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पुरुषों का सम्मान और कानून

Written By Shalini kaushik on गुरुवार, 30 जून 2022 | 10:16 am

 


[False dowry case? Man kills self

Express news service Posted: Feb 07, 2008 at 0321 hrs
Lucknow, February 6 A 30-year-old man, Pushkar Singh, committed suicide by hanging himself from a ceiling fan at his home in Jankipuram area of Vikas Nagar, on Wednesday.In a suicide note, addressed to the Allahabad High Court, Singh alleges that he was framed in a dowry case by his wife Vinita and her relatives, due to which he had to spend time in judicial custody for four months.
The Vikas Nagar police registered a case later in the day.
“During the investigation, if we find it necessary to question Vinita, we will definitely record her statement,” said BP Singh, Station Officer, Vikas Nagar.
Pleading innocence and holding his wife responsible for the extreme step he was taking, Singh’s note states: “I was sent to jail after a false dowry case was lodged against me by Vinita and her family, who had demanded Rs 14 lakh as a compensation. Neither my father nor I had seen such a big amount in our lives. We even sold our house to contest the case.”
According to reports, Singh married Vinita about two years ago and lived in Allahabad since.
Early last year, his wife left him and started living with her family.
A case under Sections 323 (voluntarily causing hurt), 498 (A) (cruelty by husband or relatives of husband) and 504 (intentional insult) was lodged by Vinita and her relatives before she left him.
In the note, Singh wrote he was in the Naini Central Jail from “September 29 to December 24, 2007”.
Shishupal Singh, Singh's brother-in-law, said he was disturbed ever since he released from jail. The court case constantly haunted him.
“After he was bailed out, he was living with his mother, younger sister and a physically-challenged brother in a rented house in Jankipuram.” The family had their own house in Indira Nagar, which was recently sold to meet the legal expenses, he added.
“While he searched for a job, he drove a three-wheeler for a living. A few days ago, he received a notice from the court and since then, he stopped stepping out of the house,” he said.
In the note, Singh further wrote: “I would also like to request Vinita not to harass my family in future. It was my mistake to marry her and I am repenting it by sacrificing my life.”]

''मुझे दहेज़ कानून की धारा ४९८-ए,३२३ और ५०४ के तहत जेल जाना पड़ा ,मेरी पत्नी विनीता ने शादी के 2 साल बाद हमारे परिवार के खिलाफ दहेज़ के रूप में 14 लाख रुपये मांगने का झूठा मुकदमा लिखाया था .इतनी रकम कभी मेरे पिता ने नहीं कमाई ,मैं इतना पैसा मांगने के बारे में कभी सोच भी नहीं सकता था ,मेरी भी बहने हैं ,इस मुक़दमे के चलते मेरा पूरा परिवार तबाह हो गया है ,हम आर्थिक तंगी के शिकार हो गए ,मकान बिक गया ,अब मैं ज़िंदा नहीं रहना चाहता हूँ ख़ुदकुशी करना चाहता हूँ ,मेरी मौत के लिए मेरी ससुराल के लोग जिम्मेदार होंगे .''
       ये था उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के जानकीपुरम सेक्टर -सी में रहने वाले पुष्कर सिंह का ख़ुदकुशी से पहले लिखा गया पत्र ,जिसे लिखने के बाद ६ फरवरी २००८ को पुष्कर ने फांसी का फंदा गले में डाल कर ख़ुदकुशी कर ली .
       दूरदर्शन पर प्रसारित धारावाहिक  'पवित्र बंधन 'में एक पात्र मीनाक्षी ,जो कि एक एडवोकेट है और धारावाहिक के नायक गिरीश रॉय चौधरी की मृतक पत्नी की सहेली ,वह गिरीश राय चौधरी से एकतरफा पागलपन की हद तक प्यार करती है और उसे पाने के लिए किसी भी हद तक गुज़र जाने को तैयार है .अपने इस प्रयास में विफल रहने पर वह स्वयं को चोटें मारती है ,स्वयं के कपडे फाड़ती है और पुलिस लेकर पहुँच जाती है गिरीश राय चौधरी के घर ,ये इलज़ाम लेकर कि गिरीश ने उसके साथ 'बलात्कार का प्रयास किया है '.
     ये दोनों ही मामले ऐसे हैं जो संविधान द्वारा दिए गए प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण के मूल अधिकार से एक हद तक पुरुष जाति को वंचित करते हैं .पुरुषों ने महिलाओं पर अत्याचार किये हैं ,उनके साथ बर्बर व्यवहार किये हैं किन्तु ये आंकड़ा अधिकांशतया होते हुए भी पूर्णतया के दायरे में नहीं आता .अधिकांश पुरुषों ने अधिकांश महिलाओं के जीवन को कष्ट पहुँचाया है किन्तु इसका तात्पर्य यह तो नहीं कि सभी पुरुषों ने महिलाओं को कष्ट पहुँचाया है .अधिकांश महिलाएं पुरुषों के द्वारा पीड़ित रही हैं किन्तु इस बात से ये तो नहीं कहा जा सकता कि सभी महिलाएं पुरुषों के द्वारा पीड़ित रही हैं और इसीलिए अधिकांश के किये की सजा अगर सभी को दी जाती है तो ये कैसे कहा जा सकता है कि संविधान द्वारा सभी को जीने का अधिकार दिया जा रहा है .जीने का अधिकार भी वह जिसके बारे में स्वयं संविधान के संरक्षक उच्चतम न्यायालय ने मेनका गांधी बनाम भारत संघ ए.आई.आर.१९७८ एस.सी.५९७ में कहा है -
''प्राण का अधिकार केवल भौतिक अस्तित्व तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसमें मानव गरिमा को बनाये रखते हुए जीने का अधिकार है .''
 फ्रेंसिसी कोरेली बनाम भारत संघ ए.आई.आर.१९८१ एस.सी. ७४६ में इसी निर्णय का अनुसरण करते हुए उच्चतम न्यायालय  ने कहा -''अनुच्छेद २१ के अधीन प्राण शब्द से तात्पर्य पशुवत जीवन से नहीं वरन मानव जीवन से है इसका भौतिक अस्तित्व ही नहीं वरन आध्यात्मिक अस्तित्व है .प्राण का अधिकार शरीर के अंगों की संरक्षा तक ही सीमित नहीं है जिससे जीवन का आनंद मिलता है या आत्मा वही जीवन से संपर्क स्थापित करती है वरन इसमें मानव गरिमा के साथ  जीने का अधिकार भी सम्मिलित है जो मानव जीवन को पूर्ण बनाने के लिए आवश्यक है .''
     और ऐसे मामले जहाँ कानून से मिली छूट के आधार पर शादी के सात साल के अंदर के विवाह को दहेज़ से जोड़ देना और नारी के द्वारा स्वयं ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करने पर पुरुष से धिक्कार पाने पर उसे बलात्कार के प्रयास का रूप दे दिया जाना सीधे तौर पर पुरुष की गरिमा पर ,जीने के अधिकार पर हमले कहें जायेंगें क्योंकि इन मामलों में नारी का पक्ष न्यायालय के सामने मजबूत रहता है और एक यह पक्ष भी न्यायालय के सामने रहता है कि नारी ऐसे मामलों में शिकायत की पहल नहीं करती है और इसका खामियाजा पुरुषों को भुगतना पड़ता है .ऐसे मामलों में सबूतों ,गवाहों की कमी यदि महिलाओं को रहती है तो पुरुषों को भी इसका सामना करना पड़ता है और अपने मामलों को साबित करना दोनों के लिए ही कठिन हो जाता है किन्तु महिला के लिए न्यायालय का कोमल रुख यहाँ पुरुषों के लिए और भी बड़ी कठिनाई बन कर उभरता है .यूँ तो अधिकांशतया नारियों पर ही अत्याचार होते हैं किन्तु जहाँ एक तरफ ख़राब चरित्र के पुरुष हैं वहीँ ख़राब चरित्र की नारियां भी हैं और इसका फायदा वे ले जाती हैं क्योंकि ख़राब चरित्र का पुरुष ऐसे जाल में नहीं फंसता वह पहले से ही अपने बचाव के उपाय किये रहता है जबकि अच्छे चरित्र का पुरुष उन बातों के बारे में सोच भी नहीं पाता जो इस तरह की तिकड़मबाज नारियां सोचे रहती हैं और अमल में लाती हैं .
       जैसे कि हमारे ही एक परिचित के लड़के से ब्याही लड़की विवाह के कुछ समय तो अपनी ससुराल में रही और बाद में अपने मायके चली गयी और वहां से ये बात पक्की करके ही ससुराल में आई कि लड़का ससुराल से अलग घर लेकर रहेगा .लड़के के अलग रहने पर वह आई और कुछ समय रही और बाद में एक दिन जब लड़का कहीं बाहर गया था तो घर से अपना सामान उठाकर अपने भाइयों के साथ चली गयी और अपने घर जाकर अपने पति पर दहेज़ का मुकदमा दायर कर दिया ,सबसे अलग रहने के बावजूद घर के अन्य सभी को भी पति के साथ ४९८-ए के अंतर्गत क्रूरता के घेरे में ले लिया .स्थिति ये आ गयी कि लड़के के मुंह से यह निकल गया -''कि बस अब तो ऊपर जाने के मन करता है .''वह तो बस भगवान की कृपा कही जाएगी या फिर उसके घरवालों का साथ कि अपनी कोई जमीन बेचकर उन्होंने लड़की वालों को १० लाख रूपये दिए और लड़के को ख़ुदकुशी और खुद को जेल जाने से बचाया किन्तु अफ़सोस यही रहा कि कानून कहीं भी साथ में खड़ा नज़र नहीं आया .
        ऐसे ही ये बलात्कार या बलात्कार का प्रयास का आरोप है जिसमे या तो लम्बी कानूनी कार्यवाही या लम्बी जेल और या फिर ख़ुदकुशी ही बहुत सी बार निर्दोष चरित्रवान पुरुषों का भाग्य बनती है .हमारी जानकारी के ही एक महोदय का अपनी संपत्ति को लेकर एक महिला से दीवानी मुकदमा चल रहा है और वह महिला जब अपने सारे हथकंडे आज़मा कर भी उन्हें मुक़दमे में पीछे न हटा पायी तो उसने वह हथकंडा चला जिसे सभ्य समाज की कोई भी महिला कभी भी नहीं आज़माएगी .उसने इन महोदय के एकमात्र पुत्र पर जो कि उससे लगभग १५ साल छोटा होगा ,पर यह आरोप लगा दिया कि उसने मेरे घर में घुसकर मेरे साथ 'बलात्कार का प्रयास 'किया .वह तो इन महोदय का साथ समाज के लोगों ने दिया और कुछ राजनीतिक रिश्तेदारी ने जो इनका एकमात्र पुत्र जेल जाने से बच गया और उसका जीवन तबाह होने से बच गया किन्तु कानून के नारी के प्रति कोमल रुख ने इस नारी के हौसलों को ,जितने दिन भी वह इन्हें इस तरह परेशान रख सकी से इतने बुलंद कर दिए कि वह आये दिन जिस किसी से भी उसका कोई विवाद होता है उसे बलात्कार का प्रयास का आरोप लगाने की ही धमकी देती है और कानून कहीं भी उसके खिलाफ खड़ा नहीं होता बल्कि उसे और भी ज्यादा छूट देता है .भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा १४६[३] में अधिनियम संख्या ४ सं २००३ द्वारा परन्तुक अंतःस्थापित कर कानून ने ऐसी ही छूट दी है .जिसमे कहा गया है -
   [बशर्ते कि बलात्कार या बलात्कार करने के प्रयास के अभियोजन में अभियोक्त्री से प्रतिपरीक्षा में उसके सामान्य अनैतिक चरित्र के विषय में प्रश्नों को करने की  अनुज्ञा नहीं होगी .]
        क्या यही है कानून कि एक निर्दोष चरित्रवान मात्र इसलिए अपमानित हो ,जेल काटे कि वह एक पुरुष है .अगर बाद में कानूनी दांवपेंच के जरिये वह अपने ऊपर लगे आरोपों से मुक्ति पा भी लेता है तब भी क्या कानून उसके उस टुकड़े-टुकड़े हुए आत्मसम्मान की भरपाई कर पाता है जो उसे इस तरह के निराधार आरोपों से भुगतनी पड़ती है ?क्या ज़रूरी नहीं है ऐसे में गिरफ़्तारी से पहले उन मेडिकल परीक्षण ,सबूत ,गवाह आदि का लिया जाना जिससे ये साबित होता हो कि पीड़िता के साथ यदि कुछ भी गलत हुआ है तो वह उसी ने किया है जिस पर वह आरोप लगा रही है .ऐसे ही दहेज़ के मामले ,क्रूरता के मामले जिस तरह एकतरफा होकर महिला का पक्ष लेते हैं क्या ये कानून के अंतर्गत सही कहा जायेगा कि निर्दोष सजा पाये और दोषी खुला घूमता रहे .आज कितने ही मामलों में महिलाएं ही पहले घर वालों के द्वारा की गयी जबरदस्ती में शादी कर लेती हैं और बाद में उस विवाह को न निभा कर वापस आ जाती हैं और दहेज़ कानून का दुरूपयोग करती हैं .कानून को गंभीरता से इन मुद्दों को सुलझाने के लिए दोनों पक्षों के लिए सही व्यवस्था करनी ही होगी अन्यथा इस देश में मानव गरिमा के साथ जीने का अधिकार पुरुषों को भी है यह बात भूलनी ही होगी .

