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समाज की कुलदेविया गौत्र वार

Written By yayawer on गुरुवार, 18 अप्रैल 2024 | 3:09 pm

क्षत्रिय वंश की कुलदेवियां प्राचीन समय में भारत में वर्ण व्यवस्था थी, जिसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र इन चार वर्णों में बाँटा गया था। यह वर्ण व्यवस्था समाप्त हो गई तथा इन वर्णों के स्थान पर कई जातियाँ व उपजातियाँ बन गई। क्षत्रियों का कार्य समाज की रक्षा करना था। भारतीय उपमहाद्वीप की बहुत प्रभावशाली जाति है। 

समाज की अपनी कुल देवियों की मान्यता है. जिनकी यह पूजा करते है और जिनसे उन्हें शक्ति मिलती है। इन सभी कुल शाखाओं ने नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षित रखने के लिए कुल देवियों को स्वीकार किया। 

ये कुलदेवियां कुल के अनुसार निम्नलिखित हैं- 

खंगार - गजानन माता, 

चावड़ा - चामुंडा माता, 

छोकर - चण्डी केलावती माता, 

धाकर - कालिका माता, 

निमीवंश - दुर्गा माता, 

परमार - सच्चियाय माता, 

आसोपा सांखला - जाखन माता,

 पुरु - महालक्ष्मी माता, 

बुन्देला - अन्नपूर्णा माता, 

इन्दा - चामुण्डा माता, 

उज्जेनिया - कालिका माता, 

उदमतिया - कालिका माता, 

कछवाहा - जमवाय माता, 

कणड़वार - चण्डी माता, 

कलचूरी - विंध्यवासिनी माता, 

काकतिय - चण्डी माता,

काकन - दुर्गा माता, 

किनवार - दुर्गा माता, 

केलवाडा - नंदी माता, 

कौशिक - योगेश्वरी माता, 

गर्गवंश कालिका माता, 

गोंड़ - महाकाली माता, 

गोतम - चामुण्डा माता, 

गोहिल - बाणेश्वरी माता, 

चंदेल - मेंनिया माता, 

चंदोसिया - दुर्गा माता, 

चंद्रवंशी - गायत्री माता, 

चुड़ासमा -अम्बा भवानी माता, 

चौहान - आशापूर्णा माता, 

जाडेजा - आशपुरा माता, 

जादोन - कैला देवी (करोली), 

जेठंवा - चामुण्डा माता, 

झाला - शक्ति माता, 

तंवर - चिलाय माता, 

तिलोर - दुर्गा माता, 

दहिया - कैवाय माता, 

दाहिमा - दधिमति माता, 

दीक्षित - दुर्गा माता, 

देवल - सुंधा माता, 

दोगाई - कालिका(सोखा)माता, 

नकुम - वेरीनाग बाई,

नाग - विजवासिन माता, 

निकुम्भ - कालिका माता, 

निमुडी - प्रभावती माता, 

निशान - भगवती दुर्गा माता, 

नेवतनी - अम्बिका भवानी,

 पड़िहार - चामुण्डा माता,

परिहार - योगेश्वरी माता, 

बड़गूजर - कालिका(महालक्ष्मी)माँ, 

बनाफर - शारदा माता, 

बिलादरिया - योगेश्वरी माता, 

बैस - कालका माता, 

भाटी - स्वांगिया माता, 

भारदाज - शारदा माता, 

भॉसले - जगदम्बा माता, 

यादव - योगेश्वरी माता, 

राउलजी - क्षेमकल्याणी माता, 

राठौड़ - नागणेचिया माता, 

रावत - चण्डी माता, 

लोह - थम्ब चण्डी माता, 

लोहतमी - चण्डी माता, 

लोहतमी - चण्डी माता, 

वाघेला - अम्बाजी माता, 

वाला - गात्रद माता, 

विसेन - दुर्गा माता, 

शेखावत - जमवाय माता,

सरनिहा - दुर्गा माता, 

सिंघेल - पंखनी माता, 

सिसोदिया - बाणेश्वरी माता, 

सीकरवाल - कालिका माता, 

सेंगर - विन्ध्यवासिनि माता,

 सोमवंश - महालक्ष्मी माता, 

सोलंकी - खीवज माता, 

स्वाति - कालिका माता, 

हुल - बाण माता,

 हैध्य - विंध्यवासिनी माता, 

मायला - इन्जु माता , 

सिकरवार क्षत्रियों की कुलदेवी कालिका माता.

 हरदोई के भवानीपुर गांव में कालिका माता का प्राचीन मंदिर है। सिकरवार क्षत्रियों के घरों में होने वाले मांगलिक अवसरों पर अब भी सबसे पहले कालिका माता को याद किया जाता है। यह मंदिर नैमिषारण्य से लगभग 3 किलोमीटर दूर कोथावां ब्लाक में स्थित है। कहा जाता है कि पहले गोमती नदी मंदिर से सट कर बहती थी। वर्तमान में गोमती अपना रास्ता बदल कर मंदिर से दूर हो गयी है, लेकिन नदी की पुरानी धारा अब भी एक झील के रूप में मौजूद है। बुजुर्ग बताते हैं कि पेशवा बाजीराव द्वितीय को 1761 में अहमद शाह अब्दाली ने युद्ध क्षेत्र में हरा दिया था। इसके बाद बाजीराव ने अपना शेष जीवन गोमती तट के इस निर्जन क्षेत्र में बिताया। चूंकि वह देवी के साधक थे। इस कारण मंदिर स्थल को भवानीपुर नाम दिया गया। पेशवा ने नैमिषारण्य के देव देवेश्वर मंदिर का भी जीर्णोद्धार कराया था। अब्दाली से मिली पराजय के बाद उनका शेष जीवन यहां माता कालिका की सेवा और साधना में बीता। उनकी समाधि मंदिर परिसर में ही स्थित है। यहां नवरात्र के दिनों में मेला लगता है। मेला में भवानीपुर के अलावा जियनखेड़ा, महुआ खेड़ा, काकूपुर, जरौआ, अटिया और कोथावां के ग्रामीण पहुंचते हैं। यहां सिकरवार क्षत्रिय एकत्र होकर माता कालिका की विशेष साधना करते हैं।

डी जे पर प्रतिबन्ध लगे

Written By Shalini kaushik on मंगलवार, 5 मार्च 2024 | 7:21 am

  


आजकल शादी विवाह समारोह चल रहे हैं, आज घर के पीछे स्थित एक धर्मशाला में विवाह समारोह थाऔर जैसा कि आजकल का प्रचलन है वहाँ डी.जे. बज रहा था और शायद उच्चतम ध्वनि में बज रहा था और जैसा कि डी.जे. का प्रभाव होता है वही हो रहा था ,उथल-पुथल मचा रहा था ,मानसिक शांति भंग कर रहा था और आश्चर्य की बात है कि हमारे कमरों के किवाड़ भी हिले जा रहे थे ,हमारे कमरों के किवाड़ जो कि ऐसी दीवारों में लगे हैं जो लगभग दो फुट मोटी हैं और जब हमारे घर की ये हालत थी तो आजकल के डेढ़ ईंट के दीवार वाले घरों की हालत समझी जा सकती है .बहुत मन किया कि जाकर डी.जे. बंद करा दूँ किन्तु किसी की ख़ुशी में भंग डालना न हमारी संस्कृति है न स्वभाव इसलिए तब किसी तरह बर्दाश्त किया किन्तु आगे से ऐसा न हो इसके लिए कानून में हमें मिले अधिकारों की तरफ ध्यान गया .

भारतीय दंड सहिंता का अध्याय 14 लोक स्वास्थ्य ,क्षेम ,सुविधा ,शिष्टता और सदाचार पर प्रभाव डालने वाले अपराधों के विषय में है और इस तरह से शोर मचाकर जो असुविधा जन सामान्य के लिए उत्पन्न की जाती है वह दंड सहिंता के इसी अध्याय के अंतर्गत अपराध मानी जायेगी और लोक न्यूसेंस के अंतर्गत आएगी .भारतीय दंड सहिंता की धारा 268 कहती है -
''वह व्यक्ति लोक न्यूसेंस का दोषी है जो कोई ऐसा कार्य करता है ,या किसी ऐसे अवैध लोप का दोषी है ,जिससे लोक को या जन साधारण को जो आस-पास रहते हों या आस-पास की संपत्ति पर अधिभोग रखते हों ,कोई सामान्य क्षति ,संकट या क्षोभ कारित हो या जिसमे उन व्यक्तियों का ,जिन्हें किसी लोक अधिकार को उपयोग में लाने का मौका पड़े ,क्षति ,बाधा ,संकट या क्षोभ कारित होना अवश्यम्भावी हो .''
कोई सामान्य न्यूसेंस इस आधार पर माफ़ी योग्य नहीं है कि उससे कुछ सुविधा या भलाई कारित होती है .
इस प्रकार न्यूसेंस या उपताप से आशय ऐसे काम से है जो किसी भी प्रकार की असुविधा ,परेशानी ,खतरा,क्षोभ [खीझ ]उत्पन्न करे या क्षति पहुंचाए .यह कोई काम करने या कोई कार्य न करने के द्वारा भी हो सकता है और धारा 290 भारतीय दंड सहिंता में इसके लिए दंड भी दिया जा सकता है .धारा 290 कहती है -
''जो कोई किसी ऐसे मामले में लोक न्यूसेंस करेगा जो इस सहिंता द्वारा अन्यथा दंडनीय नहीं है वह जुर्माने से जो दो सौ रूपये तक का हो सकेगा दण्डित किया जायेगा .''
और न केवल दाण्डिक कार्यवाही का विकल्प है बल्कि इसके लिए सिविल कार्यवाही भी हो सकती है क्योंकि यह एक अपकृत्य है और यह पीड़ित पक्ष पर निर्भर है कि वह दाण्डिक कार्यवाही संस्थित करे या क्षतिपूर्ति के लिए सिविल दावा दायर करे .
और चूँकि किसी विशिष्ट समय पर रेडियो .लाउडस्पीकर ,डीजे आदि को लोक न्यूसेंस नहीं माना जा सकता इसका मतलब यह नहीं कि इन्हें हमेशा ही इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता .वर्त्तमान में अनेक राज्यों ने अपने पुलिस अधिनियमों में इन यंत्रों से शोर मचाने को एक दंडनीय अपराध माना है क्योंकि यह लोक स्वास्थ्य को दुष्प्रभावित करता है तथा इससे जनसाधारण को क्षोभ या परेशानी उत्पन्न होती है [बम्बई पुलिस अधिनियम 1951 की धाराएं  33, 36 एवं 38 तथा कलकत्ता पुलिस अधिनियम 1866 की धारा 62 क [ड़]आदि ]
इसी तरह उ०प्र० पुलिस अधिनयम 1861 की धारा  30[4] में यह उल्लेख है कि वह त्यौहारों और समारोहों के अवसर पर मार्गों में कितना संगीत है उसको भी विनियमित कर सकेगा .

''शंकर सिंह बनाम एम्परर ए.आई.आर. 1929 all .201 के अनुसार त्यौहारों और समारोहों के अवसर पर पुलिस को यह सुनिश्चित करने का अधिकार है कि वह संगीत के आवाज़ की तीव्रता को सुनिश्चित करे .त्यौहारों और समारोहों के अवसर पर लोक मार्गों पर गाये गए गाने एवं संगीत की सीमा सुनिश्चित करना पुलिस का अधिकार है .''

और यहाँ मार्ग से तात्पर्य सार्वजनिक मार्ग व् स्थान से है जहाँ जनता का जमाव विधिपूर्ण रूप में होता है और इसलिए ऐसे में पुलिस भी इस तरह के समारोहों में इन यंत्रों की ध्वनि तीव्रता का विनियमन कर सकती है .

      साथ ही कानून द्वारा मिले हुए इस अधिकार के रहते ऐसे स्थानों की प्रबंध समिति का भी यह दायित्व बन जाता है कि वह जन सुविधा व् स्वास्थ्य को देखते हुए ध्वनि तीव्रता के सम्बन्ध में नियम बनाये अन्यथा वह भी भारतीय दंड सहिंता के अंतर्गत दंड के भागी हो सकते हैं क्योंकि वे प्रबंधक की हैसियत से प्रतिनिधायी दायित्व के अधीन आते हैं .
 
शालिनी कौशिक 
एडवोकेट 
कैराना (शामली) 

एक पुत्र को पिता की पाती

Written By Sundip Kumar Singh on शनिवार, 21 अक्तूबर 2023 | 9:26 pm

'कुछ लोग ऐसे परिवारों में जन्म लेते हैं जहां शिक्षा को बढ़ावा दिया जाता है, जबकि कुछ अन्य इसके विरुद्ध होते हैं. कुछ का जन्म समृद्ध अर्थव्यवस्था में होता है जहां उद्मिता को बढ़ावा दिया जाता है, जबकि कुछ का जन्म युद्ध और अभाव में होता है. मैं तुम्हें सफल होते देखना चाहता हूं. और मैं चाहता हूं कि तुम इसे खुद हासिल करो. लेकिन याद रखो कि सफलता हमेशा मेहनत के कारण नहीं मिलती, और गरीबी हमेशा आलस के कारण नहीं होती. जब तुम दूसरों को, और साथ में खुद को आंकने लगो, यह हमेशा ध्यान में रखना.'

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एक पुत्र को पिता की पाती...

Written By yayawer on मंगलवार, 3 अक्तूबर 2023 | 2:35 pm

सांखला – वंशोत्पत्तिः

सांखला, पंवार (परमार) राजपूतों की ही एक शाखा है। पंवारा से सांखला शाखा की उत्पत्ति का संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है – सांखला शाखा के पंवार राजपूतों के आदिपुरुष वैरसी के परपितामह (पड़दादा) धरणीवराह पंवार जूने किराडू (बाड़मेर) का शासक था। धरणीवराह का पुत्र बहाड़ हुआ जिससे पंवारों का यह राज्य गया। बाहड़ पंवार के दो पुत्र हुए– सोढ़ो तथा वाघ पंवार। सोढ़ा (सोढो) तो अमरकोट की चरफ चला गया, जहां सूमरों ने उसे अमरकोट से 14 कोस दूर ‘रातो कोट’ देकर बसाया।

बाहड़ोत वाघ पंवार के वंशज ही सांखला कहलाये। ‘सांखला शाखा के नामकरण का सम्बन्ध देवी सचियाय माता द्वारा प्रदत्त शंख को लाने से है। वाघ पंवार बाहड़ोत कुछ समय तक चौहटण गांव में रहा, फिर चौहटण छोड़कर एक नया गांव बसाया जो उन्हीं के नाम पर वाघोरिया कहलाया। इसी क्षेत्र के गांव मूधियाड़ में गैचंद पड़िहार के घर बाघ पंवार की भूवा (बाहड़ की पुत्री) थी। वाघ का सम्पर्क अपनी भूवा तथा फूफा गैचंद पड़िहार से होता रहता था। गैचंद पड़िहार महत्त्वकांक्षी और शकी जागीरदार था। वाघ पंवार की कर्मठता से वह उस पर सन्देह करने लगा तथा अन्य राजपूतों ने भी उसे बहकाया कि वाघ पंवार से आप को खतरा है। परिणाम स्वरूप शकी गैचंद पड़िहार ने अपनी ही पली के भतीज वाघ पंवार को मरवा दिया। वाघ पंवार की पली गर्भवती थी, जिसे सुरक्षित रखने हेतु वाघ का स्वामी भक्त सेवक मुंहता सुगणा अजमेर ले गया। कुछ ही दिनों बाद वाघ की पली के प्रसव हुआ, उसने पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम वैरसी रखा गया। यही वैरसी प्रथम सांखला राजपूत के रूप में प्रसिद्ध हुआ। (प्रारम्भ में तो यह वैरसी पंवार ही कहलाता था, ‘सांखला’ नाम आगे चल कर देवी सचियाय माता के आदेश से धारण हुआ)। वैरसी पंवार अपने बाल्यकाल से ही सचियाय माता की आराधना में लग गया। अपनी आराध्या देवी के प्रति अटूट आस्था रखते हुए वैरसी, माता सचियाय के अनन्य उपासक के रूप में प्रतिषिठत हुआ। उसने गैचंद पड़िहार को मारकर अपने पिता की हत्या का बदला लेने की कामना से कँवल पूजा करके सचियाय माता को अपना सिर चढाने का संकल्प किया। सपने में सचियाय माता ने आशीर्वाद दिया और गैचंद पड़िहार के वध हेतु दिशा-निर्देश प्रदान किया, तदनुसार वाघोत वैरसी पंवार ने अपने पिता के हत्यारे अपने फूफा (भूहड़ा) गैचंद पड़िहार को मार गिराया।’

