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उसे पता भी न चला

Written By Pappu Parihar Bundelkhandi on रविवार, 10 नवंबर 2013 | 6:12 pm

उसे पता भी न चला,
उसके लिए,
कितने,
लड़ गये,
मर गए,
कट गए,
कितनों का खून बहा,
कितनों को चोटें लगीं,

उसे पता भी न चला,
उसके लिए,
दोस्त-दोस्त से लड़ा,
छोटा बड़े से भिड़ा,
हर कोई एक-दुसरे से चिड़ा,
दोष दुसरे पर मढ़ा,

उसे पता भी न चला,
उसके लिए,
दीवानगी किस-किस की,
दाव-पर-दाव,
उसके नाम पर लगे,
शहर पर सहर,
उसके नाम से बसे,

उसे पता भी न चला,
उसके लिए,
कितनों ने उसे सपनों में बुलाया,
सपनों में सजाकर,
सपनों कि रानी बनाया,
सपनों ही सपनों में,
ब्याह रचाया,
उसे पता भी न चला,

...

क्या लिखूँ, कैसे लिखूँ,

Written By Pappu Parihar Bundelkhandi on गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013 | 7:19 pm

क्या लिखूँ, कैसे लिखूँ,
कुछ समझ आता नहीं,
जिन्दगी के यह हालात,
मैं किसी को बतलाता नहीं,

बड़ी बेबसी है,
बड़ी बेकसी है,
दिल में बहुत जगह है,
हर गम दिल की पनाह है,

हाज़िर न प्यार करूँ,
जाहिर न इनकार करूँ,
कैसे लिखूँ अपने मौजू को,
किस-किस का इंतज़ार करूँ,

कलम भी है, कागज़ भी है,
स्याही भी है, मेज भी है,
लिख न कुछ पा रहा हूँ,
हर गम आपसे छुपा रहा हूँ,

आँशु ही बह रहे हैं,
हालात वो सब कह रहे हैं,
पता आपका लिख रहे हैं,
चिट्ठी डाकखाने में डाल रहे हैं,

     ..........   पप्पू परिहार


.

बस चन्द दिनों की तो बात है

Written By Pappu Parihar Bundelkhandi on शुक्रवार, 11 नवंबर 2011 | 10:25 am


.
बस चन्द दिनों की तो बात है,
उनकी हमारी हुई मुलाक़ात है,
मुलाकात की तो बस बात है,
एक दो बार की मुलाकात है,

वो अपने आपे में थे,
हम अपने सहापे में थे,
कुछ बात उनकी तरफ से थी,
कुछ बात हमारी तरफ से थी,

यूँ ही बातों-बातों में,
थोड़ी बहुत मुलाकातों में,
वक्त गुजरता चला गया,
दिल एक होता चला गया,

उनको न रहा गया,
हमको न रहा गया,
अगली मुलाकात में,
मम्मी-पापा को बुला लिया गया,

अनजानों से मिले थे,
बात समझ गए थे,
तय उन्होंने कर दिया,
आपको आमंत्रण दिया,


.

यह मासूम निगाहें

Written By Pappu Parihar Bundelkhandi on मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011 | 8:38 am



.....................................

यह मासूम निगाहें,
यह कातिल अदा,
यह लहराती जुल्फें,
यह कपकपाते होंठ,

.....................................

यह जुल्फें,
यह आँखें,
यह मुस्कराहट,
यह खिला-खिला चेहरा,

यह नाजों नक्श,

जो देख ले,
एक बार,
वह हो जाये तुम्हारा,

..................................

ये नज़रों के तीर किसे,
नजराने में पेश कर रही हो,
हमें लगा तुम हमें,

बस हमें देख रही हो,

....................................

यह नज़रें हैं,
यह दिल है,
यह दिल की,
उल्फत है,

काबू में,

न रहीं,
किसी के,
हमारी क्या,
जुल्फत है,

..........................................







उफ़ ये अदा, हो गए जिस पर फ़िदा

Written By Pappu Parihar Bundelkhandi on शनिवार, 15 अक्टूबर 2011 | 8:46 am

 
................................................
 
उफ़ ये अदा, हो गए जिस पर फ़िदा,
       न रहा गुमान, न रहा इमान,
ये जुल्फें ये नजरें ये होंठ ये अदा,
       ये चेहरा या खुदा या खुदा या खुदा,

...............................................


यह तन्हाईयाँ,
       यह यादों में किसी की खोई हूँ,
जागी न सोई हूँ,
       बस यादों में किसी की खोई हूँ,


..................................................



