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क्या केवल प्रशासनिक पद पर बैठी बेटी ही मजबूत है - मिशन शक्ति अभियान पर सुलगता सवाल शालिनी कौशिक एडवोकेट का

Written By Shalini kaushik on शुक्रवार, 1 मई 2026 | 10:10 am

    


    उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के मार्गदर्शन में ''महिलाओं तथा बच्चों की सुरक्षा, सशक्तिकरण व सम्मान'' के उदद्देश्यों के साथ ''मिशन शक्ति'' के रूप में वृहद अभियान की शुरुआत की गई. मिशन शक्ति अभियान के पहले चरण की शुरूवात 17 अक्टूबर 2020 को की गई थी. मिशन शक्ति अभियान के 4 चरणों में सफल संचालन के पश्चात् मिशन शक्ति फेज-5, उत्तर प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान, स्वावलंबन, स्वास्थ्य और सशक्तिकरण के लिए शुरू किया गया, जिसकी शुरुआत 20 सितंबर 2025 को हुई थी। यह अभियान महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और समाज में उनकी भागीदारी को बढ़ाने पर केंद्रित है, जिसमें स्वास्थ्य हेल्पलाइन का शुभारंभ, 'बीसी सखी' जैसी योजनाओं से जोड़ना और पुलिस द्वारा जागरूकता कार्यक्रम चलाना शामिल है।

       अभी तक के मिशन शक्ति अभियान के यदि हम पांचो चरणों की बात करें तो हम पाते हैं कि इस अभियान में महिला शक्ति को प्रशासनिक क्षेत्र में ही आगे बढ़ाने का आदर्श स्थापित किया गया है -

✒️ अमरोहा: मिशन शक्ति के तहत, एमएस सीनियर सेकेंडरी स्कूल की छात्रा निष्ठा एक दिन की थानेदार बनीं. उन्होंने महिला अपराधों पर सख्त कार्रवाई करने का निर्देश दिया.

✒️ जौनपुर: कक्षा 10 की छात्रा दिव्या यादव ने मिशन शक्ति के तहत एक दिन के लिए थानाध्यक्ष का पद संभाला और महिला सशक्तिकरण का संदेश दिया.

✒️ शाहजहांपुर: टियारा अरोरा को एक दिन के लिए मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) बनाया गया. उन्होंने स्वास्थ्य विभाग का निरीक्षण किया और फरियादियों की समस्याएं सुनीं.

✒️ रायबरेली (सलोन): कन्या पूर्व माध्यमिक विद्यालय की छात्रा सोनाली जोशी ने एक दिन के लिए नगर पंचायत की कार्यकारी अधिकारी (EO) का पद संभाला और बालिकाओं को सशक्त बनाने के उद्देश्य से कार्य किया.

✒️ रायबरेली (महाराजगंज): उच्च प्राथमिक विद्यालय सलेथू की कक्षा सात की छात्रा अंशिका वर्मा को एक दिन के लिए खंड शिक्षा अधिकारी (BEO) बनाया गया, और उन्होंने विभागीय योजनाओं की जानकारी ली.

✒️ मिर्जापुर: पटेहरा कला के कंपोजिट विद्यालय की कक्षा 7 की छात्रा सुनैना को एक दिन के लिए खंड विकास अधिकारी (BDO) बनाया गया. उन्होंने स्वयं सहायता समूहों को जोड़ने पर जोर दिया.

✒️ शामली : उत्तर प्रदेश सरकार के 'मिशन शक्ति' अभियान के मद्देनजर शामली जनपद में सराहनीय और अनूठी पहल करते हुए महिलाओं को सशक्त और जागरूक बनाने के लिए ज़िले की 21 प्रतिभाशाली बेटियों को एक दिन के लिए प्रशासनिक पदों की जिम्मेदारी सौंपी गई। अभियान के तहत बेटियों के उम्दा प्रदर्शन ने न केवल जनपद का मान बढ़ाया, बल्कि होनहार बेटियों ने प्रशासनिक अनुभव प्राप्त कर सशक्त भारत का चेहरा भी प्रस्तुत किया।

         मिशन शक्ति अभियान उत्तर प्रदेश में अपने पांच चरण पूर्ण कर चुका है. पांचो अभियान में बेटियों को डी एम, एस पी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी जैसे वरिष्ठ प्रशासनिक पदों की जिम्मेदारी ही सौंपी गई. ये एक सराहनीय पहल है बेटियों में शक्ति व ऊर्जा भरने के संबंध में, किन्तु ये मिशन शक्ति अभियान सम्पूर्ण नहीं कहा जा सकता जब तक कि इसमें नारी शक्ति के आरम्भ से लेकर आज तक के स्वरूप को अनदेखा कर दिया जायेगा.

नारी पर आरम्भ से लेकर आज तक दो दो परिवारों की जिम्मेदारी रही है, इसलिए उसकी शक्ति को अनदेखा या उपेक्षित किया ही नहीं जा सकता. नारी सबसे पहले गृहणी होती है, 

वह ही प्रथम शिक्षिका का मानद दर्जा पाती रही है. कहा भी जाता रहा है कि एक नारी का शिक्षित होना दो परिवारों का शिक्षित होना है. सावित्री बाई फुले की जयंती 3 जनवरी को पूरा देश मनाता है और वे प्रथम शिक्षिका के रूप में सम्मान पाती आई हैं,


नारी ने समाज सेवा के क्षेत्र में भी बड़े बड़े कीर्तिमान स्थापित किये हैँ,दीदी माँ साध्वी ऋतंभरा जी, हिंदू धर्म की शिक्षाओं के महत्व और समाज के लोगों पर पड़ने वाले इनके प्रभावों पर प्रवचन देती हैं। बेटियों की जिम्मेदारी संभालती हैं और उनके घर बसाने में पूर्ण सहयोग करती हैँ. उनके द्वारा पालन पोषण प्राप्त आज बहुत सी बेटियां प्रशासनिक पदों पर विराजमान हैँ और देश की शोभा बढ़ा रही हैँ.


वकालत के क्षेत्र में झंडे गाड़ने में भी नारी पीछे नहीं हैं और बहुत पहले से ही महिला अधिवक्ता भी समाज को मिलती रही हैँ.कॉर्नेलिया सोराबजी (15 नवंबर 1866 - 6 जुलाई 1954) एक भारतीय महिला थी, जो मुम्बई विश्वविद्यालय से पहली महिला स्नातक, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में कानून का अध्ययन करने वाली पहली महिला थी(वास्तव में, किसी भी ब्रिटिश विश्वविद्यालय में अध्ययन करने वाली पहली भारतीय राष्ट्रीय, भारत में पहली महिला वकील , और भारत और ब्रिटेन में कानून का अभ्यास करने वाली पहली महिला। 2012 में, लंदन के लिंकन इन में उनकी प्रतिमा का अनावरण किया गया था।


भारत क़ृषि प्रधान देश है और भारतीय खेती मूलतः वर्षा पर निर्भर है. ये कठिन कार्य भारतीय पुरुष प्रधान समाज नारी के सहयोग के बिना करने में सक्षम नहीं है. भारत का इतिहास साक्षी है खेती के कठिन क्षेत्र में नारी के गरिमामय योगदान का और आरम्भ से लेकर आज तक नारी केवल खेत पर पति के लिए खाना लाने का ही कार्य नहीं करती रही बल्कि किसान बनकर भी अपना योगदान देने से पीछे नहीं रही है.


घर में झाडू को लक्ष्मी का दर्जा दिया गया है.यहाँ तक कि अगर गलती से झाड़ू को पैर लग जाये तो उससे माफ़ी मांगने तक की भारतीय परंपरा है. पहले महात्मा गाँधी जी द्वारा और अब प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी द्वारा झाड़ू को हाथ में लेकर स्वच्छता अभियान की शुरुआत की गई. सफाई में ही भगवान का वास होता है यही सन्देश देते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा कुम्भ आयोजन के दौरान सफाई कर्मियों के पैर भी स्वयं धोये गए. ऐसे में हम शक्ति के इस स्वरूप को अनदेखा व उपेक्षित कैसे कर सकते हैँ जबकि हम स्वयं की निजी जिंदगी में भी सफाई कर्मियों महिला के सहयोग से ही स्वच्छ वातावरण में रहने का सुख प्राप्त कर पाते हों.



राजनीति एक ऐसा क्षेत्र जिसमें आने से पुरुष भी कतराते हैँ क्योंकि यहाँ खींचतान कुछ ज्यादा होती हैँ, जिम्मेदारी बहुत ज्यादा होती है. सामान्य बैकग्राउंड के व्यक्ति का इसमें स्थान बनाना बहुत कठिन होता है किन्तु भारतीय नारी अपनी योग्यता और मेहनत के दम पर राजनीति के शीर्ष स्थानों पर काबिज होने मे सफल रही है और जनता की सेवा करने के अपने जज्बे को सदैव ईमानदारी से निभाती रही है.


