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यू पी में अधिवक्ता खतरे में

Written By Shalini kaushik on बुधवार, 30 अगस्त 2023 | 3:42 pm

 

हापुड़ में प्रियंका त्यागी एडवोकेट के साथ पुलिस प्रशासन द्वारा बदसलूकी और उसके बाद हापुड़ बार एसोसिएशन के अधिवक्ताओं के शांति पूर्ण धरने पर सी ओ हापुड़ द्वारा बर्बरता पूर्वक लाठी चार्ज करना, साथ ही, महिला अधिवक्ताओं को भी लाठी चार्ज के घेरे में लेना जिसमें दो दर्जन से अधिक अधिवक्ताओं का गम्भीर रूप से घायल होना, इसे लेकर पूरे यू पी के अधिवक्ताओं की कलमबंद हड़ताल और ठीक हड़ताल के दिन हापुड़ से सटे हुए गाजियाबाद में 35 वर्षीय अधिवक्ता मोनू चौधरी की गोली मारकर हत्या उत्तर प्रदेश में अधिवक्ताओं की असुरक्षित स्थिति दिखाने के लिए पर्याप्त है और अधिवक्ता सुरक्षा कानून की जरूरत की पुरजोर वक़ालत कर रही है. 

       वकीलों की सुरक्षा के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया प्रतिबद्ध है और इसीलिए अधिवक्ता सुरक्षा कानून के ड्राफ़्ट को बीसीआई ने मंजूरी दे दी थी . बीसीआई ने इस ऐक्ट का प्रारूप तैयार कर सभी राज्यों की बार काउंसिल को भेजा था और उनसे सुझाव और संशोधन के लिए राय मांगी थी और फिर बिना किसी संशोधन के ही ऐक्ट के मसौदे को मंजूरी दे दी गयी. एडवोकेट प्रोटेक्शन बिल की रूपरेखा और ड्राफ़्ट बार काउंसिल ऑफ इंडिया की सात सदस्यीय कमेटी ने तैयार किया और इसकी 16 धाराओं में वकील तथा उसके परिवार के सदस्यों को किसी प्रकार की क्षति और चोट पहुंचाने की धमकी देना, किसी भी सूचना को जबरन उजागर करने का दबाव देना, पुलिस अथवा किसी अन्य पदाधिकारी से दबाव दिलवाना, वकीलों को किसी केस में पैरवी करने से रोकना, वकील की संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, किसी वकील के खिलाफ अपमानजनक शब्द का इस्तेमाल करना जैसे कार्यों को अपराध की श्रेणी में रखा गया और ये सभी अपराध गैर जमानती अपराध रखने का प्रावधान किया गया. ऐसे अपराध के लिए 6 माह से 5 वर्ष की सजा के साथ साथ दस लाख रुपये जुर्माना लगाने का भी प्रावधान रखा गया जिसके लिए पुलिस को 30 दिनों के भीतर अनुसंधान पूरा किया जाना जरूरी किया गया , जिसकी सुनवाई जिला एवं सत्र न्यायाधीश /अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश करेंगे. वकील को सुरक्षा के लिए हाई कोर्ट में आवेदन देने का प्रावधान और हाई कोर्ट वकील के आचरण सहित अन्य तथ्यों की जांच कर जरूरत पड़ने पर स्टेट बार काउंसिल तथा बीसीआई से जानकारी लेकर सुरक्षा देने के बारे में आदेश जारी करने का प्रावधान रखा गया लेकिन किसी केस में अभियुक्त वकील पर यह कानून लागू नहीं होगा यह भी निश्चित किया गय. 

    आज  तक भी एडवोकेट प्रोटेक्शन ऐक्ट लागू नहीं किये जाने का खामियाजा उत्तर प्रदेश के अधिवक्ताओं को लगातार भुगतना पड़ रहा है और ऐक्ट के न होने के नकारात्मक असर वकीलों को नजर आते जा रहे हैं. लगातार ऐक्ट लागू किए जाने की मांग उत्तर प्रदेश में तहसील बार एसोसिएशन से लेकर बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश द्वारा की जा रही है, किंतु उत्तर प्रदेश सरकार के कानों पर जूँ तक नहीं रेंग रही है. अब लगातार हो रही अधिवक्ताओं की हत्या को देखते हुए यही सवाल उठ रहा है कि क्या वेस्ट यू पी में हाई कोर्ट खंडपीठ की तरह ही अधिवक्ताओं की सुरक्षा को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है?  

