिक्षिका के रूप में सम्मान पाती आई हैं,


नारी ने समाज सेवा के क्षेत्र में भी बड़े बड़े कीर्तिमान स्थापित किये हैँ,दीदी माँ साध्वी ऋतंभरा जी, हिंदू धर्म की शिक्षाओं के महत्व और समाज के लोगों पर पड़ने वाले इनके प्रभावों पर प्रवचन देती हैं। बेटियों की जिम्मेदारी संभालती हैं और उनके घर बसाने में पूर्ण सहयोग करती हैँ. उनके द्वारा पालन पोषण प्राप्त आज बहुत सी बेटियां प्रशासनिक पदों पर विराजमान हैँ और देश की शोभा बढ़ा रही हैँ.


वकालत के क्षेत्र में झंडे गाड़ने में भी नारी पीछे नहीं हैं और बहुत पहले से ही महिला अधिवक्ता भी समाज को मिलती रही हैँ.कॉर्नेलिया सोराबजी (15 नवंबर 1866 - 6 जुलाई 1954) एक भारतीय महिला थी, जो मुम्बई विश्वविद्यालय से पहली महिला स्नातक, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में कानून का अध्ययन करने वाली पहली महिला थी(वास्तव में, किसी भी ब्रिटिश विश्वविद्यालय में अध्ययन करने वाली पहली भारतीय राष्ट्रीय, भारत में पहली महिला वकील , और भारत और ब्रिटेन में कानून का अभ्यास करने वाली पहली महिला। 2012 में, लंदन के लिंकन इन में उनकी प्रतिमा का अनावरण किया गया था।


भारत क़ृषि प्रधान देश है और भारतीय खेती मूलतः वर्षा पर निर्भर है. ये कठिन कार्य भारतीय पुरुष प्रधान समाज नारी के सहयोग के बिना करने में सक्षम नहीं है. भारत का इतिहास साक्षी है खेती के कठिन क्षेत्र में नारी के गरिमामय योगदान का और आरम्भ से लेकर आज तक नारी केवल खेत पर पति के लिए खाना लाने का ही कार्य नहीं करती रही बल्कि किसान बनकर भी अपना योगदान देने से पीछे नहीं रही है.


घर में झाडू को लक्ष्मी का दर्जा दिया गया है.यहाँ तक कि अगर गलती से झाड़ू को पैर लग जाये तो उससे माफ़ी मांगने तक की भारतीय परंपरा है. पहले महात्मा गाँधी जी द्वारा और अब प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी द्वारा झाड़ू को हाथ में लेकर स्वच्छता अभियान की शुरुआत की गई. सफाई में ही भगवान का वास होता है यही सन्देश देते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा कुम्भ आयोजन के दौरान सफाई कर्मियों के पैर भी स्वयं धोये गए. ऐसे में हम शक्ति के इस स्वरूप को अनदेखा व उपेक्षित कैसे कर सकते हैँ जबकि हम स्वयं की निजी जिंदगी में भी सफाई कर्मियों महिला के सहयोग से ही स्वच्छ वातावरण में रहने का सुख प्राप्त कर पाते हों.



राजनीति एक ऐसा क्षेत्र जिसमें आने से पुरुष भी कतराते हैँ क्योंकि यहाँ खींचतान कुछ ज्यादा होती हैँ, जिम्मेदारी बहुत ज्यादा होती है. सामान्य बैकग्राउंड के व्यक्ति का इसमें स्थान बनाना बहुत कठिन होता है किन्तु भारतीय नारी अपनी योग्यता और मेहनत के दम पर राजनीति के शीर्ष स्थानों पर काबिज होने मे सफल रही है और जनता की सेवा करने के अपने जज्बे को सदैव ईमानदारी से निभाती रही है.


  आज भारतीय नारी विमान उड़ा रही है,ट्रेन चला रही है,बस चला रही है, इ रिक्शा भी चला रही है, बसों मे कंडक्टर का कठिन दायित्व भी निभा रही हैं, आंगनबाड़ी बनकर घर घर सरकार की योजनाओं को पहुंचा रही है. 


