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मिथक तब टूटेंगे....

Written By रेखा श्रीवास्तव on शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011 | 1:20 pm

क्या सिर्फ कुर्सी पर बैठा भर लेने से नारी को सशक्त बनाया जा सकता है? नहीं इसके लिए तो सबसे पहले हमें अपनी सोच बदलनी होगी और नारी को भी अपने को विचारों और आचरण से सुदृढ़ बनाना होगा। अगर कुर्सी पर बैठो तो फिर इंदिरा बनो, लक्ष्मी बाई बनो , दुर्गा भाभी बनो। तब सार्थकता है कि नारी भी नर के कंधे से कन्धा मिलाकर चल सकती है और वे उसको अपनी सहयोगी और समकक्ष समझते हैं।
नारी आरक्षण की मांग हर तरफ उठ रही है और मिल भी रहा है। लेकिन उस आरक्षण की दुर्दशा अभी हाल ही में हमारे उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात के ग्राम प्रधान की स्थिति से जाना जा सकता है। पद आरक्षित था तो पुरुष तो उसको लड़ नहीं सकता था और न ही उस पर काबिज हो सकता था। पत्नी या बहू को चुनाव लडवा दिया और जब जीत गयी तो फिर कठपुतली की तरह से नचाना शुरू कर दिया। जेठ जी ने चुनाव प्रचार में रुपया खर्च किया था तो उनको वसूलना था और वसूल कैसे सकते थे? अगर उसके पास होता तो वह खुद ही खर्च कर लेती । इसके लिए उससे चैक पर हस्ताक्षर लेकर रूपया निकालने का कम शुरू हुआ। उसको बंधक बना दिया गया और चैक पर हस्ताक्षर लेने का सिलसिला कभी बंद न होता अगर वह बहाने से अपने मायके आकर इस बात की रिपोर्ट आला अधिकारियों से न कर पाई होती। उसके बाद भी मामले की स्पष्ट खोजबीन सामने नहीं आ पाई और उसने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया।
ये आरक्षण देने भर से एक रात में विधेयक पारित होने के साथ ही नेत्रियाँ पैदा नहीं हो सकती हैं। इसके लिए एक पृष्ठभूमि भी चाहिए , उनकी शिक्षा भी चाहिए और उनमें जागरूकता भी चाहिए कि उनका कोई प्रयोग न कर सके। गाँव कि बात छोडिये हम शहर कि बात करते हैं। पार्षद पत्नी चुनी जाती है और वह पत्नी सिर्फ शपथ लेने भर जाती है और उसके बाद सभासद उनके पति कहला रहे हैं और पत्नी के हस्ताक्षर किये कागज़ लेकर सारे काम करते फिर रहे हैं। क्या यही नारी सशक्तिकरण की तस्वीर है। अगर नारी को उसकी प्रतिभा या अधिकार के प्रयोग तक सही दिशा देनी है तो फिर उसको सहयोग दीजिये कि वह उसके काबिल तो बने ही साथ ही अपने अधिकारों का स्वतंत्रता पूर्वक प्रयोग कर सके। कुर्सी को शोभा भर बने रहने से उसका कोई भी भला नहीं होने वाला है। इसलिए अगर आप आरक्षण का लाभ उठा रही हैं तो खुद तो उस लायक समझें तभी उसको लें अन्यथा किसी अन्य योग्य महिला के लिए रहने दें। कठपुतली बन कर काम करने से अच्छा है कि वह घर में पति और बच्चों के कार्य को बखूबी करती रहे. इसमें कोई बुराई नहीं है.

Founder

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Saleem Khan