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बाबा "क्षमा" करना

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on सोमवार, 28 नवंबर 2011 | 3:40 pm


बाबा "क्षमा" करना 
शायद किसी की तेज रफ़्तार ने 
उसके पाँव कुचल डाले थे 
खून बिखरा दर्द से कराहता 
आँखें बंद --माँ --माँ --हाय हाय ...
अपनी आदत से मजबूर 
जवानी का जोश 
मूंछे ऐंठता -खा पी चला था - मै
तोंद पर हाथ फेरता -गुनगुनाता 
कोई  मिल जाए 
एक कविता हो जाये  !!
दर्द देख कविता आहत हुयी 
मन रोया उसे उठाया 
वंजर रास्ता - सुनसान 
जगाया -कंधे पर उसका भार लिए 
एक अस्पताल लाया !
डाक्टर  बाबू मिलिटरी के हूस 
मनहूस ! क्या जानें दर्द - आदत होगी 
खाने का समय - देखा -पर बिन रुके 
चले गए -अन्य जगह दौड़े 
उपचार दिलाये घर लाये 
धन्यवाद -दुआ ले गठरी बाँधे 
लौट चले -कच्चे घर -
झोपडी की ओर............
एक दिन फिर तेज रफ़्तार ने 
मुझे रौंदा -गठरी उधर 
सतरंगी दाने विखरे -कंकरीली सडक 
लाठी उधर - मोटा चश्मा उधर 
कुछ आगे जा - कार का ब्रेक लगा 
महाशय आये - बाबा "क्षमा" करना 
जल्दी में हूँ -कार स्टार्ट --फुर्र ..ओझल 
"भ्रमर" का दिल खिल उठा 
“आश्चर्य” का ठिकाना रहा 
किसी ने आज प्यार से 'बाबा" कहा 
“क्षमा” माँगा -एक "गरीब" ब्राह्मण से 
वो भी "माया"-“मोह” के इस ज़माने में 
जहाँ कीचरण” छूना तो दूर 
लोगनमस्ते” कहने से कतराते 
'तौहीन' समझते हैं 
सब "एक्सक्यूज" है 
दिमाग पर जोर डाला 
अतीत में खोया 
आवाज पहचानने लगा 
माथे की झुर्रियों पर बोझ डाला 
याद आया - सर चकराया 
इन्हीभद्र पुरुष”  का पाँव था कुचला 
हमने कंधे पर था ढोया
और उस दिन था ये “बीज” बोया 
या खुदा -परवरदीदार 
अपना किया धरा 
बेकार--कहाँ जाता है ??
कभी कभी तो है काम आता ?
मै यादों में पड़ा 
थोडा कुलबुलाया ..रोया 
फिर हंसा 
अपनी किस्मत पर 
और गंतव्य पर चल पड़ा ....
-----------------------------
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल "भ्रमर" 
२१.११.२०११ यच पी 
.१८-.०८ पूर्वाह्न 

किस घर बैठूं -किसका खाऊँ ?

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on बुधवार, 23 नवंबर 2011 | 9:33 am


किस घर बैठूं -किसका खाऊँ ?
हाथी मेरा खाता पीता
सुस्त चले – रहता बस सोता
अश्वमेध का सपना आया
घोडा चुन-चुन लाया
हाथी पर चढ़ कभी परिक्रमा
जब पूरी ना हो पायी
अश्वशक्ति – कुछ मंत्री- तंत्री
ले उधार तब-इच्छा पूरी कर पायी
सूरज ढलने को आया जब
अँधेरा ना हो जाए !
इसी लिए घर आग लगाया
उजाला -कुछ दिन रह जाए !!
उत्तर हाथी, उत्तर काशी
उत्तर शिला -उत्तर लोढ़ा
चार धाम- मन में आया
साँसें अटकी -जीवित क्यों हूँ
संसद में ला पास करा लूं
अपनी मूरति – कुछ गढ़वा के
चौराहे – मंदिर -में ला -दूँ
———————————
उसका ख्याल ये देख -देख कर
दल-दल मै फंसता जाऊं
अभी एक हैं भाई मेरे
जाऊं थोडा मिल आऊँ !
कल वे बँटे दीवारों होंगे
किस घर बैठूं – किसका खाऊँ ?
——————————-
बार्डर पर जाते ही भैया
एक -मुछंडे ने – रोका !
“बौने” छोटे- वहां बहुत हैं
तेरा “कद” अब भी ऊंचा !!
वीसा -पासपोर्ट -ले आओ
बंट जाए- तो फिर- घर जाओ
अब वो गाँव देश ना प्यारा
अब ये है पर-देश
मारा मारी -विधान -सभा में
नहीं मिला सन्देश ??
———————————–
दो रोटी खाकर मै जीता
कीचड़ वाला पानी भाई
सूखे कुएं का – अब तक पीता
ये कंकाल लिए अपना मै
कैसे पासपोर्ट बनवाऊँ ?
मगरमच्छ हैं -गिद्ध बहुत हैं
भय है- ना नोचा जाऊं !
———————————-
मन चाहे पत्थर की मूरति से
मिल मै – कुछ रो आऊँ
हाड मांस का पुतला अपना
आंसू – थोडा दिखलाऊँ
————————-
इस आंसू में शक्ति बहुत है
थोडा उनको समझाऊँ !
जो सजीव “पाथर” हैं मिल लूं
आँख मिला के -बतलाऊँ
जहर भरा है जिनके रग में
आंसू थोडा- मिला के आऊँ !
मुई खाल की सांस की गर्मी से
थोडा मै पिघलाऊँ !
मन में उनके जो इच्छा है
मार -उसे थोडा मै पाऊँ !
यहाँ पे राज करेंगी मौसी
वहां पे मामा कंस !
विद्वानों को तहखाने कर
मिलकर लेंगे डँस !!
—————————–
भ्रमर ५
यच पी