  आज भारतीय नारी विमान उड़ा रही है,ट्रेन चला रही है,बस चला रही है, इ रिक्शा भी चला रही है, बसों मे कंडक्टर का कठिन दायित्व भी निभा रही हैं, आंगनबाड़ी बनकर घर घर सरकार की योजनाओं को पहुंचा रही है. 


     और भी बहुत से दायित्व हैँ जो आज की बेटियां निभा रही हैं किन्तु मिशन शक्ति अभियान के लिए जो पद प्रशासन द्वारा चुने गए हैँ वे मात्र प्रशासनिक पद हैँ जहाँ नारी खुद निर्णय लेने का अधिकार भी नहीं रखती. एक शिक्षिका के रूप मे वह सोचने समझने की शक्ति देती है, एक समाज सेविका के रूप मे वह जीवन मे उन्नति का पथ प्रशस्त करती है, एक वकील के रूप मे वह न्याय दिलाती है, एक नेता के रूप में वह गलत के खिलाफ मजबूती से लड़ना सिखाती है, आंगनबाड़ी के रूप मे वह सरकारी योजनाओं का जनता से परिचय कराती है एक सफाईकर्मी के रूप मे वह स्वच्छता से जीना सिखाती है किन्तु इतने सब महत्वपूर्ण योगदानों के बावजूद सरकारी योजनाओं मे नारी के इन शक्ति स्वरूपों का कोई महत्व नहीं है. मिशन शक्ति के तहत किसी बेटी को यह सन्देश नहीं दिया जाता कि नारी के इनमें से किसी भी शक्ति स्वरुप को जीवन मे उतारा जाये. नहीं बताया जाता कि नारी का सबसे बड़ा शक्ति स्वरुप उसका गृहणी होना है और अगर वह एक गृहणी के रूप मे एक दिन भी अगर घर को अच्छी तरह से संभाल सके तो यह शक्ति की सच्ची पहचान होगी और अगर वह देश और समाज में सभ्यता, ईमानदारी की नस्लें तैयार कर सके तो एक सुन्दर भविष्य का निर्माण होगा, समाज और देश का भविष्य उज्ज्वल बनेगा. नारी शक्ति के दायित्व बहुत अधिक हैँ और उन्हें ध्यान में रखते हुए सरकार को मिशन शक्ति का दायरा अभियान के छठवें चरण में बढ़ाना ही होगा.

धन्यवाद 🙏🙏

द्वारा 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली )

मजदूर दिवस का तमाशा

 कविता: 

*"मजदूर दिवस का तमाशा"*

✍️ कृष्ण कायत, मंडी डबवाली।


पंडालों में शोर है, नारों का बाजार है,

आज फिर 'मजदूर' नेताओं का त्योहार है।

तय हुई है मजदूरी पर लंबी एक बहस आज,

मंच पर बैठा हुआ वो खुद ही जमींदार है।


एसी की ठंडक में 'धूप' पर कविता पढ़ी गई,

पसीने के नमक पर फिर चाशनी चढ़ी गई।

शिकागो के किस्सों से हॉल सारा गूँज उठा,

मजदूर की बदहाली पर सुर्खियाँ गढ़ी गई।


तस्वीरें खींची गईं, अखबारों में छपवा दी,

खैरात के लड्डू बांटे, और वाहवाही बटोर ली।

उधर लू के थपेड़ों में जो दीवार चिन रहा,

उसने तो सूखी रोटी पानी में भिगो कर तोड़ ली।


ना उसे कानून पता, ना सरकार का वादा है,

उसका बस भूख से लड़ने का ही इरादा है।

तुम मनाओ 'मई दिवस' रैलियों के शोर में,

उसकी किस्मत में आज भी बोझा ही ज्यादा है।


कैसी ये क्रांति है, कैसा ये बदलाव है?

ये मजदूरों का दिन नहीं, बुद्धिजीवियों का दांव है।

महल वाले जब भी 'कुटिया' की बात करते हैं,

समझ लो कि किसी पद की तरफ बढ़ा पाँव है।


✍️ कृष्ण कायत, मंडी डबवाली।

मई दिवस का संदेश - शोषण पर रोक ही मानवता का विकास।

 *मई दिवस का संदेश - शोषण पर रोक ही मानवता का विकास।*


 ✍️ कृष्ण कायत, मंडी डबवाली।


एक मई, अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस - वह अवसर जब हम श्रमिक वर्ग की अथक मेहनत, ऐतिहासिक संघर्षों और वर्तमान शोषण की काली सच्चाई को करीब से देखते हैं। पूंजीवादी व्यवस्था की मुनाफे की असीम हवस ने मजदूरों को चूस लिया है। यह दिन हमें न सिर्फ इतिहास की याद दिलाता है, बल्कि दृढ़ संकल्प भी जगाता है कि मेहनतकश हाथों को सम्मान मिले, शोषण थमे, और समान विकास का मार्ग प्रशस्त हो।


मई दिवस की कहानी 1886 के शिकागो से शुरू हुई, जब अमेरिकी मजदूरों ने आठ घंटे के कार्यदिवस की मांग की। हेयमार्केट चौक पर शांतिपूर्ण सभा पर पुलिस ने गोलियां बरसाईं, कई लोग मारे गए, कई घायल हुए। इस बलिदान ने दुनिया हिला दी। 1889 में पेरिस के सोशलिस्ट इंटरनेशनल ने एक मई को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस घोषित किया। भारत में यह संदेश 1923 में मद्रास के मजदूर जुलूसों से पहुंचा। कम्युनिस्ट नेता एस.ए. डांगे और बी.टी. रानाडिवे ने इसे आजादी की लड़ाई से जोड़ा। स्वतंत्र भारत में यह ट्रेड यूनियनों का प्रतीक बना - लाखों श्रमिक सड़कों पर उतरते, नारे लगाते: "आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम, आठ घंटे तंदुरुस्ती।" समय ने इसे मजबूत किया । अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) समझौता, 1919 में स्थापित संयुक्त राष्ट्र की एक विशेष एजेंसी द्वारा वैश्विक श्रम मानकों को निर्धारित करने वाला एक त्रिपक्षीय (सरकार, नियोक्ता, श्रमिक) समझौता है। इसका उद्देश्य दुनिया भर में सामाजिक न्याय, सम्मानजनक कार्य, बेहतर कामकाजी परिस्थितियों, न्यूनतम मजदूरी और मानव अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। भारत में संविधान के अनुच्छेद 23-24 ने बंधुआ मजदूरी रोकी, फैक्ट्री एक्ट 1948 ने कार्यस्थल सुरक्षित बनाया। लेकिन अब यह विकास उलट रहा है, पूंजी की हवस ने सब कुछ निगल लिया।


वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था मुनाफे की भूखी है, वह श्रमिकों को मशीन समझती है। भारत सरकार ने 29 पुराने श्रम कानूनों को समेकित करके चार नए लेबर कोड (श्रम संहिता) 21 नवंबर 2025 से लागू किए हैं, जो 1 अप्रैल 2026 से पूर्णतः प्रभावी हो रहे हैं। भारत में 4 नए लेबर कोड- कोड ऑन वेजेस, इंडस्ट्रियल रिलेशंस, सोशल सिक्योरिटी और ऑक्यूपेशनल सेफ्टी। इन्होंने 29 पुराने कानूनों को समाहित कर कॉरपोरेट्स को शोषण की खुली छूट दी है। इन्हें 'सुधार' कहा गया, लेकिन विश्लेषक इसे कार्पोरेट अनुकूल बताते हैं। उदाहरणस्वरूप, इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड में हड़ताल के लिए 14 दिन का पूर्व नोटिस अनिवार्य कर दिया गया, जबकि नियोक्ता बिना नोटिस छंटनी कर सकता है अगर कर्मचारी 300 से कम हों। फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट से कॉन्ट्रैक्ट वर्कर बढ़े, जिन्हें स्थायी नौकरी या भविष्य निधि का पूर्ण लाभ नहीं मिलता।