    उत्तर प्रदेश के समस्त अधिवक्ताओं की ओर से विनम्र निवेदन है कि उत्तर प्रदेश सरकार तुरंत एडवोकेट प्रोटेक्शन ऐक्ट के लागू किए जाने के लिए कदम उठाए.   

शालिनी कौशिक 
एडवोकेट
कैराना (शामली) 

पाकिस्तान लौटेगी सीमा हैदर

Written By Shalini kaushik on रविवार, 27 अगस्त 2023 | 8:06 pm

 



     सीमा हैदर (पाकिस्तान की नागरिक) आजकल भारत में चर्चाओं में टॉप टेन में शामिल हैं और यही नहीं इस चर्चित चेहरे का फायदा उठाकर स्वयं को टॉप रैंकिंग में लाने के लिए भारतीय मीडिया भी काफी हाथ-पैर मार रहा है. पाकिस्तान के मुस्लिम समुदाय की सीमा हैदर अपने चार बच्चों के साथ तीन देशों - पाकिस्तान, नेपाल और भारत के बार्डर को अवैध रूप से पार कर भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के रघुपुरा में अवैध रूप से रह रही है और अब वह भारत के नागरिक सचिन की पत्नी के तौर पर भारत की नागरिकता हासिल करने के लिए आगे बढ़ गई है और यही भारतीय नागरिकता हासिल करने के लिए बढ़ाया गया सीमा हैदर का कदम उसकी भारत में अवैध उपस्थिति का भंडाफोड़ कर गया है. 
भारत में नागरिकता अधिनियम-1955 द्वारा भारतीय नागरिकता प्राप्ति के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं जो इस प्रकार हैं - 

 पंजीकरण द्वारा नागरिकता 
केन्द्रीय सरकार, आवेदन किये जाने पर, नागरिकता अधिनियम 1955 की धारा 5 के तहत किसी व्यक्ति (एक गैर क़ानूनी अप्रवासी न होने पर) को भारत के नागरिक के रूप में पंजीकृत कर सकती है यदि वह निम्न में से किसी एक श्रेणी के अंतर्गत आता है:--

भारतीय मूल का एक व्यक्ति जो पंजीकरण के लिए आवेदन करने से पहले सात साल के लिए भारत का निवासी हो;
भारतीय मूल का एक व्यक्ति जो अविभाजित भारत के बाहर किसी भी देश या स्थान में साधारण निवासी हो;
एक व्यक्ति जिसने भारत के एक नागरिक से विवाह किया है और पंजीकरण के लिए आवेदन करने से पहले सात साल के लिए भारत का साधारण निवासी है;
उन व्यक्तियों के अवयस्क बच्चे जो भारत के नागरिक हैं;
पूर्ण आयु और क्षमता से युक्त एक व्यक्ति जिसके माता पिता सात साल से भारत में रहने के कारण भारत के नागरिक के रूप में पंजीकृत हैं।
पूर्ण आयु और क्षमता से युक्त एक व्यक्ति, या उसका कोई एक अभिभावक, पहले स्वतंत्र भारत का नागरिक था और पंजीकरण के लिए आवेदन देने से पहले एक साल से वह भारत में रह रहा है।
पूर्ण आयु और क्षमता से युक्त एक व्यक्ति जो सात सालों के लिए भारत के एक विदेशी नागरिक के रूप में पंजीकृत है और पंजीकरण के लिए आवेदन देने से पहले वह एक साल से भारत में रह रहा है।.          
        जिसके अनुसार, सीमा हैदर का गैर कानूनी अप्रवासी होना उसकी भारतीय नागरिकता प्राप्ति की सर्वप्रथम बाधा है, उसके पश्चात यदि वह यह कहती है कि वह भारत के नागरिक की पत्नी है तब भी वह भारत की नागरिकता प्राप्त नहीं कर सकती है क्योंकि ऐसे में पंजीकरण के लिए आवेदन करने से पूर्व उसे सात साल के लिए भारत का साधारण निवासी होना चाहिए था और वह अभी दो माह से ही भारत में रह रही हैं इसलिए इस नियम के अंतर्गत भी उसे भारतीय नागरिकता प्राप्त नहीं हो सकती है. 
        सीमा हैदर का भारत में तीन तीन बॉर्डर लाँघकर आना, चार बच्चों को लेकर आना, पांचवी पास होना, मीडिया के प्रश्नों का बेहिचक ज़वाब देना, हिन्दू धर्म की मान्यताओं का बहुत बढ़चढ़कर दिखावा करना, इसरो के चंद्रमा पर पहुंचने को लेकर व्रत रखना, जय श्री राम के नारे लगाना आदि बहुत कुछ है जो उसे संदिग्धों की श्रेणी में रखता है और उसकी भारत में मौजूदगी को लेकर भारतीय जनमानस में रोष भरता है. ऐसे में भारतीय कानून के अनुसार और भारत में उसकी संदिग्ध उपस्थिति को देखते हुए उसे अभिरक्षा में लेकर उसके चारों बच्चों के साथ उसे वापस पाकिस्तानी सरकार के हवाले कर दिया जाना चाहिए.