हुस्न का जलवा, तुमने बिखेरा है,
       याद नहीं कहाँ, अपना बसेरा है,
अब डालें कहाँ, अपना डेरा है,
       तुम्हारे दिल में अब बसेरा है,


.................................................

क्यूँ इतना सताती हो,
       सब पर जुल्म ढाती हो,
खुबसूरत हो इतनी,

       फिर क्यूँ इतना सवंकर आती हो,
क्यूँ इतना लजाती हो,

       होश सबके उड़ाती हो,
मासूम हो इतनी,

       फिर क्यूँ इतना नजाकत दिखाती हो,
 

..................................................... 


दूर वो जिन्दगी से अब

Written By Pappu Parihar Bundelkhandi on शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011 | 12:05 pm

दूर वो जिन्दगी से अब,
धीरे-धीरे जाने लगे हैं,
उनकी चाल से महसूश किया,
किसी की अपनाने लगे हैं,

हमने भी उन्हें छोड़ दिया,
आज़ादी दे दी,
तब से लेकर तब तक,
जिन्दगी उनके बिना ही जी ली,

वर्षों बाद दिखे थे,
एक हसीना के साथ,
घूम रहे थे दोनों,
डाले हाथों में हाथ,

हम उनके सामने न आए,
वो हमको न देख पाए,
दूर से ही नज़र रखी,
अपनी ही सहेली दिखी,


.

चन्द्रमुखी चौटाला - 3

Written By Pappu Parihar Bundelkhandi on गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011 | 7:09 am

कविता कौशिक, Kavita Kaushik

.
आपका अंदाज़-ए-उर्दू भा गया,
आपकी अदा से अदावत पा गया,
वाह-वाह क्या बात है,
आपकी जुबाँ-ए-उर्दू लाजवाब है,

वो नाज़ुक अंदाज़, आपका आज हटकर था,
वो अदाकारी का अंदाज़, आज आपका नायाब था,

वो लफ़्ज़ों को बोलने का अंदाज़,
हमें बहुत कुछ सिखा गया आज,
आज का आपका नजरिया-ए-नाज़,
आपकी नजाकत दिखा गया आज,

नाज़ुक-ए-हुश्न की हसीना आप फब रही हैं,
आज आप इस लिबास में हसीन लग रही हैं,
आज आपके इस अंदाज़ के हर कोई दीवाने हुए,
आपकी अदाकारी के किस्से गली-गली सुनाने हुए,

.

माजरा ये मोहब्बत, यारों, समझ से समझ आता है


.
माजरा ये मोहब्बत, यारों, समझ से समझ आता है,
जब होती है मोहब्बत तब माज़रा ये समझ आता है,

बिन मोहब्बत किये, कईओं ने दीवाना समझा,
कितनों ने ताने दिए, कईओं ने बेगाना समझा,

पर वो मोहब्बत की गहराई जानता है, यारो,
उसने मोहब्बत निभायी है, यारो,

उसके किस्से मशहूर हुए ज़माने में,
हूर जो मिली उसे अनजाने में,

तन्हा होकर वक्त जो उसने बिताया,
इश्क ने एक दिन उसे नूर-ए-खुदा दिलाया,

.

कुछ निगाहें उनकी

कुछ निगाहें उनकी,
दूरी-दूरी बना रही थी,
पास आने से,
कतरा रहीं थीं,

दूर से निगाह भी,
न मिला रहीं थीं,
दूर-दूर ही वो,
चली जा रही थीं,

सोचो,
मंज़र-ए-हकीक,
क्या गुजरी होगी,
मेरे दिल पर,

जो रोज़ आगोश में,
मचलती थीं,
आज दूर से ही,
निकलना चाहती थीं,

जाते हैं,
वजह को,
तलाशते हैं,

क्यूँ दूर-दूर,
ये,
मुगालते हैं,


.