तत्पश्चात् सचियाय माता को अपना सिर चढ़ाने हेतु ओसियां आया। इसी प्रसंग में मुंहता नैणसी लिखते हैं – । “पछै ओसियां जात आयौ। आप एकंत देहुरो जड़ने कॅवलपूजा करणी मांडी। तरै देवीजी हाथ झालियो कह्यो – ‘म्हें थांरी-सेवा-पूजासों राजी हुवा; तोनै माथो बगसियो, तू सोना रो माथो कर चाढ।’ आप रै हाथ रौ संख वैरसी नू दियो, कह्यो – ‘ओ संख बजायनै सांखलो कहाय।”

अर्थात् [देवी सचियाय माता ने अपने हाथ में धारण किया हुआ शंख वाघोत वैरसी पंवार (परमार) को दिया तथा कहा कि यह शंख बजा कर (शंखनाद कर के) ‘सांखला’ कहलाओ]।। इस प्रकार वाघोत वैरसी पंवार सर्वप्रथम अपनी आराध्य देवी सचियाय माता के आदेश से उनके द्वारा प्रदत्त शंख बजाने के कारण सांखला कहलाया। निष्कर्ष यह हुआ कि वैरसी पंवार सचियाय माताजी के आशीर्वाद और आज्ञा से ही वैरसी सांखला कहलाया। इस प्रकार पंवार राजपूतों से ही सांखला शाखा (गोत्र) का उद्भव हुआ, अर्थात् सांखला वंश की उत्पत्ति हुई, जिसका आदि पुरुष वैरसी सांखला हुआ। कुल-परम्परा (केड़ परापरी) :

वैरसी सांखला ने गैचंद पड़िहार की जागीरी के गांव-मूधियाड़ का कोट (गढ़) ढहा कर, उसी सामग्री से गांव रूणवायं (रूण) में रूंणकोट का निर्माण करवाया।

वैरसी सांखला के पुत्र राणा राजपाल के तीन पुत्र हुए छोहिल, महिपाल और तेजपाळ। छोहिल के वंशज रूंण पर काबिज रहे अतः वे रूणेचा कहलाये। वैरसी सांखला के पोत्र रायसी महिपाळोत (महिपाल के पुत्र रायसी) सांखला ने रूण छोड़ कर जांगळ पर आधिपत्य किया, उसके वंशज जांगळवा सांखला कहलाये। इस प्रकार सांखला वंश से कई केड़ (कुल) चले जैसे रूणेचा और जांगळवा ये सांखलाओं के ही केड़ है। सांखलों की ऐसी कई उपशाखाएं (केड़) होगी। प्रतिपाद्यानुसार हमारा सम्बन्ध सांखलों के जांगळवा केड़ (कुल) से है। इसी कुल परम्परा (केड़) में हरभू (हड़बू) सांखला हुआ। . वैरसी सांखला की चौथी पीढ़ी में उसका परपोत्र (पड़पोता) रायसी महिपालोत सांखला ने रूंण (रूणवाय) छोड़ कर जांगळू पर आधिपत्य के उद्देश्य से जांगळू के तत्कालीन शासक दहियों के कैसा उपाध्याय (कैसा उपधिया) नामक एक ब्राह्मण को अपने विश्वास में लेकर उसकी सलाह और सहायता से नियोजित ढंग से 50-60 सेजवाळों (महिलाओं की वाहक बैलगाड़ियां) में बैठकर सांखले सिरदारों ने केसा उपाधिया द्वारा जांगळू गढ़ के द्वारपाल को जगा कर, उसे भ्रम में रखते हुए मुख्य द्वार(प्रोळ) खुलवाकर कोट में प्रवेश किया और अपने अस्त्र शस्त्र धारण किए हुए सांखलों ने ‘सेजवाळों से कूद कर सभी दहियों को मार गिराया। राणा रायसी सांखले की जांगळू में ‘आंण-दुहाई’ फिर गई। इस प्रकार रायसी सांखला ने जांगळू पर आधिपत्य किया।

मुंहता नैणसी के शब्दों में – “दहियांरा जिकै कोट मांहै हुता सु सोह कूट मारिया।। सांखला राणा रायसीरी जांगळू में आंण फिरी। रायसी इण भांत जांगळू लीवी।’

राणा रायसी सांखला के केड़ (कुल) में चौथी पीढ़ी में राणा कंवरसी (कुंवरसी) सांखला हुआ, जो राजस्थान के इतिहास में प्रसिद्ध है। इसकी पत्नी का नाम भारमल था। कुंवरसी सांखलो और भारमल राजस्थानी साहित्य में भी प्रसिद्ध पात्र हैं।

– इसी कुल (केड़) की छठी पीढ़ी में करमसी सांखला हुए, जो अनन्य हरि-भक्त तथा विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न कवि के रूप में राजस्थानी साहित्य के इतिहास में सुप्रसिद्ध है। सांखला करमसी रूणेचा रचित ‘क्रिसनजी री वेलि” राजस्थानी साहित्य भण्डार की अनुपम मणि है। वि.स. 1600 के आसपास अथवा इससे भी पूर्व रचित यह गौरव ग्रन्थ ‘क्रिसन-रूकमणी-री वेलि’ की रचना करते समय उनके लिए निश्चय ही अनुकरणीय और प्रेरणा स्रोत रही है। करमसी सांखला कृत इस वेली के कुल 22 छन्द ही उपलब्ध हैं। सम्पूर्ण रचना का यह अंतिम अंश प्रतीत होता है। इसकी प्रति बीकानेर के राव बीकाजी के भाई बीदा क पौत्र सांगा के पुत्र सांवलदास जी ने वि.सं.1634 को बनवाई। वेलि के अंतिम अंश क रूप में उपलब्ध इन 22 छन्दों से ही, उनकी विलक्षण काव्य प्रतिभा का परिचय हो जाता है।

ये सांखला करमसी, राणां कुंवरसी सांखला के पौत्र तथा राणां राजसी के पुत्र थे, फिर भी इनका नाम सांखला करमसी रूणेचा के रूप में प्रसिद्ध हुआ न कि सांखला करमसी जांगळवा। इसका कारण संभवतया यही रहा होगा कि पाटवी पुत्र नहीं होने के कारण इन्हें जांगळू में रहना अनिवार्य नहीं था अतः ये रूंण में आकर बस गये होंगे, जिसके कारण लोगों ने रूणेचा समझ लिया होगा।

राणा आंबा इनका भाई था, (आंबा, राणा राजसी का पाटवी पुत्र होने के कारण ही उनका उत्तराधिकारी हुआ) जिसे दूसरे इर्षालु भाई हूंजा राजसीयोत ने मार कर जांगळू पर आधिपत्य किया (राजगादी प्राप्त की) इसी मूजा के बेटे (संभवतया पाटवी पुत्र) गोपाळदे की पत्नी मांगळियांणी गर्भवती थी, जिसे उनके स्वामीभक्त सेवक धरमा वीठू (चारण) ने उसके पीहर – खींवसर में उसके पिता कीलूजी मांगळिया के पास सुरक्षित पहुंचा दी। वहीं उसके प्रसव हुआ जिसमें पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम महराज (मेहराज) रखा गया। यह महराज सांखला कीलू मांगळिया का दोहित्र था।

इसी गोपाळदेउत (गोपाळजी के पुत्र) महराज सांखला ने 15 वर्ष की अल्प आयु में ही अपने बंधु-बांधवों को साथ लेकर जांगळू पर आक्रमण किया तथा पूंजा और उसके पुत्र अदा, (बाप-बेटा) दोनों को मार कर उनकी लाशें ढ़ाकसी के कुएँ में डाली। इसी अवसर पर महराज सांखला और उसके साथियों ने पूंजा और ऊदा के बहुत से साथियों को मारा। उज्ज्वल चरित्र के स्वामी महराज सांखला ने रक्त रंजित जांगळू को नहीं स्वीकारा। यह माणकराव सांखला के बेटों को जांगळू सौंप कर जोगी के तालाब के दो कोस पूर्व में पीहलाप गांव में आकर बसा। मेहराज सांखला ने गांव पीहलाप के आस-पास तीन तालाब खुदवाये। कुछ समय बाद महराज सांखला पीहलाप छोड़ कर नागोर के राव चूडा वीरमोत (वीरमदे का पुत्र चूडा) से मिला तथा उनकी स्वीकृति से गांव भंडेल में जा बसा, राव चूडाजी की सेना भी भंडेल में ही रहती थी। | मेहराज सांखला प्रसिद्ध शंकुन विचारक था। शकुनों के आधार पर वह भविष्य जान लेता था। अंत में जैसलमेर के राव रांणगदे भाटी के साथ युद्ध करते हुए महराज सांखला वीर गति को प्राप्त हुए।

इसी महापराक्रमी, पुण्यात्मा और परोपकारी पुरुष गोपाळदेओत महाराज (मेहराज) सांखला के छह पुत्रों में ज्येष्ठ (पाटवी पुत्र) हड़बूजी सांखला है जो राजस्थान के प्रसिद्ध हिन्दू पीरों में उल्लेखनीय है।

जीवनवृत्त : हड़बू-सांखला

सांखला वंश के आदि पुरुष मां सचियाय देवी के अनन्य उपासक वैरसी सांखला की आठवीं पीढ़ी में शकुन-विशेषज्ञ, वचन सिद्ध योग-साधक तथा चमत्कारिक व्यक्ति के स्वामी हड़बूजी सांखला हुए – | अपने पिता जांगळवा मे मेहराज सांखला की वीरगति के पश्चात् हड़बूजी सांखला उनकी जागीरी का गांव भंडेल छोड़कर फलोधी (वर्तमान नाम फलोदी) की ओर आ गये तथा फलोधी परगने के गांव सिरड़ से कुछ दूर जंगल में एक स्थान पर अपना डेरा स्थापित किया (अस्थायी निवास किया)। इस प्रसंग में मुंहता नैणसी की ख्यात में लिखित विवरण निम्न प्रकार है – ।

“तठा पछै मैहराज रो बेटो हरभम भूडल सू छाडनै फलौधी रै गांव चाखू, तिण सू कोस 3, गांव सिरड़थां कोस 5 हरभामजाळ छै, तठे आंण गाडे छोड़िया तठे रामदे पीर नै हरभम रै परसंग हुवो। जोगी बाळनाथ रामदे पीर रै माथै हाथ दिया था। तिण ही हरभम सांखलै माथै हाथ दिया। हरभम हथियार छोड़ने इण राह में हुवो।” |

इस प्रसंग में मेरे विनम्र मतानुसार ‘हरभमजाळ’ किसी गांव का नाम नहीं है। अपितु ‘जाळ’ के एक वृक्ष का नाम है। ‘जाळ’ का एक वृक्ष देख कर उसके समीप हड़बूजी ने ‘डेरा’ दिया होगा अथवा अपने ‘डेरे’ (अस्थायी निवास या शिविर) के निकट स्वयं हड़बूजी (हरभम) सांखला ने जाळ का वृक्ष लगाया होगा। दोनों ही स्थितियों (संभावनाओं) में यह जाळ का वृक्ष हड़बूजी (हरभमजी) के नाम पर हरभमजाळ कहलाया।

इस प्रसंग में यह उल्लेखनीय है कि हड़बू-सांखला के लिए मुंहता नैणसी री ख्यात’ में हरभू तथा हरभम नामों का प्रयोग मिलता है। अतः हरभम सांखला द्वारा लगाई जाने अथवा सींची जाने के कारण जाळ का वह वृक्ष हरभम जाळ’ कहलाया।

बाबा रामदेवजी और हड़बू सांखला परस्पर मौसी के बेटे भाई कहे जाते हैं। इस विषय में प्रामाणिक तथ्य अद्यावधि अपेक्षित है। जो भी हो हड़बूजी और बाबा रामदेवजी के प्रगाढ़ मैत्री सम्बन्ध तो लोक प्रसिद्ध है। यद्यपि हड़बूजी आयु में रामदेवजी से बहुत बड़े थे। (ये समव्यस्क नहीं थे) मुंहता नैणसी की उपर्युक्त पंक्तियों के अनुसार ये गुरु भाई भी थे। यह भी निर्विवाद रूप से सत्य है कि हड़बूजी सांखला ने बाबा रामदेवजी के सम्पर्क आने पर अस्त्र-शस्त्रों का परित्याग कर दिया था। वे एक योग-साधक तथा चमत्कारिक संत और सिद्ध पुरुष के रूप में प्रतिष्ठित हुए। तभी तो उनकी गणना रामसापीर (बाबा रामापीर अथवा बाबा रामदेवजी) के साथ राजस्थान के प्रसिद्ध पांच पीरों में हुई।

हड़बूजी सांखला निश्चित रूप से रावजोधाजी के समकालीन थे। जब राव, जोधाजी विपत्ति ग्रस्त हुए, वे मंडोर को मेवाड़ के आधिपत्य से मुक्त करवाने के लिए चिन्तित थे। उन्हीं दिनों राव जोधाजी, हड़बूजी के आशीर्वाद हेतु उनके पास गये। हड़बूजी ने राव जोधाजी को विजयश्री प्राप्त करने के आशीर्वाद के साथ ही एक कटार भी प्रदान की। वह कटार जोधपुर राजघराने की पूजनीय वस्तुओं में से एक थी, जो कालान्तर में बीकानेर राजघराने में वेरीसाल नगाड़े आदि पूज्य वस्तुओं के साथ आज भी वहीं सुरक्षित है।

राव जोधा को जब विजयश्री प्राप्त हुई, मंडोर पर उनका आधिपत्य हुआ तो उन्होंने अपने राज्य के फलोदी परगने का गांव बैंगटी हड़बूजी सांखला को जागीर के रूप में समर्पित करके उनके प्रति कृतज्ञता व सम्मान अभिव्यक्त किया।

इस तथ्य की पुष्टि मुंहता नैणसी की ख्यात से भी होती है – “तठा पछै कितरेहेक दिने राव जोधाजी विखा मांहे. आया। सांखलै हरभम जीमाया नै आ दवा दी – ‘इण मूगा पेट माहै थकां जितरी भू घोड़ो फेरीस तितरी धरती थारा बेटा पोतरा भोगवसी। पछै राव जोधै रे धरती हाथ आई। पछै राव जोधै हरभम नू बैंहगटी सांसण कर दीनी। तिण बैंहगटी में हमैं ही हरभम रा पोतरा रहे छै।’

हड़बू सांखला शकुन-विचार के विशेषज्ञ के रूप में विख्यात हुए। इस विषय में दो ऐतिहासिक प्रसंग महत्त्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय है। एक तो बाबा रामदेवजी द्वारा जीवित समाधि लेने के कई दिनों बाद उनसे इनका मिलन। अर्थात् रामदेवजी ने जीवित समाधि के पश्चात् ‘पहला पर्चा (प्रथम चमत्कार) के रूप में इन्हें साक्षात् दर्शन दिये। यह प्रसंग इसी अध्याय में आगे के पृष्ठों में यथा स्थान विस्तार पूर्वक प्रस्तुत किया गया है।