     और भी बहुत से दायित्व हैँ जो आज की बेटियां निभा रही हैं किन्तु मिशन शक्ति अभियान के लिए जो पद प्रशासन द्वारा चुने गए हैँ वे मात्र प्रशासनिक पद हैँ जहाँ नारी खुद निर्णय लेने का अधिकार भी नहीं रखती. एक शिक्षिका के रूप मे वह सोचने समझने की शक्ति देती है, एक समाज सेविका के रूप मे वह जीवन मे उन्नति का पथ प्रशस्त करती है, एक वकील के रूप मे वह न्याय दिलाती है, एक नेता के रूप में वह गलत के खिलाफ मजबूती से लड़ना सिखाती है, आंगनबाड़ी के रूप मे वह सरकारी योजनाओं का जनता से परिचय कराती है एक सफाईकर्मी के रूप मे वह स्वच्छता से जीना सिखाती है किन्तु इतने सब महत्वपूर्ण योगदानों के बावजूद सरकारी योजनाओं मे नारी के इन शक्ति स्वरूपों का कोई महत्व नहीं है. मिशन शक्ति के तहत किसी बेटी को यह सन्देश नहीं दिया जाता कि नारी के इनमें से किसी भी शक्ति स्वरुप को जीवन मे उतारा जाये. नहीं बताया जाता कि नारी का सबसे बड़ा शक्ति स्वरुप उसका गृहणी होना है और अगर वह एक गृहणी के रूप मे एक दिन भी अगर घर को अच्छी तरह से संभाल सके तो यह शक्ति की सच्ची पहचान होगी और अगर वह देश और समाज में सभ्यता, ईमानदारी की नस्लें तैयार कर सके तो एक सुन्दर भविष्य का निर्माण होगा, समाज और देश का भविष्य उज्ज्वल बनेगा. नारी शक्ति के दायित्व बहुत अधिक हैँ और उन्हें ध्यान में रखते हुए सरकार को मिशन शक्ति का दायरा अभियान के छठवें चरण में बढ़ाना ही होगा.

धन्यवाद 🙏🙏

द्वारा 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली )

मजदूर दिवस का तमाशा

 कविता: 

*"मजदूर दिवस का तमाशा"*

✍️ कृष्ण कायत, मंडी डबवाली।


पंडालों में शोर है, नारों का बाजार है,

आज फिर 'मजदूर' नेताओं का त्योहार है।

तय हुई है मजदूरी पर लंबी एक बहस आज,

मंच पर बैठा हुआ वो खुद ही जमींदार है।


एसी की ठंडक में 'धूप' पर कविता पढ़ी गई,

पसीने के नमक पर फिर चाशनी चढ़ी गई।

शिकागो के किस्सों से हॉल सारा गूँज उठा,

मजदूर की बदहाली पर सुर्खियाँ गढ़ी गई।


तस्वीरें खींची गईं, अखबारों में छपवा दी,

खैरात के लड्डू बांटे, और वाहवाही बटोर ली।

उधर लू के थपेड़ों में जो दीवार चिन रहा,

उसने तो सूखी रोटी पानी में भिगो कर तोड़ ली।


ना उसे कानून पता, ना सरकार का वादा है,

उसका बस भूख से लड़ने का ही इरादा है।

तुम मनाओ 'मई दिवस' रैलियों के शोर में,

उसकी किस्मत में आज भी बोझा ही ज्यादा है।


कैसी ये क्रांति है, कैसा ये बदलाव है?

ये मजदूरों का दिन नहीं, बुद्धिजीवियों का दांव है।

महल वाले जब भी 'कुटिया' की बात करते हैं,

समझ लो कि किसी पद की तरफ बढ़ा पाँव है।


✍️ कृष्ण कायत, मंडी डबवाली।

मई दिवस का संदेश - शोषण पर रोक ही मानवता का विकास।

 *मई दिवस का संदेश - शोषण पर रोक ही मानवता का विकास।*


 ✍️ कृष्ण कायत, मंडी डबवाली।


एक मई, अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस - वह अवसर जब हम श्रमिक वर्ग की अथक मेहनत, ऐतिहासिक संघर्षों और वर्तमान शोषण की काली सच्चाई को करीब से देखते हैं। पूंजीवादी व्यवस्था की मुनाफे की असीम हवस ने मजदूरों को चूस लिया है। यह दिन हमें न सिर्फ इतिहास की याद दिलाता है, बल्कि दृढ़ संकल्प भी जगाता है कि मेहनतकश हाथों को सम्मान मिले, शोषण थमे, और समान विकास का मार्ग प्रशस्त हो।