गुरु नानक जी और प्रकाश पर्व

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on गुरुवार, 10 नवंबर 2011 | 10:53 am


गुरु नानक जी के अमूल्य वचन
भगवान की कृपा प्राप्त करने के केवल दो साधन हैं
* मन को निर्मल बनाये रखना !
** भगवान् के पावन नाम का उच्चारण करते रहना !
गृहस्थ में रहते हुए बुराइयों से डरने वाला अच्छे गुणों को धारण करने वाला भगवान् को हर समय याद रखने वाला !
इस प्रकार से ही भव सागर से पार हो सकता है मानव !
images
(फोटो साभार गूगल / नेट से )



गुरु नानक जी और प्रकाश पर्व




धवल चांदनी जग रोशन है
हँसते हुए सितारे
सुमन बरसता – भेज रहे हैं
“पावन-आत्मा”के स्वागत में
माँ टकटकी लगाये
होनहार कब आयें ,,,
आओ घी के दीप जलाएं
गुरु नानक से पूत हमारे
“कोख” अमर कर जाएँ
हो “प्रकाश पर्व ” कुछ ऐसा
दीवाली मन जाए
उनकी शिक्षा दीक्षा से हम
जीवन सफल बनायें
प्रेम की धरा बहे जहां इस
बंधन ना हो कोई
सिंध-पाक -अमृतसर चाहे
ननकाना दरबार
मानव-मानवता भर जाए
वीर-सपूत हजार
गुरु-ग्रन्थ साहिब को माथे
रख के करें प्रचार
सत्य धर्म अरु प्यार अहिंसा
कभी ना होए अत्याचार
पंज-आब से धरती अपनी
श्रम से चलो बनाएं
हरियाली-खुशहाल-शांति
हर प्रदेश फैलाएं
चलो गरीबी भूख को भाई
जग से दूर भगाएं
भूख मिटे फिर ना हो चोरी
गुरु शिक्षा से उन्नत हो के
बनें गुरु हम विश्व पटल में
पंख फैलाएं -उड़ जाएँ हम
नभ के तारे छू छू आयें
“मंथन” सागर कर जाएं
शत सहस्त्र हम दीप जलाएं
रोशन मन तन कर जाएं
हमारे सभी मित्र मण्डली को इस प्रकाश पर्व की ढेर सारी शुभ कामनाएं – हमारे महापुरुषों का आशीष सदा आप सब पर बरसे -एक प्रभा मंडल और ज्योति आप के माथे पर विराजे ….सभी सपूतों को भ्रमर का नमन …
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल “भ्रमर’
हिमाचल
१०.११.२०११ ७.४०-८.२२ पूर्वाह्न

ईमानदार आदमी सांप हैं ??

Written By SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR5 on शुक्रवार, 4 नवंबर 2011 | 12:58 pm

ईमानदार आदमी सांप हैं ??






तुम बिल में ही रहो

बाहर झांको और घुस जाओ

अँधेरे में

कोई संकीर्ण रास्ता गली

ढूंढ रौशनी ले लो

हवा ले लो

सांस ले लो

त्यौहार पर हम चढ़ावा दे देंगे

दूध पिला देंगे

जब की हम जानते हैं

तब भी तुम हमारे लिए

जहर उगलोगे

जब भी बाहर निकलोगे

देव-दूत बन डोलोगे

मेला लग जाता है

भीड़ हजारों लाखों लोग

आँख मूँद तुम पर श्रद्धा

जाने क्या है तुम में ??

औकात में रहो

देखा नहीं तुम्हारे कितने भाई मरे

हमारे मुछंडे मुस्तैद हैं

फिर भी तुम्हारी जुर्रत

बाहर झांकते हो

आंकते हो -हमारी ताकत ??