शालिनी कौशिक 
  (एडवोकेट) 

10 से 5 - कौन खरीदता /पीता शराब

Written By Shalini kaushik on रविवार, 26 जून 2022 | 10:00 am

 


       यूपी में आज नहीं मिलेगी शराब, सरकार ने घोषित किया ड्राई डे, आबकारी विभाग में अपर आयुक्त हरिश्चंद्र ने बताया कि आज ड्राई डे घोषित किया गया है, जिसके चलते शराब की दुकानों को सुबह 10 से शाम 5 बजे तक पूरी तरह से बंद रखा जाएगा. इसके अलावा सरकारी भांग की दुकानें भी आज पूरी तरह से बंद रखी जाएंगी. अगर उत्तर प्रदेश सरकार के इस आदेश की गुणवत्ता की जांच की जाए तो इसे शून्य प्रभावी ही कहा जाएगा क्योंकि शराब आज के पुरुष समाज की एक आवश्यक आवश्यकता के रूप में जगह बना चुकी है और यह एक आम चलन बन चुका है कि गरीब और मजदूर वर्ग का व्यक्ति दिन भर मजदूरी करता है और शाम होते ही चल देता है शराब की दुकान की तरफ, मयखाने की शरण में, शाम मतलब 5 बजे के बाद और शराब की दुकानों और मयखाने के खुलने के समय के बारे में तो हमारे महान कवि डॉ हरिवंशराय बच्चन भी अपनी विश्व प्रसिद्ध रचना " मधुशाला" तक में इशारा कर कह गए हैं -

"अंधकार है मधुविक्रेता, सुन्दर साकी शशिबाला
किरण किरण में जो छलकाती जाम जुम्हाई का हाला,
पीकर जिसको चेतनता खो लेने लगते हैं झपकी
तारकदल से पीनेवाले, रात नहीं है, मधुशाला।।"
               ऐसे में, जो कार्य आरंभ ही अंधेरे के आगाज से होता है उसके लिए दिन में दुकानों को बंद कर देने से" ड्राई डे " कैसे रहेगा. वास्तव में सरकार अगर नशा विरोधी मुहिम चलाने के लिए प्रतिबद्ध है तो कम से कम शराब की दुकानों और मयखाने के लिए एक सप्ताह का तो "लॉक डाउन" घोषित करे.

शालिनी कौशिक 
          एडवोकेट
कैराना (शामली) 


द्रौपदी मुर्मू - महिलाओं का गौरव

Written By Shalini kaushik on बुधवार, 22 जून 2022 | 10:35 am

  


आज भारत में बहुत परिवर्तन आये हैं. बहुत से परिवर्तन दुःखद हैं तो कुछ सुखद भी हैं और उन परिवर्तनों में सबसे बड़े परिवर्तन ये हैं कि आज भारत का वह समाज, जो हमेशा से हमारे आदिवासी समाज के अधिकार छीनने का कार्य करता था, आज वह उसे समाज में अग्रणी का अधिकार देने के लिए आगे आ रहा है और यही नहीं कि आदिवासी समाज को बल्कि आदिवासी समाज की महिला को देश का सर्वोच्च पद देने की तैयारी की जा रही है और वह भी उस दल द्वारा, जिसने कभी उच्च पद के लिए अपने दल की ही बहुत सी श्रेष्ठ व्यक्तित्व की धनी महिलाओं की अनदेखी की, वह भी मात्र इसलिए कि वे महिलाएं थी, पर आज ये परिवर्तन आ रहे हैं भले ही राजनीतिक लाभ लेने के लिए आ रहे हैं, किन्तु सुखद हैं क्योंकि इनसे सदियों से दबे कुचले आदिवासी समुदाय और महिलाओं को आगे बढ़कर अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए सुअवसर प्राप्त हो रहे हैं. एक संघर्षशील  महिला, आदिवासी समुदाय की महिला श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी को एनडीए का राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया गया है और जहां तक आज संसद में और भारतीय राज्यों की विधानसभाओं में एनडीए का प्रतिनिधित्व है, द्रौपदी मुर्मू जी का भारत का राष्ट्रपति चुना जाना लगभग तय है. ऐसे में, भले ही राजनीतिक लाभ के लिए, महिला सशक्तिकरण के एक और नए युग के आरंभ के लिए भारतीय जनता पार्टी, एनडीए का बहुत बहुत धन्यवाद और देश की आगामी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी और समस्त भारतीय महिलाओं को हार्दिक शुभकामनाएं.