शालिनी कौशिक
         एडवोकेट 
कैराना (शामली)

संघर्षों पर सफ़लता पाने वाले आदर्श चरित्र श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट

Written By Shalini kaushik on शुक्रवार, 25 अगस्त 2023 | 3:11 pm


  

   माननीय श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी संघर्षों का दूसरा नाम हैं. शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी जब कक्षा 6 में थे तब शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी ने मजदूरी की, कक्षा 7 में घर पर क्राकरी का काम किया, हॉकरी भी की और तब उन्हें इस कार्य के लिए 140/-रुपये मिलते थे. शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी ने 1977-78 में इन्टर किया और उसके बाद ट्यूशन करने शुरू किए. 1990 में शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी ने वक़ालत पास की, 2000 मे पहली बार क्षेत्र पंचायत का चुनाव लड़ा और ब्लॉक अध्यक्ष चुने गए. 2005 मे जिला पंचायत सदस्य चुने गए. 2006-07 में समाजवादी पार्टी के विधान सभा अध्यक्ष रहे. 2008 में खुर्जा बार एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी रहे. 2009-10 में समाजवादी पार्टी की अधिवक्ता सभा के जिला सचिव रहे. 2012 से 2017 तक समाजवादी पार्टी के विधान सभा के जिला अध्यक्ष रहे. 2018 में बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के सदस्य चुने गए और 1 साल 2020-21 में सचिव और तीसरी बार सह अध्यक्ष चुने गए.


    इतने कड़े संघर्षों के साथ माननीय श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी अपने जीवन के सिद्धांतो पर अडिग खड़े रहे और 20 अगस्त 2023 को यह गौड़ सर की श्रेष्ठता ही कही जाएगी कि बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश में पश्चिमी यू पी का प्रतिनिधित्व 25 सदस्यों मे मात्र 3 अधिवक्ताओं का होने पर भी उन्हें प्रथम बार की सदस्यता मे ही बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के चेयरमैन पद के लिए सदस्यों द्वारा चयनित किया गया है. यह पश्चिमी यू पी के लिए बहुत गौरव का क्षण है कि अधिवक्ताओं की सबसे बड़ी संस्था बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश में खुर्जा के अधिवक्ता श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट चेयरमैन पद पर नियुक्त हुए हैं.


     संघर्षों से भरे हुए माननीय श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी के जीवन के बारे में जब मैंने सर से गहराई से जानना चाहा तो अपने जीवन के संघर्षों के बारे में बताते बताते श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी काफी भावुक हो गए और कहने लगे कि आपको तो हमने उपरी उपरी बातेँ ही बताई हैं अगर पूरी गहराई से हम बताएं तो आप रो देंगी. सर कहने लगे कि हमने बहुत संघर्ष देखे हैं और इसीलिये हमें किसी का भी दर्द अपना ही लगता है और इसीलिए हम हर किसी की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं और आज अगर मैं कुछ हूं तो यह परम पिता परमात्मा की ही कृपा है. 