फुंफकारते हो

डराते हो

हमारे पीछे है एक बड़ी ताकत

बिके हुए लोग भ्रष्ट ,चापलूस

भिखारी , गरीब , भूखे -कमजोर

बहुत कुछ ऐसे -कवच ----

फिर भी जाने क्यों

हमारे दिल की धडकनें भी

बढ़ जाती हैं

मखमली गद्दों पर नींद नहीं आती है

नींद की गोलियां बेअसर दिखती हैं

बीबी बच्चों से दूर

अकेले में निस्तब्ध रात्रि में

मै भी हाथ जोड़ लेता हूँ

तुम्हारे आगे

की शायद ये डर भागे ------

शुक्ल भ्रमर -.१३-.२५ पूर्वाह्न

यच पी .११.2011


ईमानदारी के ये दो रूपये

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on रविवार, 2 अक्टूबर 2011 | 4:45 pm

मेरी एक अलग जाति है
छुआ छूत है मुझसे
अधिकतर लोग किनारा किये रहते हैं
३६ का आंकड़ा है मेरा उनका
नाम के लिए मै
एक पदाधिकारी हूँ एक कार्यालय का
लेकिन चपरासी बाबू सब प्यारे है
दिल के करीब हैं
कंधे से कन्धा मिलाये
ठठाते हैं हँसते बतियाते हैं
पुडिया से दारु ..कबाब
अँधेरी गली के सब राजदार हैं
सुख में सब साथ साथ हैं
सब प्रिय हैं साथी हैं
जो भी मेरे विरोधी हैं
उनके …अरे समझे नहीं
मेरे प्रबंधक के ….
हमसाये हैं ..हमराही हैं
मेरे मुह से निकली बातें
चुभती हैं
उनके कानों कान जा पहुँचती हैं
चमचों की खनखनाहट
जोर की है
जहां मेरा रिजेक्शन का मुहर लगने वाला हो
फाईल मेरे पास आने से पहले ही
वहां तुरंत अप्रूवल हो जाता है
और मै मुह देखता
दो रोटी की आस में
दो किताबों की चाह में
जो मेरे प्यारे बच्चों तक जाती है
जो दो रूपये कल उनका भविष्य….
ईमानदारी के ये दो रूपये
तनख्वाह के कुछ गिने चुने ….
मुहर ठोंक देता हूँ
कडवे घूँट पी कर
उनकी शाख ऊपर तक है
उनका बाप ही नहीं
कई बाप …ऊपर बैठे हैं जो
मेरे पंख नोच ..जटायु बना देने के लिए
मैंने रामायण पढ़ा हैं
समझौता कर …अब जी लेता हूं
अधमरा होने से अच्छा
कुछ दिन जी कर
कुछ तीसरी दुनिया के लिए
आँख बन जाना अच्छा है
शायद कुछ रौशनी आये
मेरी नजर उन्हें मिल जाए
बस जी रहा हूँ ….
अकेले पड़ा सोचता हूँ
नींद हराम करता हूँ
जोश भरता हूँ
होश लाता हूँ
चल पड़ता हूँ …..
गाँधी जी का एक भजन गाते हुए
जोदी तोर डाक सुने केऊ ना आसे
तोबे एकला चोलो रे …..
शुक्ल भ्रमर ५
२.१०.२०११
यच पी

ना जाने क्यों वो “बुत” बनकर

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on रविवार, 25 सितंबर 2011 | 8:26 pm

ना जाने क्यों वोबुत” बनकर

मंदिर दौड़ी मस्जिद दौड़ी
कभी गयी गुरुद्वारा
अर्ज चर्च में गली गली की 
खाक छान फिर पाया 
लाल एक मन-मोहन भाया
मेरे जैसे कितनी माँ की
इच्छा दमित पड़ी है अब भी 
कुछ के “लाल” दबे माटी में
कुछ के जबरन गए दबाये 
बड़ा अहम था मुझको खुद पर 
राजा मेरा लाल कहाए 
ईमां धर्म कर्म था मैंने  
कूट -कूट कर भरा था जिसमे
ना जाने क्यों वोबुत” बनकर
दुनिया मेरा नाम गंवाए
उसको क्या अभिशाप लगा या
जादू मंतर मारा किसने
ये गूंगा सा बना कबूतर
चढ़ा अटरिया गला   फुलाए
कभी गुटरगूं कर देता बस
आँख पलक झपकाता जाए
हया लाज सब क्या पी डाला
दूध  ko  मेरे चला भुलाये
कल अंकुर फूटेगा उनमे
माटी में जोलाल” दबे हैं
एकलाल” से सौ सहस्त्र फिर
डंका बज जाए चहुँ ओर
छाती चौड़ी बाबा माँ की
निकला सूरज दुनिया भोर 
हे "बुततू बतला रे मुझको
क्या रोवूँ  मै ??  मेरा चोर ??
चोर नहीं ....तो है कमजोर ??
अगर खून -"पानी"  है अब भी
वाहे गुरु लगा दे जोर  
शुक्ल भ्रमर
यच पी २५..२०११
.१५ पी यम

Founder

Founder
Saleem Khan