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MERI ZINDGI KI TARAH

Written By Bisari Raahein on गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011 | 10:08 pm

                   { मेरी जिंदगी की तरह }
                 बीच राह पर ...
                ठोकरों में जमाने की 
                पडा है वो 
              ' इक पत्थर का टुकड़ा ',
               जाते हुए राही की 
                ठोकर से था 
                दूर जा गिरा ,
                 आते मुसाफिर की 
                ठोकर से फिर 
                 वहीँ आ पड़ा ,
               अकेला वीरान है 
                नहीं सुनने वाला 
                 कोई दुखड़ा ,
               लोगों के काम आता
               फिर दुत्कारा जाता ,
                बेकार जो पड़ा है 
                 ये पत्थर का टुकड़ा ,
                 चौंक उठता है 
                  राहिओं की 
                   ठोकरों से रह -रह ,
                  शायद इसकी भी 
                  बस यही जिंदगी है 
                   मेरी जिंदगी की तरह,
                   मेरी जिंदगी की तरह ..........
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4 टिप्पणियाँ:

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

ईमान लाओ और नमाज अदा करो फिर आपको सुकून मिलेगा और आप ठोकर में पड़े हुए पत्थर के बजाय माइल स्टोन बन जाएंगे ।

shyam gupta ने कहा…

सही है रास्ते का पत्थर की बज़ाय, इबादत के पुष्प बनो, शहीदों के पथ पर चढो....

सदा ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

जिन्दगी कि परिभाषा सबकी अपनी अपनी अलग अलग होती है, बस सब उसको अपने तरीके से जी लेते हैं.

पत्थर खुद प्रतिकार नहीं कर सकता है लेकिन इंसान अपने लिए प्रतिकार और दृढ होने का संकल्प कर सकता है. इसलिए हमेशा सकारात्मक सोच रखनी चाहिए.

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