2023 के पीएचडीएचएस सर्वे के अनुसार, 90% अनौपचारिक क्षेत्र के मजदूर (कुल 50 करोड़ श्रमिक) बिना सामाजिक सुरक्षा के जी रहे हैं। कोविड-19 के दौरान 12 करोड़ प्रवासी मजदूर बेरोजगार हुए, फिर भी एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) में छंटनी बढ़ी। न्यूनतम मजदूरी राज्यवार अलग-अलग है - बिहार में 300 रूपए प्रतिदिन व दिल्ली में 600 रूपए प्रतिदिन, लेकिन महंगाई (2025 में 6% से ऊपर) इसे बेमानी बनाती है। पूंजीवादी व्यवस्था में 1% अमीरों के पास देश की 40% संपत्ति है (ऑक्सफैम रिपोर्ट 2025), जबकि मजदूर वर्ग गरीबी रेखा से नीचे धंस रहा है। कारखानों में 12-14 घंटे की पाली, ओवरटाइम बिना भुगतान, और यौन उत्पीड़न जैसी समस्याएं आम हैं। गिग इकॉनमी (उबर, जोमैटो) में डिलीवरी बॉय बिना बीमा व अन्य सुविधाओं के सड़कों पर दौड़ते हैं , 2024 में 500 से ज्यादा दुर्घटनाओं में मौतें हुई हैं। 

ये कानून कॉरपोरेट्स को मुनाफा कमाने की खुली छूट देते हैं। 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' के नाम पर श्रमिक अधिकार कुचले जा रहे, जैसे गुजरात के हीराचंद दोषी मामले में जहां 1200 मजदूरों को बिना नोटिस हटाया गया। मजदूर कमजोर हो रहे हैं क्योंकि यूनियन कमजोर पड़ीं - ट्रेड यूनियन एक्ट में रजिस्ट्रेशन कठिन हो गया।


आज का मजदूर न सिर्फ गरीब है, बल्कि असुरक्षित भी है। बिहार-यूपी के प्रवासी दिल्ली-मुंबई के निर्माण स्थलों पर काम करते हैं, जहां हादसे (जैसे 2025 का मुंबई ब्रिज गिरना, 20 मौतें) बिना सजा के भुला दिए जाते हैं। महिलाएं टेक्सटाइल मिलों में कम मजदूरी पर जी रही हैं और 40% महिला श्रमिक गरीबी रेखा में हैं । जलवायु परिवर्तन से कृषि मजदूर प्रभावित हुए व 2025 की बाढ़ में लाखों बेरोजगार। समाज का विकास इन्हीं हाथों से होता है, खेत जोतने से लेकर स्मार्टफोन बनाने तक । फिर भी अमीर-गरीब की खाई दिन प्रतिदिन चौड़ी हो रही है।


मजदूरों का यह शोषण वैश्विक संकटों में और भी भयावह हो जाता है। 2025 का ईरान-अमेरिका युद्ध इसका जीता-जागता सबूत है। तनाव बढ़ा तो तेल $150/बैरल पहुंचा, भारत में महंगाई 12% उछली। फैक्टरियां बंद, बिजली-पानी, रसोई गैस सिलेंडर महंगा । गुजरात रिफाइनरियों में हड़तालें दबीं। ईरान बंदरगाह प्रतिबंधों से आयात ठप, मुंबई-चेन्नई डॉक मजदूर भूखे रहे। पाक सीमा तनाव से राजस्थान-हरियाणा के 5 लाख प्रवासी ट्रेनों में लौटे , कई रास्ते में मरे। दिल्ली निर्माण स्थलों पर बांग्लादेशी-नेपाली श्रमिक भागे, नए कोड ने 'अवैध' ठहराय - हिरासत, मारपीट हुई। उर्वरक महंगे होने से किसान-मजदूर खेत छोड़ शहर पलायन को मजबूर। निर्यात 20% गिरा, ऑटो प्लांट्स में 3 लाख नौकरियां गईं। परिवार भूखे, बच्चे स्कूल छोड़ सड़कों पर - यह पूंजीवाद की क्रूरता है, जहां युद्ध हथियार कंपनियों को मुनाफा व  मजदूरों को कब्र देता है। कोविड की तरह, प्रवासी बेरोजगार, जलवायु बाढ़ों ने लाखों को बेघर किया। समाज की नींव रखने वाले ये हाथ टूट रहे हैं।


एक मई यही संदेश देता है कि मजदूरों को दृढ़ कानून, सुविधाएं और अवसर दें। श्रम कोड संशोधित करें: हड़ताल अधिकार बहाल, राष्ट्रीय लिविंग वेज ₹500/दिन, पूर्ण सामाजिक सुरक्षा। यूनियनों को ताकत, कौशल विकास के लिए आईटीआई अपग्रेड व डिजिटल ट्रेनिंग इत्यादि। प्रवासियों को पोर्टेबल बीमा-आवास, युद्ध जैसे संकटों में पलायन रोके जाएं। भेदभाव मिटाएं - शिक्षा, स्वास्थ्य, समान वेतन हों। सरकार-यूनियन-कॉरपोरेट मिलकर अमल करें। मजदूर ही समाज की रीढ़ हैं। उनके शोषण को रोककर ही मानवता का सच्चा विकास संभव है।तभी मेहनत का फल हर हाथ तक पहुंचेगा, मानवता का विकास होगा।


✍️ कृष्ण कायत, मंडी डबवाली।

स्वच्छ भारत अभियान -कटु सत्य

Written By Shalini kaushik on शनिवार, 21 मार्च 2026 | 6:01 pm

 


 

स्वच्छ भारत एक अभियान 

लेकर आये मोदी जी 

स्वच्छ भारत संकल्पना 

पूर्ण न हो पाई अब तक भी.

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जगह जगह हैँ बने शौचालय 

नगरपालिका देख रही.

पर जनता उनसे हटकर ही 

मूत्र विसर्जन कर रही.

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कूड़ा गाड़ी घर घर जाती 

कूड़ा लेने हर घर से,

पर उन हाथों का क्या कर लें 

जो अब भी सड़क पे फेंक रहे.

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अच्छे कपड़े पहन पहन कर 

नई गाड़ी में बैठ रहे 

चिप्स की थैली, कोक की बोतल 

साफ सडक पर फेंक रहे.

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शौच को जाना खेत में रोका 

पर न सुधरे हैँ न सुधरेंगे,

शहर में आकर उतर मोटर से 

आगे किसी घर के शौच करेंगे.

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वादडिया सुजादडिया

 जप शरीरा नाल 

आस पास गंदगी रखने में 

ये भारतीय रचें मिसाल 

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गाँधी जी असफल हुए थे 

मोदी जी भी हैँ नाकाम 

शालिनी सच्चाई बताकर 

खोले सच स्वच्छता अभियान.

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द्वारा 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कांधला (शामली )

“बरसात की खामोशी”

Written By Bisari Raahein on शुक्रवार, 29 अगस्त 2025 | 4:24 pm

 *कविता — “बरसात की खामोशी”*


बारिश आती है,

चुपके से, बिना आवाज के।

हर टपकन में सुकून छुपा होता है,

जैसे कोई गीत अधूरा रह गया हो।


कहीं छतों की टप-टप,

तो कहीं गलियों का सन्नाटा।

भीगी हुई मिट्टी की खुशबू में,

कुछ कहानियाँ दबी हुई हैं।


कभी पेड़ से गिरती बूंदों में,

कभी बच्चों की हँसी में,

बारिश होती है हर सवाल का जवाब,

पर वह जो अनसुना रहता है,

वही दर्द धरती पर बहता है।


जहाँ खिल उठी फसलें,

वहीं कहीं टूटे सपने भी हैं।

बरसात की वह खामोशी,

जिसे सुन पाता है कोई,

वही इस मौसम का सच

समझ पाता है।

✍️ कृष्ण कायत, मंडी डबवाली।

कांधला में व्यापार की रीढ़ तोड़कर रख दी ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफार्म ने

Written By Shalini kaushik on बुधवार, 2 जुलाई 2025 | 7:03 am

  


कांधला कस्बा शामली जिले का एक अमन पसंद, संतुष्ट समाज के रहने की जगह, खेतो और बागो से घिरा कस्बा है. यहाँ विकास के लिए आधुनिकता से जुड़ने की कोई चाह यहाँ के क्षेत्रवासियों में नहीं है. तरक्की के नाम पर आज तक कस्बा कांधला ने केवल यह हासिल किया है कि यहाँ के लोग रोजमर्रा की जरूरतों की बेहद जरुरी चीजें जैसे अनाज, सब्जी, दाल आदि खरीद सकें और रोटी, कपड़ा, मकान आदि की सामान्य आवश्यकता पूर्ण कर सकें. ऐसा नहीं है कि कांधला को विकास की राह पर आगे बढ़ने का कभी कोई प्रस्ताव या अवसर नहीं मिला किन्तु कांधला के भौतिक रूप से सम्पन्न समाज ने उन प्रस्तावो को एक कान से सुन दूसरे कान से निकाल दिया. आज जिस शुगर मिल की बदौलत शामली एक जिले के रूप में विकसित हुआ है उसका पहला प्रस्ताव कांधला को ही मिला था लेकिन उस प्रस्ताव को कांधला के जमींदारों ने ठुकरा दिया. जसाला गांव में जो खेल स्टेडियम है, उसके लिए पहले क्षेत्र के प्रतिष्ठित मंत्री जी ने कांधला के बड़े जमींदारों से ही जमीन मांगी थी, जिसमें विफल रहने पर मंत्री जी ने अपने गांव में ही स्टेडियम की स्थापना की. ऐसे रूढ़िवादी, पुरातन सोच में डूबे क़स्बा कांधला के व्यापार की रीढ़ की हड्डी ही तोड़कर रख दी है -ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफार्म ने, जिससे घरेलू सामान मंगाना क्षेत्रवासियों के शौक में शामिल हो गया है और जिसके कारण आज कस्बे का मेन बाजार ठप्प होता ही दिखाई दे रहा है.

ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म आम जनता को ग्रोसरी आइटम्स में कोई भी सामान हो, कैसा भी सामान हो, 10 मिनट में उनके बताये पते पर भेजने का प्रस्ताव दे रहे हैं ग्रोसरी आइटम्स (Grocery items) का मतलब है वे खाद्य पदार्थ और घरेलू सामान जो हम अपनी दैनिक जरूरतों के लिए खरीदते हैं, जैसे कि चावल, आटा, दाल, तेल, मसाले, साबुन, शैम्पू, आदि। 

➡️ ग्रोसरी आइटम्स में आमतौर पर शामिल हैं:

✒️अनाज और दालें: चावल, आटा, दालें, बेसन, सूजी

✒️तेल और मसाले: खाना पकाने का तेल, नमक, हल्दी, मिर्च, धनिया, आदि

✒️दूध और डेयरी उत्पाद: दूध, दही, पनीर, घी

✒️फल और सब्जियां: ताज़े फल और सब्जियां

✒️बेकरी उत्पाद: ब्रेड, बिस्कुट, केक

✒️नाश्ते के सामान: स्नैक्स, चिप्स, नमकीन, चॉकलेट

✒️पेय: चाय, कॉफी, जूस

✒️सफाई का सामान: डिटर्जेंट, साबुन, शैम्पू, टूथपेस्ट, आदि

✒️अन्य: सूखे मेवे, मसाले, अचार, आदि 

इन वस्तुओं को ही आमतौर पर कस्बा कांधला के किराने की दुकानों से खरीदा जाता रहा है और यहाँ कस्बे के मेन बाजार में मुख्यतः सर्राफ और कपड़े की दो चार दुकानों को छोड़कर बहुतायत ग्रोसरी आइटम्स की दुकानों की ही है जिन पर पिछले वर्ष लगभग अश्विन नवरात्रि से ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफार्म ने तगडी सेंध लगाई है और अब हालात ये हैं कि लगभग हर तीसरी या चौथी दुकान बंद पड़ी है. जो व्यापारी दुकान पर बैठे भी हैं वे ग्राहक के बाजार में न आने की ही कहानी कह रहे हैं और मौजूदा हालात से बैचेन और व्याकुल हैं. स्थिति यह हो गई है कि आम आदमी ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफार्म से लुटने के बावजूद भी कांधला के मेन बाजार से ग्रोसरी आइटम्स तक लेने आने में अपना समय व्यर्थ समझ रहा है क्योंकि ज़ब सामान घर पर ही दस मिनट में पहुँचने की सुविधा मिली हो तो बाजार जाने की जहमत क्या उठानी.

       ऐसे मे लगता तो यही है कि अगर इसी तरह ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफार्म स्थानीय व्यापारी भाइयों के व्यापार को यूँ ही चूना लगाते रहे तो कांधला कस्बा अपनी एकमात्र तरक्की के क्षेत्र व्यापार के पलायन की ओर ही खिसक जायेगा, जिससे उबरने का फिलहाल कोई रास्ता नजर नहीं आता है.


द्वारा 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली )

मेरे पापा सर्वश्रेष्ठ -सादर नमन 💐

Written By Shalini kaushik on रविवार, 15 जून 2025 | 8:24 am



झुका दूं शीश अपना ये बिना सोचे जिन चरणों में ,

ऐसे पावन चरण मेरे पिता के कहलाते हैं .

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बेटे-बेटियों में फर्क जो करते यहाँ ,

ऐसे कम अक्लों को वे आईना दिखलाते हैं .

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शिक्षा दिलाई हमें बढाया साथ दे आगे ,

मुसीबतों से हमें लड़ना सिखलाते हैं .

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मिथ्या अभिमान से दूर रखकर हमें ,

सादगी सभ्यता का पाठ वे पढ़ाते हैं .

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कर्मवीरों की महत्ता जग में है चहुँ ओर,

सही काम करने में वे आगे बढ़ाते हैं .

.............................................................

जैसे पिता मिले मुझे ऐसे सभी को मिलें ,

अनायास दिल से ये शब्द निकल आते हैं .

....................................

शालिनी कौशिक

[कौशल]

मुजफ्फरनगर का नाम विजयलक्ष्मी नगर हो

Written By Shalini kaushik on बुधवार, 5 मार्च 2025 | 5:16 pm

 

उत्तर प्रदेश विधान परिषद में भाजपा एमएलसी और प्रदेश उपाध्यक्ष मोहित बेनीवाल द्वारा मुजफ्फरनगर का नाम बदलकर “लक्ष्मीनगर” रखने की मांग उठाई गई है । उन्होंने बजट सत्र के दौरान यह मांग रखी और कहा कि यह जनभावना से जुड़ा विषय है और इस ऐतिहासिक मांग को पूरा किया जाना चाहिए।मोहित बेनीवाल ने कहा कि हमारी धार्मिक परंपराओं और इतिहास के प्रति सम्मान रखते हुए महानगरों व स्थानों के नाम में सत्यता और परंपरा का अनुसरण किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मुजफ्फरनगर का नाम ऐतिहासिक रूप से लक्ष्मीनगर होना चाहिए, क्योंकि यह क्षेत्र पहले से ही एक पवित्र स्थान रहा है।
          भारत वर्ष की धार्मिक और ऐतिहासिक परंपराओं के प्रति सम्मान की भावना को ध्यान में रखते हुए भाजपा एम एल सी मोहित बेनीवाल जी की यह मांग कोई नई नहीं है. भारत वर्ष में प्राचीन समय से ही हमारे महापुरुषों और देवी देवताओं का सम्मान बनाए रखने के लिए विभिन्न नगरों, जिलों आदि का नाम उनके नाम पर रखे जाने की परंपरा रही है जिसे तुर्कों मुगलों आदि के भारत में आक्रमण किए जाने पर गहरा धक्का लगा. आज जब देश में सनातन धर्म और संस्कृति का शासन प्रभावी है तो देश की प्राचीन परंपरा का सम्मान बिना किसी भी भेदभाव के लागू किया जाना चाहिए और शुक्रताल जैसी तीर्थ नगरी का जनपद होने के कारण भी मुजफ्फरनगर का नाम जल्द प्राचीन स्वरुप में लाते हुए माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी द्वारा "विजय लक्ष्मी नगर" के रूप में प्रतिष्ठापित कर दिया जाना चाहिए.
शालिनी कौशिक
एडवोकेट
कैराना (शामली)

इकरा चौधरी - भारतीय राजनीति की समझदार नेत्री

Written By Shalini kaushik on बुधवार, 22 जनवरी 2025 | 6:12 am

 


      इकरा हसन आज भारतीय राजनीति में एक विख्यात और समझदार राजनेत्री के रूप में पहचान बना रही हैं. कैराना क्षेत्र से हसन परिवार की चौथी सांसद के रूप में तो इकरा हसन ने नाम कमाया ही है उससे कहीं ज्यादा नाम राजनीति में होते हुए, पढ़ी लिखी होते हुए भी सर से दुपट्टा न हटने देने वाली भारतीय नारी के संस्कारों को अपनाकर कमा रही हैं. 