   और यह सच्चाई है क्योंकि मैंने जब सर का नम्बर ढूंढ़कर उनसे अपने COP नम्बर के लिए सहायता मांगी थी तो सर ने मुझसे मेरा फॉर्म भेजने के लिए कहा और जिस किसी का भी फॉर्म मैंने सर को दिया है सर ने उसका काम कराया है और यही नहीं सर ने कभी भी फॉर्म में निश्चित रकम से ऊपर एक भी पैसा नहीं लिया है क्योंकि जब मैं सर को अपना फॉर्म देने मुजफ्फरनगर गई तो वहां सर के बेटे उत्कर्ष गौड़ एडवोकेट मिले और मेरा ड्राफ़्ट तैयार नहीं था तो मैं उन्हें 500 /- रुपये के ड्राफ़्ट के लिए ऊपर से पैसे देने लगी तो उन्होंने एकदम कहा कि पापा गुस्सा होंगे. 31 जनवरी 2020 को मैंने सर को पहले फॉर्म के रूप में अपना फॉर्म दिया था COP नम्बर के लिए और आज अगस्त 2023 में स्थिति यह है कि सर शामली जिले के 170 अधिवक्ताओं को COP नम्बर और 60 अधिवक्ताओं के रजिस्ट्रेशन नंबर बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश से जारी करा चुके हैं. जबसे गौड़ सर ने शामली जिले के अधिवक्ताओं के सहयोग की जिम्मेदारी अपने कँधों पर उठाई है, शामली जिले के अधिवक्ताओं का ना तो बार काउंसिल में रजिस्ट्रेशन की कोई परेशानी रह गई है और न ही COP नम्बर प्राप्त करने में कोई परेशानी रह गई है.


  और यह गौड़ सर की अधिवक्ताओं की समस्या निदान करने की भावना ही कही जाएगी कि सर ने बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के चेयरमैन पद को सम्भालते ही 2018 में सबसे पहले COP नम्बर प्राप्त अधिवक्ताओं के COP नम्बर रि-इश्यू की फीस 500 रुपये से घटाकर 250 रुपये कर दी है जिसमें सर्वप्रथम बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश को बहुत बड़े आर्थिक नुकसान की समस्या सामने आई किन्तु सर अपने निर्णय से नहीं डगमगाये और उन्होंने अधिवक्ताओं का हित हो ऊपर रखा. सर का कहना था कि - "जिसने मेरे लिए एक बार भी कोई कार्य कर दिया है उसका एहसान मैं जिंदगी भर याद रखता हूं और उसके साथ खड़ा रहता हूं." 


  ऐसे हैं हम सभी के आदरणीय श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी और उनके जीवन के संघर्षों और उसके बाद सफ़लता के चरमोत्कर्ष पर पहुंचने को हम इन पंक्तियों के माध्यम से समझ सकते हैं - 

" कुछ किए बिना ही जय - जयकार नहीं होती 

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती." 

शालिनी कौशिक एडवोकेट

विशेष प्रतिनिधि, शामली

माननीय श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट, 

चेयरमैन, बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश

योगी आदित्यनाथ जी कैराना में स्थापित करें जनपद न्यायालय शामली

Written By Shalini kaushik on शुक्रवार, 11 अगस्त 2023 | 12:04 pm

  


       2011 में 28 सितंबर को शामली जिले का सृजन किया गया. तब उसमें केवल शामली और कैराना तहसील शामिल थी. इससे पहले शामली और कैराना तहसील मुजफ्फरनगर जनपद के अंतर्गत आती थी. कुछ समय बाद शामली जिले में ऊन तहसील बनने के बाद अब शामली जिले के अंतर्गत तीन तहसील कार्यरत हैं. 2018 के अगस्त तक शामली जिले का कानूनी कार्य मुजफ्फरनगर जिले के अंतर्गत ही कार्यान्वित रहा किन्तु अगस्त 2018 में शामली जिले की कोर्ट शामली जिले में जगह का चयन न हो पाने के कारण कैराना में आ गई और इसे नाम दिया गया -" जिला एवं सत्र न्यायालय शामली स्थित कैराना. "