शालिनी कौशिक

         एडवोकेट

कैराना (शामली) 

कर्मवीर पिता -स्व बाबू कौशल प्रसाद एडवोकेट - सादर नमन

Written By Shalini kaushik on शनिवार, 18 जून 2022 | 10:12 pm

 


झुका दूं शीश अपना ये बिना सोचे जिन चरणों में ,
ऐसे पावन चरण मेरे पिता के कहलाते हैं .
.......................................................
बेटे-बेटियों में फर्क जो करते यहाँ ,
ऐसे कम अक्लों को वे आईना दिखलाते हैं .
..........................................................
शिक्षा दिलाई हमें बढाया साथ दे आगे ,
मुसीबतों से हमें लड़ना सिखलाते हैं .
......................................................
मिथ्या अभिमान से दूर रखकर हमें ,
सादगी सभ्यता का पाठ वे पढ़ाते हैं .
......................................................
कर्मवीरों की महत्ता जग में है चहुँ ओर,
सही काम करने में वे आगे बढ़ाते हैं .
.....................................................
जैसे पिता मिले मुझे ऐसे सभी को मिलें ,
अनायास दिल से ये शब्द निकल आते हैं .
....................................
शालिनी कौशिक
(एडवोकेट)

बाल श्रम पर रोक लगे

Written By Shalini kaushik on रविवार, 12 जून 2022 | 9:59 am


”बचपन आज देखो किस कदर है खो रहा खुद को ,
उठे न बोझ खुद का भी उठाये रोड़ी ,सीमेंट को .”
........................................................................
”लोहा ,प्लास्टिक ,रद्दी आकर बेच लो हमको ,
हमारे देश के सपने कबाड़ी कहते हैं खुद को .”
.......................................................................
”खड़े हैं सुनते आवाज़ें ,कहें जो मालिक ले आएं ,
दुकानों पर इन्हीं हाथों ने थामा बढ़के ग्राहक को .”
...........................................................................
”होना चाहिए बस्ता किताबों,कापियों का जिनके हाथों में ,
ठेली खींचकर ले जा रहे वे बांधकर खुद को .”
.......................................................................
”सुनहरे ख्वाबों की खातिर ये आँखें देखें सबकी ओर ,
समर्थन ‘शालिनी ‘ का कर इन्हीं से जोड़ें अब खुद को .”
................................................................

शालिनी कौशिक
एडवोकेट 
कैराना 

भाग लें - पुरुस्कार जीतें-जय श्री राम 🙏🌹🙏

Written By Shalini kaushik on गुरुवार, 9 जून 2022 | 2:27 pm

 


श्री राम हम सनातन धर्मावलंबियों के आदर्श चरित्र हैं और मंदिर महादेव मारूफ शिवाला कांधला धर्मार्थ ट्रस्ट (रजिस्टर्ड) निरंतर प्रयासरत है सनातन धर्म के उच्च आदर्शों की स्थापना में - क्या आप मानते हैं श्री राम को आदर्श चरित्र - तो तुरंत उठाईये अपनी क़लम और पुरस्कार भी पाईये. 
#श्री_राम_आदर्श_चरित्र 
🙏🌹जय श्री राम 🌹🙏
प्रस्तुति 
शालिनी कौशिक एडवोकेट 

Written By yayawer on बुधवार, 8 जून 2022 | 12:21 pm

 "कुलदेवी कुलदेवता वर्णन"

पुस्तक के प्रष्ठ का अवलोकन 








कुलदेवी कुलदेवता वर्णन

यह पुस्तक महत्वपूर्ण और हर घर में रखने और सबके पढने लायक है, 

कुलदेवी व इष्टदेवी के रूप में ओसियां की महिषमर्दिनी स्वरूपा सच्चियाय माता, परमार उपलदा द्वारा ओसियां बसाने से लेकर परमार व सांखला वंश का माता सचियाय के साथ सम्बंध के बारे में विवरण दिया है।


साथ ही इसमें सच्चियायमाता कथामाहात्म्य भी पाठकों के लिये प्रस्तुत किया है। सांखला बंधुओं की परमार के रूप में उत्पति के समय प्रथम आराध्या देवी के रूप में कात्यायनी शक्तिपीठ माउंट आबू की अर्बुदादेवी-अधर माता और उनके मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथायें भी दी गई हैं। अर्बुदांचल की प्रतिरक्षक अधर देवी के मंदिर की प्राचीनता, देवी के अधर और पादुका आदि के बारे में बताया गया है। सांखलाओं की कुलदेवी के मंदिर आसोप के जाखळ माता मंदिर के बारे में पूर्ण जानकारी और साथ में रेण के जाखण माता मंदिर और यक्षिणी के बारे में जानकारी के साथ उनकी पूजा पद्धति के बारे में बताया गया है। पंवार वंश की इष्टदेवी उज्जैन की गढ़कालिका माँ हरसिद्धिभवानी और हमारे पूर्वज महान सम्राट विक्रमादित्य से जुड़ी कहानी बताई गई है।

प्रकाशक- कलम कला प्रकाशन, लाडनूं - ३४१३०६ 

पुस्तक का मूल्य- ५०० रुपैये 

एक दिन ..

Written By mridula pradhan on सोमवार, 6 जून 2022 | 1:48 pm

 एक दिन..

अकेली मैं उदास

बुलाने बैठी

आसमान में उड़ते हुए

चिड़ियों को 

चिड़ियों ने कहा-

'रात होनेवाली है

घर जाने की

जल्दी है'.

सूरज को गोद में लिए

पश्चिम की लाली से

बोली मैं

कुछ देर के लिए

मेरे पास

आओ तो 

'विदा करनी है

सूरज को,

कैसे आऊंगी इस वख्त

कहो तो?'..

थोड़ी ही देर बाद

आहट हुई

रात के आने की

दरवाज़े पर ही

खड़ी-खड़ी

रोकने लगी रात को

कि ठहर कर जाना 

'अभी-अभी आयी हूँ '

रात ने कहा-

'मुश्किल है इन दिनों

बरसता है शबनम

सारी-सारी रात

भींगने का मौसम है'..

चाँद से बोली

आओ सितारों के साथ

कुछ बात करें 

चाँद ने कहा-

'घूमना है तारों के साथ

आज की रात

कैसे बात करें?'..

फूलों,भौरों ,तितलियों ने

रचाया था उत्सव

स्वच्छंद  विचरते हुए

मेघ-मालाओं ने कहा-

'बरसना है अभी और'..

हवाओं को जाना था

खुशबू लेकर

दूर-दराज़..

नदियों,झीलों को

करनी थी अठखेलियाँ ..

और..पहाड़ पर जमी हुई

बर्फ़ ने कहा-

'बहुत दूर है तुम्हारा घर'..

झरनों से गिरता हुआ

कल-कल

दूबों पर फैली

हरियाली

ताड़,खजूर ,युक्लिप्टस

और चिनारों ने

सुना दी अपनी-अपनी..

और हारकर  कहा मैंने 

अपने मन से

तुम मेरे पास रहना..

'मुझे नहीं रहना'

झुँझलाकर बोला-

मेरा अपना ही मन

'मैं जा रहा  हूँ

बच्चों के पास 

आ जाऊँगा मिल-मिलाकर

'तुम यहीं रहो'..

लेकिन..कितने दिन हो गये

मन तो

लौटा ही नहीं..

मेरे बच्चों,

तुमलोग ऐसा करना

वापस भेज देना

समझा-बुझाकर मेरा मन

कि..मैं यहाँ

अकेली रह गयी हूँ..

योगी जी और पर्यावरण दिवस - गहरा नाता

Written By Shalini kaushik on रविवार, 5 जून 2022 | 8:15 am

माननीय मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश श्री योगी आदित्यनाथ जी और पर्यावरण दिवस का एक दूसरे से बहुत गहरा नाता है. संयुक्त राष्ट्र ने पर्यावरण के प्रति राजनीतिक और सामाजिक जागृति लाने के लिए पांच जून साल 1972 को विश्व पर्यावरण दिवस मनाने की घोषणा की. इस तरह दोनों का ही जन्म दिवस एक ही दिन, एक ही साल हुआ ये अलग बात है कि पर्यावरण दिवस पहली बार 5 जून 1974 को मनाया गया. आज हमारी धरती तप रही है और इस तपन का मुख्य असर हम अपने पेड़ पौधों पर देख सकते हैं, सुबह पानी से अच्छी सिंचाई के बाद भी वे शाम तक सूख जाते हैं, पनपने का तो सवाल ही नहीं है बस किसी तरह वे जिंदा ही बच जाएं. कारण इसके हम खुद हैं, सामान्य पँखों से काम नहीं चलता है अब हर किसी को ए सी चाहिए, एक बार बताइए सच्चे मन से - कितने ए सी वालों ने एक भी पौधा अपनी जिंदगी में इस धरती पर लगाया है. योगी आदित्यनाथ जी द्वारा हर साल लाखों पौधे लगाए जा रहे हैं हमारी धरती की रक्षा के लिए, क्या आपका कोई दायित्व नहीं है उस धरती के लिए जिस पर आपका घर बनता है, आपका परिवार रहता है. अगर कोई दायित्व स्वीकार करते हैं तो आगे आइए और कम से कम एक पौधा अवश्य लगाएं और धरती माँ का कर्ज चुकाएं और हाँ पौधा लगाते हुए अपना फोटो लेकर सोशल मीडिया पर अवश्य शेयर करें ताकि आप अन्यों की प्रेरणा का स्रोत बनें. 

    माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी को जन्म दिवस की और आप सभी को विश्व पर्यावरण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🙏

द्वारा

शालिनी कौशिक एडवोकेट

कैराना /कांधला

बीसीआई विचार करे

Written By Shalini kaushik on गुरुवार, 2 जून 2022 | 9:29 am

  


आश्चर्य है कि व्यापारी वर्ग सरकार से स्वयं के लिए विधान परिषद की सीट मांग सकता है, सांसद, विधायक की तरह वीआईपी का दर्जा मांग सकता है, हर शहर में एक चौक का नाम व्यापार शक्ति चौक करने की मांग कर सकता है और विद्धान कहे जाने वाले और देश की आजादी से लेकर आज तक देश को सर्वोत्कृष्ट विकास की राह पर पहुंचाने वाले अधिवक्ताओं का समुदाय अपने वर्चस्व और सम्मान को लेकर खामोशी अख्तियार कर रहा है. अब आए दिन वकीलों की हड़ताल को रोकने को लेकर माननीय सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट द्वारा नई से नई कार्यवाहियों की तैयारियां की जा रही हैं और इस पर भी बीसीआई खामोश रहता है. कोविड-19 के ख़तरनाक दौर में अधिवक्ताओं के आर्थिक सहयोग हेतु कोई मांग नहीं रखता है और वह भी उस स्थिति में जब अधिवक्ता वक़ालत के अलावा कोई अन्य व्यवसाय कर ही नहीं सकते. क्यूँ आज का अधिवक्ता समुदाय खामोश हो गया है? क्या आज वकीलों ने सरकार के इस तानाशाही रवैये को अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लिया है. इस पर माननीय बीसीआई द्वारा विचार किया जाना जरूरी है और वकीलों का मनोबल ऊंचा करने और सम्मान कायम रखने के लिए देश स्तरीय सम्मेलन और आंदोलन की राह पर आगे बढ़ना जरूरी है. क्योंकि
"तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने,
दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी ।
जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत
कल उनकी पीढ़ियां तक इस्तकबाल करेंगी."
 शालिनी कौशिक एडवोकेट
 कैराना


नारी का श्रृंगार तो पति है

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on शनिवार, 30 अप्रैल 2022 | 12:37 pm

BHRAMAR KA DARD AUR DARPAN: नारी का श्रृंगार तो पति है: नारी का श्रृंगार तो पति है पति पर जान लुटाए एक एक गुण देख सोचकर कली फूल सी खिलती जाए प्रेम ही बोती प्रेम उगाती नारी प्यारी रचती जाए *****
 नारी का श्रृंगार तो पति है
पति पर जान लुटाए
एक एक गुण देख सोचकर
कली फूल सी खिलती जाए
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
*****
प्रेम के वशीभूत है नारी
पति परमेश्वर पर वारी
व्रत संकल्प अडिग कष्टों से
सौ सौ जन्म ले शिव को पाए
कर सेवा पूजा श्रद्धा से
फूली नहीं समाए
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
*******
चाहत से मुस्काए गजरा
बल पौरुष से केश सजे
नेह प्रेम पर माथ की बिंदिया
झूम झूम नव गीत रचे
नैनों से पति के बतिया के
हहर हहर लव चूमे जाए
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
****
जहां समर्पण प्यार साथ है
नारी अद्भुत बलशाली
नही कठिन कुछ काज है जग में
सीता सावित्री या अपनी गौरी काली
मंगल सूत्र गले में धारे
मंगल लक्ष्मी करती जाये
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
******
निज बल अभिमान चूरकर
चरण वंदना में रत रहती
हो अथाह सागर भी घर में
त्याग _ प्रेम दिल लक्ष्मी रहती
विष्णु पालते जग को सारे
लक्ष्मी ममता ही बरसाए
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
******
पति के प्रेम की रची मेंहदी
देख भाग्य मुस्काती मन में
वहीं अंगूठी संकल्पों की
रहे चेताती सात वचन की
दंभ द्वेष पाखण्ड व छल से
दूर खड़ी, अमृत बरसाए
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
******
गौरी लक्ष्मी सीता पाए
सरस्वती का साथ निभाए
पुरुष भी क्यों ना देव कहाए??
क्यों ना वो जग पूजा जाए?
प्रकृति शक्ति की पूजा करके
निज गौरव नारी को माने
प्रेम ही बोती प्रेम उगाती
नारी प्यारी रचती जाए
*********
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 5
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश, भारत। 29.04.2022
3.33_4.33 पूर्वाह्न

कचहरी को बाजार न बनाया जाए

Written By Shalini kaushik on शनिवार, 23 अप्रैल 2022 | 12:21 pm

  



22 अप्रैल 2022 को सोनीपत कोर्ट परिसर में दिनदहाड़े गवाह वेद प्रकाश की हत्या हो जाती है और कहा जाता है कि हत्यारे पेशेवर नहीं थे, सतर्क होता तो बच सकती थी वेद प्रकाश की जान.

      ऐसा नहीं है कि न्यायालय परिसर में यह कोई पहली घटना हो. उत्तर प्रदेश में तो ये घटनाएं आम हैं. कभी शाहजहांपुर में अधिवक्ता की हत्या हो जाती है तो कभी गोरखपुर में दुष्कर्म आरोपी की, गाजियाबाद में कचहरी में कड़ी सुरक्षा के बावजूद वाहनों की चोरी हो जाती हैं किन्तु दो चार दिन महीने सुरक्षा मजबूत कर कचहरी फिर वापस लौट आती है लापरवाही की तरफ, किसी अगली घटना के इंतजार में.

     देखा जाए तो कचहरी न्याय पाने का एक केंद्र है और वहां न्यायाधीशों, वकीलों, मुन्शी, न्यायालयों के कर्मचारियों, स्टाम्प वेंडर्स, बैनामा लेखकों आदि न्यायालय कार्य करने वाले और वकीलों के कार्य करने वालों का और कचहरी में आने जाने वालों के चाय नाश्ते आदि का प्रबंध करने वालों का होना एक अनिवार्य आवश्यकता है किन्तु कचहरी में भीख मांगने वालों का आना, मेवे आदि बेचने वालों का आना, कान साफ करने वालों का आना कचहरी को सामान्य बाजार की श्रेणी में ला देता है और उसकी सुरक्षा को खतरे में डाल देता है और सबसे खतरनाक है ऐसे में बगैर किसी जांच - पड़ताल पूछताछ के गैर जरूरी लोगों का कचहरी परिसर में प्रवेश. क्या ज़रूरी नहीं है ऐसे में ये उपाय -

1 - सभी वकीलों, मुंशियों आदि के लिए आई कार्ड हों.

2- वकील अपने मुवक्किल और गवाहों को कचहरी परिसर में आने का पत्र जारी करें, जिसे गेट पर तैनात पुलिस को दिखाकर ही मुवक्किल और गवाह कचहरी में प्रवेश कर सकें.

3- जिन लोगों का कचहरी के किसी कार्य से ताल्लुक नहीं है, उन्हें केवल सामान या सेवा बेचने के लिए या भीख मांगने के लिए ही कचहरी में आना है, उनका कचहरी में प्रवेश प्रतिबंधित किया जाए.

4- कचहरी में प्रवेश करने वाले की जांच पड़ताल कर ही प्रवेश कराया जाए और यदि उसके पास हथियार या कोई भी घातक वस्तु हों तो उसके लाने का कारण पता कर गेट पर ही रजिस्टर में दर्ज कर हथियार जमा कराया जाए और गैर जरूरी होने पर हथियार सहित कचहरी में प्रवेश न करने दिया जाए. 

       हमें ये प्रतिबंध नागवार गुजर सकते हैं किन्तु ये सब जरूरी हैं न्याय व्यवस्था को सुदृढ़ और सुरक्षित रूप से कायम रखने के लिए और मैं समझती हूं कि सतर्कता के तौर पर इन्हें अपनाया जाना चाहिए.

शालिनी कौशिक एडवोकेट

कैराना 

बाल मजदूरी - भारत का कलंक

Written By Shalini kaushik on बुधवार, 20 अप्रैल 2022 | 11:23 pm

 


”बचपन आज देखो किस कदर है खो रहा खुद को ,
उठे न बोझ खुद का भी उठाये रोड़ी ,सीमेंट को .”
........................................................................
”लोहा ,प्लास्टिक ,रद्दी आकर बेच लो हमको ,
हमारे देश के सपने कबाड़ी कहते हैं खुद को .”
.......................................................................
”खड़े हैं सुनते आवाज़ें ,कहें जो मालिक ले आएं ,
दुकानों पर इन्हीं हाथों ने थामा बढ़के ग्राहक को .”
...........................................................................
”होना चाहिए बस्ता किताबों,कापियों का जिनके हाथों में ,
ठेली खींचकर ले जा रहे वे बांधकर खुद को .”
.......................................................................
”सुनहरे ख्वाबों की खातिर ये आँखें देखें सबकी ओर ,
समर्थन ‘शालिनी ‘ का कर इन्हीं से जोड़ें अब खुद को .”
................................................................