     विकिपीडिया से प्राप्त जानकारी के अनुसार इकरा चौधरी एक भारतीय राजनीतिज्ञ तथा वर्तमान में कैराना लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र से सांसद हैं। वे समाजवादी पार्टी दल की राजनेत्री हैं। इकरा लोकसभा के साथ-साथ राज्यसभा के पूर्व सदस्य दिवंगत चौधरी मुनव्वर हसन और लोकसभा की पूर्व सदस्य बेगम तबस्सुम हसन की बेटी हैं. उन्होंने नई दिल्ली के क्वीन मैरी स्कूल से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की और दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्री राम कॉलेज से कला स्नातक की डिग्री हासिल की। ​​इसके बाद उन्होंने 2020 में लंदन के SOAS विश्वविद्यालय से एमएससी अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और कानून की पढ़ाई पूरी की।इकरा एक राजनीतिक परिवार से आती हैं, उनके दादा अख्तर हसन, पिता मुनव्वर हसन और माँ तबस्सुम हसन कैराना से पूर्व सांसद हैं। उनके भाई नाहिद हसन तीन बार विधान सभा के सदस्य रह चुके हैं। उन्होंने 2016 में जिला पंचायत चुनाव लड़कर 5000 वोटों से हारकर अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। उन्होंने अपने भाई नाहिद हसन के लिए चुनाव अभियान शुरू किया, जो कुछ मामलों में जेल में बंद थे। उन्होंने अभियान का नेतृत्व किया और अपने भाई को कैराना विधानसभा क्षेत्र से विजयी उम्मीदवार के रूप में चिह्नित किया । 2024 के आम चुनाव के दौरान , इकरा ने भारतीय जनता पार्टी के प्रदीप कुमार को 69,116 मतों के अंतर से हराकर कैराना से संसद सदस्य बनने का गौरव प्राप्त किया । शिक्षा मंत्रालय के बजट पर चर्चा के दौरान उन्होंने अल्पसंख्यक शिक्षा के साथ भेदभाव करने के लिए बजट की आलोचना की। उन्होंने मौलाना आज़ाद फाउंडेशन के बंद होने और पाठ्यपुस्तकों से डार्विन के सिद्धांत और मुगल इतिहास के विरूपण सहित महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और वैज्ञानिक सामग्री को हटाने पर भी चिंता व्यक्त की।

    इकरा चौधरी आज भारतीय राजनीति का गौरव बन गई हैं. क्षेत्र की बेटी की काबिलियत और क्षेत्रवासियों से अपनापन सभी क्षेत्रवासियों के दिलों में अपनी गहरी छाप छोड़ चुका है. 

    इस सब के मध्य एक स्थिति ऐसी भी है जिसे लेकर स्वयं इकरा चौधरी भी नाराजगी जता चुकी हैं और स्वयं कह चुकी हैं कि "मैं चाहती हूं कि मैं इन रील के स्थान पर अपने काम के लिए पहचानी जाऊँ." 

संसद में कैराना की आवाज उठाने वाली, संभल हिंसा में मुसलमानों को लेकर चिंता व्यक्त करने वाली इकरा चौधरी के भाषण, बयान सुनने के लिए क्षेत्रवासी टी वी, मोबाइल पर चिपके रहते हैं. इकरा चौधरी के वीडियो सामने स्क्रीन पर देखते ही जैसे ही उन्हें क्लिक करते हैं उनमें उनके भाषण के स्थान पर, बयानों के स्थान पर, क्षेत्रवासियों के साथ चर्चा करते हुए उनके आश्वासनों के स्थान पर फिल्मी गाने लगे होते हैं जो क्षेत्र की बेटी की गरिमा का, मर्यादा का उल्लंघन करते हुए नजर आते हैं. 

     आज देश को जिस तरह के युवा, सद्भावना पूर्ण राजनेताओं की जरूरत है इकरा चौधरी उनमें से एक हैं. वे जनता में, युवाओं में लोकप्रिय हैं और उनमें वो दिमाग है जो युवा पीढ़ी को सही दिशा में लेकर जा सकता है, बुजुर्गों, महिलाओं की सुरक्षा, समस्याओं का समाधान कर सकता है. इसलिए यह जरूरी है कि इकरा चौधरी से जुड़ी इस तरह की गतिविधियों रील्स पर रोक लगाई जाए. ताकि वे अपना कार्य सुरक्षा और सुविधा के साथ शांत मस्तिष्क के साथ सम्पन्न कर सकें. 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली) 


नारी देवी, बहन या बेटी भी होती है पुरुषों

Written By Shalini kaushik on सोमवार, 20 जनवरी 2025 | 11:20 am

 


 हिन्दू धर्म की एक प्रसिद्ध उक्ति है "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता" जिसे हिन्दू धर्मावलंबियों द्वारा बहुत ही जोर शोर से उच्चारित किया जाता है. आजकल प्रयाग राज उत्तर प्रदेश में महाकुंभ आयोजित किया जा रहा है, जहां चहुँ ओर हिन्दू धर्म का डंका बज रहा है. साधू संतों के प्रवास के दौरान सारी प्रयाग राज की धरती पवित्र हो रही है. हिन्दू धर्म का झंडा बुलन्द करने वाली भाजपा नीत केंद्र और राज्य की सरकार ने श्रद्धालुओं के प्रयाग राज में पहुंचने की उत्तम व्यवस्था की है मीडिया द्वारा हिंदू धर्म - सनातन धर्म के इस पर्व को लेकर खासा प्रचार प्रसार किया जा रहा है. जिससे युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक में उल्लास पूर्ण वातावरण है जिससे बड़ी संख्या में श्रद्धालु ज़न वहां पहुंच रहे हैं. इसी उल्लास को लेकर आने वाली दो खबरों ने हिन्दू धर्म संस्कृति पर सवाल खड़े कर दिए हैं. एक मध्य प्रदेश के महेश्वर से माला बेचने आई मोनालिसा के साथ युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक का असभ्य, अशोभनीय व्यवहार और एक साध्वी बनने जा रही मॉडल हर्षा रिछारिया की सुन्दरता के पीछे पागलपन की हदें पार करती हिन्दू जनता. सवाल खड़े करती हैं हिन्दू धर्म के इस महाआयोजन पर, जिसमें श्रद्धा, आस्था, भक्ति सर्वोच्च होनी चाहिए, वहां वासना आगे दिखाई दे रही है. वहां पहुंची हिन्दू धर्मावलंबियों की भीड़ को ये सुन्दर, परी, अप्सरा नजर आ रही हैं, क्यूँ आखिर क्यूँ? धर्म के इस श्रेष्ठ पर्व में भी इनके मन में उनकी सुन्दरता ही क्यूँ उतर रही है क्यूँ इनके मन में इन्हें लेकर धार्मिक भावनाएँ नहीं उभर रही हैं? क्यूँ हिन्दू धर्म की श्रेष्ठ मान्यताएं इनके मन में मोनालिसा को इनकी बेटी, बहन और हर्षा रिछारिया को एक देवी के रूप में स्थान नहीं दिला पा रहा है? कहाँ कमी रह गई है भाजपा की नीतियों में जो बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का अभियान चला कर भी धर्म के इस महाकुंभ तक में बेटियों को सुरक्षित वातावरण नहीं दे पा रही है कि आखिर मोनालिसा के पिता को बेटी को दबंगों द्वारा उठा लिए जाने की धमकी के डर से घर वापस भेजना पड़ गया है और मॉडल से साध्वी बनी हर्षा रिछारिया को रोते रोते महाकुंभ छोड़ना पड़ गया है.

शालिनी कौशिक एडवोकेट

कैराना (शामली)

धन्यवाद प्यारे काले कुत्ते 🙏🙏

Written By Shalini kaushik on शनिवार, 4 जनवरी 2025 | 10:18 am



 आजकल कुत्तों को लेकर बहुत सी उनके द्वारा खतरनाक हमलों को लेकर खबरें सामने आ रही हैं. ऐसे में एक खबर उनकी वफादारी की भी आनी चाहिए और वह भी उस कुत्ते की जो कि सड़क पर, हमारे मोहल्ले में ही रहने वाला है.

     एक काला कुत्ता और उसकी भूरी बहन , जिनकी माँ समान मौसी को लगभग 2 वर्ष पूर्व हमारे मोहल्ले में ही एक गाड़ी वाले ने अन्धाधुन्ध ड्राइविंग करते हुए कुचलकर मार डाला था और जो तब बहुत ही छोटे पिल्ले थे , को हम दोनों बहनें थोड़ा सा दूध और शुगर फ्री बिस्कुट खाने के लिए देते रहे और तब से लेकर आज तक वे दोनों पिल्ले बड़े होकर भी हमसे जुड़े रहे. इनमें से काला पिल्ला जो अब बड़ा कुत्ता हो गया है, की वफादारी कल शाम दिखाई दी, जब अंदोसर मन्दिर कांधला में बाबू कौशल प्रसाद एडवोकेट की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम पूर्ण कर हम घर आ गए थे, अंधेरा हो गया था, श्री राम मन्दिर सीता चौक कांधला पर पूजा कार्य पूर्ण कर छोटी बहन डॉ शिखा कौशिक को अपने मोबाइल फोन की याद आई और तब जब वह घर में फोन ढूंढने लगी और फोन नहीं मिला तो उसे याद आया कि फोन पुस्तकालय में रह गया है अंदोसर मन्दिर बंद हो चुका होगा, अब रात भर क्या करें? ठण्ड भी काफी थी इसलिए सडकें भी लगभग खाली थी, क्या किया जाए, बहुत सोचकर मैंने कहा कि चल मन्दिर चलते हैं और हम 7 बजे शाम चल दिये मन्दिर, घर से लगभग 1 किलोमीटर की दूरी है मन्दिर की, कोई रिक्शा नहीं मिला, पैदल ही निकल पड़े, मन्दिर पहुंचे, गेट खोला, शिखा को अपना मोबाइल पुस्तकालय में मिल गया इसी बीच देखा कि वह काला कुत्ता मेरे साथ ही मन्दिर के गेट पर खड़ा था, बहुत हिम्मत बँध गई उसे देखकर और आश्चर्य भी हुआ क्योंकि वह आजतक कभी यहां नहीं आया था, आ भी नहीं सकता था क्योंकि मन्दिर की तरफ के कुत्ते उसे अपने क्षेत्र में आने ही नहीं देते,किन्तु यह उसकी वफादारी थी जो कि वह हमारा पालतू कुत्ता न होते हुए भी निभा रहा था. अंधेरी रात और अकेली सड़क पर उस प्यारे काले कुत्ते ने जो हमारा साथ निभाया उसे हम कभी नहीं भूल सकते, इनकी वफादारी एक मिसाल है और सदैव रहेगी.