दूर अक्नायितों से आवाज़-सी आती है

दूर अक्नायितों से,
आवाज़-सी आती है,
कोई निगाह,
बार-बार,
देख-सी जाती है,

मन ही मन में,
सोचता हूँ,
यह हूर कौन हैं,
जो तक-सी जाती है,

क्यूँ मुझे,
देख जाती है,
देखकर,
अनदेखा,
कर जाती है,

रोज़-रोज़,
इसी तरह,
छत पर,
चली आती है,

बैठा हूँ,
अपनी किताबें लेकर,
अब कोई,
बहाना लेकर,

सोच उसी के,
बारे में,
रहा हूँ,
समझ न,
पा रहा हूँ,

रोज़-रोज़,
मैं भी,
छत पर,
चला आता हूँ,

इक रोज़,
वो न आयी,
बड़ी देर,
नज़र बैठाई,

सीडियों पर,
आवाज़ आयी,
झट से निगाह,
किताब में,
गड़ाई,

बहिन है,
मेरी आयी,
साथ उसके,
वो भी आयी,

मेरी तो हवा,
निकल आयी,
क्या शिकायत,
लेकर आयी,

फिर कभी वो,
छत पे न आयी,
आज तक है,
आस लगाई,

बात बाद में,
पता चलाई,
उसकी तो,
हो गयी सगाई,

यहाँ तो बस,
घूमने है आयी,
वो हो गयी,
अब परायी,

हाय वो लम्हा,
कभी-कभी जिन्दगी भर सताता है,
जब सामने से मोहब्बत आती है,
पर इश्क इतराता है,

हिम्मत गर उस वक्त कर जाता,
उसे इस वक्त अपने पास पाता,

.

उसने ये जिन्दगी हंसकर गुज़ार दी

उसने,
ये जिन्दगी,
हंसकर,
गुज़ार दी,

अहसास तक,
न होने दिया,
रोकर,
गुज़ार दी,

तन्हाई में,
अपनी,
किसी को,
न शामिल किया,

भरी भरकम,
जिन्दगी को,
अकेले ही,
उसने जिया,

मिलता था,
ख़ुशी से,
गले लगकर,
सभी से,

खिलता था,
चेहरा,
खिली-खिली,
हंसी से,

दिल के,
आंसुओं को,
आँखों की,
नमी,
न बनने दिया,

उन्ही से,
सींचकर,
नूर,
अपना,
है बनने दिया,


.

वो नज़र

वो नज़र,
किस तरह,
मुझे,
पड़ने की,
कोशिश,
कर रही है,

वो नज़र,
किस तरह,
अपने को,
छुपाने की,
कोशिश,
कर रही है,

मुस्कान-ओ-हैदर से,
चेहरा,
खिल,
उठा है,

उसे देखकर,
मेरा दिल,
मचल,
उठा है,

ये सवारीं,
जुल्फें,
ये तक्बीरियत,
बैठने की,

सफा-ए-हुश्न से,
मत पूछो,
वज़ह,
रूठने की,

फ़नक-ए-रूह,
अब,
सामने,
आईं है,

अनक-ए-रूह,
तब,
हमने,
मिलाईं हैं,

कृतिका कामरा - 3

Written By Pappu Parihar Bundelkhandi on मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011 | 9:38 am

कृतिका कामरा Kritika Kaamra


.

वाह साफ़ाकियत-ए-मजमूनात,

तेरे हुश्न के लिए क्या कहूँ,

गोशा-ए-लफ़्ज़ों को रहने दूँ,

दीदार-ए-अदा, आखें खुली रखूँ, 


.

.

तन्हाईओं में उसे



.

तन्हाईओं में उसे,
पुकारता चला,
दिल ही दिल में,
यादारता चला,

ईधर से उधर,
टहलता चला,
मन ही मन,
मचलता चला,

तन्हाईओं में .......

टकराया न किसी से,
अपने आप को,
जिन्दगी में,
संभालता चला,

खोया है तुमको जबसे ,
अपने आप को,
जिन्दगी में,
रम्भालता  चला,

तन्हाईओं में .......


.

वो, पास से



.
वो,
पास से,
गुज़र,
जाते हैं,

नज़र,
न,
ऊपर,
उठाते हैं,

उनके,
आने का,
अहसास,
हम,
भांप,
जाते है,

.........

औरों से,
बतियाते हैं,
हँसते हैं,
हँसाते हैं,

एक नज़र,
हमारी तरफ,
न फेरते हैं,
न फिरयाते हैं,

............

रोज़-रोज़,
आते हैं,
रोज़-रोज़,
चले,
जाते हैं,

हम,
देखते ही,
रह,
जाते हैं,

पास भी,
न,
फटक,
पाते हैं,

.........

पर,
एक अहसान,
वो,
कर,
जाते हैं,

चेहरा,
अपना,
हर रोज़ 
दिखा,
जाते हैं,

दिया,
दिल का,
जला,
जाते हैं,

रोशन,
निगाह,
कर,
जाते हैं,

आस,
एक,
जगा,
जाते हैं,

जाते-जाते,
कुछ ऐसा,
कर,
जाते हैं,


.