दूसरा प्रसंग इनकी दोहित्री लक्ष्मी का मारवाड़ की महारानी एवं यथा समय राजमाता बनने के सम्बन्ध में है। इस ऐतिहासिक प्रसंग में एक विशेषज्ञ शकुन विचारक के रूप में हड़बूजी सांखला ने ज्योतिष विद्या की तुलना में शुकन को श्रेष्ठ सिद्ध किया है। ज्योतिष ज्ञान (जिसे विद्वानों द्वारा विज्ञान मान लिया गया है) पर यह शकुन विचार की विजय पताका फहरा कर हड़बूजी सांखला ने यह सिद्ध कर दिया कि शकुन विचार केवल एक लोक विश्वास ही नहीं अपितु लोक विज्ञान है।

शकुन सम्बन्धी इस ऐतिहासिक प्रसंग का सार यह है कि शकुनों के आधार पर हड़बूजी सांखला द्वारा की गई भविष्यवाणी के आधार पर ही इनकी कुरूप दोहित्री लिछमी (लक्ष्मी) का विवाह जोधपुर के राव जोधाजी के पुत्र सूजाजी के साथ हुआ, जो पाटवी (ज्येष्ठ पुत्र) न होते हुए भी (बड़े भाई सातल की निसन्तान मृत्युपरान्त)सिहांसनारूढ़ हए, इस प्रकार लक्ष्मी नौकोटि मारवाड़ की महारानी हुई, जबकि ज्योतिषियों ने उसे खोटे नक्षत्रों में उत्पन्न और भाग्यहीन बता कर जंगल में फिंकवा दिया था।

इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि हड़बूजी की बेटी का विवाह जैसलमेर के केहरजी भाटी के पुत्र कलीकरण भाटी के साथ हुआ था।

मारवाड़ की परम्परानुसार बेटी का प्रथम प्रसव पीहर में होता है अत: गर्भावस्था में वह अपने माता-पिता के घर बैंगटी में रह रही थी। हड़बूजी अपने कुछ सेवक साथियों सहित फलोधी आए हुए थे। उसी दिन उनकी बेटी ने एक पुत्री को जन्म दिया। नानीजी (हड़बूजी की ठकुरानी) ने ज्योतिषयों को तत्काल बुला कर नक्षत्र पुछवाये तो ज्ञात हुआ कि बच्ची खोटे नक्षत्रों में उत्पन्न होने के कारण अशुभ है। अमंगल की आशंका से नवजात बच्ची को चीथड़ों में लपेट कर दासियों द्वारा जंगल में फिंकवा दिया गया। सूर्यास्त के समय फलोधी से बैंगटी आते हुए हड़बूजी ने जंगल में किसी तीतर (पक्षी विशेष) की आवाज सुनी तो अपने सेवकों को रूकने का संकेत किया तथा स्वयं भी रुक गये।

कुछ ही देर में वही तीतर पुन: बोलने लगा साथ ही दूसरी ओर से मार्ग से कुछ दूरस्थ झाड़ियों में से बाळसाद (नवजात शिशु का रोना) सुनाई दिया। बोलते हुए तीतर की दिशा, कोण, दूरी तथा वार समय आदि का विचार करके हड़बूजी ने अपने एक सेवक को झाड़ियों से रोते हुए शिशु को ले आने की आज्ञा दी। सेवक खाली हाथ लौटा, कारण पूछने पर बतया की एक ‘गीगली’ (कन्या) फटे-पुराने कपड़ों (चीथड़ों) में लेपट कर कोई फेंक गया है, न जाने किसका पाप है? उसे लाना मैंने ठीक नहीं समझा। हड़बूजी ने उसे डॉट कर वापिस भेजकर नवजात कन्या को मंगवा लिया। सांयकाल तक अपने घर (गांव बैंगटी या बैंगहटी) पहुंचे और सेवक के साथ बच्ची को घर में भिजवा दी। सेवक ने किसी दास के हाथ वह बच्ची ठकुरानी (हड़बूजी की धर्मपत्नी) के पास पहुंचाई तो ठकुरानी ने पहचान ली तथा किसी विशवसनीय दासी के साथ बाहर कोटड़ी (बैठक) में मित्रों तथा अतिथियों से घिरे – बैठे हड़बूजी को संकेत करवा कर घर में बुलवाया। एकान्त में ठकुरानी ने उनसे कहा कि ज्योतिषयों की राय में मूलनक्षत्रों (बुरे नक्षत्रों) में उत्पन्न होने के कारण यह कन्या अशुभकारी है, इसीलिए मैनें इसे जंगल में फिंकवाया था। यदि इसका जन्म अपने पिता के घर होता तो वे तो मारकर फिंकवाते। हड़बूजी ने समझाते हुए कहा कि – ज्योतिष विद्या झूठ हो सकती है किन्तु मेरे शकुन कभी झूठे नहीं हो सकते। मुझे जो शकुन हुए हैं, उनके अनुसार यह कन्या दोनों कुल (पीहर तथा ससुराल) तो उज्ज्वल करेगी ही, इसमें कोई संदेह नहीं, साथ ही तीसरे कुल (ननिहाल) का भी मान बढ़ायेगी। धन्यभाग हमारा कि हमें परमभाग्यशाली दोहित्री प्राप्त हुई है। आप निश्चिंत होकर इसका लाललन पालन करो। उन्होंने अपनी बेटी को भी इस कन्या के जन्म की बधाई दी और उपर्युक्त आधार पर उसे भी पूर्ण आश्वस्त किया। बच्ची का नाम लिखमांदे (लिछमी) अर्थात् लक्ष्मी रखा गया। मुंहता नैणसी की ख्यात में भी लिखमांदे तथा लिछमी ये दोनों नाम रूप प्रयुक्त हैं।

लिछमी अपनी कुरूपता के कारण, बाल्यकाल में ही उसके दो दान्त असाधारण रूप से बड़े थे, इसलिए वह ‘दांतलड़ी’ के ‘नांवटिये’ (उपनाम) से चर्चित हो गयी। ठकुरानी का आग्रह था कि उसके जल्दी हाथ पीले किये जाय (विवाह किया जाय) अन्यथा कुल को संकट देखना पड़ सकता है। वयस्क होने से पूर्व ही लिछमी के विवाह हेतु बारम्बार किए जा रहे ठकुरानी के आग्रह के वशीभूत होकर हड़बूजी सांखला ने पुरोहित के हाथ पोकरण के जागीरदार राव खींवेजी (राव खींवजी) को भेजा गया किन्तु रांव खींवेजी ने यह कह कर नारियल वापिस कर दिया (सम्बन्ध स्वीकार नहीं किया) कि यह सगाई (सम्बन्ध) मुझे मंजूर नहीं, क्योंकि – सुनने में आया कि वह दांतड़ली (बड़े दांतों वाली) है। पुरोहित (ब्राह्मण) निराश होकर बैंगटी लौट आया। हकीकत सुन कर लिछमी की मां तथा नानीजी बहुत दु:खी हुए। हड़बूजी ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा कि – पोकरण का राव खींवजी तो हत्भागा है, वह भाग्यहीन हमारी बाई लिछमी को कैसे प्राप्त कर सकता है? इसे यह तो किसी परम भाग्यशाली पुरुष के साथ बिहायी जायेगी। इस प्रकार तीन चार ठिकानों द्वारा छिमी के सम्बन्ध हेतु मना कर दिया गया (नारियल वापिस लौटा दिये गये)। ठकुरानी और उसकी बेटी बेचैन रहने लगी किन्तु हड़बूजी निश्चिन्त थे, उन्हें अपने शकुनों के प्रति दृढ़ आस्था और अटूट विश्वास था। वे अब भी यही कहते कि समय की धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा करो। लिछमी भागयवान कन्या है, यह किसी परम भाग्यशाली के ही कुल की शोभा बनेगी और उसके वैभव में अभिवृद्धि करेगी।

अन्ततोगत्वा विधाता द्वारा निश्चित समय आया, सुसंयोग बना और जोधपुर के राव जोधाजी का राजकुमार सूजा आखेट करते हुए अपने चंद साथियों के साथा गांव बैंगटी के पास से निकला तो उसने अपने सेवक के माध्यम से लिछमी के साथ अपनी सगाई का प्रस्ताव भेजा। बातचीत हुई तथा राजकुमार सूजाजी जोधावत के साथ हड़बू सांखला की दोहिती तथा जैसलमेर निवासी भाटी कलीकरण केहरोत के पुत्री की सगाई हो गई। ‘झट मगनी फट शादी’ की कहावतानुसार जल्दी ही विवाह भी हो गया। नव कोटि मारवाड़ के राव जोधाजी के पुत्र राजकुमार सूजाजी ने हड़बू जी के यहां तोरण वांदा (तोरण वन्दना की तो) हड़बूजी के घर-परिवार के साथ-साथ सम्पूर्ण बैगटी गांव के समस्त लोग गौरवानुभूति से गद्गद् थे; फिर कलीकरण । परिवार में तो इस आश्चर्यजनक सम्बन्धोत्पन्न हर्ष का आरोपार नहीं रहा।

ठकुरानी ने हड़बूजी के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति करते हुए, उनके शास्त्र सम्बन्धी ज्ञान की प्रशंसा करते हुए लिछमी के विषय में उनकी भविष्यवा बधाई दी तो हड़बूजी ने कहा – बधाई के सही अवसर हेतु अभी प्रतीक्षा करो।

यद्यपि राजकुार सूजा पाटवी नहीं था, अत: जोधपुर का राजा बनने की बात असंभव थी, किन्तु विधि का विधान नहीं टलता, राव जोधाजी का पाटवी पुत्र राव सातल की मृत्यु हो गई। राव सातल के कोई पुत्र नहीं था, इसलिए जोधपुर के राजसिंहासन पर सूजाजी का राज्याभिषेक हुआ। राव सूजाजी नवकोटि मारवाड़ के नरेश तथा लिछमी (लिखमांदे) नव कोटि मारवाड़ की महारानी हुई।

राव सूजाजी के दो राजकुमार – नरा तथा वाघा, वयस्क होने पर फलोधी तथा बगड़ी परगनों के शासनाधिकारी बनाये गये। राजमाता लिखमांदे (लिछमी देवी) बड़े-बेटे नरा के साथा फलोधी में थी कि एक दिन पोकरण के नामोल्लेख से उसने ठंडी श्वास (नि:श्वास) छोड़ी, संयोगवश नरा ने देख लिया, पूछने पर ज्ञात हुआ कि जब वह अविवाहित थी तो पोकरण के राव खींवजी ने उसे दांतड़ली कह कर उसकी निन्दा की थी। नरा ने उसी क्षण पोकरण पर आधिपत्य का निश्चय किया। दूरदृष्टा और कुशाग्र बुद्धि नरा ने अपने एक दरबारी पुरोहित (ब्राह्मण) के साथ मिल कर योजना बनाई। पुरोहित का ससुराल पोकरण में था। वह वहीं रहकर राव खींवजी की गतिविधियों पर टोह रखने लगा। यह प्रचारित कर दिया कि वह नरे सूजावत से लड़कर आ गया है। अब वहां नहीं जायेगा। उसका परिवार भी पोकरण में ले आया गया था।

शीतकाल में राव खीवोंजी अपनेसभी साथियों सहित पोकरण परगने के गांव उगरास की सीमा में शिकार के लिए आया, यहीं मद्यपान तथा मांस भक्षण में लगा रहा। नरैजी का पुरोहित, पोकरण के द्वारपाल का कटोरा लेकर उसके लिए मांस लाने के बहाने फळोदी आया, अग्रिम सन्देश भी भेज दिया था। सैन्य दल लेकर नरा सूजावत ने पोकरण पर आधिपत्य हेतु प्रस्थान किया।

प्रस्थान के समय उनके ‘क्रोड़ी ध्वज’ घोड़े ने जोर से ‘फुर्राटा’ किया, जो तत्कालीन परगना पोकरण के ग्राम उगरास की शरहद में राव खींवा ने सुना। आक्रमण आशंका से चिन्तित होकर कुछ घुड़सवारों को फलोदी से पोकरण की ओर आने मार्ग की तरफ खोज-खबर के लिए भेजा। उन्हें नरा सूजावत द्वारा भ्रमित कर अतः उन्होंने वापिस जाकर कहा कि नरा बीकावत (बीकाजी के पुत्र नरा) अमर कोट जा रहा है। घोड़ा नरा-सुजावत से मांग कर लिया है। राव खावा निश्चित हो गया।

उधर नरा सूजावत ने जाकर पोकरण के गढ़ को घेर लिया। पुरोहित ने मुख्य द्वार (पोल) पर जाकर द्वारपाल को आवाज दी, उसने खिड़की खोली तो पुरोहित के पास में ही खड़े नरे सूजावत नेबरछी के प्रहार से द्वारपाल को मार गिराया। गढ़ पर . आधिपत्य करके पोकरण नगर में नरे सूजावत की ‘आंण-दुहाई’ फिरवादी गई (विजय की घोषणा करवा दी गई।) । गांव उगरास की सीमा में अपने सैनिकों तथा साथियों सहित ‘दारूड़ा-मारूड़ा’ में मस्त (मद्यपान तथा गीतों में लीन) राव खींवाजी (खिंवजी) को राव नरै सूजावत ने उसी के सेवकों द्वारा सूचित करवाया कि ‘दांतड़ली रै जायोडै नरै पोकरण लीवी ‘ अर्थात् बड़े दांतों वाली (लिछमी) के बेटे नरे ने पोकरण पर आधिपत्य कर लिया है।

पोकरण पर आधिपत्य करके नरै सूजावत ने गढ़ के अन्त:पुर की सभी महिलाओं को उनके आभूषण तथा नकदी सहित ससम्मान गढ़ से विदा कर गांव उगरास की सीमा तक अपने सैनिकों के पहरे में पहुंचाया।

उस दिन पोकरण पर नरे सूजावत का अधिकार हुआ, जो तीन पीढ़ियों तक रहा।

इस प्रकार शकुन पर आधारित हड़बूजी सांखला की भविष्यवाणी अक्षरसः सत्य सिद्ध हुई। इनको शकुन विशेषज्ञ और चमत्कारिक मानते हुए इतिहासकार ओझाजी ने लिखा है कि – “यह सांखला (परमार) जाति का राजपूत था और बैंगटी का रहने वाला था। यह बड़ा शकुन जानने वाला और करामाती माना जाता था तथा राव जोधा के समय में विद्यमान था।

एक परोपकारी महात्मा तथा समाज-सेवी के रूप में प्रसिद्ध हड़बूजी सांखला अपनी बैलगाड़ी में अनाज भर कर गांव-गांव घूम कर अकाल-ग्रस्त तथा अभाग्रस्त लोगों को बांटा करते थे। इसके अतिरिक्त गो भक्त हड़बूजी अकाल के दिनों में अपनी इसी गाड़ी में गायों के लिए चारा भर कर गांव-गांव जाकर बांटा करते थे। इनकी वह गाड़ी चारा एवं अनाज के अक्षय भण्डार के रूप में लोक प्रसिद्ध हुई। वह गाड़ी आज भी राजस्थानी लोक संस्कृति के पूज्य तत्त्व के रूप में विख्यात है, जो ग्राम बैंगटी में हड़बूजी के मंदिर में विद्यमान है।

सुप्रसिद्ध शकुन विचारक, भविष्य द्रष्टा, चमत्कारी व्यक्तित्व के स्वामी तथा संत प्रवृत्ति के महापुरुष हड़बूजी सांखला एक सिद्ध योग साधक भी थे। बाबा रामदेवजी की भांति ही हड़बूजी ने भी अपनी कर्म एवं साधना स्थली ग्राम बैंगटी में जीवित समाधि ली।