Thanks lovely black dog 🙏🙏

शालिनी कौशिक एडवोकेट

कैराना (शामली)

चलिए, थोड़ा सरल हो लेते हैं...

Written By Sundip Kumar Singh on रविवार, 8 दिसंबर 2024 | 7:24 pm

इस दुनिया में कई तिलिस्म हैं जिन्हें अबतक न कोई सुलझा नहीं सका है और लगता है आगे भी ये ऐसे ही बने रहेंगे. आप सोचकर देखिए सुबह से शाम तक आप तमाम लोगों से मिलते हैं, आपके नजरिए से कई लोग सही और कई गलत लगते होंगे लेकिन क्या आपने देखा है कि कोई सामने से आकर कहे कि- 'हां, मैं गलत हूं और मैं अपने में सुधार करूंगा ताकि किसी को मुझसे दिक्कत नहीं हो.' नहीं न, सब अपनी कहानी में सही होते हैं. आप भी सोचकर देखिए अपनी हर कहानी में आप भी खुद को सही मानते मिलेंगे.

तो जब सब सही हैं दुनिया में तो फिर गलत कौन है? आखिर इतनी परेशानिया हैं हमारी पर्सनल लेवल पर और सामाजिक लेवल पर तो कहीं न कहीं कोई न कोई गलत पक्ष में तो है? अगर सब लोग इस बात को समझ लें तो दुनिया की सारी समस्याएं एक झटके में खत्म हो जाएं...लेकिन क्या ऐसा होता दिख रहा? नहीं. क्या है कारण और क्या है समााधान. चलिए थोड़ा इसे आध्यात्मिक पक्ष से समझने की कोशिश करते हैं...

12वीं सदी में ही रूमी ने लिख दिया था-

''पता है

यहां से बहुत दूर, गलत और सही के पार,

एक मैदान है.. मैं वहां मिलूंगा तुझे…

तुम, तुमसे मिलना, तुम्हारे बारे में सोचना,

सारी दुनिया भर के काम छोड़ कर तुमसे मिलना,

जो कभी नहीं किया, वो करना… सब,

सब गलत है…

लेकिन अगर गलत है तो गलत लग क्यूं नहीं रहा..

कहां है ये सही और गलत…? जहां मैं हूं, वहां से कुछ सफ़ेद या काला नहीं है…

सब कुछ, कई रंगों का है, सब कुछ, हर पल , नया रंग ओढ़ता है..

सब कुछ…. सही भी है, और गलत भी…

मेरी सारी दुनिया ही, उस सही और गलत के पार का मैदान है…

और यहां, इस मैदान में, मुझे वो सब लोग मिलते हैं, जो मेरी तरह, सबरंग में देखते हैं..

सब की आंखें ख़राब हैं… दिमाग भी… सब एक जैसे हैं…''

हम अक्सर खुद को इस उलझन में पाते हैं कि जीवन में क्या चीजें सही दिशा में हैं या नहीं? साथ ही ये भी कि सही क्या है और गलत क्या है? हमें किस राह पर होना चाहिए? हमसे जुड़ी चीजें कहीं गलत राह पर तो नहीं हैं? आपको इन उलझनों का जवाब खुद खोजना होगा. अपने इर्द-गिर्द खोजना होगा. दूसरों के अनुभवों से आपकी जिंदगी के सवाल हल नहीं होंगे. आपको अपने जीवन को सरलता की ओर ले जाना होगा.

हां, आप दूसरों की जिंदगी की समस्याओं और उनके समाधान को कॉपी नहीं कर सकते लेकिन उनके अनुभवों से जरूर सीख सकते हैं. कैसे? सरल होकर, खुद को थोड़ा हल्का करके... आखिर ज्यादा बोझ लेकर जाना कहां है? ज्यादा लोड लेकर करना क्या है?

स्वेट माडर्न लिखते हैं-

'मैं प्रकृति के निकट रहने का यत्न करता हूं. अपने जीवन में उसका अनुकरण करता हूं. फल यह मिलता है कि खूब निद्रा आती है. पाचन शक्ति भी बनी रहती है. सभी साम्थर्य अपने पूरे वेग में रहता है. सरलता और परिश्रम का यही सबसे बड़ा इनाम है...'

इसका जवाब आपको खुद खोजना होगा. जीवन में सही गलत में उलझने की बजाय सरल रास्ते आपको हमेशा बेहतरी की ओर ले जाएंगे. स्वामी विवेकानंद कहते हैं-

'जो भी चीज आपको शारीरिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से कमजोर बनाती हैं, उसे जहर समझकर अस्वीकार कर दीजिए.'

वैसे, भी सही-गलत का ये सवाल कोई आज का नहीं है, सदियों पहले भी इंसान इसी उधेर-बुन में था. किसी ने एक संत के दरबार में ये सवाल पूछा. संत ने चेहरे पर चिर शांति और मुस्कान लाते हुए कहा-

'सही-गलत में फर्क करना इतना मुश्किल तो नहीं है. जो करने से दिल का बोझ बढ़े वो गलत और जो करने से दिल को इत्मीनान आए वो सही...'

योगी आदित्यनाथ इस तरह बना रहे हैं उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश

Written By Shalini kaushik on शनिवार, 26 अक्टूबर 2024 | 10:01 am

 


26 अक्टूबर 2024 के समाचारपत्रों की सुर्खियां "जिले के आठ केंद्रों पर होगी पीसीएस की प्री-परीक्षा" न केवल शामली जिले का गौरव बढ़ा रही थी बल्कि प्रदेश के युवाओं, छोटे व्यापारियों, दुकानदारों के लिए जीवन में एक नए उजाले की ऊर्जा भर रही थी.

    दैनिक अमर उजाला में प्रकाशित समाचार के अनुसार यूपीपीसीएस की परीक्षा जो पहले 26 व 27 अक्तूबर को प्रस्तावित थी, को टालकर सात और आठ दिसंबर कर दिए जाने के बाद जनपद में परीक्षा को लेकर तैयारियां शुरू हो गई है। परीक्षा के लिए शामली जनपद में आठ केंद्र बनाये गये हैं. जिला विद्यालय निरीक्षक जेएस शाक्य के अनुसार "इस बार जनपद में भी पीसीएस की प्रारंभिक परीक्षा 2024 का आयोजन होना है। आयोग के सचिव की ओर से पिछले दिनों डीएम को पत्र भेजकर केंद्रों की सूचना मांगी गई थी। उन्होंने बताया कि पत्र के अनुसार परीक्षा दो पाली में आयोजित होगी। जिसमें पहली पाली सुबह 9.30 से 11.30 तक रहेगी। जबकि दूसरी पाली दोपहर 2.30 से 4.30 बजे तक रहेगी। जिलाधिकारी से 17 अक्तूबर तक 480 और कम से कम 384 अभ्यर्थियों के बैठने की क्षमता वाले केंद्रों की सूची मांगी गई थी।उन्होंने बताया कि ऐसे आठ केंद्रों की सूची व कमरों की संख्या, कलक्ट्रेट से प्रत्येक सेंटर की दूरी आदि की जानकारी भेज दी गई है। केंद्रों पर सभी व्यवस्था चेक करने के बाद ही सूची को भेजा गया है. "

      उत्तर प्रदेश में अभी अगस्त माह में ही पुलिस भर्ती परीक्षा आयोजित की गई थी, जिसमें शामली जिले में भी कई परीक्षा केंद्र बनाये गये थे और अब पीसीएस की प्रारम्भिक परीक्षा के लिए फिर से वेस्ट यू पी में शामली जिले में भी परीक्षा केंद्र बनाये जाने से एक बात तो माननीय योगी आदित्यनाथ जी की उत्तर प्रदेश सरकार में साफ हो ही गई है कि अब वेस्ट यू पी का पैसा ईस्ट यू पी में नहीं जाएगा और न ही इधर के युवाओं को इलाहाबाद में परीक्षा देने जाने के लिए लंबी दूरी की ट्रेन यात्रा, गंदे होटलों में ठहरना, खाने पीने आदि की दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा.