        2018 से अब तक मतलब अगस्त 2023 तक शामली जिले के मुख्यालय से लगभग 12 किलोमीटर दूर जिला जज की कोर्ट के लिए जगह का चयन हो जाने के बाद शासन द्वारा 51 एकड़ भूमि जिला न्यायालय कार्यालय और आवासीय भवनों के लिए आवंटित की गयी थी, जिसमें चाहरदीवारी के निर्माण के लिए 4 करोड़ की धन राशि अवमुक्त की गई थी जिससे अब तक केवल बाउंड्रीवाल का ही निर्माण हो पाया है. उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा जिला न्यायालय कार्यालय और आवासीय भवनों के निर्माण के लिए 295 करोड़ रुपये का एस्टीमेट बनाकर शासन को भेजा गया था किंतु शासन द्वारा वर्तमान तक भी कोई धनराशि अवमुक्त नहीं की गई. 

    अब तक हमने बात की केवल उन महत्वाकांक्षाओं की जिनके मद्देनजर बगैर किसी व्यवस्थित योजना के शामली जिले का निर्माण पहले प्रबुद्ध नगर के नाम से और बाद में जनता के दबाव में शामली जिले के ही नाम से कर दिया गया. अब यदि वास्तविकता की बात करें तो शामली जिले में केवल तहसील स्तर का ही कार्य सम्पन्न हो रहा है. जिसे देखते हुए कहा जा सकता है कि वहां कानूनी विभाग लगभग शून्यता की स्थिति में है और वहां जिला जज की कोर्ट की स्थापना के साथ साथ मुंसिफ कोर्ट से लेकर जिला जज की कोर्ट की स्थापना करने के लिए बहुत बड़े स्तर का कार्य सम्पन्न करना होगा, जबकि शामली जिले की तहसील कैराना में जिला जज की कोर्ट से एक नंबर कम की कही जाने वाली कोर्ट ए डी जे कोर्ट की स्थापना ही 2011 में हो चुकी है और कैराना तहसील में स्थापित न्यायालय परिसर शामली जिले के मुख्यालय से मात्र 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और फिर ज़िला न्यायालय शामली के कार्यालय और आवासीय भवनों का निर्माण अब भी तो शामली मुख्यालय पर नहीं किया जाना है अब भी तो वह शामली के गाँव बनत में किया जाना है और वह भी केवल शामली के अधिवक्ताओं और जनता की इस जिद पर कि शामली जिले का ही सर ऊंचा रहना चाहिए, जबकि कैराना भी तो शामली जिले की ही तहसील है और अगर उत्तर प्रदेश सरकार  कैराना के न्यायालय तक के क्षेत्र को शामली जिले के ही क्षेत्र में सम्मिलित कर यहां स्थापित न्यायालयों को मुख्य न्यायालय का दर्जा प्रदान करती है तो जितने बजट की आवश्यकता शामली जिले के बनत गाँव में न्यायालय भवनों हेतु है उसके एक चौथाई से भी कम खर्च में शामली जिले के जनपद न्यायालय की समस्या का निवारण हो जाएगा, किन्तु मानवीय हठ इस साधारण सी बात को एक प्रदेश स्तरीय समस्या का रूप प्रदान कर रही है. 

    ऐसे में, माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी से विनम्र निवेदन है कि वे कैराना की सुदृढ़ न्यायिक व्यवस्था, कैराना में फैली अपराधियों की जड़ें और शामली जिले की बदहाल कर देने वाली जाम की समस्या को देखते हुए कैराना में ही जिला एवं सत्र न्यायाधीश के न्यायालय को शामली जिले का मुख्य न्यायालय घोषित करें और यदि इसके लिए उन्हें कैराना में न्यायालय परिसर तक के क्षेत्र को शामली जिले के अंतर्गत ही घोषित करना पड़े तो करें क्योंकि शामली जिले में जिस जगह का चयन जिला कोर्ट के लिए किया गया है वहां तक क्षेत्र के निवासियों का पहुंचना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है क्योंकि शामली जिला इतना सघन रूप से बसा हुआ है कि मात्र एक किलोमीटर पार करने में भी 1-2 घण्टे से ऊपर का समय लग रहा है. ऐसे में न्याय पाने के लिए पीड़ितों को या तो रात में ही घर से निकलना पड़ेगा या फिर न्याय पाने की आशा को ही खो देना पड़ेगा. साथ ही, यदि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कैराना स्थित जनपद न्यायालय को मुख्य न्यायालय का दर्जा दिया जाता है तो सरकार का बहुत सारा धन भी बचेगा और कैराना तहसील में लगभग खंडहर पड़े बहुत सारे क्षेत्र का न्यायालय और अधिवक्ताओं के चेम्बर के रूप में इस्तेमाल भी हो सकेगा. 