 सांखला पंवार (परमार) राजपूतों का इतिहास 


सांखला परमारों की एक शाखा है। वि.स.1318 के शिलालेख में शब्द शंखकुल का प्रयोग किया गया है। धरणीवराह पुराने किराडू का राजा था। धरणीवराह के मारवाड़ भी अधीन था। धरणी का पुत्र बाहड़ था जिसके दो पुत्र प्रथम का नाम सोड व दूसरा बाघ था। सोड के वंशज ‘सोडा' परमार कहलाए। बाघ जैचन्द पडिहार के हाथों युद्ध में मारा गया। उसका पुत्र वैरसी पिता की मौत का बदला लेने की फिराक में था। उसने ओसियां की सचियाय माता से वर प्राप्त कर पिता की मृत्यु का बदला लिया। वह ओसियां सचियाय माता के गया जहाँ नैणसी लिखते हैं कि माता ने उसे दर्शन दिए और शंख प्रदान किया, तभी से वैरसी के वंशज सांखला कहलाने लगे। इसने जैचन्द के मूंघियाड़ के किले को तुड़वा कर रूण में किला बनवाया तब से ये राणा कहलाने लगे। इसका पुत्र राजपाल था जिसके तीन पुत्र जिनके नाम छोहिल, महिपाल और तेजपाल था।

छोहिल के पुत्र पालणांसी के वंश में चाचग हुआ। चाचग ने मांडु के सुल्तान को पराजित कर उसके नगारा निशान छीन लिए जिससे उसके वंशज नादेत निशाणेत कहलाए। उसका पुत्र सोहड़ भी वीर था। महाराणा मोकल ने इन परमारों में विवाह किया। महाराणा कुम्भा इनके दोहिते थे। आमेर के राजा पृथ्वीराज के प्रधान हदाजी परमार भी इसी वंश के थे। नागौर का राज्य जब राजा मानसिंह आमेर के अधिकार में आया तो उस वंश के बलकरण को रूण सहित 84 गांवों की जागीर दी जो कि उनकी सेवा में था। महिपाल का पोता उदगा पृथ्वीराज चौहान के सामन्तों में था। राजपाल के पुत्र महिपाल के बेटे रायसी ने रूण आकर जांगलू चौहानों को हरा अपना राज कायम किया। इसने अपने नाम पर रायसीसर बसाया। ये सांखले रूणेचे सांखले कहलाये।

(देवीसिंह मंडावा द्वारा लिखित पुस्तक "क्षत्रिय राजवंशों का इतिहास" से साभार)


शिव किशोर गौड़ एडवोकेट - कुशल नेतृत्व उज्जवल भविष्य बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश

Written By Shalini kaushik on सोमवार, 25 सितंबर 2023 | 7:53 am

  


        पूरे भारत में मार्च 2023 तक, भारत में अधिवक्ताओं/वकीलों की संख्या 1.5 मिलियन (15 लाख) से अधिक होने का अनुमान है, जिसमें लगभग एक लाख अधिवक्ता  बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश से सम्बद्ध हैं. एक औसत बुद्धि का व्यक्ति भी अनुमान लगा सकता है कि इतनी विशाल संस्था के सर्वोच्च पद पर आसीन पदाधिकारी पर अधिवक्ताओं के हितों को संरक्षित करने की कितनी महती जिम्मेदारी है. पूरे प्रदेश में एक भी अधिवक्ता के साथ कुछ गलत घटित होने पर जितनी तत्परता के साथ वर्तमान में बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के चेयरमैन पद पर आसीन श्री शिव किशोर गौड़ जी द्वारा संज्ञान में लेकर कार्यवाही की जा रही है, वह उल्लेखनीय है। 

         हापुड़ में पुलिस महकमे द्वारा निर्दोष अधिवक्ताओं पर किए गए बर्बरता पूर्ण हमले पर भी श्री शिव किशोर गौड़ जी द्वारा सख्त रूख अपनाकर प्रदेश व्यापी हड़ताल का आह्वान किया गया और पूरे प्रदेश के अधिवक्ताओं ने बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के आह्वान को धरातल पर मजबूती प्रदान की। इसका ही परिणाम था कि प्रदेश सरकार को झुककर बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के चेयरमैन श्री शिव किशोर गौड़ जी को वार्ता के लिए ससम्मान आमंत्रित किया गया और अधिवक्ताओं की सभी मांगों को स्वीकार करना पड़ा। सफल वार्ता के पश्चात दोषी पुलिस अधिकारियों को निलंबित व स्थानांतरित किया गया और कुछ दिन पश्चात ही उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा एडवोकेट प्रोटेक्शन एक्ट लागू करने के लिए एक समिति गठित कर दी गई। यह यदि संभव हुआ तो केवल हमारे संघर्षशील नेतृत्व के कारण। 

       यही नहीं, 2015 में बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा अधिवक्ताओं के वकालत से प्रमाणिक रूप से जुड़े रहने के प्रमाण के लिए सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस की शुरुआत की गई. जिससे अधिवक्ताओं को जो आरंभ से आज तक अपने प्रदेश की बार काउंसिल में रजिस्ट्रेशन कराकर वक़ालत करते रहते थे, उन्हें भविष्य में आगे प्रेक्टिस करने के लिए सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस की जरूरत होने लगी. सबसे पहले अधिवक्ताओं को सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस 2018 से प्रदान किए गए, जिनका रि-इश्यू का कार्य सितंबर 2022 से आरम्भ कर दिया गया, जिसमें अधिवक्ताओं द्वारा वक़ालत नामों की आवश्यकता और 500 रुपये की फीस को लेकर सवाल खड़े किए गए, जिसे देखते हुए बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा रि-इश्यू का कार्य स्थगित कर अपने हाथों में लिया गया और लगभग साल भर बीतने के बाद भी 1983 से पूर्व के अधिवक्ताओं को वक़ालत नामों की आवश्यकता से छूट देकर फीस 500 रुपये ही रखी गई, इधर अगस्त 2023 में बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के चेयरमैन पद पर नियुक्त हुए श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी और उन्होंने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के 500 रुपये फीस के निर्देश और बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के सम्भावित आर्थिक नुकसान को तरजीह न देते हुए अधिवक्ताओं की आर्थिक समस्या को तरजीह दी और आते ही सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस के रि-इश्यू की फीस आधी कर दी 250 रुपये. 

   वर्तमान में चेयरमैन पद पर सर्वाधिक 15 सदस्यों की वोट से चयनित शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी अपनी व्यवहार कुशलता और अधिवक्ताओं के हित में निरन्तर लगे रहने के कारण एक सर्वप्रिय बार काउंसिल सदस्य के रूप में स्थान बनाए हुए हैं. 2017 में बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के सदस्य के रूप में निर्वाचित श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी अब तक बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश में सह अध्यक्ष और सदस्य सचिव रहे हैं. 1990 से अधिवक्ता के रूप में पंजीकृत शिव किशोर गौड़ एडवोकेट पहली बार बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के सदस्य बने और अपने पहले ही कार्यकाल में शिव किशोर गौड़ एडवोकेट ने शामली, मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर के अधिवक्ताओं के 60 से ऊपर अधिवक्ताओं के रजिस्ट्रेशन, 200 से अधिक अधिवक्ताओं को सर्टिफिकेट ऑफ प्रेक्टिस, कई अधिवक्ताओं का अन्य राज्यों से उत्तर प्रदेश में स्थानांतरण कार्य, कई अधिवक्ताओं के डेथ क्लेम का कार्य अपने विशेष प्रतिनिधि द्वारा जानकारी प्राप्त होने पर उनके अपने क्षेत्र में बैठे बैठे ही संपादित कराया है और प्रयाग राज में कार्यरत बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश को 800 किलोमीटर दूर शामली जिले तक सुलभ बना दिया है. 

     आज आवश्यकता है कि हम सब ऐसे कुशल व अधिवक्ताओं के हितों को समर्पित व्यक्तित्व श्री शिव किशोर गौड़ जी के हाथ मजबूत करें। कुशल नेतृत्व ही हम अधिवक्ताओं के न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य को भी सुदृढ़ करता है।

द्वारा 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

विशेष प्रतिनिधि, शामली 

श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट 

चेयरमैन, 

बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश 


यू पी में अधिवक्ता खतरे में

Written By Shalini kaushik on बुधवार, 30 अगस्त 2023 | 3:42 pm

 

हापुड़ में प्रियंका त्यागी एडवोकेट के साथ पुलिस प्रशासन द्वारा बदसलूकी और उसके बाद हापुड़ बार एसोसिएशन के अधिवक्ताओं के शांति पूर्ण धरने पर सी ओ हापुड़ द्वारा बर्बरता पूर्वक लाठी चार्ज करना, साथ ही, महिला अधिवक्ताओं को भी लाठी चार्ज के घेरे में लेना जिसमें दो दर्जन से अधिक अधिवक्ताओं का गम्भीर रूप से घायल होना, इसे लेकर पूरे यू पी के अधिवक्ताओं की कलमबंद हड़ताल और ठीक हड़ताल के दिन हापुड़ से सटे हुए गाजियाबाद में 35 वर्षीय अधिवक्ता मोनू चौधरी की गोली मारकर हत्या उत्तर प्रदेश में अधिवक्ताओं की असुरक्षित स्थिति दिखाने के लिए पर्याप्त है और अधिवक्ता सुरक्षा कानून की जरूरत की पुरजोर वक़ालत कर रही है. 

       वकीलों की सुरक्षा के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया प्रतिबद्ध है और इसीलिए अधिवक्ता सुरक्षा कानून के ड्राफ़्ट को बीसीआई ने मंजूरी दे दी थी . बीसीआई ने इस ऐक्ट का प्रारूप तैयार कर सभी राज्यों की बार काउंसिल को भेजा था और उनसे सुझाव और संशोधन के लिए राय मांगी थी और फिर बिना किसी संशोधन के ही ऐक्ट के मसौदे को मंजूरी दे दी गयी. एडवोकेट प्रोटेक्शन बिल की रूपरेखा और ड्राफ़्ट बार काउंसिल ऑफ इंडिया की सात सदस्यीय कमेटी ने तैयार किया और इसकी 16 धाराओं में वकील तथा उसके परिवार के सदस्यों को किसी प्रकार की क्षति और चोट पहुंचाने की धमकी देना, किसी भी सूचना को जबरन उजागर करने का दबाव देना, पुलिस अथवा किसी अन्य पदाधिकारी से दबाव दिलवाना, वकीलों को किसी केस में पैरवी करने से रोकना, वकील की संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, किसी वकील के खिलाफ अपमानजनक शब्द का इस्तेमाल करना जैसे कार्यों को अपराध की श्रेणी में रखा गया और ये सभी अपराध गैर जमानती अपराध रखने का प्रावधान किया गया. ऐसे अपराध के लिए 6 माह से 5 वर्ष की सजा के साथ साथ दस लाख रुपये जुर्माना लगाने का भी प्रावधान रखा गया जिसके लिए पुलिस को 30 दिनों के भीतर अनुसंधान पूरा किया जाना जरूरी किया गया , जिसकी सुनवाई जिला एवं सत्र न्यायाधीश /अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश करेंगे. वकील को सुरक्षा के लिए हाई कोर्ट में आवेदन देने का प्रावधान और हाई कोर्ट वकील के आचरण सहित अन्य तथ्यों की जांच कर जरूरत पड़ने पर स्टेट बार काउंसिल तथा बीसीआई से जानकारी लेकर सुरक्षा देने के बारे में आदेश जारी करने का प्रावधान रखा गया लेकिन किसी केस में अभियुक्त वकील पर यह कानून लागू नहीं होगा यह भी निश्चित किया गय. 

    आज  तक भी एडवोकेट प्रोटेक्शन ऐक्ट लागू नहीं किये जाने का खामियाजा उत्तर प्रदेश के अधिवक्ताओं को लगातार भुगतना पड़ रहा है और ऐक्ट के न होने के नकारात्मक असर वकीलों को नजर आते जा रहे हैं. लगातार ऐक्ट लागू किए जाने की मांग उत्तर प्रदेश में तहसील बार एसोसिएशन से लेकर बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश द्वारा की जा रही है, किंतु उत्तर प्रदेश सरकार के कानों पर जूँ तक नहीं रेंग रही है. अब लगातार हो रही अधिवक्ताओं की हत्या को देखते हुए यही सवाल उठ रहा है कि क्या वेस्ट यू पी में हाई कोर्ट खंडपीठ की तरह ही अधिवक्ताओं की सुरक्षा को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है?  

    उत्तर प्रदेश के समस्त अधिवक्ताओं की ओर से विनम्र निवेदन है कि उत्तर प्रदेश सरकार तुरंत एडवोकेट प्रोटेक्शन ऐक्ट के लागू किए जाने के लिए कदम उठाए.   

शालिनी कौशिक 
एडवोकेट
कैराना (शामली) 

पाकिस्तान लौटेगी सीमा हैदर

Written By Shalini kaushik on रविवार, 27 अगस्त 2023 | 8:06 pm

 



     सीमा हैदर (पाकिस्तान की नागरिक) आजकल भारत में चर्चाओं में टॉप टेन में शामिल हैं और यही नहीं इस चर्चित चेहरे का फायदा उठाकर स्वयं को टॉप रैंकिंग में लाने के लिए भारतीय मीडिया भी काफी हाथ-पैर मार रहा है. पाकिस्तान के मुस्लिम समुदाय की सीमा हैदर अपने चार बच्चों के साथ तीन देशों - पाकिस्तान, नेपाल और भारत के बार्डर को अवैध रूप से पार कर भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के रघुपुरा में अवैध रूप से रह रही है और अब वह भारत के नागरिक सचिन की पत्नी के तौर पर भारत की नागरिकता हासिल करने के लिए आगे बढ़ गई है और यही भारतीय नागरिकता हासिल करने के लिए बढ़ाया गया सीमा हैदर का कदम उसकी भारत में अवैध उपस्थिति का भंडाफोड़ कर गया है. 
भारत में नागरिकता अधिनियम-1955 द्वारा भारतीय नागरिकता प्राप्ति के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं जो इस प्रकार हैं - 

 पंजीकरण द्वारा नागरिकता 
केन्द्रीय सरकार, आवेदन किये जाने पर, नागरिकता अधिनियम 1955 की धारा 5 के तहत किसी व्यक्ति (एक गैर क़ानूनी अप्रवासी न होने पर) को भारत के नागरिक के रूप में पंजीकृत कर सकती है यदि वह निम्न में से किसी एक श्रेणी के अंतर्गत आता है:--

भारतीय मूल का एक व्यक्ति जो पंजीकरण के लिए आवेदन करने से पहले सात साल के लिए भारत का निवासी हो;
भारतीय मूल का एक व्यक्ति जो अविभाजित भारत के बाहर किसी भी देश या स्थान में साधारण निवासी हो;
एक व्यक्ति जिसने भारत के एक नागरिक से विवाह किया है और पंजीकरण के लिए आवेदन करने से पहले सात साल के लिए भारत का साधारण निवासी है;
उन व्यक्तियों के अवयस्क बच्चे जो भारत के नागरिक हैं;
पूर्ण आयु और क्षमता से युक्त एक व्यक्ति जिसके माता पिता सात साल से भारत में रहने के कारण भारत के नागरिक के रूप में पंजीकृत हैं।
पूर्ण आयु और क्षमता से युक्त एक व्यक्ति, या उसका कोई एक अभिभावक, पहले स्वतंत्र भारत का नागरिक था और पंजीकरण के लिए आवेदन देने से पहले एक साल से वह भारत में रह रहा है।
पूर्ण आयु और क्षमता से युक्त एक व्यक्ति जो सात सालों के लिए भारत के एक विदेशी नागरिक के रूप में पंजीकृत है और पंजीकरण के लिए आवेदन देने से पहले वह एक साल से भारत में रह रहा है।.          
        जिसके अनुसार, सीमा हैदर का गैर कानूनी अप्रवासी होना उसकी भारतीय नागरिकता प्राप्ति की सर्वप्रथम बाधा है, उसके पश्चात यदि वह यह कहती है कि वह भारत के नागरिक की पत्नी है तब भी वह भारत की नागरिकता प्राप्त नहीं कर सकती है क्योंकि ऐसे में पंजीकरण के लिए आवेदन करने से पूर्व उसे सात साल के लिए भारत का साधारण निवासी होना चाहिए था और वह अभी दो माह से ही भारत में रह रही हैं इसलिए इस नियम के अंतर्गत भी उसे भारतीय नागरिकता प्राप्त नहीं हो सकती है. 
        सीमा हैदर का भारत में तीन तीन बॉर्डर लाँघकर आना, चार बच्चों को लेकर आना, पांचवी पास होना, मीडिया के प्रश्नों का बेहिचक ज़वाब देना, हिन्दू धर्म की मान्यताओं का बहुत बढ़चढ़कर दिखावा करना, इसरो के चंद्रमा पर पहुंचने को लेकर व्रत रखना, जय श्री राम के नारे लगाना आदि बहुत कुछ है जो उसे संदिग्धों की श्रेणी में रखता है और उसकी भारत में मौजूदगी को लेकर भारतीय जनमानस में रोष भरता है. ऐसे में भारतीय कानून के अनुसार और भारत में उसकी संदिग्ध उपस्थिति को देखते हुए उसे अभिरक्षा में लेकर उसके चारों बच्चों के साथ उसे वापस पाकिस्तानी सरकार के हवाले कर दिया जाना चाहिए.