         अगस्त माह में आयोजित पुलिस भर्ती परीक्षा में जहां युवाओं के लिए नए स्थानों पर केंद्र होने के कारण थोड़ी आवागमन और ठहरने आदि की परेशानियां पैदा हुई वहीं छोटे दुकानदारों के लिए उनके अपने ही क्षेत्र में दूर दराज से युवाओं की भीड़ होने के कारण उनके व्यापार में तरक्की देखी गई. योगी आदित्यनाथ जी की उत्तर प्रदेश सरकार ने क्योंकि प्रदेश में युवाओं और व्यापारियों के हितों की रक्षा के लिए यह फैसला अभी ही लागू किया है इसलिए आरंभ में दिक्कतें आना स्वाभाविक है किन्तु यह दूरगामी प्रभाव रखता है और निश्चित रूप से पूरे उत्तर प्रदेश में इस तरह से परीक्षा भर्ती केंद्र होना न केवल युवाओं के समय, पैसे की बचत करने में कारगर होगा वहीं पूरे प्रदेश के रिक्शावालों, ठेली-खोमचा वालों, ढाबों वालों के लिए व्यापार बढ़ाएगा और इन जगहों पर होटल आदि के व्यवसाय के अवसर बढ़ाने का काम करेगा.

    इस तरह से योगी सरकार की परीक्षा केंद्र प्रणाली पूर्वी उतर प्रदेश का वर्चस्व तोड़कर वेस्ट यू पी को भी आगे बढ़ने के सुनहरे अवसर प्रदान कर रही है और उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश के पथ पर निरन्तर आगे बढ़ा रही है.

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली) 

वकीलों से निरन्तर दुर्व्यवहार

Written By Shalini kaushik on गुरुवार, 24 अक्टूबर 2024 | 6:17 am

 



सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को एक वकील द्वारा गलती से न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय को "न्यायमूर्ति हृषिकेश मुखर्जी" कह दिए जाने पर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ ने तुरंत वकील को टोका और कहा कि एक वकील को न्यायाधीशों के नाम मालूम होने चाहिए। इस मामले का जिक्र करते हुए वकील ने कहा, "यह मामला न्यायमूर्ति हृषिकेश मुखर्जी के सामने था।" इस पर चीफ जस्टिस ने तुरंत उन्हें टोकते हुए कहा, "हृषिकेश मुखर्जी या न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय? अगर आप रॉय को मुखर्जी बना देंगे तो... आपको अपने जजों के नाम मालूम होने चाहिए। यह तो हद है। कृपया वेबसाइट पर जाकर नाम चेक कीजिए।"

       अपने कार्यकाल के दौरान यह कोई पहला वाकया नहीं है जब माननीय मुख्य न्यायाधीश द्वारा वकीलों का अपमान किया गया है. जरा सी शब्दों की चूक या प्रक्रिया के पालन में थोड़ी कमी को माननीय मुख्य न्यायाधीश तुरंत नोट करते हैं और वकीलों को मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार लताड़ते या डांटते रहते हैं. वकील द्वारा जस्टिस हृषीकेश राय का नाम हृषीकेश मुखर्जी कह देना एक जरा सी संबोधन की चूक है जिसका कोई महत्त्व इतने बड़े स्तर पर नहीं होता है. न्यायालय के कार्यों के दौरान जज या न्यायाधीश के नाम का कोई स्थान नहीं होता है वहां वे केवल पद नाम से ही संबोधित किए जाते हैं इसलिए कोई जरूरी नहीं होता है कि जजों या न्यायाधीशों का नाम किसी भी वकील को आवश्यक रूप से पता होना ही चाहिए, ये अलग प्रतिभा की बात होती है जब जजों या न्यायाधीशों का नाम ही नहीं बल्कि उनकी शिक्षा, स्थाई निवास आदि का वकील को ज्ञान हो और रही बात हद की तो हद तो तब भी होनी चाहिए जब जज या न्यायाधीश वकील के किसी फार्म पर स्थानीय बार एसोसिएशन के पदाधिकारी के वकील के साथ होते हुए यह कहते हुए मना कर दे कि वह उस वकील को नहीं जानता. इस हद की ओर भी तो भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश का ध्यान जाना चाहिए कि जजों और न्यायाधीशों द्वारा ऐसा तब किया जाता है जब वकीलों के उन कागजात पर जजों या न्यायाधीशों द्वारा सत्यापन को सबंधित संस्था द्वारा आवश्यक बनाया गया है. 

शालिनी कौशिक एडवोकेट 

कैराना (शामली) 

 

बदनसीब है बार एसोसिएशन कैराना

Written By Shalini kaushik on बुधवार, 2 अक्टूबर 2024 | 11:43 am

   


   आज भारतीय राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की जयंती मना रहे है. मैं भी देश के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित करने वाले देश के इन दोनों अनमोल रत्नों को सादर श्रद्धांजलि अर्पित करती हूं. मैं इन दोनों महापुरुषों के योगदान को समझ सकती हूं क्योंकि मैं अपने पिता स्व बाबू कौशल प्रसाद एडवोकेट जी में इनकी छवि के एक साथ दर्शन करती हूं. कैराना में अधिवक्ताओं के उज्जवल भविष्य हेतु अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित करने वाले मेरे पिता जीवन की ऐसी कोई सुविधा नहीं थी जिसे वे हासिल न कर सकते हों, जो व्यक्ति अपने संपर्कों के दम पर कैराना में सिविल जज सीनियर डिवीजन कोर्ट ले आए, ए डी जे कोर्ट ले आए, जिनके दम पर अधिवक्ता यह कह सकते हों कि हम आंदोलन करने के लिए आगे बढ़ जाते थे क्योंकि पता था कि बाबू कौशल हमें बचा ही लेंगे, वह व्यक्ति अगर केवल अपनी प्रेक्टिस पर ध्यान देता तो कितनों का ही कहना है कि वे अपनी कोठी कार बना सकते थे किंतु उन्होंने नहीं चुना यह सुख आराम, उन्होंने चुना अधिवक्ता हित और अधिवक्ताओं का उज्जवल भविष्य और इसी कारण वे शायद पहले ऐसे अध्यक्ष बार एसोसिएशन कैराना रहे होंगे जिन्होंने 26 बार बार एसोसिएशन का अध्यक्ष पद सम्भालने के बावजूद अपनी सारी जिंदगी अपनी शादी में मिले सूट में गुजार दी. जब उन्होंने अपना शरीर छोड़ा तो सूट पैंट से भरे कई संदूक छोड़कर नहीं गए बल्कि एक अटैची में कई सालों से पहनी दो पैंट, दो कमीज और दो पाजामे छोडकर गए और एक जर्जर सूट जो अपनी शादी 18 नवंबर 71 से 1 मार्च 2015 तक पहनते आ रहे थे. 

    बदनसीब है बार एसोसिएशन कैराना जिसने पूरे वेस्ट यू पी में एक मजबूत पहचान देने वाले, कैराना के अधिवक्ताओं को सुरक्षित भविष्य देने वाले और अधिवक्ताओं के दुख में साथ खड़े रहने वाले, कैराना कचहरी के अधिवक्ताओं को ही अपना परिवार समझने वाले स्व बाबू कौशल प्रसाद एडवोकेट के त्याग, मेहनत, ईमानदारी का अपमान कर ऐसे व्यक्तित्व के दोबारा जन्म लेने पर ही रोक लगा दी. आज पितृ विसर्जनी अमावस्या के दिन मैं तो यही कहूँगी कि इस धरती पर कभी भी जन्म न लें मेरे पिता जैसे लोग ताकि कभी भी किसी भी संस्था को अपना सब अर्पण कर ऊंचा उठाने वाला व्यक्ति न मिले.