शालिनी कौशिक
       एडवोकेट 
कैराना (शामली) 

वकीलों का ड्रेस कोड

Written By Shalini kaushik on मंगलवार, 19 अप्रैल 2022 | 12:01 pm

  


प्रत्येक पेशे का एक निश्चित ड्रेस कोड होता है जो एक पेशे से जुड़े हुए लोगों की पहचान से गहरा ताल्लुक रखता है. यही ड्रेस कोड आम जनता में सफेद शर्ट, नेक बैंड और काले कोट पहने व्यक्ति के लिए तुरंत कानूनी पेशे से जुड़े व्यक्तित्व का परिचय देता है. जहां यह ड्रेस कोड अधिवक्ताओं को आम जनता में " ऑफिसर ऑफ द कोर्ट" के रूप में पहचान देता है वहीं यह ड्रेस कोड अधिवक्ताओं में आत्मविश्वास और अनुशासन को भी जन्म देता है. 
        यह काली और सफेद पोशाक, जो कानूनी पेशेवरों द्वारा पहनी जाती है, इस ड्रेस कोड के विकास का इतिहास मध्य युग का है जब वकीलों को बैरिस्टर, सॉलिसिटर, अधिवक्ता या पार्षद के रूप में भी जाना जाता था, तब उनका ड्रेस कोड जजों के समान था.
           भारत में कानूनी व्यवस्था का आरम्भ ब्रिटेन द्वारा किया गया और क्योंकि जब भारत में कानूनी व्यवस्था का आरम्भ हुआ, भारत पर अंग्रेजों का शासन था तो अधिवक्ताओं की ड्रेस पर भी ब्रिटेन की व्यवस्था हावी होनी अवश्यंभावी थी. तब से लेकर अब तक बहुत से परिवर्तन होते रहे और अब भारत में वकीलों का ड्रेस कोड अधिवक्ता अधिनियम 1961 के तहत बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों द्वारा शासित होता है. जो इस प्रकार है - 
" उपरोक्त नियमों की धारा 49 सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय, अधीनस्थ न्यायालयों, न्यायाधिकरणों या प्राधिकरणों में उपस्थित होने वाले अधिवक्ताओं के लिए ड्रेस कोड को नियंत्रित करती है। वे अपनी पोशाक के भाग के रूप में निम्नलिखित पहनेंगे, जो शांत और प्रतिष्ठित होंगे। 
I. भारत में अधिवक्ताओं के लिए ड्रेस कोड भाग
VI: अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 49(1)(gg) के तहत बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम/नियमों का अध्याय IV। अधिवक्ताओं द्वारा पहना जाता है, जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, किसी भी अदालत या न्यायाधिकरण के समक्ष पेश होता है। ”

1- कोट

(ए) एक काले बटन-अप कोट, चापकन, अचकन, काला शेरवानी और वकील के गाउन के साथ सफेद बैंड, या
(बी) एक काला खुला स्तन कोट, सफेद कॉलर, कठोर या मुलायम, और वकील के गाउन के साथ सफेद बैंड .
किसी भी मामले में जींस को छोड़कर लंबी पतलून (सफेद, काली, धारीदार या ग्रे) या धोती:
2- काली टाई

परन्तु यह और कि उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों, जिला न्यायालयों, सत्र न्यायालयों या नगर सिविल न्यायालयों के अलावा अन्य न्यायालयों में बैंड के स्थान पर काली टाई पहनी जा सकती है।
द्वितीय. लेडी एडवोकेट्स:
(ए) ब्लैक फुल स्लीव जैकेट या ब्लाउज, व्हाइट कॉलर स्टिफ या सॉफ्ट व्हाइट बैंड्स और एडवोकेट्स गाउन। सफेद ब्लाउज, कॉलर के साथ या बिना कॉलर के, सफेद बैंड के साथ और काले खुले ब्रेस्टेड कोट के साथ।
या
(बी) साड़ी या लंबी स्कर्ट (सफेद या काला या बिना किसी प्रिंट या डिज़ाइन के कोई भी मधुर या मंद रंग) या फ्लेयर्स (सफेद, काली या काली-धारीदार या ग्रे) या पंजाबी पोशाक चूड़ीदार-कुर्ता या सलवार-कुर्ता के साथ या बिना दुपट्टा (सफेद या काला) या काले कोट और बैंड के साथ पारंपरिक पोशाक।

III. बशर्ते कि सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय में पेश होने के अलावा अधिवक्ता का गाउन पहनना वैकल्पिक होगा।

चतुर्थ। परन्तु यह और कि उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय, जिला न्यायालय, सत्र न्यायालय या नगर सिविल न्यायालय के अलावा अन्य न्यायालयों में बैंड के स्थान पर काली टाई पहनी जा सकती है।"
न्यायाधीशों का ड्रेस कोड वरिष्ठ अधिवक्ताओं के समान ही होता है। पुरुष न्यायाधीश सफेद शर्ट और पतलून के साथ एक सफेद गर्दन बैंड और एक काले कोट के साथ एक गाउन पहनते हैं, जबकि महिला न्यायाधीश आमतौर पर पारंपरिक साड़ी पहनना पसंद करती हैं, और इसे एक सफेद गर्दन बैंड, एक काला कोट और एक गाउन के साथ जोड़ती हैं।

नियमों के अनुसार, एक अधिवक्ता को न्यायालयों के अलावा अन्य सार्वजनिक स्थानों पर बैंड या गाउन नहीं पहनना चाहिए, सिवाय ऐसे औपचारिक अवसरों पर और ऐसे स्थानों पर जैसे कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया या कोर्ट द्वारा निर्धारित किया जा सकता है।
COVID-19 के प्रकोप के बीच जब न्यायालयों को अपने कामकाज के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग प्रणाली का पालन करना पड़ा है, तो वकीलों के लिए अदालत के सामने पेश होने के लिए ड्रेस कोड में भी बदलाव लाया गया है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अधिवक्ताओं को निर्देश दिया है कि वे वर्चुअल कोर्ट के माध्यम से की जा रही सुनवाई के दौरान "सादे सफेद शर्ट / सलवार-कमीज / साड़ी, सादे सफेद गले में पट्टी" पहन सकते हैं। इसी आधार पर देश भर के उच्च न्यायालयों ने वर्चुअल कोर्ट के माध्यम से पेश होने के लिए वकीलों के नए ड्रेस कोड में बदलाव को अधिसूचित किया है। इसमें कहा गया है कि यह प्रणाली तब तक बनी रहेगी जब तक कि "चिकित्सा अनिवार्यताएं मौजूद न हों या अगले आदेश तक।"
      इसी ड्रेस कोड पर आपत्ति जताई गई है और इलाहाबाद हाई कोर्ट के समक्ष इसे बदलने के लिए याचिका दायर की गई है, जिस पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने इलाहाबाद हाईकोर्ट को सूचित किया कि उसने वकीलों के लिए ड्रेस कोड के मुद्दे पर बार और न्यायपालिका के साथ विचार-विमर्श करने के लिए पांच सदस्यीय समिति का गठन किया है। बीसीआई ने यह सबमिशन हाईकोर्ट द्वारा उसे जारी एक नोटिस के जवाब में दिया है, जो अदालत के समक्ष दायर याचिका पर वकीलों के लिए निर्धारित काले कोट और पोशाक के मौजूदा ड्रेस कोड पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहा है। इसमें आरोप लगाया गया कि यह भारत की जलवायु परिस्थितियों के खिलाफ है।
     याचिका में किए गए अभिकथनों का उल्लेख करते हुए बीसीआई ने कहा: "वास्तव में याचिकाकर्ता ने कहा है कि बैंड ईसाई धर्म का प्रतीक है। उनके बयान के अनुसार इसे बंद कर दिया जाना चाहिए। गैर ईसाइयों को इसे पहनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कोट और गाउन पहनने पर भी सवाल उठाया है। ड्रेस फ्रेमिंग के समय नियमों को बनाते वक्त और न ही उसके बाद से आज तक इस तरह की व्याख्या की गई है। इस मुद्दे पर निर्णय लेने से पहले बार और न्यायपालिका के वरिष्ठ सदस्यों सहित सभी हितधारकों के साथ इस मुद्दे पर विस्तृत विचार-विमर्श की आवश्यकता है।"
 याचिका में आगे कहा गया, "एडवोकेट्स के लिए निर्धारित ड्रेस कोड जहां उन्हें कोट और गाउन पहनना है और एक बैंड के माध्यम से अपनी गर्दन बांधना है, जलवायु परिस्थितियों के अनुसार नहीं है ... एडवोकेट्स बैंड ईसाई धर्म का धार्मिक प्रतीक है। इसलिए गैर-ईसाइयों को इसे पहनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है… सफेद साड़ी और सलवार-कमीज पहनना हिंदू संस्कृति और परंपरा के अनुसार विधवा महिलाओं का प्रतीक है, इसलिए बीसीबी की ओर से इस संबंध में भी विवेक का प्रयोग नहीं किया गया।.  
       इसे लेकर जब आम जनता और अधिवक्ताओं की राय ली गई तो कुछ इस तरह के विचार सामने आए -  एक संजू बाबा कहते हैं कि 
"वर्तमान में वकीलों का ड्रेस किसी धरम के आधार पर नहीं है , भारत के जलवायु के विपरीत भी नहीं है ,याचिकाकर्ता को बाहरी चीजों पर ध्यान न देकर न्यायिक प्रणाली और न्याय पर ध्यान केंद्रित करनी चाहिए ड्रेस कोड बदलने से न्याय पर असर नहीं पड़ेगा बल्कि ड्रेस कोड के चक्कर में भेद भाव पैदा होगा ,कोई कहेगा ये ड्रेस मुझमें सूट नहीं करता, इसका रंग मेरे ग्रह के अनुसार नहीं है, ऐसी रंग की ड्रेस पहनने से केस में हार होती है इत्यादि,.........…"
अधिवक्ता अर्चित पंवार:  बार एसोसिएशन, कैराना (शामली) कहते हैं कि 
     "ड्रेस कोड का ठीक पालन करना बहुत ज्यादा जरुरी है… उचित ड्रेस कोड का ना होना एक तरह की अवमानना ​​ही है मेरी राय में और रही बात ड्रेस कोड में तबदीली करने की… मेरी राय में मौजूदा ड्रेस कोड पर्याप्त है और इसमें कोई बदलाव की आवश्यकता नहीं है।" 
सुरेन्द्र  कुमार मलिक एडवोकेट: बार एसोसिएशन, कैराना (शामली) को ड्रेस आरामदायक भी चाहिए और वे कहते हैं कि 
" बैंड और गाउन को हटाना चाहिए
कोट व टाई होनी चाहिए" 
       और मैं स्वयं एक अधिवक्ता हूं और मुझे स्वयँ पर गर्व भी होता है और मेरा आत्मविश्वास भी बढ़ता है जब मैं यह ड्रेस पहनती हूं, समाज में सम्मान प्राप्त होता है इस ड्रेस को धारण करने पर, यह कहना कि यह भारत की धार्मिक रीति रिवाजों के विपरीत है, गलत है क्योंकि ये भारतीय संस्कृति में पाखण्ड परोसने वालों के कारनामे हैं जिन्होंने एक विधवा के लिए ड्रेस कोड का सृजन किया, नारी पर जितने अत्याचार पुरुष प्रधान समाज कर सकता है हमेशा से करता आया है और करता ही रहेगा, उन्होंने सफेद रंग को विधवाओं के लिए लागू किया, पुरुष का विवाह हो जाए या पत्नी मर जाये, वह वैसे का वैसा ही रहेगा, उसके रहन सहन, पहनावे में कोई अन्तर नहीं आएगा किन्तु नारी की जिंदगी में दोनों ही स्थितियों में बंदिशें लागू हो जाती हैं किन्तु यह पिछड़ेपन की सोच न्याय के पैरोकारों पर लागू नहीं हो सकती. इस ड्रेस कोड ने एक लम्बे समय से हमारे समाज, देश, विदेश में एक पहचान बनाई है और हम नहीं चाहते हैं कि यह पहचान हमसे छिन जाए. आज स्थिति यह है कि पहले पहल युवा पीढ़ी इस ड्रेस कोड के आकर्षण में ही वक़ालत व्यवसाय को अपनाते हैं और बाद में अपनी योग्यता से आगे बढ़ते जाते हैं. 
   इसलिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया से हमारा विनम्र निवेदन है कि अधिवक्ताओं के ड्रेस कोड को भारतीय पुरातनवादी सोच के कारण परिवर्तन की ओर न धकेला जाए और इसे जस का तस ही रखा जाए. 
शालिनी कौशिक एडवोकेट 
सीट नंबर 29 
बार एसोसिएशन 
कैराना 