शालिनी कौशिक
         एडवोकेट 
कैराना (शामली)

संघर्षों पर सफ़लता पाने वाले आदर्श चरित्र श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट

Written By Shalini kaushik on शुक्रवार, 25 अगस्त 2023 | 3:11 pm


  

   माननीय श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी संघर्षों का दूसरा नाम हैं. शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी जब कक्षा 6 में थे तब शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी ने मजदूरी की, कक्षा 7 में घर पर क्राकरी का काम किया, हॉकरी भी की और तब उन्हें इस कार्य के लिए 140/-रुपये मिलते थे. शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी ने 1977-78 में इन्टर किया और उसके बाद ट्यूशन करने शुरू किए. 1990 में शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी ने वक़ालत पास की, 2000 मे पहली बार क्षेत्र पंचायत का चुनाव लड़ा और ब्लॉक अध्यक्ष चुने गए. 2005 मे जिला पंचायत सदस्य चुने गए. 2006-07 में समाजवादी पार्टी के विधान सभा अध्यक्ष रहे. 2008 में खुर्जा बार एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी रहे. 2009-10 में समाजवादी पार्टी की अधिवक्ता सभा के जिला सचिव रहे. 2012 से 2017 तक समाजवादी पार्टी के विधान सभा के जिला अध्यक्ष रहे. 2018 में बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के सदस्य चुने गए और 1 साल 2020-21 में सचिव और तीसरी बार सह अध्यक्ष चुने गए.


    इतने कड़े संघर्षों के साथ माननीय श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी अपने जीवन के सिद्धांतो पर अडिग खड़े रहे और 20 अगस्त 2023 को यह गौड़ सर की श्रेष्ठता ही कही जाएगी कि बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश में पश्चिमी यू पी का प्रतिनिधित्व 25 सदस्यों मे मात्र 3 अधिवक्ताओं का होने पर भी उन्हें प्रथम बार की सदस्यता मे ही बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के चेयरमैन पद के लिए सदस्यों द्वारा चयनित किया गया है. यह पश्चिमी यू पी के लिए बहुत गौरव का क्षण है कि अधिवक्ताओं की सबसे बड़ी संस्था बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश में खुर्जा के अधिवक्ता श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट चेयरमैन पद पर नियुक्त हुए हैं.


     संघर्षों से भरे हुए माननीय श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी के जीवन के बारे में जब मैंने सर से गहराई से जानना चाहा तो अपने जीवन के संघर्षों के बारे में बताते बताते श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी काफी भावुक हो गए और कहने लगे कि आपको तो हमने उपरी उपरी बातेँ ही बताई हैं अगर पूरी गहराई से हम बताएं तो आप रो देंगी. सर कहने लगे कि हमने बहुत संघर्ष देखे हैं और इसीलिये हमें किसी का भी दर्द अपना ही लगता है और इसीलिए हम हर किसी की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं और आज अगर मैं कुछ हूं तो यह परम पिता परमात्मा की ही कृपा है. 


   और यह सच्चाई है क्योंकि मैंने जब सर का नम्बर ढूंढ़कर उनसे अपने COP नम्बर के लिए सहायता मांगी थी तो सर ने मुझसे मेरा फॉर्म भेजने के लिए कहा और जिस किसी का भी फॉर्म मैंने सर को दिया है सर ने उसका काम कराया है और यही नहीं सर ने कभी भी फॉर्म में निश्चित रकम से ऊपर एक भी पैसा नहीं लिया है क्योंकि जब मैं सर को अपना फॉर्म देने मुजफ्फरनगर गई तो वहां सर के बेटे उत्कर्ष गौड़ एडवोकेट मिले और मेरा ड्राफ़्ट तैयार नहीं था तो मैं उन्हें 500 /- रुपये के ड्राफ़्ट के लिए ऊपर से पैसे देने लगी तो उन्होंने एकदम कहा कि पापा गुस्सा होंगे. 31 जनवरी 2020 को मैंने सर को पहले फॉर्म के रूप में अपना फॉर्म दिया था COP नम्बर के लिए और आज अगस्त 2023 में स्थिति यह है कि सर शामली जिले के 170 अधिवक्ताओं को COP नम्बर और 60 अधिवक्ताओं के रजिस्ट्रेशन नंबर बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश से जारी करा चुके हैं. जबसे गौड़ सर ने शामली जिले के अधिवक्ताओं के सहयोग की जिम्मेदारी अपने कँधों पर उठाई है, शामली जिले के अधिवक्ताओं का ना तो बार काउंसिल में रजिस्ट्रेशन की कोई परेशानी रह गई है और न ही COP नम्बर प्राप्त करने में कोई परेशानी रह गई है.


  और यह गौड़ सर की अधिवक्ताओं की समस्या निदान करने की भावना ही कही जाएगी कि सर ने बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के चेयरमैन पद को सम्भालते ही 2018 में सबसे पहले COP नम्बर प्राप्त अधिवक्ताओं के COP नम्बर रि-इश्यू की फीस 500 रुपये से घटाकर 250 रुपये कर दी है जिसमें सर्वप्रथम बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश को बहुत बड़े आर्थिक नुकसान की समस्या सामने आई किन्तु सर अपने निर्णय से नहीं डगमगाये और उन्होंने अधिवक्ताओं का हित हो ऊपर रखा. सर का कहना था कि - "जिसने मेरे लिए एक बार भी कोई कार्य कर दिया है उसका एहसान मैं जिंदगी भर याद रखता हूं और उसके साथ खड़ा रहता हूं." 


  ऐसे हैं हम सभी के आदरणीय श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी और उनके जीवन के संघर्षों और उसके बाद सफ़लता के चरमोत्कर्ष पर पहुंचने को हम इन पंक्तियों के माध्यम से समझ सकते हैं - 

" कुछ किए बिना ही जय - जयकार नहीं होती 

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती." 

शालिनी कौशिक एडवोकेट

विशेष प्रतिनिधि, शामली

माननीय श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट, 

चेयरमैन, बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश

योगी आदित्यनाथ जी कैराना में स्थापित करें जनपद न्यायालय शामली

Written By Shalini kaushik on शुक्रवार, 11 अगस्त 2023 | 12:04 pm

  


       2011 में 28 सितंबर को शामली जिले का सृजन किया गया. तब उसमें केवल शामली और कैराना तहसील शामिल थी. इससे पहले शामली और कैराना तहसील मुजफ्फरनगर जनपद के अंतर्गत आती थी. कुछ समय बाद शामली जिले में ऊन तहसील बनने के बाद अब शामली जिले के अंतर्गत तीन तहसील कार्यरत हैं. 2018 के अगस्त तक शामली जिले का कानूनी कार्य मुजफ्फरनगर जिले के अंतर्गत ही कार्यान्वित रहा किन्तु अगस्त 2018 में शामली जिले की कोर्ट शामली जिले में जगह का चयन न हो पाने के कारण कैराना में आ गई और इसे नाम दिया गया -" जिला एवं सत्र न्यायालय शामली स्थित कैराना. "

        2018 से अब तक मतलब अगस्त 2023 तक शामली जिले के मुख्यालय से लगभग 12 किलोमीटर दूर जिला जज की कोर्ट के लिए जगह का चयन हो जाने के बाद शासन द्वारा 51 एकड़ भूमि जिला न्यायालय कार्यालय और आवासीय भवनों के लिए आवंटित की गयी थी, जिसमें चाहरदीवारी के निर्माण के लिए 4 करोड़ की धन राशि अवमुक्त की गई थी जिससे अब तक केवल बाउंड्रीवाल का ही निर्माण हो पाया है. उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा जिला न्यायालय कार्यालय और आवासीय भवनों के निर्माण के लिए 295 करोड़ रुपये का एस्टीमेट बनाकर शासन को भेजा गया था किंतु शासन द्वारा वर्तमान तक भी कोई धनराशि अवमुक्त नहीं की गई. 

    अब तक हमने बात की केवल उन महत्वाकांक्षाओं की जिनके मद्देनजर बगैर किसी व्यवस्थित योजना के शामली जिले का निर्माण पहले प्रबुद्ध नगर के नाम से और बाद में जनता के दबाव में शामली जिले के ही नाम से कर दिया गया. अब यदि वास्तविकता की बात करें तो शामली जिले में केवल तहसील स्तर का ही कार्य सम्पन्न हो रहा है. जिसे देखते हुए कहा जा सकता है कि वहां कानूनी विभाग लगभग शून्यता की स्थिति में है और वहां जिला जज की कोर्ट की स्थापना के साथ साथ मुंसिफ कोर्ट से लेकर जिला जज की कोर्ट की स्थापना करने के लिए बहुत बड़े स्तर का कार्य सम्पन्न करना होगा, जबकि शामली जिले की तहसील कैराना में जिला जज की कोर्ट से एक नंबर कम की कही जाने वाली कोर्ट ए डी जे कोर्ट की स्थापना ही 2011 में हो चुकी है और कैराना तहसील में स्थापित न्यायालय परिसर शामली जिले के मुख्यालय से मात्र 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और फिर ज़िला न्यायालय शामली के कार्यालय और आवासीय भवनों का निर्माण अब भी तो शामली मुख्यालय पर नहीं किया जाना है अब भी तो वह शामली के गाँव बनत में किया जाना है और वह भी केवल शामली के अधिवक्ताओं और जनता की इस जिद पर कि शामली जिले का ही सर ऊंचा रहना चाहिए, जबकि कैराना भी तो शामली जिले की ही तहसील है और अगर उत्तर प्रदेश सरकार  कैराना के न्यायालय तक के क्षेत्र को शामली जिले के ही क्षेत्र में सम्मिलित कर यहां स्थापित न्यायालयों को मुख्य न्यायालय का दर्जा प्रदान करती है तो जितने बजट की आवश्यकता शामली जिले के बनत गाँव में न्यायालय भवनों हेतु है उसके एक चौथाई से भी कम खर्च में शामली जिले के जनपद न्यायालय की समस्या का निवारण हो जाएगा, किन्तु मानवीय हठ इस साधारण सी बात को एक प्रदेश स्तरीय समस्या का रूप प्रदान कर रही है. 

    ऐसे में, माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी से विनम्र निवेदन है कि वे कैराना की सुदृढ़ न्यायिक व्यवस्था, कैराना में फैली अपराधियों की जड़ें और शामली जिले की बदहाल कर देने वाली जाम की समस्या को देखते हुए कैराना में ही जिला एवं सत्र न्यायाधीश के न्यायालय को शामली जिले का मुख्य न्यायालय घोषित करें और यदि इसके लिए उन्हें कैराना में न्यायालय परिसर तक के क्षेत्र को शामली जिले के अंतर्गत ही घोषित करना पड़े तो करें क्योंकि शामली जिले में जिस जगह का चयन जिला कोर्ट के लिए किया गया है वहां तक क्षेत्र के निवासियों का पहुंचना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है क्योंकि शामली जिला इतना सघन रूप से बसा हुआ है कि मात्र एक किलोमीटर पार करने में भी 1-2 घण्टे से ऊपर का समय लग रहा है. ऐसे में न्याय पाने के लिए पीड़ितों को या तो रात में ही घर से निकलना पड़ेगा या फिर न्याय पाने की आशा को ही खो देना पड़ेगा. साथ ही, यदि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कैराना स्थित जनपद न्यायालय को मुख्य न्यायालय का दर्जा दिया जाता है तो सरकार का बहुत सारा धन भी बचेगा और कैराना तहसील में लगभग खंडहर पड़े बहुत सारे क्षेत्र का न्यायालय और अधिवक्ताओं के चेम्बर के रूप में इस्तेमाल भी हो सकेगा. 

    अतः माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी कम से कम एक बार जांच कमेटी बिठाकर कैराना स्थित जनपद न्यायालय को ही शामली जिले के मुख्य न्यायालय का दर्जा दिए जाने की मांग पर विचार करें. 


       🙏🙏धन्यवाद 🙏🙏


शालिनी कौशिक एडवोकेट

कैराना (शामली)

बंदर और उत्तर प्रदेश

Written By Shalini kaushik on गुरुवार, 3 अगस्त 2023 | 12:49 pm

 


    आज उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा चर्चाओं में अगर कोई शब्द है तो वह है " विकास", जो कि सत्ता पक्ष की नजरों में बहुत ज्यादा हो रहा है और विपक्ष की नजरों में गायब हो गया है किन्तु जो सच्चाई आम जनता के सामने है, जिस भयावह सच को उत्तर प्रदेश की जनता भुगत रही है, वह यह है कि घर के अंदर, घर के बाहर, मन्दिर, मस्जिद, कार्यस्थल, न्यायालय - कचहरी परिसर, सडकें, बिजली के खंबे, पानी की टंकियां, खुले घास के मैदान, वाहनों के पार्किंग स्थल आदि आदि क्या क्या कहा जाए, सभी बन्दरों के परिवार - खानदान से आतंकित हैं और इनके खौफ में कोई अपनी जिंदगी से हाथ धो रहा है तो कोई अपने हाथ पैर से तो कोई अपने बच्चों या बूढे माँ बाप से, किन्तु आश्चर्य इस बात का है कि जनता के हृदय पर विराजमान सरकार के दिल पर तो क्या असर करेगी, उसके कानों पर जूँ तक नहीं रेंग रही है.

         जबसे इस धरती पर जन्म लिया, बंदरों की बहुत बड़ी संख्या का सामना किया है. घर के ऊंचे ऊंचे जीनों से बन्दरों से बचने के लिए छलांग तक लगाई है. मम्मी को दो दो बार, एक बार रात में छत पर सोते समय और एक बार रसोई से बाहर आते समय बन्दरों ने काटा है, पापा को कैराना कचहरी में कोर्ट की ओर जाते समय बन्दर ने काटा है. मुझे खुदको बन्दर ने छत पर पकड़ लिया था, वो तो और बन्दरों के शोर को सुनकर मेरे मुँह के पास तक पहुंचा बन्दर मुझे छोडकर भाग गया था और मैं वे दर्दनाक इंजेक्शन लगवाने से बच गई थी जो मम्मी को दो बार और पापा को एक बार लगवाने पड़े थे.