मई दिवस की कहानी 1886 के शिकागो से शुरू हुई, जब अमेरिकी मजदूरों ने आठ घंटे के कार्यदिवस की मांग की। हेयमार्केट चौक पर शांतिपूर्ण सभा पर पुलिस ने गोलियां बरसाईं, कई लोग मारे गए, कई घायल हुए। इस बलिदान ने दुनिया हिला दी। 1889 में पेरिस के सोशलिस्ट इंटरनेशनल ने एक मई को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस घोषित किया। भारत में यह संदेश 1923 में मद्रास के मजदूर जुलूसों से पहुंचा। कम्युनिस्ट नेता एस.ए. डांगे और बी.टी. रानाडिवे ने इसे आजादी की लड़ाई से जोड़ा। स्वतंत्र भारत में यह ट्रेड यूनियनों का प्रतीक बना - लाखों श्रमिक सड़कों पर उतरते, नारे लगाते: "आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम, आठ घंटे तंदुरुस्ती।" समय ने इसे मजबूत किया । अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) समझौता, 1919 में स्थापित संयुक्त राष्ट्र की एक विशेष एजेंसी द्वारा वैश्विक श्रम मानकों को निर्धारित करने वाला एक त्रिपक्षीय (सरकार, नियोक्ता, श्रमिक) समझौता है। इसका उद्देश्य दुनिया भर में सामाजिक न्याय, सम्मानजनक कार्य, बेहतर कामकाजी परिस्थितियों, न्यूनतम मजदूरी और मानव अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। भारत में संविधान के अनुच्छेद 23-24 ने बंधुआ मजदूरी रोकी, फैक्ट्री एक्ट 1948 ने कार्यस्थल सुरक्षित बनाया। लेकिन अब यह विकास उलट रहा है, पूंजी की हवस ने सब कुछ निगल लिया।


वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था मुनाफे की भूखी है, वह श्रमिकों को मशीन समझती है। भारत सरकार ने 29 पुराने श्रम कानूनों को समेकित करके चार नए लेबर कोड (श्रम संहिता) 21 नवंबर 2025 से लागू किए हैं, जो 1 अप्रैल 2026 से पूर्णतः प्रभावी हो रहे हैं। भारत में 4 नए लेबर कोड- कोड ऑन वेजेस, इंडस्ट्रियल रिलेशंस, सोशल सिक्योरिटी और ऑक्यूपेशनल सेफ्टी। इन्होंने 29 पुराने कानूनों को समाहित कर कॉरपोरेट्स को शोषण की खुली छूट दी है। इन्हें 'सुधार' कहा गया, लेकिन विश्लेषक इसे कार्पोरेट अनुकूल बताते हैं। उदाहरणस्वरूप, इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड में हड़ताल के लिए 14 दिन का पूर्व नोटिस अनिवार्य कर दिया गया, जबकि नियोक्ता बिना नोटिस छंटनी कर सकता है अगर कर्मचारी 300 से कम हों। फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट से कॉन्ट्रैक्ट वर्कर बढ़े, जिन्हें स्थायी नौकरी या भविष्य निधि का पूर्ण लाभ नहीं मिलता।

2023 के पीएचडीएचएस सर्वे के अनुसार, 90% अनौपचारिक क्षेत्र के मजदूर (कुल 50 करोड़ श्रमिक) बिना सामाजिक सुरक्षा के जी रहे हैं। कोविड-19 के दौरान 12 करोड़ प्रवासी मजदूर बेरोजगार हुए, फिर भी एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) में छंटनी बढ़ी। न्यूनतम मजदूरी राज्यवार अलग-अलग है - बिहार में 300 रूपए प्रतिदिन व दिल्ली में 600 रूपए प्रतिदिन, लेकिन महंगाई (2025 में 6% से ऊपर) इसे बेमानी बनाती है। पूंजीवादी व्यवस्था में 1% अमीरों के पास देश की 40% संपत्ति है (ऑक्सफैम रिपोर्ट 2025), जबकि मजदूर वर्ग गरीबी रेखा से नीचे धंस रहा है। कारखानों में 12-14 घंटे की पाली, ओवरटाइम बिना भुगतान, और यौन उत्पीड़न जैसी समस्याएं आम हैं। गिग इकॉनमी (उबर, जोमैटो) में डिलीवरी बॉय बिना बीमा व अन्य सुविधाओं के सड़कों पर दौड़ते हैं , 2024 में 500 से ज्यादा दुर्घटनाओं में मौतें हुई हैं। 

