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दष्ठौन...कविता...डा श्याम गुप्त.....

Written By shyam gupta on बुधवार, 27 जुलाई 2011 | 4:46 pm


पुत्री के जन्म दिन पर,

दष्ठौन, पार्टी !

कहा था आश्चर्य से ,

तुमने भी ।

मैं जानता था पर -

मन ही मन ,

तुम खुश थीं ,

हर्षिता, गर्विता |


दर्पण में,

अपनी छवि देखकर,

हम सभी प्रसन्न होते हैं ;

तो , अपनी प्रतिकृति देखकर ,

कौन हर्षित नहीं होगा |


पुत्र जन्म पर ये सवाल -

क्यों नहीं पूछा था तुमने ?

मैंने भी पूछ लिया था-

अनायास ही |

इसका उत्तर -

लोगों के पास तो था,पर-

नहीं था तुम्हारे पास ही |


प्रकृति-पुरुष,

विद्या-अविद्या,

ईश्वर-माया,

शिव और शक्ति;

युग्म होने पर ही -

पूर्ण होती है,

यह संसार रूपी प्रकृति |

अतः, गृहस्थ रूपी संसार की

पूर्णाहुति में ही है

यह पार्टी ||






Founder

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Saleem Khan