प्रिये!
उस दिन जब तुम्हें,
पहली बार देखा;
टूट गयी पलभर में,
मन की लक्ष्मण-रेखा ।
उस दिन जब तुम्हें,पहली बार देखा;
टूट गयी पलभर में,
मन की लक्ष्मण-रेखा ।
हम तो थे प्यार में,
बड़े ही सौदाई;
एक ही भ्रूभंग में,
हो गए धराशायी |
कितने पल-छिन,
कितने मुद्दों की साधना,
एक ही क्षण में, होगई-
तुम्हारी आराधना |
कि तेरी पलकों की छाँव में,
तभी से जीते हैं, मरते हैं ;
और सुहाने दुस्वप्न की तरह,
उस पल को-
आज तक याद करते हैं ||
----------- काव्य-दूत से...