    अतः माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी कम से कम एक बार जांच कमेटी बिठाकर कैराना स्थित जनपद न्यायालय को ही शामली जिले के मुख्य न्यायालय का दर्जा दिए जाने की मांग पर विचार करें. 


       🙏🙏धन्यवाद 🙏🙏


शालिनी कौशिक एडवोकेट

कैराना (शामली)

बंदर और उत्तर प्रदेश

Written By Shalini kaushik on गुरुवार, 3 अगस्त 2023 | 12:49 pm

 


    आज उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा चर्चाओं में अगर कोई शब्द है तो वह है " विकास", जो कि सत्ता पक्ष की नजरों में बहुत ज्यादा हो रहा है और विपक्ष की नजरों में गायब हो गया है किन्तु जो सच्चाई आम जनता के सामने है, जिस भयावह सच को उत्तर प्रदेश की जनता भुगत रही है, वह यह है कि घर के अंदर, घर के बाहर, मन्दिर, मस्जिद, कार्यस्थल, न्यायालय - कचहरी परिसर, सडकें, बिजली के खंबे, पानी की टंकियां, खुले घास के मैदान, वाहनों के पार्किंग स्थल आदि आदि क्या क्या कहा जाए, सभी बन्दरों के परिवार - खानदान से आतंकित हैं और इनके खौफ में कोई अपनी जिंदगी से हाथ धो रहा है तो कोई अपने हाथ पैर से तो कोई अपने बच्चों या बूढे माँ बाप से, किन्तु आश्चर्य इस बात का है कि जनता के हृदय पर विराजमान सरकार के दिल पर तो क्या असर करेगी, उसके कानों पर जूँ तक नहीं रेंग रही है.

         जबसे इस धरती पर जन्म लिया, बंदरों की बहुत बड़ी संख्या का सामना किया है. घर के ऊंचे ऊंचे जीनों से बन्दरों से बचने के लिए छलांग तक लगाई है. मम्मी को दो दो बार, एक बार रात में छत पर सोते समय और एक बार रसोई से बाहर आते समय बन्दरों ने काटा है, पापा को कैराना कचहरी में कोर्ट की ओर जाते समय बन्दर ने काटा है. मुझे खुदको बन्दर ने छत पर पकड़ लिया था, वो तो और बन्दरों के शोर को सुनकर मेरे मुँह के पास तक पहुंचा बन्दर मुझे छोडकर भाग गया था और मैं वे दर्दनाक इंजेक्शन लगवाने से बच गई थी जो मम्मी को दो बार और पापा को एक बार लगवाने पड़े थे.