    यही नहीं, दुःखद स्थिति तब रही जब कैराना के भाजपा नेता अनिल चौहान जी की धर्मपत्नी को बन्दरों के हमले के कारण असमय मृत्यु का शिकार होना पड़ा. बन्दरों का आतंक, उत्तर प्रदेश के शामली जिले में एक लम्बे समय से फैला हुआ है, शामली, कैराना, कांधला, थाना भवन में बन्दरों के हमले में आम आदमी को घातक दुर्घटनाओं का शिकार होना पड़ रहा है, 8 सितंबर 2021 को कैराना के भाजपा नेता अनिल चौहान की पत्नी सुषमा चौहान बन्दरों के हमले में छत से गिरी थी और मृत्यु का शिकार हुई थी, शामली के काका नगर में एक युवक को 9 मार्च 2020 को बन्दरों ने नोच नोच कर घायल कर दिया था जिससे बचने के लिए युवक ऊंचाई से गिरकर मृत्यु का शिकार हो गया था, थाना भवन में एक बच्ची को बन्दरों ने बुरी तरह घायल कर दिया था. प्रतिदिन क्षेत्र के सरकारी अस्पतालों में बन्दरों के हमले में घायल लोगों द्वारा बहुत बड़ी संख्या में जाकर एंटी रेबीज के इंजेक्शन लगवाए जा रहे हैं. वर्तमान में हाल यह है कि पूरे प्रदेश में कभी कोई पिता अपने बच्चे को बचाते हुए बन्दरों के हमले में छत से गिर रहा है और चोटिल हो रहा है. कभी कहीं बन्दर वकीलों के कोट, फाइल उठा कर उन्हें घण्टों परेशान कर रहे हैं. रोज अखबारों में कहीं न कहीं की बंदरों के हमलों की खबरें आती रहती हैं, कहीं बन्दर घरों की दीवारें तोड़ रहे हैं, कहीं हरे भरे बाग उजाड़ रहे हैं, पेड़ों पर लगे चिड़ियाओं के घौंसले तोड़ रहे हैं, कहीं बिजली के खंबे से लगे तारों पर झूल कर उन्हें अपने आवा जाही का जरिया बना रहे हैं, जिससे बिजली के तार खम्भों पर ढीले हो रहे हैं और बिजली के आने पर स्पार्किंग के कारण खंबे के नीचे खड़े हुए लोग चिंगारियों से झुलस रहे हैं. रोज सरकारी अस्पतालों में बंदरों के काटने पर इंजेक्शन लगवाने वालों की भीड़ रहती है किन्तु उत्तर प्रदेश की सरकार तक एक सारस की खबर तो पहुंच जाती है किन्तु बन्दरों के आतंक से दहले ज़न जीवन की कोई सूचना सरकार के पास या तो पहुंच ही नहीं रही है या सरकार ने बंदरों के प्रति धार्मिक आस्था को अधिक महत्त्व देते हुए ज़न ज़न की पीड़ा से मुँह मोड़ लिया है.

      मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, चंडीगढ़ आदि कुछ जगहों पर बन्दरों के हमले में मारे गए या घायल हुए लोगों के लिए वन विभाग द्वारा मुआवजे का प्रावधान किया है किन्तु उत्तर प्रदेश में ऐसी कोई व्यवस्था वन विभाग द्वारा नहीं की गई है. उत्तर प्रदेश की सरकार उदार है, जीव मात्र के सुरक्षित जीवन को लेकर संवेदनशील है किन्तु इंसान को, आम जनता को भी तो एक सुरक्षित जीवन की जरूरत होती है. सामर्थ्यवान लोग जाल आदि लगाकर, कुत्ते पालकर अपने जीवन को सुरक्षित कर लेते हैं किन्तु जिनके लिए दो वक़्त की रोटी, रोज पहनने के कपड़े और सर पर छत को जुटाना ही भारी हो क्या वे बन्दरों के हमलों से बचने के अधिकारी नहीं हैं?

       उत्तर प्रदेश की एक जागरूक नागरिक होने के नाते मेरा माननीय श्री योगी आदित्यनाथ जी से कर बद्ध निवेदन है कि आम जनता के प्रति भी थोड़ा उदार रवैय्या अपनाएं, ताकि वह अपनी रोज की जरूरतों को पूरा करने की ओर अपना ध्यान केंद्रित कर सके और पर्यावरण संरक्षण के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की राह पर चलते हुए जिन पौधों का रोपण किया है उन पौधों को बन्दरों के हमलों से बचाते हुए पेड़ बनते हुए देख सकें. साथ ही, जनता की परेशानी को देखते हुए बंदरों के हमलों में घायल या मारे गए लोगों की सहायता हेतु उत्तर प्रदेश के वन विभाग को लंगूरों की व्यवस्था और मुआवजे का प्रावधान किए जाने का भी आदेश दें.

शालिनी कौशिक एडवोकेट 

कैराना (शामली) 

नारी शक्ति है क्या

Written By Shalini kaushik on गुरुवार, 20 जुलाई 2023 | 6:11 pm

  



 
    मणिपुर वीभत्स घटना आज पूरे देश के सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर छाई हुई है. महिलाओं के लिए मौजूदा समय कितना दुखदायी है निरन्तर आंखों के सामने खुलता जा रहा है. यूँ तो, आरंभ से नारी की जिंदगी माँ के गर्भ में आने से लेकर मृत्यु तक शोचनीय ही रहती है. वह चाहे बेटी हो, पत्नी हो या माँ, सभी की नजर में बेचारी ही रहती है. आज एक ओर सरकारी योजनाओं में मिशन शक्ति, विधिक सेवा प्राधिकरण आदि माध्यम से सरकार नारी को सशक्त किए जाने का अथक प्रयास कर रही है किन्तु यह प्रयास भी भारतीय पुरातन सोच को परिवर्तित करने में विफल ही नजर आते हैं. नारी को अबला और भोग्या ही समझने वाला पुरुष सत्ता धारी समाज नारी की सामाजिक स्थिति को उन्नत होते हुए नहीं देख सकता है और वह जब भी, जैसे भी नारी को शोषित करने का कोई भी दुष्कर्म कर सकता है, करता है. बृज भूषण सिंह हो, कुलदीप सेंगर हो या मणिपुरी आदिवासी समाज - महिला को अपमानित करने से कहीं भी पीछे नहीं हटते हैं और ऐसे में इन पुरुष सामंतवाद के समर्थकों पर फर्क नहीं पड़ता है नारी के कमजोर या सबल होने से और सबसे दुःखद स्थिति यह है कि आज सत्ता के शीर्ष पर बैठी नारी शक्ति की मिसाल भी नारी अपमान के मुद्दों पर नारी के साथ खड़ी दिखाई नहीं देती हैं और इतनी ऊपर पहुंचकर भी नारी के "अबला और बेचारी" होने की कहावत को ही चरितार्थ करती हैं.

शालिनी कौशिक एडवोकेट

कैराना (शामली) 

कांधला-कैराना की सड़क जल्द ठीक हो

Written By Shalini kaushik on सोमवार, 17 जुलाई 2023 | 12:59 pm



कांधला से कैराना कहा जाए या कैराना से कांधला - एक ही बात है. पूरे यू पी या कहें तो बीजेपी की केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार ने सड़कों का जाल सा बिछा दिया है सारे में, सड़कों को लेकर बहुत कार्य किया गया है भाजपा सरकार में, किन्तु यह कांधला - कैराना के रास्ते में पड़ते नीलकण्ठ महादेव मन्दिर (वैष्णो देवी मन्दिर) के ठीक सामने पड़ती सड़क पर कांधला में और कांधला से कैराना की ओर निकलते हुए ग्राम असदपुर जिढाना से पहले और ग्राम में काफी लम्बे क्षेत्र की सड़क का दुर्भाग्य कहा जाएगा कि इस पर माननीय मोदी जी या माननीय योगी जी की नजरें नहीं पड़ी और यह ज़बर्दस्त गड्ढे और टूट फूट भरी सड़क होते हुए और बड़े हादसों की वज़ह होते हुए भी बस लीपापोती से ही ठीक दिखाई जाती रही. आज स्थिति यह है कि चार पहिया वाहन तो इस पर किसी तरह लुढ़क लुढ़क कर घसीटते हुए चला लिए जा रहे हैं किन्तु मोटर साइकिल, स्कूटी, साईकिल, ई-रिक्शा चालक मजबूरी में और कोई रास्ता न होने के कारण इस पर निकल रहे हैं और हादसों के शिकार हो रहे हैं और ऐसे में निरन्तर बारिश ने कंगाली में आटा गीला वाला कार्य किया है. जिसे देखते हुए कांधला से ऊंचा गाँव तक की सड़क का जल्द ठीक किया जाना बेहद जरूरी है ताकि क्षेत्रीय निवासियों के जान माल की सुरक्षा की जा सके.

   शालिनी कौशिक एडवोकेट

   अध्यक्ष

मन्दिर महादेव मारूफ शिवाला कांधला धर्मार्थ ट्रस्ट (रजिस्टर्ड)

बात क्या है ?

Written By Rajesh Sharma on बुधवार, 21 जून 2023 | 9:45 pm

 बात से जब बात निकली है

तो कहा है

बात इससे पहले

हमने कब कहा है

बात ही बात में

चर्चा ये आम है

बात कोई और है

जो अभी नहीं सरेआम है


बात इतनी भी नहीं

की तुम क्या थे

बात ये भी नहीं की 

हम क्या है 

बात ये है की 

मंज़िल कहाँ थी

बात ये है की 

अब हम कहाँ है 


मनोज मुन्तशिर का लेखन सीमा में बंधे

Written By Shalini kaushik on मंगलवार, 20 जून 2023 | 6:13 pm

 


 "कपड़ा तेरे बाप का,

   तेल तेरे बाप का, 

   आग भी तेरे बाप की 

   और जलेगी भी तेरे बाप की"

        भक्त शिरोमणि हनुमानजी के मुख से इस तरह के सड़क छाप डायलाग कहलाती "आदिपुरुष" के डायलाग राइटर "मनोज मुन्तशिर" शायद लंकेश रावण के पश्चात दूसरे ब्राह्मण होंगे जिन्होंने श्री राम के चरित्र के साथ खिलवाड़ करने का असहनीय कृत्य किया है. जिस दिन से" आदिपुरुष" सनातन धर्मावलंबियों के सामने आई है शायद ही कोई सच्चा सनातनी होगा जो मनोज मुन्तशिर के अनोखे ज्ञान को लेकर कम से कम दो शब्द विरोध में न बोला हो और जिस तरह से हमेशा होता आया है गलत अपनी गलतियों को कभी स्वीकार नहीं करता अपितु और नई गलतियां करना आरंभ कर देता है. पहले तो असभ्यता, अश्लीलता की सीमाएं पार कर "आदिपुरुष" ने हिन्दू धर्म को कलंकित करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी थी, अब मनोज मुन्तशिर और कहने के लिए आगे बढ़े हैं, रामायण के गहरे जानकार मनोज मुन्तशिर कहते हैं -

"बजरंग बली ने भगवान राम की तरह से संवाद नहीं किए हैं। क्योंकि वे भगवान नहीं भक्त हैं, भगवान हमने उन्हें बनाया है, उनकी भक्ति में वह शक्ति थी।"

     कलियुग के एकमात्र प्रत्यक्ष भगवान के रूप में हम हनुमानजी की पूजा आराधना करते आ रहे हैं और अचानक पता चलता है एक प्रकांड विद्धान" मनोज मुन्तशिर " से कि हनुमानजी तो हमारे जैसे ही हैं बहुत गहरा धक्का पहुंचता है हमारी आस्था पर, अब ऐसे में मन यही कहता है कि कम से कम एक बार तो  बुद्धिमानी का दिखावटी चोला धारण किए मनोज मुन्तशिर को आईना दिखा ही दिया जाए.

   हनुमान भगवान शिवजी के 11वें रुद्रावतार, भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त एवं अमर बालाजी के रूप में हम सभी सनातन धर्मावलंबियों की आस्था के प्रमुख केंद्र हैं. हनुमान (संस्कृत: हनुमान्, आंजनेय और मारुति भी) परमेश्वर की भक्ति (हिन्दू धर्म में भगवान की भक्ति) की सबसे लोकप्रिय अवधारणाओं और भारतीय महाकाव्य रामायण में सबसे महत्वपूर्ण पात्रों में प्रधान हैं। वह भगवान शिवजी के सभी अवतारों में सबसे बलवान और बुद्धिमान माने जाते हैं। रामायण के अनुसार वे जानकी के अत्यधिक प्रिय हैं। इस धरा पर जिन सात मनीषियों को अमरत्व का वरदान प्राप्त है, उनमें बजरंगबली भी हैं। हनुमान जी का अवतार भगवान राम की सहायता के लिये हुआ। हनुमान जी के पराक्रम की असंख्य गाथाएँ प्रचलित हैं। इन्होंने जिस तरह से राम के साथ सुग्रीव की मैत्री कराई और फिर वानरों की मदद से असुरों का मर्दन किया, वह अत्यन्त प्रसिद्ध है। ऐसा भी जगत में प्रसिद्ध है कि जब श्री राम ने सरयू नदी के जल में महाप्रयाण का निश्चय किया तब उन्होंने हनुमानजी को जगत के प्राणियों की रक्षा के लिए धरती पर ही रहने का आदेश दिया और तब से हनुमानजी धरती पर ही निवास करते हैं और जहां जहां भी रामायण पाठ होता है वहां अवश्य पहुंचते हैं. इसी कारण रामायण पाठ के आरंभ में

"कथा प्रारम्भ होत है -, आओ वीर हनुमान,

ऊंचे आसन बैठकर करो सदा कल्याण"

और, रामायण पाठ पूर्ण होने पर 

"कथा समाप्त होत है, जाओ वीर हनुमान,

राम लखन श्री जानकी सहित करो सदा कल्याण"

 कहने का विधान है और धरती पर बहुत से भक्त जनों ने हनुमानजी की उपस्थिति को प्रत्यक्षतः अनुभव भी किया है. आज मनोज मुन्तशिर जैसे सड़क छाप लेखक हिन्दू धर्म की गहरी आस्था के केंद्र सियाराम और हनुमानजी के चरित्र से ही खिलवाड़ पर उतर आए हैं और ऐसा तब हो रहा है जब केंद्र और उत्तर प्रदेश में बैठी सरकार हिन्दू धर्म एवं संस्कृति की रक्षा के लिए कृत संकल्प है. ऐसे में, आदिपुरुष बैन होनी चाहिए और मनोज मुन्तशिर के लेखन का सीमा बंधन होना चाहिए.

शालिनी कौशिक 

  एडवोकेट 

कैराना (शामली) 

आमंत्रण पुस्तक विमोचन

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on बुधवार, 19 अप्रैल 2023 | 11:31 pm

अमेज़न पर उपलब्ध

आमंत्रण

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on सोमवार, 17 अप्रैल 2023 | 11:48 pm

Lawyer - Advocate (Difference)

Written By Shalini kaushik on शनिवार, 25 मार्च 2023 | 3:26 pm

 

 Lawyer और एडवोकेट या अधिवक्ता या अभिभाषक या वकील को आम जनता एक ही समझती है किन्तु सत्य कुछ अलग है - 

         Lawyer और एडवोकेट दोनों को ही कानून की जानकारी होती है।  Lawyer शब्द का उपयोग जनरल नेचर में होता है। यह उन लोगों के लिए इस्तेमाल होता है, जिसने कानून की पढ़ाई की हो। अगर इसे सीधे शब्दों में कहें तो Lawyer वो हो सकता है, जिसने एलएलबी (LLB) यानी कानून की पढ़ाई की हो। हालांकि, ये जरूरी नहीं कि कोई भी कानून पढ़ चुका हुआ व्यक्ति एडवोकेट हो। पर किसी भी व्यक्ति को लीगल एडवाइज देने का काम Lawyer कर सकता है, लेकिन वह किसी व्यक्ति के लिए कोर्ट में केस नहीं लड़ सकता है।

        अगर बात करें एडवोकेट की तो एडवोकेट को Lawyer से अलग कहा जाता सकता है। यह शब्द उन लोगों के लिए प्रयोग किया जाता है, जो कानून की पढ़ाई करने के बाद किसी दूसरे व्यक्ति के लिए कोर्ट में अपनी दलील दे सकते हैं। जैसे हम कोई केस के लिए वकील के पास जाते हैं, और वो कोर्ट में हमारे लिए दलील देता है या केस लड़ता है, वो एडवोकेट होता है। बता दें कि हर Lawyer एडवोकेट हो यह ऐसा जरूरी नहीं है। लेकिन हर ए़डवोकेट Lawyer होता है।

      अगर कोई कानून पढ़ाई करने के बाद दूसरों के लिए केस नहीं लड़ता है तो वो Lawyer कहा जाता है। वहीं,अगर व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के लिए केस लड़ता है तो वह एडवोकेट बोला जाता है। यह प्रोफेशनल होता है। एडवोकेट बनने के लिए Lawyer को बार काउंसिल में रजिस्ट्रेशन करवाना होता है और बार के एग्जाम पास करने होते हैं, जिसके बाद वो एडवोकेट बन सकता है।

       अब आते हैं एडवोकेट - अधिवक्ता - अभिभाषक - वकील पर तो ये सब एक ही होते हैं -

   अधिवक्ता, अभिभाषक या वकील (एडवोकेट advocate) के अनेक अर्थ हैं, परंतु हिंदी में ऐसे व्यक्ति से है जिसको न्यायालय में किसी अन्य व्यक्ति की ओर से उसके हेतु या वाद का प्रतिपादन करने का अधिकार प्राप्त हो। अधिवक्ता किसी दूसरे व्यक्ति के स्थान पर (या उसकी तरफ से) दलील प्रस्तुत करता है।

प्रस्तुति 

शालिनी कौशिक 

      एडवोकेट 

कैराना (शामली) 

लोक अदालत का आज की न्याय व्यवस्था में स्थान

Written By Shalini kaushik on रविवार, 19 मार्च 2023 | 9:09 am



 राजस्थान हाइकोर्ट द्वारा अपने निर्णय 

 "श्याम बच्चन बनाम राजस्थान राज्य एस.बी. आपराधिक रिट याचिका नंबर 365/2023" में यह स्पष्ट किया गया है कि लोक अदालतों के फैसले पक्षकारों की आपसी सहमति पर ही दिए जा सकते हैं. 