           

अंदोसर शिवालय कांधला विश्व धरोहर घोषित हो

Written By Shalini kaushik on सोमवार, 18 अप्रैल 2022 | 8:46 am

  



18 अप्रैल को विश्व विरासत दिवस के रूप में मनाया जाता है. पुरसीवाडा (पंजाब) से आए पंडित रामचंद्र जी के तीन पुत्रों हकीम शिवनाथ जी, पंडित शिव प्रसाद जी और पंडित शिव सिंह जी द्वारा वर्ष 1800 में कस्बा कांधला के उत्तरी भाग में शिवालय की स्थापना की गई. यह शिवालय कांधला के सबसे बड़े क्षेत्र में स्थापित शिवालय है और 200 साल से पूरे भारत के भक्तों की श्रद्धा और आस्था का केंद्र है. साधू - संतों की शरण स्थली के रूप में रहा यह मन्दिर आज भी स्वामी सत्यनारायण गिरी महाराज जी की शरण स्थली है और यहां हकीम शिवनाथ जी द्वारा साधू संतों के ठहरने के लिए मुसाफिर खानों का निर्माण भी कराया गया है. सूर्य की पहली किरण आकर प्रभु गौरी नाथ के सिद्ध पीठ को नमन करती है और प्रभु भोलेनाथ का श्वेत शिवलिंग भक्तों की मनोकामना पूर्ण करते हैं. 

   माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी और माननीय मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश श्री योगी आदित्यनाथ जी से विनम्र निवेदन है कि पुश्तैनी शिवालय अंदोसर मंदिर नई बस्ती कांधला के शिवालय मन्दिर महादेव मारूफ शिवाला, कांधला को विश्व धरोहर स्थल की सूची में सम्मिलित किया जाए. 

सभी सनातन धर्मावलंबियों को ‼️विश्व धरोहर दिवस ‼️की हार्दिक शुभकामनाएं 

हर हर महादेव 🙏🌼🙏

निवेदन

शालिनी कौशिक एडवोकेट

अध्यक्ष

मन्दिर महादेव मारूफ शिवाला कांधला धर्मार्थ ट्रस्ट (रजिस्टर्ड)

व्यापारी वर्ग " पाप से घृणा" का उदाहरण प्रस्तुत करता.

Written By Shalini kaushik on सोमवार, 4 अप्रैल 2022 | 4:14 pm

 

2 अप्रैल 2022 से विक्रम संवत 2079 का आरंभ होता है. चूंकि संवत की शुरूआत चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में नवरात्रों से होती है और नवरात्र के व्रतों में हिंदू धर्मावलंबियों द्वारा कुट्टू के आटे का ही प्रयोग बहुतायत में किया जाता है तो यही किया गया किन्तु दुर्भाग्यवश वह आटा शामली और सहारनपुर जिले के 28 व्रती जनों को नुकसानदायक रहा और उन्हें स्वास्थ्य लाभ हेतु अस्पताल जाना पड़ गया.

      खबर तेजी से फैल गई और जिला मजिस्ट्रेट शामली सुश्री जसजीत कौर ने सतर्कता बरतते हुए तुरंत जांच के निर्देश जारी कर दिए और एसडीएम बृजेश कुमार सिंह पहुंच गए उन दुकानों पर, जहां से खाद्य पदार्थ की बिक्री हुई थी. जहां पहुँचकर उन्होंने खाद्य पदार्थों के नमूने लिए और नमूने लेते ही शुरू हो गया प्रशासन की कार्रवाई का व्यापारियों द्वारा विरोध.


सवाल ये हैं कि - 
1- व्यापारियों द्वारा प्रशासन की कार्रवाई का विरोध क्यूँ किया गया? 
2- क्या 28 लोगों की तबीयत खराब होने की खबर कोई प्रोपेगेंडा थी? 
3- क्या सामान बेचने वाले का कोई नैतिक दायित्व नहीं होता? 
4- और क्या व्यापारियों को स्वयं अपने द्वारा बेचे जा रहे खाद्य पदार्थ के विषाक्त होने का डर था? 
        ये सब सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि आज का समय कोई सामान्य समय नहीं है. आज नवरात्रि और रमजान दोनों साथ ही चल रहे हैं जो कि पहले भी चलते रहे होंगे किन्तु हमने कभी इनके सुचारू रूप से चलने के लिए पुलिस प्रशासन को बाज़ार में घूमते हुए नहीं देखा. ये तो पीड़ितों ने कुट्टू का आटा हिन्दू समुदाय के ही व्यापारी सतीश कुमार और पवन कुमार से खरीदा था, अगर कहीं यह खाद्य पदार्थ गैर समुदाय के दुकानदार से खरीदा होता तो इस मामले से साम्प्रदायिक सौहार्द को बिगड़ने में क्षण भर की भी देर नहीं लगती. ऐसे में व्यापारियों को उनके द्वारा बेचे गए कुट्टू के आटे से लोगों की तबीयत खराब होने पर प्रशासन द्वारा कार्रवाई का इंतजार किए बगैर स्वयं अपने खाद्य पदार्थ लेकर प्रशासन के पास पहुंच जाना चाहिए था न कि महात्मा गांधी के धरना अस्त्र का प्रयोग करना चाहिए था. अगर व्यापारी वर्ग ऐसा करता तो आज समाज के समक्ष " पाप से घृणा" का बहुत बड़ा उदाहरण प्रस्तुत करता. 
शालिनी कौशिक
 एडवोकेट 
कांधला 


मन्दिरों को पितृ स्थान से बचाएं योगी आदित्यनाथ जी

Written By Shalini kaushik on सोमवार, 28 मार्च 2022 | 8:30 pm

  


आज उत्तर प्रदेश में धर्म का राज है .ऐसे में सरकार द्वारा मंदिरों को पुनरुद्धार के लिए अनुदान दिया जा रहा है .फलस्वरूप मंदिरों को लेकर राजनीति और छीना-झपटी का समय चल रहा है .जैसे भी हो ,मंदिरों में कब्जे के लिए हिंदुओं का एक विशेष वर्ग काफी हाथ-पैर मार रहा है .साथ ही एक और षड्यंत्र उस विशेष वर्ग ने किया है और वह है मंदिरों में अपने पूर्वजों के स्थान स्थापित कर मंदिरों पर अपने कब्जे दिखाने की ओर , उस पर तुर्रा ये कि इस तरह मंदिरों में भक्तों का आवागमन बढ़ेगा , मतलब ये कि अब भगवान् के दर्शन के लिए भी भक्तों को बहाने चाहिए और इसके लिए वे अपने घर के कुंवारे मृत पूर्वजों की अस्थियों की राख को मंदिर की जमीन में दबायेंगे ,उनकी जयंती ,बरसी या श्राद्ध में उन्हें श्रृद्धासुमन अर्पित करने आएंगे और तब थोड़ा समय निकालकर भगवान् के दर्शन कर उन्हें भी कृतार्थ कर देंगे और ये पूर्वजों के स्थान भी ओरिजिनल रूप से नहीं वरन अपनी उन जमीनों से स्थानांतरित कर ,जिन्हें अपने क्षेत्र को छोड़कर जाने के लिए बेचकर नोट कमाने हैं  और जो वर्षों पहले खेतों की मिट्टी में दबकर भूमि में समाहित हो चुके हैं , से मंदिर में लाये जायेंगे .