ये कानून कॉरपोरेट्स को मुनाफा कमाने की खुली छूट देते हैं। 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' के नाम पर श्रमिक अधिकार कुचले जा रहे, जैसे गुजरात के हीराचंद दोषी मामले में जहां 1200 मजदूरों को बिना नोटिस हटाया गया। मजदूर कमजोर हो रहे हैं क्योंकि यूनियन कमजोर पड़ीं - ट्रेड यूनियन एक्ट में रजिस्ट्रेशन कठिन हो गया।


आज का मजदूर न सिर्फ गरीब है, बल्कि असुरक्षित भी है। बिहार-यूपी के प्रवासी दिल्ली-मुंबई के निर्माण स्थलों पर काम करते हैं, जहां हादसे (जैसे 2025 का मुंबई ब्रिज गिरना, 20 मौतें) बिना सजा के भुला दिए जाते हैं। महिलाएं टेक्सटाइल मिलों में कम मजदूरी पर जी रही हैं और 40% महिला श्रमिक गरीबी रेखा में हैं । जलवायु परिवर्तन से कृषि मजदूर प्रभावित हुए व 2025 की बाढ़ में लाखों बेरोजगार। समाज का विकास इन्हीं हाथों से होता है, खेत जोतने से लेकर स्मार्टफोन बनाने तक । फिर भी अमीर-गरीब की खाई दिन प्रतिदिन चौड़ी हो रही है।


मजदूरों का यह शोषण वैश्विक संकटों में और भी भयावह हो जाता है। 2025 का ईरान-अमेरिका युद्ध इसका जीता-जागता सबूत है। तनाव बढ़ा तो तेल $150/बैरल पहुंचा, भारत में महंगाई 12% उछली। फैक्टरियां बंद, बिजली-पानी, रसोई गैस सिलेंडर महंगा । गुजरात रिफाइनरियों में हड़तालें दबीं। ईरान बंदरगाह प्रतिबंधों से आयात ठप, मुंबई-चेन्नई डॉक मजदूर भूखे रहे। पाक सीमा तनाव से राजस्थान-हरियाणा के 5 लाख प्रवासी ट्रेनों में लौटे , कई रास्ते में मरे। दिल्ली निर्माण स्थलों पर बांग्लादेशी-नेपाली श्रमिक भागे, नए कोड ने 'अवैध' ठहराय - हिरासत, मारपीट हुई। उर्वरक महंगे होने से किसान-मजदूर खेत छोड़ शहर पलायन को मजबूर। निर्यात 20% गिरा, ऑटो प्लांट्स में 3 लाख नौकरियां गईं। परिवार भूखे, बच्चे स्कूल छोड़ सड़कों पर - यह पूंजीवाद की क्रूरता है, जहां युद्ध हथियार कंपनियों को मुनाफा व  मजदूरों को कब्र देता है। कोविड की तरह, प्रवासी बेरोजगार, जलवायु बाढ़ों ने लाखों को बेघर किया। समाज की नींव रखने वाले ये हाथ टूट रहे हैं।


एक मई यही संदेश देता है कि मजदूरों को दृढ़ कानून, सुविधाएं और अवसर दें। श्रम कोड संशोधित करें: हड़ताल अधिकार बहाल, राष्ट्रीय लिविंग वेज ₹500/दिन, पूर्ण सामाजिक सुरक्षा। यूनियनों को ताकत, कौशल विकास के लिए आईटीआई अपग्रेड व डिजिटल ट्रेनिंग इत्यादि। प्रवासियों को पोर्टेबल बीमा-आवास, युद्ध जैसे संकटों में पलायन रोके जाएं। भेदभाव मिटाएं - शिक्षा, स्वास्थ्य, समान वेतन हों। सरकार-यूनियन-कॉरपोरेट मिलकर अमल करें। मजदूर ही समाज की रीढ़ हैं। उनके शोषण को रोककर ही मानवता का सच्चा विकास संभव है।तभी मेहनत का फल हर हाथ तक पहुंचेगा, मानवता का विकास होगा।


✍️ कृष्ण कायत, मंडी डबवाली।

Founder

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Saleem Khan