    राजस्थान हाईकोर्ट ने माना कि लोक अदालतों के पास कोई न्यायनिर्णय शक्ति नहीं है और केवल पक्षकारों के बीच समझौते के आधार पर अवार्ड दे सकती है।

अदालत के सामने यह सवाल उठाया गया कि क्या विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अध्याय VI के तहत लोक अदालतों के पास न्यायिक शक्ति है या केवल पक्षकारों के बीच आम सहमति पर निर्णय पारित करने की आवश्यकता है।

अदालत ने कहा,

"उपर्युक्त प्रावधानों का एकमात्र अवलोकन यह स्पष्ट करता है कि जब न्यायालय के समक्ष लंबित मामला (जैसा कि वर्तमान मामले में) को लोक अदालत में भेजा जाता है तो उसके पक्षकारों को संदर्भ के लिए सहमत होना चाहिए। यदि कोई एक पक्ष केवल इस तरह के संदर्भ के लिए न्यायालय में आवेदन करता है तो दूसरे पक्ष के पास न्यायालय द्वारा निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए पहले से ही सुनवाई का अवसर होना चाहिए कि मामला लोक अदालत में भेजने के लिए उपयुक्त है।

पक्षकारों के बीच समझौता होने पर ही अधिनिर्णय दिया जा सकता है और यदि पक्षकार किसी समझौते पर नहीं पहुंचते हैं तो लोक अदालत अधिनियम की धारा 20 की उप-धारा (6) के तहत मामले को न्यायालय के समक्ष वापस भेजने के लिए बाध्य है।"

इस प्रकार यह माना जा सकता है कि लोक अदालतों के पास कोई न्यायिक शक्ति नहीं है किन्तु जो शक्ति लोक अदालत अपने पास रखती है वह बेहद महत्वपूर्ण है. पक्षकारों की आपसी सहमति पर आधारित लोक अदालतों के निर्णय एक डिक्री की तरह होते हैं और यही कारण है कि लोक अदालतों के निर्णय के खिलाफ कोई अपील किसी भी अन्य न्यायालय में पेश नहीं की जा सकती है. 

    उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण निःशुल्क कानूनी सहायता के क्षेत्र में प्रयासरत है.  लोक अदालतों को निःशुल्क कानूनी सहायता का एक बहुत ही सशक्त माध्यम कहा जा सकता है. जिसमें अदालतों द्वारा विवादग्रस्त मामलों को पक्षकारों की आपसी सहमति से निबटा कर मुकदमों के बोझ को तो हल्का किया ही जा रहा है साथ ही, पक्षकारों पर न्याय प्राप्ति के लिए महंगी पड़ रही न्याय व्यवस्था को भी सस्ता करने का प्रयास किया जा रहा है. अदालतों में लम्बित मुकदमों की भरमार को देखते हुए लोक अदालतों की संख्या में बढ़ोतरी की जा रही है और उनमें न केवल पहले से ही दायर मुकदमे वरन ऐसे सभी विवाद भी जो अभी न्यायालय के समक्ष नहीं आए हैं, प्री लिटिगेशन के आधार पर निबटाने के प्रयास जारी हैं और इसी को देखते हुए विशेष लोक अदालतों का आयोजन भी किया जा रहा है जिनमे चेक बाउंस, बैंक वसूली, नगरपालिका के संपत्ति कर आदि मामले निबटाये जा रहे हैं. 

प्रस्तुति

शालिनी कौशिक 

         एडवोकेट

रिसोर्स पर्सन 

जिला विधिक सेवा प्राधिकरण 

शामली 


तुलसीदास का पुरूष अहं भारी

Written By Shalini kaushik on मंगलवार, 7 फ़रवरी 2023 | 4:10 pm

 एक संस्कृत उक्ति है -

"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता."
      किन्तु केवल पुस्तकों और धर्म शास्त्रों तक ही सिमट कर रह गई है यह उक्ति. सदैव से स्त्री को पुरुष सत्ता के द्वारा दोयम दर्जा ही प्रदान किया जाता रहा है. धर्म शास्त्रों ने पुरुष के द्वारा किसी भी धार्मिक अनुष्ठान को उसकी धर्मपत्नी के अभाव में किए जाने की स्वीकृति नहीं दी और इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमने श्री राम द्वारा अश्वमेघ यज्ञ के समय उनके वामांग देवी सीता की विराजमान मूर्ति के रूप में देखा है. हमने अपने बाल्यकाल में गार्गी, अपाला जैसी विदुषियों का मुनि याज्ञवल्क्य जैसे महर्षि से शास्त्रार्थ के विषय में भी पढ़ा है किन्तु धीरे धीरे नारी को दबाने का चलन बढ़ा और इसके लिए ढाल बने महाकवि तुलसीदास, जिन्होंने श्री रामचरितमानस में लिख दिया 
           "ढोल, गँवार, शूद्र, पशु, नारी - 
                     ये सब ताड़न के अधिकारी" 


      अब तुलसीदास जी के इस लिखे को पढ़े लिखों ने अपने हिसाब से, अनपढ़ों ने अपने हिसाब से, पुरूष समुदाय ने अपने दिमाग से, नारी वर्ग ने अपने दिल से, सभ्य समाज ने सभ्यता की सीमाओं में, असभ्य - अभद्र लोगों ने मर्यादा की सीमाएं लाँघकर वर्णित किया, किंतु सबसे ज्यादा मार पड़ी नारी जाति पर, जिसका योगदान महाकवि के द्वारा रचित पवित्र पुण्य महाकाव्य श्री रामचरित मानस में सर्वाधिक था और उसी नारी जाति के लिए महाकवि दो शब्द धन्यवाद के लिखने के स्थान पर यह कई अर्थ भरी उक्ति लिख गए. अब नारी जाति का श्री रामचरित मानस लिखने मे क्या योगदान है, यह भी समझ लिया जाना चाहिए -
      बाल्यकाल से ही तुलसी के जीवन में संघर्ष रहा, माता पिता का सुख तो कभी नहीं मिला क्योंकि वे मूल् नक्षत्र में पैदा हुए थे और पैदा होते ही उनकी माता जी के स्वर्गवास होने पर पिता ने उन्हें त्याग दिया था. मामा के घर रहे वहां  शिक्षा का समय आ गया, वह भी पूरी कर ली। लेकिन जब इनका विवाह बनारस की एक बड़ी सुंदर स्त्री, रत्नावली से हुआ, पहली बार अपना परिवार पाया, तो पत्नी के प्रति आसक्ति कुछ अधिक ही हो गई। एक बार पत्नी मायके गई, अब पत्नी से मिलने की इच्छा में रात में ही पत्नी से मिलने पहुँच गए, द्वार बंद पाया तो पत्नी तक पहुंचने के लिए तेज बारिश में साँप को रस्सी समझकर उसे ही पकड़कर ऊपर चढ़ गए. पत्नी रत्नावली ने पति को ऐसे आया देखा तो उसे पति तुलसीदास पर बहुत क्रोध आया और उसने जो कहा वह पति तुलसीदास के लिए प्रभु का संदेश बन गया 
       "लाज न आवत आपको, 
             दौरे आयहू साथ, 
       धिक-धिक ऐसे प्रेम को 
          कहा कहहुं मैं नाथ. 
      अस्थि चर्ममय देह मम 
          ता में ऐसी प्रीती 
      तैसी जो श्रीराम में 
          कबहु न हो भव भीती." 



     अर्थात तुलसीदास जी से उनकी पत्नी कहती हैं, कि आपको लाज नहीं आई जो दौड़ते हुए मेरे पास आ गए।
हे नाथ! अब मैं आपसे क्या कहूँ। आपके ऐसे प्रेम पर धिक्कार है। मेरे प्रति जितना प्रेम आप दिखा रहे हैं उसका आधा प्रेम भी अगर आप प्रभु श्री राम के प्रति दिखा देते, तो आप इस संसार के समस्त कष्टों से मुक्ति पा जाते. 
इस हाड़-माँस की देह के प्रति प्रेम और अनुराग करने से कोई लाभ नहीं। यदि आपको प्रेम करना है, तो प्रभु श्री राम से कीजिए, जिनकी भक्ति से आप संसार के भय से मुक्त हो जाएंगे और आपको मोक्ष की प्राप्ति हो जायेगी।" 
          और पत्नी रत्नावली का यह कहना मात्र ही तुलसीदास जी के जीवन का ध्येय बन गया और उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन चरित पर आधारित युगान्तरकारी कालजयी ग्रंथ श्री रामचरित मानस की रचना की किन्तु अपने पुरुष अहं को ऊपर रखते हुए पत्नी - नारी रत्नावली का धन्यवाद अर्पित नहीं किया और लिख गए नारी को ताड़न की अधिकारी - जिसे भले ही सभ्य समाज कितना सही रूप में परिभाषित कर नारी के पक्ष में प्रचारित कर ले, असभ्य-अभद्र समाज नारी की ताड़ना करता ही रहेगा नारी को अपमानित करता ही रहेगा क्योंकि भले ही लव कुश ने अपनी माता सीता का सच्चरित्र अयोध्या वासियों के सामने रख दिया हो, भले ही महर्षि वाल्मीकि ने रामायण का सुखद अंत किए जाने की चेष्टा में अपना सारा पुण्य ज्ञान लगा दिया हो किन्तु माता सीता को तो धरती माँ की गोद में हो समाना पड़ा था. इसलिए महाकवि तुलसीदास जी का पुरुष अहं नारी समुदाय पर सदैव भारी हो पड़ेगा. 
शालिनी कौशिक 
      एडवोकेट 
कैराना (शामली) 



श्री राहुल गांधी - एक महान राष्ट्रनायक

Written By Shalini kaushik on सोमवार, 26 दिसंबर 2022 | 5:49 pm

 



        श्री राहुल गांधी जी आज भारत में कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक आम भारतीयों के दिलों में एक गहरी छाप छोड़ चुके हैं. भारत जोड़ो यात्रा के माध्यम से राहुल गांधी ने भारत को तोड़ने का इरादा रखने वालों के दिलों को बहुत तगड़ा झटका दिया है और इसी कारण राहुल गांधी जी के विरोधी कभी राहुल गांधी द्वारा महिलाओं, ल़डकियों से हाथ मिलाने को लेकर उन पर कटाक्ष करते हैं तो कभी यात्रा में मात्र सुरक्षा कर्मियों की मौजूदगी बताकर राहुल गांधी जी के भारत जोड़ने के प्रयास की हँसी उड़ाते हैं ऊपर से गोदी मीडिया के द्वारा भरसक कोशिश की जाती है कि भारत जोड़ो यात्रा को भारत में कोई प्रचार न मिले किन्तु आज भारत जोड़ो यात्रा एक क्रांति बन चुकी है और इतिहास गवाह है कि क्रांति कभी दबाई नहीं जा सकती है बल्कि क्रांति को जितना दबाया जाता है वह उतना ही रौद्र रूप लेकर उभरती है. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम इसकी गवाही देता है और आज भारत जोड़ो यात्रा भी एक ऐसी ही क्रांति बन गई है जिसमें कॉंग्रेस पार्टी के युवा नेता पूर्व कॉंग्रेस अध्यक्ष श्री राहुल गांधी जी ने अपनी पूरी जीवन शक्ति लगा दी है.

                  कन्याकुमारी से आरंभ होकर भारत जोड़ो यात्रा जैसे ही उत्तर की ओर बढ़ी, सियासी हल्कों में हलचल आरंभ हो गई और राजस्थान में उमड़ पड़े जनसमुदाय ने राहुल गांधी जी के विरोधियों में आग सी लग गई और शुरू हो गई कोरोना के फैलने की खबरें. जिस भारत जोड़ो यात्रा में अब तक विरोधियों के अनुसार इक्का-दुक्का ही लोग आ रहे थे उसे रोकने के लिए स्वास्थ्य मंत्री राहुल गांधी जी को भारत जोड़ो यात्रा रोकने के लिए पत्र लिखने बैठ गए.

      यही नहीं राहुल गांधी जी की राष्ट्रीयता यहीं पर नहीं रुकी बल्कि यात्रा के दिल्ली आने पर वे सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों के समाधि स्थल पर गए और यहां उन्होंने एक बार फिर दिखा दिया कि उनमें है वह भावना-जो एक सच्चे और महान राष्ट्रनायक में होनी चाहिए.

      राहुल गांधी सर्वप्रथम अपने पिता और देश के सातवें प्रधान मंत्री स्व श्री राजीव गांधी जी की समाधि स्थल वीर भूमि पर गए, इंदिरा गांधी जी की समाधि शक्ति स्थल, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि राजघाट, पंडित नेहरू की समाधि शांति वन, लाल बहादुर शास्त्री जी की समाधि विजय घाट, चौधरी चरण सिंह जी की समाधि स्थल किसान घाट पर गए, पर यह कोई महान कार्य नहीं था क्योंकि ये सभी कॉंग्रेस पार्टी के आदर्श चरित्र और नेता रहे हैं, राहुल गांधी जी की महानता कही जाएगी उनका भाजपा नेता और पूर्व प्रधानमंत्री स्व अटल बिहारी वाजपेयी जी की समाधि स्थल सदैव अटल पर जाकर पुष्पांजलि अर्पित करना. ऐसा नहीं है कि स्व अटल बिहारी वाजपेयी जी उनकी श्रद्धांजली के पात्र नहीं थे, अटल बिहारी वाजपेयी जी सदैव भारतीयों के हृदय में सम्मान के पात्र हैं और रहेंगे किन्तु देश के लिए अपना सर्वस्व अर्पित करने वाले पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी जी क्या भाजपाई प्रधानमंत्री और भाजपाई राष्ट्रपति के द्वारा सम्मान के पात्र नहीं होने चाहिए. वर्तमान और  वर्ष 2000 के बाद का देश का इतिहास गवाह है भाजपा द्वारा बनाए गए पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी जी के जयंती और पुण्यतिथि के अवसर पर देश में कहीं और का प्रवास कार्यक्रम तय कर लेते थे और इनकी समाधि स्थल पर जाकर अपनी पुष्पांजलि अर्पित नहीं करते थे और यही रवैय्या भाजपा के वर्तमान नेतृत्व का है जो देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले कॉंग्रेस पार्टी के इन महान प्रधानमंत्रियों की जयंती और पुण्यतिथि पर ट्विटर पर ट्वीट द्वारा ही अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं.

