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मैं शीघ्र आ रहा हूँ ....कविता...ड़ा श्याम गुप्त....

Written By shyam gupta on शुक्रवार, 17 जून 2011 | 5:21 pm

प्रिये!
सुबह सुबह जब बिस्तर से उठता हूँ,
तो लगता है,
मुझे किसे ने जगाया है |

फिर,
नित्यकर्म की बौखलाहट में,
चाय और दूध की खलबलाहट में,
एक अहसासं सा रहता है;
कोइ मेरे साथ साथ रहता है ,
और मैं किसी को खोज रहा हूं ||

और  फिर,
मरीजों की बडबड़ाहट  में,
गाड़ियों  की गडगड़ाहट में ,
तथा पहियों की लड़खडाहट, खडखड़ाहट में ,
एक  परछाईं सी है मेरे पास,
और मैं किसी को खोजता हूँ |

पुनः
टेबल -टेनिस की मेज के पीछे,
बेडमिंटन के नेट के नीचे,,
सब और मेरे पीछे पीछे ,
वही अहसास सा रहता है ,
जाने कौन कुछ कहता है,
और मैं फिर कुछ खोजने लगता हूँ |

परन्तु,
जब मैं बिस्तर पर लेटता हूँ,
दिन भर के अहसास को,
सहेज़ता हूँ ; तो-
कमरे की छतों से दीवारों से,
चारों और के खामोश नजारों से,
उभरती है ,
अहसासों के बीच से उतरती है-
एक तस्वीर,,
तुम्हारी तस्वीर |

कभी,
उन्नत ग्रीवा, दर्पित चेहरा,
धनुर्भ्रकुटि, मानिनी सी ;
'क्षमा प्रार्थी हूँ '-मैं कहता हूँ ,
पत्र की देरी के लिए ,
क्योंकि मैं रहता हूँ, सदा-
तस्वीर तेरी लिए , जो -
मैं रविवार को ले आया हूँ |

और कभी,
मुस्कुराकर के किये भ्रूभंग से ,
रूप यौवन से उठी तरंग से,
और लवों के स्फुरण के ढंग से ,
लगता है मैं बेहोश होता जारहा हूँ ;
और कह उठता हूँ-
'शायद मैं शीघ्र आरहा हूँ' ||                 ---प्रेम काव्य से ..

तुम्हारी आराधना....डा श्याम गुप्त. की कविता .........

Written By shyam gupta on रविवार, 5 जून 2011 | 7:28 pm

  प्रिये!            
उस दिन जब तुम्हें,
पहली बार देखा;
टूट गयी पलभर में,
मन की लक्ष्मण-रेखा ।

हम तो थे प्यार में,
बड़े ही सौदाई;
एक ही भ्रूभंग में,
हो गए धराशायी |

कितने पल-छिन,
कितने मुद्दों की साधना,
एक ही क्षण में, होगई-
तुम्हारी आराधना |

कि तेरी पलकों की छाँव में,
तभी  से जीते हैं, मरते हैं ;
और सुहाने दुस्वप्न की तरह,
उस पल को-
आज तक याद करते हैं ||

                          ----------- काव्य-दूत से...               

Founder

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Saleem Khan