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वह तो तुम थीं ...कविता ...डा श्याम गुप्त....

Written By shyam gupta on शुक्रवार, 10 जून 2011 | 5:59 pm

मैंने   सपनों   में   देखी थी 
इक मधुर सलोनी सी काया |

शरमाजाये वो नील गगन,
रुक जाए चलता श्यामल घन|
थम जाए सुरभित मस्त पवन,
जो दिख जाए उसकी छाया || 

चंचल जैसे गति लहरों की,
गंभीर की जैसे सागर हो |
है  कभी छलकती इसे ज्यों,
अधभरी छलकती गागर हो ||
कुछ कहदो तो शरमा जाए ,
कुछ कहदो तो गरमा जाए |
चंचल नयनों में जो कोइ,
आँखे डाले भरमा जाए  ||


गजगामिनि चलती है ऐसे,
सावन का मंद समीरण हो |
कुछ कहे तो लगता है जैसे ,
कोकिल कहती सरगम स्वर हो ||

अधखिले कमल लतिका जैसी ,
अधरों की कलियाँ खिली हुईं |
क्या इन्हें चूमलूं , यह कहते,
वह  होजाती  है   छुई-मुई ||

मैं यही सोचता था अब तक,
यह कौन है इतना  मान किये |
तुमको  देखा , मैंने  पाया,
यह तो तुम ही थीं मधुर प्रिये ||      

                                                    ---काव्य दूत से...

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