              पवित्र पुण्य धाम हरिद्वार [उत्तराखंड] के निवासी पंडित सत्यनारायण जी के अनुसार मंदिरों में पूर्वजों के स्थान स्थापित करना उन्हें श्मशान बना देना है और अगर हम वास्तु शास्त्र का अध्ययन करते हैं तो उसमें साफ लिखा है कि मंदिर के शीर्ष पर स्थापित कलश और ध्वजा जहाँ तक दिखाई देती है वह सब क्षेत्र मंदिर की परिधि में आता है और यदि हम मंदिर तक नहीं भी पहुँच सकते हैं किंतु मंदिर के कलश और ध्वजा का बहुत दूर से भी दर्शन कर प्रभु को नमस्कार करते हैं तब भी प्रभु दर्शन का पुण्यफल हमें प्राप्त होता है .मंदिर के कलश ध्वजा दिखाई देने की यह परिधि एक धर्मक्षेत्र होता है ,जिसमे कोई भी धर्मविरुद्ध कार्य करना घोर पाप की श्रेणी में आता है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि उस क्षेत्र में परमात्मा का प्रभा मंडल अधिक सक्रिय रूप में उपस्थित होता है. 

     आप अगर वास्तुशास्त्र का अध्ययन करते हैं तो आप पाएंगे कि घर के मंदिर तक में पूर्वजों की तस्वीर तक रखना मंदिर में नकारात्मक ऊर्जा को प्रविष्ट करता है ,ऐसा कहा गया है ,जबकि घर के मंदिर में तो भगवान् की प्राण-प्रतिष्ठा भी नहीं की जाती ,फिर क्यों इस तथ्य पर विचार नहीं किया जा रहा है कि जहां हमने भगवान को प्राण प्रतिष्ठा कर स्थापित किया है, हम वहां उनके बराबर में मृत शरीरों की अस्थियों की राख को दबाकर उन्हें क्यूँ असहज कर रहे हैं, क्यूँ वहां नकारात्मक ऊर्जा के प्रवेश द्वार खोल रहे हैं, क्यूँ मन्दिर को श्मशान बना रहे हैं?

             ऐसे में, सम्मानीय योगी आदित्यनाथ जी से विनम्र निवेदन है कि धर्म के राज में अधर्म न होने दें और मन्दिरों की पवित्र भूमि पर पूर्वजों के स्थान स्थापित किए जाने पर रोक लगाने के लिए कानून लाने की कृपा करें और जिन परिवारों ने मंदिरों में अपने पूर्वजों के स्थान दबंगई दिखाकर स्थापित कर लिए हैं उन्हें निश्चित समय में हटाने के लिए सरकार द्वारा नोटिस जारी किए जाएं क्योंकि ये पितृ स्थान स्थानीय मान्यताओं के अनुसार परिवारों द्वारा अपनी निजी भूमि में बनाए जाते हैं और ये व्यक्तिगत आस्था का विषय हैं इस तरह से मंदिरों की सार्वजनिक भूमि में इनका स्थापित किया जाना इन्हें जनसाधारण की पूजा का पात्र बना देता है जिसका बाद में पता चलने पर जिनके ये पितृ स्थान होते हैं और जो अनदेखी या अज्ञानता मे इन्हें पूजते हैं दोनों पक्षों के मध्य में घोर रोष की वज़ह बन जाता है. इसलिए मंदिरों में परिवारों के पितृ स्थानों पर रोक लगनी चाहिए साथ ही जो मन्दिर की देखरेख करने वाले या मन्दिर के ट्रस्ट या कमेटी के लोग ऐसी अनाधिकृत चेष्टा करते हैं उन्हें दण्डित भी किया जाना चाहिए.

       शालिनी कौशिक एडवोकेट

       अध्यक्ष

       मंदिर महादेव मारूफ शिवाला

       कांधला धर्मार्थ ट्रस्ट (रजिस्टर्ड) 



कैराना स्थित जनपद न्यायालय ही हो शामली जनपद का मुख्य न्यायालय

Written By Shalini kaushik on शनिवार, 26 मार्च 2022 | 9:02 pm

 


 2011 में 28 सितंबर को शामली जिले का सृजन किया गया. तब उसमें केवल शामली और कैराना तहसील शामिल थी. इससे पहले शामली और कैराना तहसील मुजफ्फरनगर जनपद के अंतर्गत आती थी. कुछ समय बाद शामली जिले में ऊन तहसील बनने के बाद अब शामली जिले के अंतर्गत तीन तहसील कार्यरत हैं. 2018 के अगस्त तक शामली जिले का कानूनी कार्य मुजफ्फरनगर जिले के अंतर्गत ही कार्यान्वित रहा किन्तु अगस्त 2018 में शामली जिले की कोर्ट शामली जिले में जगह का चयन न हो पाने के कारण कैराना में आ गई और इसे नाम दिया गया -" जिला एवं सत्र न्यायालय शामली स्थित कैराना. "

     2018 से अब तक मतलब मार्च 2022 तक शामली जिले के मुख्यालय से लगभग 12 किलोमीटर दूर जिला जज की कोर्ट के लिए जगह का चयन हो जाने के बाद केवल बाउंड्रीवाल का ही निर्माण हो पाया है और शामली जिले में केवल तहसील स्तर का ही कार्य सम्पन्न हो रहा है. जिसे देखते हुए कहा जा सकता है कि वहां कानूनी विभाग लगभग शून्यता की स्थिति में है और वहां जिला जज की कोर्ट की स्थापना के साथ साथ मुंसिफ कोर्ट से लेकर जिला जज की कोर्ट की स्थापना करने के लिए बहुत बड़े स्तर का कार्य सम्पन्न करना होगा, जबकि शामली जिले की तहसील कैराना में जिला जज की कोर्ट से एक नंबर कम की कही जाने वाली कोर्ट ए डी जे कोर्ट की स्थापना ही 2011 में हो चुकी है और कैराना तहसील में स्थापित न्यायालय परिसर शामली जिले के मुख्यालय से मात्र 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.

      ऐसे में, माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी से विनम्र निवेदन है कि वे कैराना की सुदृढ़ न्यायिक व्यवस्था, कैराना में फैली अपराधियों की जड़ें और शामली जिले की बदहाल कर देने वाली जाम की समस्या को देखते हुए कैराना में ही जिला एवं सत्र न्यायाधीश के न्यायालय को शामली जिले का मुख्य न्यायालय घोषित करें और यदि इसके लिए उन्हें कैराना में न्यायालय परिसर तक के क्षेत्र को शामली जिले के अंतर्गत ही घोषित करना पड़े तो करें क्योंकि शामली जिले में जिस जगह का चयन जिला कोर्ट के लिए किया गया है वहां तक क्षेत्र के निवासियों का पहुंचना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है क्योंकि शामली जिला इतना सघन रूप से बसा हुआ है कि मात्र एक किलोमीटर पार करने में भी 1-2 घण्टे से ऊपर का समय लग रहा है. ऐसे में न्याय पाने के लिए पीड़ितों को या तो रात में ही घर से निकलना पड़ेगा या फिर न्याय पाने की आशा को ही खो देना पड़ेगा. साथ ही, यदि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कैराना स्थित जनपद न्यायालय को मुख्य न्यायालय का दर्जा दिया जाता है तो सरकार का बहुत सारा धन भी बचेगा और कैराना तहसील में लगभग खंडहर पड़े बहुत सारे क्षेत्र का न्यायालय और अधिवक्ताओं के चेम्बर के रूप में इस्तेमाल भी हो सकेगा. 

     अतः माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी कम से कम एक बार जांच कमेटी बिठाकर कैराना स्थित जनपद न्यायालय को ही शामली जिले के मुख्य न्यायालय का दर्जा दिए जाने की मांग पर विचार करें. 

