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बोला सुभाष

Written By नीरज द्विवेदी on रविवार, 21 अगस्त 2011 | 1:18 am


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यहाँ देश धर्म करते करतेमैं चलते चलते ठहर गया,
भारत को एक करते करतेमैं ही टुकड़ों में बिखर गया,
अरे मेरा भी इक जीना थाबहता जो खून पसीना था,
इस धरती की सेवा करतेबहते बहते बस निकल गया॥

जो निकल गया सो निकल गयाइस आज़ादी की राहों में,
उसकी सोचो जो तेरी रगों मेंबहता बहता ही सूख गया,
अब जाग और पहचान मुझेहे देशभक्तक्या पता तुम्हें?
बोला सुभाषलड़ते लड़ते इस धरा से कब मैं चला गया?

आखिर कब तक

Written By नीरज द्विवेदी on शुक्रवार, 12 अगस्त 2011 | 5:00 am



यूँ मृतप्राय पड़े बस सोने से, क्रांति नहीं हुआ करती,
खुद पेट भर लेने से, राष्ट्र की भूख नहीं मिटा करती,
तेरे केवल जी लेने से, ये दुनिया नहीं जिया करती,
मत भूल बिन राष्ट्र तेरी भी, जिंदगी नहीं चला करती॥

कब तक बना रहेगा गर्दभ, अपनी अपनी किये रहेगा?
खुद का जीवन सुखमय, कब तक खुश ही बना रहेगा?
एड़ी छोटी घिस, स्वयं का भबिष्य बनाने की कोशिश,
करते करते यूँ ही तू, अब हल से कब तक जुता रहेगा?

मानव बन अब तो जाग, पहचान स्वयं को जीवित हो जा,
सोच समझ, कुछ कदम बढ़ा, कब तक भेडचाल चलेगा?
आज़ाद देश का पंछी है तू, ज्वालामुखी छिपाए अन्दर,
खुद को भूल, राष्ट्र पर यूँ ही, कब तक बोझिल बना रहेगा?

उतार जंग की परतों को अब, तलवारों में लगी हुयी,
तिलक लगा रक्त से अब,कब तक म्यान में ही रखेगा?
प्रारम्भ कर इन गद्दारों से, सफ़ेद रंग के सियारों से,
फिर बदल दे भारत का नक्शा भी, यूँ राष्ट्र तू बदलेगा॥

जाग अब तो जाग क्रांतिवीर, कब तक हल से जुता रहेगा?

जागो

Written By नीरज द्विवेदी on बुधवार, 10 अगस्त 2011 | 7:56 pm


देखो आज फिर लहूलुहान है भारत माँजागो,
अब सार्थक आजादी माँगती है भारत माँजागो,
फिर एक नया सुभाष माँगती है भारत माँजागो,
फिर से एक क्रांति माँगती है भारत माँजागो॥

जागो अब तो जागोकब से... जागो (Complete)


अब तो कुछ करना ही होगा

Written By नीरज द्विवेदी on बुधवार, 13 जुलाई 2011 | 11:40 pm

अन्त होता हुया आज का दिन 13 जुलाई 2011, भारतीय इतिहास का इक और काला दिन है, जिस दिन ये फ़िर सिद्ध हुया कि भारत का नेतृत्व आज नपुंषक कर रहे हैं, और इस देश की विडम्बना कि जनता सो रही है और इन्हे ऐसा करने दे रही है । आज का दिन याद रहेगा, सुबह सुबह मैने कही पढा था कि आज कुख्यात आतंकवादी अजमल कासाब का जन्मदिन है, और आज की ही शाम भारत फ़िर धमाको से गूँज उठा, आतंकियों ने भारत के मुँह पर तमाचा मारा और इस देश का कायर और नपुंषक नेतृत्व केवल तथाकथित गम्भीर विचार करने मे व्यस्त रहा । दुर्भाग्य …

ये साजिश है गद्दारों की, सत्ता के गलियारों की,
नेताओं की पीढी को, अब बदलना ही होगा ।

देख लिया इनका कानून, देख लिया ये वोटाचार,
धरती के इन बोझों को, जिन्दा गडवाना ही होगा ।

रोज रोज ये मौतें देख, जीवन काँपा करता है,
इनकी आँखों में पट्टी, पूरा भारत शर्मसार है ।

अक्ल न अब भी आई तो, राजशक्ति ना थर्राई,
तो हे भारत के नपुंषकों, तुमको मरना ही होगा ।

ये इस देश के कातिल की, मेहमानवाजी करते हैं,
वो अपने जन्मदिवस पर, हमको मारा करते हैं ।

जागो अब महापुरुषों, क्यूँ कुम्भकरण से सोते हो ?
इन सत्तालोलुपों को, तुम्हे कुचलना ही होगा ॥
अब तो कुछ करना ही होगा ।


मिट भी गया तो क्या

Written By नीरज द्विवेदी on मंगलवार, 12 जुलाई 2011 | 11:38 pm

कुछ कहना चाहता हूँहमें पता है कि हमारा अस्तित्व बहुत छोटा हैपर हमारा उद्देश्य कभी छोटा नही रहा । इस भ्रष्टाचार और अराजकता के इस घनीभूत अंधेरे से लडते हुये बुझ भी गये तो दु:ख़ नही होगा । पूरे देश को जगाने का उद्देश्य लेकर आये हैंये देश जहाँ जनता परेशान और हताश होकर सूखे पत्ते की तरह हो गयी हैइन सूखे पत्तो में अगर स्वाभिमान की आग लगाते हुयेअगर इन्ही जलते हुये पत्तो के बीच खो भी गये तो खेद नही होगा । प्रस्तुत है --

उद्देश्य बडा लेकर निकला हूँभारत को राह दिखाना है,

इक छोटा दिया हूँघुप्प अँधेरे से लडबुझ भी गया तो क्या ?

अलख जगानी हर घर कीबाधा हो नर की या पत्थर की,
भारत को फ़िर भारत करने मेंअस्तित्व मिट भी गया तो क्या?

चन्द्रगुप्त के बंशज जागोअब नेताओं को नेतृत्व सिखाना है,
इक चिंगारी हूँसूखे पत्ते सुलगाकरखो भी गया तो क्या ?

भारत का नेतृत्व आजअसहाय पडामृतप्राय हो गया,
भारत माँ का जाया हूँरक्षण हित मिट भी गया तो क्या ?

जीवन के सारे पहलू भारत मेंयहाँ वहाँ निरुद्देश्य पडे हैं,
नेता जनता को छ्लता हैसेवक स्वामी पर भारी है,

वृक्ष का सूखा पत्ता हूँइस आँधी मेंउड भी गया तो क्या ?
मैं तो खाक हूँखाक में पलाखाक में मिल भी गया तो क्या ?
खाक में मिल भी गया तो क्या ?




Founder

Founder
Saleem Khan