उलझन-सी है, कशमकश-सी है


.
उलझन-सी है,
कशमकश-सी है,
ठहराई-सी है,
गहराई-सी है,

कदम क्या उठाऊं,
रूक जाऊं, चली जाऊं,
बैठे-बैठे समझ न पाऊं,
किस पर ऐतबार कर जाऊं,

ज़माना बड़ा है,
अपना न कोई खड़ा है,
जिधर नज़र पड़ी है,
घूरती नज़र गडी है,

अहसान अब न ले सकूं,
बोझ उसका न सह सकूं,
अह्सानदार बड़ा होता है,
हर जगह खड़ा होता है,

उलझन-सी ....


.


उसे न हँसता हुआ देखा

Written By Pappu Parihar Bundelkhandi on सोमवार, 10 अक्टूबर 2011 | 9:17 am

उसे न हँसता हुआ देखा,
उसे बस उदास-सा देखा,
चेहरे की रोनक खो-सी गयी है,
कोई हूर-सी दिल तोड़ गयी है,

तन्हाई को उसने अपना लिया है,
रोशनाई को उसने छोड़ दिया है,
अब हर नज़र उसे जला-सी जाती है,
अब हर निगाह उसे रुला-सी जाती है,

नज़रें मिलाने से डरने लगा है,
किसी पर न अब मरने लगा है,
दूर-दूर हसीनाओं से रहने लगा है,
करीब न किसी को सहने लगा है,

आज चेहरा खिला था उसका,
महबूब नया मिला था उसका,
तभी फोन सहेली का आया,
आज न आ सकूंगी बताया,

उसने कल का फ़साना दिखाया,
फोन पर उसका फोटो दिखाया,
जिससे कल मिल कर है आई,
राज़ उसके खिले चेहरे का पाई,

यहाँ दिलों के खेल में, बातें ऐसी बेसुमार होती हैं,
जिन पर हो निगाह, वही अपने खास की होती हैं,


.



.
ओ,
उतरता-सा गया,
दिल में,
समाता-सा गया,

रोक न सकी,
अपने को,
टोक न सकी,
सपने को,

ख्वाबों की,
दुनिया में,
खोने-सी,
लगी,

मन-ही-मन,
उसे,
अपनाने-सी,
लगी,

बात उससे,
न.
अभी,
हुयी थी,

नज़र न,
अभी,
दो-चार,
हुयी थी,

जाता देखा था,
उसे राह पर,
दूर-से,
निगाह कर,

उसकी,
वो चाल,
कह गयी,
उसका हाल,

खोई-खोई-सी,
हो गयी,
कुलबुलाहट-सी,
हो गयी,

नीचे जा रही हूँ,
कदम उठते नहीं,
ओ कब मिलेगा,
जान सकते नहीं,

पानी लाना,
मेहमान आयें हैं,
पापा के पुराने
दोस्त आयें हैं,

बहुत दिनों बाद,
तेरे पापा से,
मिलने,
है आयें हैं,

पानी लाई,
नज़र उठाई,
वहाँ उसे,
बैठा पाई,

सहम-सी गयी,
सकपका-सी गयी,
जल्दी-से ट्रे रख,
लौट-सी गयी,

माँ ने तभी,
और बताया,
उनका सुपुत्र,
है साथ आया,

याद दिलाने,
पुराना वादा आया,
तेरे लिया,
है रिश्ता लाया,

.

कुछ तो लोग कहेंगे - 4

Written By Pappu Parihar Bundelkhandi on रविवार, 9 अक्टूबर 2011 | 10:52 am


.
कुछ तो लोग कहेंगे
ये लडकियां भी,
क्या गुल खिलाती हैं,
जवानों को तरसाकर,
बूढों से दिल लगाती हैं,

.

अब वो मेरी जिन्दगी में



.
अब वो मेरी जिन्दगी में,
दुबारा आना चाहते हैं,
पर बात यह है कि,
मैंने दर बंद कर दिए हैं,

कैसे उनको बताऊँ,
दिल पर क्या बीती,
उनसे अल्हदा होकर,
जिन्दगी की जंग जीती,

अब वक्त मिला उन्हें,
मेरी तरफ-तारुफ़ होने का,
जब सारी जिन्दगी बीती गयी,
तब ख्याल आया साथ निभाने का,

अब किसी और की हो चुकी,
तुमसे अब बात बहुत हो चुकी,
अपना वक्त बहुत बेजाया कर चुकी,
तुमसे नज़र अब दूर हो चुकी,



.

Founder

Founder
Saleem Khan