    यही नहीं, दुःखद स्थिति तब रही जब कैराना के भाजपा नेता अनिल चौहान जी की धर्मपत्नी को बन्दरों के हमले के कारण असमय मृत्यु का शिकार होना पड़ा. बन्दरों का आतंक, उत्तर प्रदेश के शामली जिले में एक लम्बे समय से फैला हुआ है, शामली, कैराना, कांधला, थाना भवन में बन्दरों के हमले में आम आदमी को घातक दुर्घटनाओं का शिकार होना पड़ रहा है, 8 सितंबर 2021 को कैराना के भाजपा नेता अनिल चौहान की पत्नी सुषमा चौहान बन्दरों के हमले में छत से गिरी थी और मृत्यु का शिकार हुई थी, शामली के काका नगर में एक युवक को 9 मार्च 2020 को बन्दरों ने नोच नोच कर घायल कर दिया था जिससे बचने के लिए युवक ऊंचाई से गिरकर मृत्यु का शिकार हो गया था, थाना भवन में एक बच्ची को बन्दरों ने बुरी तरह घायल कर दिया था. प्रतिदिन क्षेत्र के सरकारी अस्पतालों में बन्दरों के हमले में घायल लोगों द्वारा बहुत बड़ी संख्या में जाकर एंटी रेबीज के इंजेक्शन लगवाए जा रहे हैं. वर्तमान में हाल यह है कि पूरे प्रदेश में कभी कोई पिता अपने बच्चे को बचाते हुए बन्दरों के हमले में छत से गिर रहा है और चोटिल हो रहा है. कभी कहीं बन्दर वकीलों के कोट, फाइल उठा कर उन्हें घण्टों परेशान कर रहे हैं. रोज अखबारों में कहीं न कहीं की बंदरों के हमलों की खबरें आती रहती हैं, कहीं बन्दर घरों की दीवारें तोड़ रहे हैं, कहीं हरे भरे बाग उजाड़ रहे हैं, पेड़ों पर लगे चिड़ियाओं के घौंसले तोड़ रहे हैं, कहीं बिजली के खंबे से लगे तारों पर झूल कर उन्हें अपने आवा जाही का जरिया बना रहे हैं, जिससे बिजली के तार खम्भों पर ढीले हो रहे हैं और बिजली के आने पर स्पार्किंग के कारण खंबे के नीचे खड़े हुए लोग चिंगारियों से झुलस रहे हैं. रोज सरकारी अस्पतालों में बंदरों के काटने पर इंजेक्शन लगवाने वालों की भीड़ रहती है किन्तु उत्तर प्रदेश की सरकार तक एक सारस की खबर तो पहुंच जाती है किन्तु बन्दरों के आतंक से दहले ज़न जीवन की कोई सूचना सरकार के पास या तो पहुंच ही नहीं रही है या सरकार ने बंदरों के प्रति धार्मिक आस्था को अधिक महत्त्व देते हुए ज़न ज़न की पीड़ा से मुँह मोड़ लिया है.

      मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, चंडीगढ़ आदि कुछ जगहों पर बन्दरों के हमले में मारे गए या घायल हुए लोगों के लिए वन विभाग द्वारा मुआवजे का प्रावधान किया है किन्तु उत्तर प्रदेश में ऐसी कोई व्यवस्था वन विभाग द्वारा नहीं की गई है. उत्तर प्रदेश की सरकार उदार है, जीव मात्र के सुरक्षित जीवन को लेकर संवेदनशील है किन्तु इंसान को, आम जनता को भी तो एक सुरक्षित जीवन की जरूरत होती है. सामर्थ्यवान लोग जाल आदि लगाकर, कुत्ते पालकर अपने जीवन को सुरक्षित कर लेते हैं किन्तु जिनके लिए दो वक़्त की रोटी, रोज पहनने के कपड़े और सर पर छत को जुटाना ही भारी हो क्या वे बन्दरों के हमलों से बचने के अधिकारी नहीं हैं?

       उत्तर प्रदेश की एक जागरूक नागरिक होने के नाते मेरा माननीय श्री योगी आदित्यनाथ जी से कर बद्ध निवेदन है कि आम जनता के प्रति भी थोड़ा उदार रवैय्या अपनाएं, ताकि वह अपनी रोज की जरूरतों को पूरा करने की ओर अपना ध्यान केंद्रित कर सके और पर्यावरण संरक्षण के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की राह पर चलते हुए जिन पौधों का रोपण किया है उन पौधों को बन्दरों के हमलों से बचाते हुए पेड़ बनते हुए देख सकें. साथ ही, जनता की परेशानी को देखते हुए बंदरों के हमलों में घायल या मारे गए लोगों की सहायता हेतु उत्तर प्रदेश के वन विभाग को लंगूरों की व्यवस्था और मुआवजे का प्रावधान किए जाने का भी आदेश दें.

शालिनी कौशिक एडवोकेट 

कैराना (शामली) 

Founder

Founder
Saleem Khan