        ऐसे में, एक राष्ट्रनायक वही होना चाहिए जो दलगत राजनीति से परे रहता हो, केवल राष्ट्र का सम्मान ही सर्वोपरि रखता हो और कॉंग्रेस पार्टी से जुड़े होने पर भी राहुल गांधी के द्वारा भाजपा के पूर्व प्रधानमंत्री स्व श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की समाधि पर जाकर पुष्पांजलि अर्पित करना उन्हें राष्ट्रनायक की छवि प्रदान करता है और एक आम भारतीय आज उनमें अपने भारत राष्ट्र का महान नायक होने का अक्स देख रहा है. राहुल गांधी जिंदाबाद 🇮🇳

शालिनी कौशिक

 एडवोकेट 

कैराना (शामली) 


हिन्दू बड़े दिलवाले - Marry Christmas 🌲🌹🌲

Written By Shalini kaushik on शनिवार, 24 दिसंबर 2022 | 2:35 pm

   


 व्हाटसएप और ट्विटर पर आज राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में लगभग हर किसी के खाते नज़र आते हैं और इसीलिए मन की हर बात को इन पर साझा किया जाना एक आम चलन बनता जा रहा है और इसी कारण ये अकाउंट सामाजिक सौहार्द और भारतीय संस्कृति के लिए काफी हद तक, अगर सच ही कहा जाए तो, खतरनाक बनते जा रहे हैं. 

     पिछले कुछ दिनों से ट्विटर और व्हाटसएप के स्टेटस पर 25 दिसंबर के लिए कट्टर हिन्दुत्व, स्वयंसेवक बनने और तुलसी पूजन जैसे संदेश प्रसारित किए जा रहे हैं और वह मात्र इसलिए कि 25 दिसंबर को ईसाई धर्मावलंबियों का पवित्र त्यौहार "क्रिसमस" मनाया जाता है. ऐसी ट्वीट, ऐसे स्टेटस एक चिंता सी पैदा कर रहे हैं कि क्या यही लिखा है हमारे महान भारत की महान संस्कृति में कि हम दूसरे की खुशियों में आग लगाने का कार्य करें. वह संस्कृति जो कबीरदास की पन्क्तियों में हमें प्रेरित करती है 

"ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोए, 

  औरन को सीतल करे, आपहु सीतल होय." 

      आज उसी भारतीय संस्कृति को मैला करने का, दूषित करने का आगाज हो रहा है और यह कहना भी देरी ही होगी कि आज ऐसा करना आरंभ किया गया है जबकि बीते भारत के कुछ साल एक खास वर्ग इसी साज़िश को अंजाम दे रहा है जिससे निबटने के लिए देश के एक प्रमुख राजनेता श्री राहुल गांधी जी ने कन्याकुमारी से कश्मीर तक भारत जोड़ो यात्रा की सफल शुरूआत की है. 

       भारतीय संस्कृति के महान विद्वान् डाॅ. रामधारी सिंह जी दिनकर ने भारतीय संस्कृति की व्याख्या करते हुए लिखा है, कि भारतीय संस्कृति का महत्व स्वयं सिद्ध है। यह व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की धरोहर है। संस्कृति के वरदहस्त से ही हमारा राष्ट्र निरंतर प्रगति के पथ पर प्रशस्त है। भारतीय संस्कृति आंतरिक भावना है। इसके अंतर्गत व्यक्ति के आचार विचार उसके जीवन मूल्य, उसकी नैतिकता, संस्कार, आदर्श, शिक्षा, धर्म, साहित्य और कला का समावेश होता है अतः भारतीय संस्कृति एक व्यापक तत्व है। निश्चित ही भारतीय संस्कृति मानव की साधना की सर्वोत्तम परिणति है।"

‘‘भारतीय संस्कृति में धर्म की स्वीकृति है, किन्तु धर्म किसी संकीणर्ता या अंधविश्वास का पर्याय नहीं है।’’ वर्तमान समय ही नहीं बल्कि प्राचीनकाल से ही भारतीय संस्कृति का आधार धार्मिक एकता व सहिष्णुता रहा है। राम, कृष्ण, शिव तथा बुद्ध, महावीर इत्यादि की मान्यताओं के अलावा भारत में देवी-देवताओं की संख्या अनगिनत है। फिर भी इनकी विचारधाराओं में एकता का मूल है, क्योंकि विभिन्न रूप स्वीकार करने पर भी एक-ईश्वर में भारतीय मानस का विश्वास सुदृढ़ है। 

ऋग्वदे की प्रसिद्ध ऋचा - ‘एक सद्धिप्रा बहुधा वदन्ति’ के अनुसार एक शक्ति के स्वरूप अनेक है। सगुण रूप मे इष्टदेव के नामभेद होने पर भी निराकार ब्रह्म की सत्ता सब हिन्दू मतो में मान्य है। अहिंसा, दया, तप आदि सभी गृहस्थ और वैराग्य धर्मों का सिद्धान्त है। चाहे वे बौद्ध, जैन या वैष्णव किसी भी मत के मानने वाले हों। 

भारतीय संस्कृति मे सहनशीलता का भी बड़ा विशिष्ट गुण है। इसी का परिणाम है कि देश में अनेक जातियाँ और धर्मों के लोग आपस में मिलजुल कर रहते हैं फिर भी भारतीय संस्कृति विलीन नहीं हुई है। आदान-प्रदान की प्रक्रिया द्वारा भारतीय संस्कृति अपने स्वरूप को संजोये हुए ‘अनेकता में एकता’ की स्थापना प्रकट करती है। भारत की धर्म परायणता से न तो इस्लाम को ठेस पहुँची और न ईसाईयत को कोई हानि हुई। हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई भारत में केवल एक धर्म ही नहीं हैं बल्कि भारत की पहचान के चार मजबूत स्तंभ हैं. धर्म और अध्यात्म द्वारा भारतीय संस्कृति जन-जीवन को आश्वस्त बनाने में सफल हैं। 

        भारतीय संस्कृति के इस गुण को बताते हुए पृथ्वी कुमार अग्रवाल लिखते हैं - ‘आपसी भेद का कारण भारतीय संस्कृति में धर्म कभी नहीं बन सका। एक-दो उदाहरण हो तो उसके मूल में अन्य तथ्य प्रमुख है। संस्कृति की एक विशेषता को न केवल विचारक दार्शनिकों ने स्थापित किया, बल्कि राजनयिकों और सम्राटो ने भी समझा। 

स्वयं अशोक का कथन है कि उसने धार्मिक मेल-जोल को बढ़ावा देने का सफल प्रयत्न किया है। इस सहिष्णुतापूर्ण समन्वय भावना को मुगल बादशाह अकबर ने भी स्वीकार किया और तदनुसार इस्लाम जैसा विपरीत मत भी भारतीयता का अंग बन गया।’ विश्व इतिहास में हम धर्म के नाम पर अनेक अत्याचारों का होना पाते हैं। यूनान में सुकरात, फिलिस्तीन में ईसा मसीह को बलि होना पड़ा। परन्तु भारतीय संस्कृति में हिंसा धर्मान्धता के वशीभूत नही हुई। सहिष्णुता भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है।

   खुली दृष्टि और ग्रहण शीलता भारतीय संस्कृति का एक मन्त्र है। बाह्य संस्कृतियों और जातियों से आदान-प्रदान प्रभावों को आत्मसात करना, नए लक्ष्य की प्राप्ति आदि उसी विचारधारा के अंग है। सामाजिक व्यवस्था की उदारता और ग्रहण क्षमता उसके लक्षण है। डॉ विजयेन्द्र स्नातक लिखते हैं कि भारतीय संस्कृति का मूलाधार - ‘‘जीयो और जीने दो है। हमारी संस्कृति की यही खुली विचारधारा है। समय-समय पर अनेक जातियाँ भारतवर्ष में आकर यही  घुल-मिल गई। राजनीतिक विजय के बावजूद भी ये भारत की संस्कृति पर विजय नहीं पा सकी। इनकी अच्छी विचारधारा को भारतीय संस्कृति ने अपने अन्दर समाहित कर लिया।

इसी प्रकार की विचारधारा को दिनकर जी ने भी व्यक्त किया है - ‘भारतीय संस्कृति में जो एक प्रकार की विश्वसनीयता उत्पन्न हुई, वह संसार के लिए सचमुच वरदान है। इसके लिए सारा संसार उसका प्रशंसक रहा है। निःसंदेह वर्तमान में भी यही विचारधारा भारतीय संस्कृति को संपोषित कर रही है।

भारतवर्ष में भौगोलिक व सांस्कृतिक विविधता होते हुए भी यह देश अपनी एकता के लिए विख्यात है। इस देश को ’संसार का संक्षिप्त प्रतिरूप’ कहा गया है। यह धरती अनेक जनो वाली विविध भाषा, अनेक धर्म और यथेच्छ घरो वाली है। भाषा और धर्म देश में विविधता के आज भी लक्षण है। किन्तु वे एक सूत्रबद्ध है। भारतीय संस्कृति की ‘विविधता में एकता’ की विचारधारा पर रामधारी सिंह दिनकर लिखते हैं - ‘‘भारतवर्ष मे सभी जाति मिलकर एक अलग समाज का निर्माण करती हैं जैसे - कई प्रकार की औषधियों को कड़ाही में डालकर जब काढ़ा बनाते हैं तब उस काढ़ा  का स्वाद दूर एक औषधि के अलग स्वाद से सर्वथा भिन्न हो जाता है। असल में उस काढ़ा  का स्वाद सभी औषधियों के स्वादों के मिश्रण का परिणाम होता है। 

     भारतीय संस्कृति ने विश्व की किसी भी संस्कृति को हेय दृष्टि से नहीं देखा है। किसी को भी स्वयं से तुच्छ आंकना हमारी संस्कृति में सिखाया ही नहीं गया है. इसने अन्य सभ्यताओं के गुणों को आत्मसात करने के साथ-साथ उनके अवगुणों का परिष्कार भी किया है। यह हमारी ही संस्कृति है जो सच्चाई के लिए अगर मिटना जानती है तो अपनों का साथ देने के लिए मिटा देना भी जानती है. शायद यही कारण है कि हमारी संस्कृति वर्तमान में भी ज्यो की त्यों अपनी प्रसिद्धि बनाये हुए हैं। इस प्रकार हमारी संस्कृति विश्व की ओजस्वी संस्कृति है।

      

       डाॅ. हरिनारायण दुबे ने भारतीय संस्कृति पर प्रकाश डालते हुए लिखा है, कि ‘‘भारतीय संस्कृति का प्राणतत्व आध्यात्मिक है। इसमें ऐहिक एवं भौतिक सुखों की तुलना में आत्मिक अथवा पारलौकिक सुख के प्रति आग्रह देखा जा सकता है। भारतीय संस्कृति में धर्मान्धता का कोई स्थान नहीं है। इस संस्कृति की मूल विशेषता यह रही है कि व्यक्ति अपनी परिस्थितियों के अनुरूप मूल्यों की रक्षा करते हुए कोई भी मत, विचार अथवा धर्म अपना सकता है।"

" भारतीय संस्कृति की महत्वपूर्ण विरासत इसमें अंतर्निहित सहिष्णुता की भावना मानी जा सकती है। यद्यपि प्राचीन काल से ही भारत में अनेक धर्म एवं सम्प्रदाय रहे हैं किंतु इतिहास साक्षी है कि धर्म के नाम पर अत्याचार और रक्तपात प्राचीन भारत में नहीं हुआ. इस प्रकार भारत भूमि का यह सतत् सौभाग्य रहा है कि यहां अनादिकाल से मानवमात्र को ही नहीं वरन प्राणिमात्र को एकता एवं भाईचारे की भावना में जोड़ने की प्रबल संस्कृति प्रवाहमान है।"

   महान् साहित्यकार कवि और विद्वान् श्री रवींद्रनाथ टैगोर के अनुसार ‘‘भारतीय संस्कृति की आध्यात्म और मानवता की भावना अनुकरणीय है। भारतीय संस्कृति का दृष्टिकोण उदार और विशाल है क्योंकि मूलतः उसका विकास प्रकृति के स्वच्छन्द वातावरण में और उसके साथ सहयोग करते हुए हुआ है। इसी कारण भारतीय संस्कृति में सहयोग समन्वय, उदारता तथा समझौते की प्रवृत्ति मूलरूप से विद्यमान है।"

       " डाॅ. एल. पी. शर्मा ने भारतीय संस्कृति की व्याख्या करते हुए उसकी निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख किया है-          

भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम् संस्कृति है। 

भारतीय संस्कृति में विविधता होते हुए भी एकता विद्यमान है। 

भारतीय संस्कृति में धार्मिक सहिष्णुता सदैव रही है।

 भारतीय संस्कृति एक धर्म प्रधान संस्कृति है। 

भारतीय संस्कृति सदैव प्रगतिशील रही है। 

भारतीय संस्कृति में भौतिक और आध्यात्मिक प्रगति का मिश्रण है। 

भारतीय संस्कृति में विश्व बंधुत्व की भावना निहित है। 

भारतीय संस्कृति की प्रकृति सहयोगात्मक है.   

       

           इस प्रकार, विश्व बंधुत्व का संदेश देने वाली, वसुधैव कुटुंबकम की भावना संजोने वाली भारतीय संस्कृति आज स्वार्थ की राजनीति का शिकार होकर क्या इतना नीचे गिर जाएगी कि दूसरे की खुशियों को आग लगाकर अपनी दुनिया को रोशन करेगी. जिस संस्कृति में अतिथि तक को देवता का स्थान दिया गया है, उस संस्कृति में अपनी आने वाली पीढ़ी को अपने भाइयों के ही साथ भेदभाव की सीख दी जाएगी. तुलसी पूजन दिवस कह कर हिन्दुओं की भावनाएं उद्वेलित करने वाले धर्म के ठेकेदारों ने क्या अभी कार्तिक माह के पूरे महीने में माँ तुलसी की आराधना नहीं की है और फिर तुलसी हमारे लिए पूजनीय पौधा है क्या इसके लिए हम मात्र 25 दिसंबर को ही चुनेंगे और वो भी इसलिए कि क्रिसमस पर एक ट्री को सजा कर ईसाई अपनी खुशियाँ मनाते हैं. क्यूँ छोटा कर रहे हैं हिन्दू अपने हृदय की विशालता को, जो साल भर सत्कार पाने वाली माँ तुलसी को एक क्रिसमस ट्री के समक्ष खड़ा कर छोटा कर रहे हैं. संता के रूप में ईसाईयों के छोटे मासूम बच्चों की मासूमियत को क्यूँ अपनी राजनीति के लिए अपमानित करने की कोशिश कर रहे हैं? कहाँ तो विद्यालयों में राजनीति के प्रवेश तक का विरोध किया जाता था और कहां आज सत्ता के लिए, अपनी राजनीति चमकाने के लिए छोटे छोटे मासूम बच्चों की मासूमियत को कट्टरता में बदलने की कोशिश की जा रही है. इस तरह खतम हो जाएगा ये बचपन, ये समाज, ये देश और इस तरह ये सारी सभ्यता. 

          इसलिए मत संकीर्ण कीजिए खुद की सोच को, खुद के दिल के दरवाजे बंद मत कीजिए, हवाओं को आने दीजिए और सामाजिक समरसता, धार्मिक सौहार्दपूर्ण वातावरण बना रहने दीजिए, हिन्दू धर्मावलंबियों ने अभी श्री कृष्ण जन्माष्टमी, नवरात्रि, विजयादशमी, दीपावली आदि बहुत से त्योहार मनाए हैं और उसमें अपने ईसाई, मुस्लिम, सिख भाई - बहनों से बहुत सी हार्दिक शुभकामनाएं प्राप्त की हैं. तो अब अपना भी दिल खुला रखिए और खुले दिल से अपने ईसाई भाई बहनों को भी क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनाएं प्रेषित कीजिए. 

🌲🌹HAPPY CHRISTMAS 🌹🌲

द्वारा 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली)






Founder

Founder
Saleem Khan