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करिए करिए शाहा ब्यारी..एक आध्यात्मिक आनंद

Written By बरुण सखाजी on शनिवार, 4 अगस्त 2012 | 11:41 pm

नर्मदा का रेतीला मैदान, तो कई बार ऊंची घाटी को छूते पल्लड़। यानी कभी गर्मी में तो कभी भारी बारिश तो कभी ठंड की सिहरन में भी मल मास पड़ा। पर महिलाओं में इतना जोश को सुबह 4 बजे से नर्मदा के एक महीने तक लगातार स्नान करतीं। फिर पूजन और एक बहुत ही खूबसूरत भजन गीत: करिए करिए शाहा ब्यारी, जी महाराजा अवध विहारी, इतनी सुन मैया जानकी जी बोली कहा बनी तरकारी। कहने को यह भजन था, लेकिन अध्यात्म के गहरे मंथन सा आनंद इसमें आता। नर्मदा में ठिठुरते हुए स्नान फिर बीच में भगवान की मूर्ति और फिर यह गीत। हम लोग ज्यादा नहीं समझते थे। गांवों में मनोरंजन के साधन भी कम होते हैं, इसलिए ही सही। मगर सब दोस्त टोली बनाकर इस आनंद में शरीख होते जरूर थे। कालांतर प्रकारांतर में पता चला कि यह एक धार्मिक विधि है। सभी महिलाएं मल मास (विक्रम संवत में हर तीन साल में एक महीना अतिरिक्त होता है। इसे ही मल मास या पुरुषोत्तम मास कहा जाता है) या कार्तिक मास में ब्रह्म मुहूर्त की गोधुली बेला में स्नान कर शायद पाप धोना चाहती होंगी, मगर मेरे लिए तो सिर्फ इस गीत का सुमधुर गीतात्मक आनंद जरुरी था। बचपन बीता कुछ चीजों की समझ बढ़ी। तब सालों बाद गांव पहुंचे तो देखा पहले मल मास के स्नान के लिए सुबह से ही महिलाएं घरों घर बुलौआ सा देती हुई जाती थी। यह बुलौआ महज एक आह्वन नहीं हुआ करता था, बल्कि आत्मिक रूप से माईं, चाची, बड़ी अम्मा, दादी या किसी को उनके गांव के नाम वाली फलां के नाम से पुकारती हुईं चली जाती थीं। यह कोई वंृदावन की कृष्ण भक्ति सा नजारा था, लेकिन जब में इस बार गया तो सबकुछ बदल सा गया था। अगस्त में यह मल मास चल रहा है, महिलाएं अब भी उसी नर्मदा में नहाने जा रहीं हैं। किंतु तरीका बदल गया है। पहले जो पूरा गांव एक होकर धमनी के रास्ते, ऊपर के रास्ते से नर्मदा में इकट्ठा होता था, वह अब सब अपनी-अपनी राह से नर्मदा जा रहा था। कोई किसी को नहीं बुलाता, अब बस कुछ झुंड थे। कोई एक जाति के नाम पर तो कोई एक परिवार के नाम पर। इनमें कुछ ऐसे झुंड भी थे, जो मुहल्लों के नाम पर हैं। कुल संख्या में भी कमी आई थी। मेरे लिए यह सब रोमांचक था, चूंकि शहरी परिवेश ने जो दिया सो दिया लेकिन सुबह जल्दी उठने की अच्छी आदत वह हमेशा के लिए लेकर उड़ गया। लेकिन करिए करिए शाहा ब्यारी की एक सुरमयी धुन अभी भी कानों में तैर जाती है, तो एक आध्यात्मिक संगीत मन के भीतर कहीं बज उठता है। निश्चित तौर पर यह एक धार्मिक विधि और पापों से मुक्ति का एक जरिया थी। किंतु यह प्रक्रिया गांवी सहजता, अपने कर्मोंं के साथ ईश्वरीय चिंतन, सबके बीच के प्रेम, उत्सवी भारतीय मानस, को प्रतिबिंबित करती थी। पूरी जिंदगी भले ही सही और गलत के बीच फैसला न कर सके हों, किंतु एक डुबकी इस नाम पर लगाना कि जो कुछ गलत किया उसके लिए माफी अच्छी बात थी। यह उस युगबंधक मनुष्य के मानस पर एक तमाचा भी है, जो यह मानता है कि युग बदला है तो हम सतयुग या अच्छे युग के कैसे हो सकते हैं। एक अलग इंसानी फितरत भी यहां झलकती है कि इंसान चाहे कितना ही आगे पीछे, ऊपर नीचे चला जाए मगर वह अपने गलत कामों को सुधारने की कोशिश करता ही रहेगा। सालों बाद के गांवी गुटों को देखकर तकलीफ होती जरूर है, किंतु यह सोचकर कि इंसान हमेशा सुधरने की कोशिश करता है। इस मामले में भी वह आज नहीं, कल नहीं परसों जरूर अपने मुहल्ला गुटों को खत्म करके एकल गांवी गुट बन सकेंगे। चूंकि इन दिनों मल मास चल रहा है और यह महिलाएं स्नान भी कर ही रहीं है, तो मुमकिन है वे फिर चाची, दादी, बड़ीअम्मा, नन्हेघर की दादी, नैलापुर वाली, कैलकच्छ वाली, भौजी आ जाओ चिल्लाती हुईं नर्मदा जरूर जाएंगी। और मुझे वो गीत सुनने मिलेगा करिए करिए शाहा ब्यारी, जी महाराज अवध विहारी, इतनी सुन मैया जानकी जी बोलीं कहा बनी तराकारी। करिए करिए शाहा ब्यारी... वरुण के सखाजी चीफ रिपोर्टर, दैनिक भास्कर, रायपुर
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