           🙏🙏धन्यवाद 🙏🙏

शालिनी कौशिक एडवोकेट

कैराना (शामली) 

खंडपीठ /चेंबर /आर्थिक मदद /आरक्षण कुछ तो दें योगी जी - शालिनी कौशिक एडवोकेट

Written By Shalini kaushik on शुक्रवार, 25 मार्च 2022 | 10:37 pm

 



      माननीय योगी आदित्यनाथ जी ने आज उत्तर प्रदेश के दूसरी बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की है. जहां एक ओर योगी आदित्यनाथ जी ने अपने पिछले कार्यकाल में पुलिस और प्रशासन का बेहतर तरीके से इस्तेमाल करते हुए आपराधिक तत्वों को उत्तर प्रदेश में जेल के सींखचों में डालने का कार्य सफलतापूर्वक किया है वहीं न्याय के पैरोकार अधिवक्ताओं के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैया योगी सरकार द्वारा अख्तियार किया गया है. योगी आदित्यनाथ जी के माध्यम से सभी के लिए घोषणाएं की जा रही हैं किन्तु वकीलों को लेकर अभी तक किसी मदद का आश्वासन सामने नहीं आया है. अतः देश औेर दुनिया की कोरोना कालीन उपजी विषम परिस्थितियों को देखते हुए मेरा योगी जी से निम्न निवेदन है -

1 - यह कि जूनियर अधिवक्ताओं के लिए आर्थिक सहायता हेतु कुछ राशि सरकार द्वारा घोषित की जाए और कुछ निश्चित धनराशि इस बीमारी के कारण अपने परिजन को खो चुके वकील के परिवार को दिए जाने की जल्द घोषणा की जाए.

2- यह कि रोजगार की समस्या को लेकर देखते हुए आज बड़ी संख्या में युवाओं द्वारा वक़ालत को अपने व्यवसाय के रूप में अपनाया जा रहा है किन्तु कचहरी में जूनियर वकीलों के लिए सबसे बड़ी समस्या उनके व्यवसाय स्थल को लेकर आ रही है. ऐसे में जूनियर वकीलों के चेम्बर के लिए सम्बन्धित कचहरी में स्थल की उपलब्धता सुनिश्चित करायी जाए.

3- यह कि वक़ालत व्यवसाय में आज भी महिला अधिवक्ताओं को दोयम दर्जा प्राप्त है और उन्हें अभी भी अपना स्थान मजबूत बनाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता है. ऐसे में, महिला अधिवक्ताओं के लिए न्यायालयों में कमिश्नर और सरकारी वकीलों के पदों पर आरक्षण दिए जाने की व्यवस्था की जाए.

4- यह कि पिछले 5 दशक से पश्चिमी यू पी के अधिवक्ताओं द्वारा हाई कोर्ट की खंडपीठ की मांग की जा रही है और अब भाजपा नीत सरकार द्वारा अपने मंत्रिमंडल में वेस्ट यू पी को तरजीह दी गई है. ऐसे में अधिवक्ताओं की इस मांग के साथ न्याय करते हुए माननीय योगी जी से निवेदन है कि वेस्ट यू पी में हाई कोर्ट खंडपीठ प्रदान करते हुए यहां की जनता को न्याय के करीब लाया जाए और अधिवक्ताओं के दामन पर हड़ताल प्रिय होने का कलंक हाई कोर्ट खंडपीठ देकर मिटा दिया जाए.

       माननीय श्री योगी आदित्यनाथ जी अधिवक्ताओं की इन सभी समस्याओं पर विचार करेंगे और उन्हें अवश्य हल करेंगे, ऐसा " योगी है तो यकीन है" उक्ति पर ध्यान केन्द्रित करते हुए कहा जा सकता है.

शालिनी कौशिक एडवोकेट

कैराना 

प्रसन्नता और गौरैया - एक सिक्के के दो पहलू

Written By Shalini kaushik on रविवार, 20 मार्च 2022 | 8:37 am

      


      20 मार्च अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस और विश्व गौरैया दिवस के रूप में मनाया जाता है. प्रसन्नता कोई वस्तु नहीं है कि आप बाजार में गए और कुछ सस्ती या महंगी पैसा खर्च कर खरीद लाए. प्रसन्नता को आप महँगी होने पर सस्ती दर पर खरीद कर भी प्राप्त नहीं कर सकते, यह वह मानसिक क्षण है जिसे आप तभी पा सकते हैं जब यह आपके मन को गहराई तक स्पर्श करती है और हम भले ही कितने भौतिकवादी हो जाएं, हमारी आत्मा कभी किसी भी प्रकार के छल - प्रपंच का शिकार नहीं हो सकती और हमें सच्ची खुशी हमारी आत्मा की संतुष्टि से ही प्राप्त होती है और हमारी आत्मा की यह संतुष्टि ही प्रसन्नता का सही रूप है और क्योंकि आज विश्व गौरैया दिवस भी है ऐसे में अपने घर की बेटी - गौरैया की सुरक्षा हमें सही रूप में प्रसन्नता का हकदार बना सकती है. पहले घरों में गौरैया के, तोतों के रहने के छोटे छोटे कोटर बनाये जाते थे, पेड़ - पौधे होते थे, आज ये सब खत्म होते जा रहे हैं ऐसे में गौरैया का दिखाई देना भी बंद हो गया है.



      अतः मेरा आप सभी से विनम्र निवेदन है कि आप सभी अपने घर के पास, यदि कस्बों में रहते हैं तो मोहल्ले में, यदि शहरों में रहते हैं तो कॉलोनी में पेड़ पौधे अवश्य लगाएं, उनका संवर्धन और संरक्षण करें. यदि आप वास्तव में ऐसा कर पाते हैं तो निश्चित रूप से आपके आँगन में एक बार फिर गौरैया फुदकते हुए आएगी और तब सच्ची प्रसन्नता आपके चेहरे पर आएगी और हृदय पर छाएगी.

शालिनी कौशिक एडवोकेट

कैराना 

बेटे का इतिहास

Written By Shalini kaushik on शनिवार, 19 मार्च 2022 | 11:24 pm

 

आज का बेटा
जब
कल बाप बनेगा
देखेगा
बेटा बाप के सर पर
रखकर पैर
खुद को
आगे बढ़ा रहा है
और
अपने बाप के मुँह पर
पर्दा डालता जा रहा है.
तब याद आता है उसे
इतिहास खुद को
दोहरा रहा है.
कल जो तूने
अपने
बाप के साथ किया था
आज तेरा बेटा
तेरे साथ
वही
किए जा रहा है.
शालिनी कौशिक एडवोकेट, कैराना

BHRAMAR KA DARD AUR DARPAN: सरयू तट राम खेलें होली सरयू तट

BHRAMAR KA DARD AUR DARPAN: सरयू तट राम खेलें होली सरयू तट: सरयू तट राम खेलें होरी सरयू तट सिया राम की है अनुपम जोड़ी, सरयू तट कनक भवन में रंग है बरसे मात पिता परिजन हिय हुलसे.. सरयू तट सजे बजे प्रभु ...

जूतों का भार

Written By Bisari Raahein on रविवार, 16 जनवरी 2022 | 4:41 pm

 *लघुकथा* 


*( जूतों का भार )*


"मैडम जी फैमली आइडी चाहिए जी...." सातवीं कक्षा की नेहा के साथ आए उसके पिता ने  मैडम सुनीता के पास आकर गुहार लगाई । 

'क्यों ? क्या करना है उसका...' सुनीता मैडम ने प्रश्न दागा । 

"जी ... वो राशन डिपो वाले ने राशन देने से मना कर दिया । कहता है कि पहले स्कूल से अपनी फैमिली आइडी लेकर आओ" नेहा के पिता ने व्यथित स्वर में कहा ।

"अच्छा अब खुद को काम पड़ा तो स्कूल की याद आ गई ... और हम जो रोज फोन कर - कर के पागल हो गए कि अपनी बच्ची को आनलाईन भेजा गया गृह कार्य करवा कर मोबाइल पर भेजो । उसकी तो सुनवाई की नहीं आपने....?"  सुनीता मैडम बिफर पड़ीं ।

"जी.. वो हमारे फोन का नेट पैक खत्म हो गया था इसलिए..........." नेहा के पिता ने मजबूरी बतानी चाही लेकिन सुनीता मैडम उनकी बात बीच में ही काटकर गुस्से से चिल्ला उठी ।

"जाओ , पहले जाकर फोन रिचार्ज करवा कर लाओ और आनलाईन फीडबैक फार्म भरो फिर मिलेगी आईडी....।''

थोड़ी देर बाद बाप बेटी फिर से स्कूल में आ गए और सुनीता मैडम को फोन पकड़ा कर बोले ... "जी , फोन रिचार्ज करवा लिया है आप बता दो अब कि आनलाईन क्या करना है इसमें ?"

सुनीता मैडम का उनसे फोन पकड़ते हुए ध्यान गया कि इतनी ठंड में भी नेहा नंगे पांव स्कूल आई थी जबकि आज तो जुराब-जूतों में भी ठंड महसूस हो रही है । इसलिए फिर से गुस्से में नेहा से पूछा "इतनी ठंड में भी बिना जूते - चप्पल के घूम रही हो ... अक्ल नाम की चीज है या नहीं .....?"

"जी .... जूते हैं नहीं और कई दिन हुए चप्पलें टूट गई हैं ..." नेहा ने डरते हुए जवाब दिया ।

नेहा के पिता ने सफाई देने के लहजे में बोला , " जी... अभी थोड़ी तंगी चल रही है इसलिए...... बस दो-चार दिहाड़ी लगातार लग जाएं तो दिलवा देंगे चप्पल इसे ..... अभी तो ये फोन भी दुकानदार से मिन्नतें करके उधार में रिचार्ज करवाया है।" 

तभी मैडम सुनीता को लगा कि उसके हाथ में मोबाइल नहीं जूतों समेत नेहा का भार है और वह नि:शब्द हो गई ।


*कृष्ण कायत - 9896105643*

*संयोजक :- हरियाणा लघुकथा मंच डबवाली।*


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