शालिनी कौशिक एडवोकेट 

कैराना (शामली) 

हाई कोर्ट का निर्णय अधिवक्ता एकता पर कुठाराघात

Written By Shalini kaushik on गुरुवार, 5 सितंबर 2024 | 7:55 am

 


(Shalini Kaushik Law Classes post link) 

 इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला दिया है कि किसी वकील या वकीलों के संगठन द्वारा हड़ताल पर जाना, हड़ताल का आह्वान करना या किसी वकील, न्यायालय के अधिकारी या कर्मचारी या उनके रिश्तेदारों की मृत्यु के कारण शोक संवेदना के रूप में कार्य से विरत रहना, प्रत्यक्षतः आपराधिक अवमानना ​​का कृत्य माना जाएगा।

     जहां तक माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा अधिवक्ताओं की हड़ताल के कारण न्यायालय में रुके हुए न्यायिक कार्यों पर चिंता को देखते हुए वकीलों या वकीलों के संगठन द्वारा हड़ताल पर जाने की बात सामान्य मुद्दों पर देखा जाए तो सही कहीं जाएगी, किन्तु यदि हम अधिवक्ता समुदाय द्वारा शोक जताने के लिए हड़ताल को देखते हैं तो माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद को अपने निर्णय पर पुनर्विचार किए जाने के लिए ही आग्रह करेंगे क्योंकि उच्च न्यायालय इलाहाबाद का यह फैसला देखा जाए तो अधिवक्ता सम्वेदना को आपराधिक अवमानना के दायरे में घसीट रहा है जो कतई गलत है.

      माननीय उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा है कि शोक सभा का आयोजन किसी भी कार्य दिवस में साढ़े तीन बजे से किया जा सकता है. अब अगर हम अधिवक्ता समुदाय द्वारा शोक जताने के लिए कार्य से विरत रहने की भावना और कारण की बात करते हैं तो य़ह शोक कर अधिवक्ता समुदाय द्वारा मृतक अधिवक्ता के या उसके मृतक परिजन के दाह संस्कार या दफनाने आदि की प्रक्रिया में शामिल होने के लिए किया जाता है. मेरे पिता जो कि बार एसोसिएशन कैराना के वरिष्ठ अधिवक्ता थे, की मृत्यु 1 मार्च 2015 की शाम 7 बजे हुई, हिन्दू धर्म के सिद्धांतों के अनुसार रात में दाह संस्कार नहीं किया जाता है, इसलिए दाह संस्कार 2 मार्च को होना था, मैं स्वयं अधिवक्ता हूं, पिता की मृत्यु के कारण मैं कचहरी जा ही नहीं सकती थी और मेरे पिता का जो सम्पर्क, समुदाय था, वह भी अधिवक्ता समुदाय था और उस अधिवक्ता समुदाय ने सुबह 7 बजे से ही घर पर पहुंचना आरंभ कर दिया था जो कि स्वाभाविक भी था और जरूरी भी, किन्तु बड़ी संख्या में अधिवक्ता 11 बजे तक एकत्र हो पाए और वह भी तब जब वे कचहरी में शोक व्यक्त करते हुए कार्य से पूर्ण विरत रहने की घोषणा कर पाए. पूरी तरह से दाह संस्कार के कार्य में 2 घण्टे का समय लगा और अधिवक्ताओं द्वारा उसके बाद बार भवन में शोक सभा भी की गई जिसके बारे में मुझे पापा के साथी अधिवक्ता बताकर गए थे. यही नहीं सनातन धर्म के संस्कारों में मृत्यु के बाद तेरहवीं में भी मृतक के परिजनों के दुख बांटने के लिए उसके मित्र, सखा, सम्बन्धी सभी शामिल होते हैं ऐसे ही वकीलों के मित्र, सखा, सम्बन्धी लगभग सभी वकील ही होते हैं, मेरे पिता के भी मित्र, सखा वकील ही थे, जिनका सामुदायिक नाम बार एसोसिएशन कैराना है वे सभी मेरे पिता की तेरहवीं में शामिल हुए जिसका समय सनातन धर्म में 2 बजे रखा गया है और इसके लिए वे 2 बजे से कचहरी कैराना में कार्य से विरत रहे और यह सब जो हो रहा था, यह सब अधिवक्ताओं की संवेदना थी, जिसका कोई भी संदेश माननीय उच्च न्यायालय की आपराधिक अवमानना के रूप में नहीं लिया जा सकता है. ऐसे में साढ़े तीन बजे का निर्णय अगर तब हो गया होता तो एक अधिवक्ता के दाह संस्कार में अधिवक्ता समुदाय ही गायब होता और बाद में वह उपस्थित हो भी जाए तो वह दुख व्यक्त करता हुआ भी ग्लानि अनुभव करता. 

       अधिवक्ताओं पर पहले ही बहुत से प्रतिबन्ध हैं, वे न तो अपने व्यवसाय का विज्ञापन कर सकते हैं, न ही अपना व्यक्तिगत अन्य कारोबार कर सकते हैं, भले ही उनकी वकालत कुछ भी चले या न चले, वे अपने व्यवसाय की गरिमा का सम्मान करते हुए इन सभी नियम कानूनों का पालन करते हैं किन्तु अधिवक्ताओं के शोक जताने के लिए कार्य से विरत रहने को कोर्ट की आपराधिक अवमानना की श्रेणी में लाना अधिवक्ता समुदाय के साथ अन्याय है. पहले ही उत्तर प्रदेश में एडवोकेट प्रोटेक्शन ऐक्ट लागू नहीं है और ऐसे में अधिवक्ताओं पर एक दूसरे के दुख में भी साथ देने पर इस तरह से रोक लगाने पर अधिवक्ताओं को अधिवक्ताओं से अलग करने का प्रयास कर "अधिवक्ता एकता" पर कुठाराघात किया जा रहा है, जिसे किसी भी हालत में सही नहीं कहा जा सकता है. अब मृतक अधिवक्ता या उसके मृतक परिजन के दाह संस्कार, या दफनाने आदि की प्रक्रिया में शामिल होने के समय को छोड़कर बाद में साढ़े तीन बजे मात्र शोक प्रकट कर देना मात्र एक औपचारिकता ही रह जाएगी जिससे अधिवक्ता एकता खतम ही हो जाएगी. 

शालिनी कौशिक

एडवोकेट 

कैराना (शामली) 

अपने लिए जिए तो क्या जिए - स्व श्री प्रेमचंद गुप्ता

Written By Shalini kaushik on गुरुवार, 1 अगस्त 2024 | 11:42 am

 


राष्ट्र व समाज के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित करने वाले स्व श्री प्रेमचंद गुप्ता जी एक उदारमना व्यक्तित्व थे, जिनके शब्दकोष में किसी की सहायता हेतु 'नहीं' शब्द था ही नहीं। सामान्यतः कस्बे में गुरू जी व मास्टर जी के नाम से प्रसिद्ध स्व श्री प्रेमचंद गुप्ता जी ऐसी जिजीविषा से युक्त व्यक्तित्व थे ; जिसने व्यक्तिगत जीवन संघर्षो से टकराते हुए भी समाज के हितार्थ अपना अतुलनीय योगदान किया। 

        कांधला क्षेत्र की सर्वप्रथम स्थापित अग्रणी शैक्षणिक संस्था हिन्दू इण्टर कॉलेज में तीन दशकों तक अर्थशास्त्र प्रवक्ता के सम्मानित पद पर आसीन रहते हुए हजारों विद्यार्थियों को उज्जवल भविष्य प्रदान करने के साथ-साथ उन्होंने अनेक सामाजिक संस्थाओं के पदाधिकारी के रूप में समाज की निःस्वार्थ सेवा की कितने ही गरीबों को आर्थिक सहायता प्रदान कर संकट से उबरने में उनका सहयोग किया स्व श्री प्रेमचंद गुप्ता जी ने कांधला क्षेत्र की समस्याओं को दूर करने, अनेक संस्थाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त करने, गरीब - शोषित जन की सहायता करते हुए एक जागरूक नागरिक के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त की। 

      कांधला के उत्तर में स्थित मुक्तिधाम को एक व्यवस्थित स्वरूप प्रदान कराने के लिए उन्होंने व्यापक जन संपर्क कर दिन रात एक कर दिए। प्रगतिशील विचारधारा के धनी स्व श्री प्रेमचंद गुप्ता जी सामाजिक विषमताओं से टकराने वाले, उन्हें चुनौती देने वाले और जीवंतता के पर्याय थे। स्व श्री प्रेमचंद गुप्ता जी ने सनातन धर्म व संस्कृति के प्रचार-प्रसार में अपने समस्त जीवन काल में अद्वितीय योगदान किया। कांधला क्षेत्र का हर नागरिक उनके प्रतिअपनी कृतज्ञता प्रकट करता है और उनके जन्म दिवस पर उनको सादर नमन करता है। हम उनके समस्त परिवारीजन के उत्तम स्वास्थ्य तथा उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं। 

सादर 

शालिनी कौशिक एडवोकेट डॉ शिखा कौशिक नूतन

अध्यक्ष एवं महासचिव 

मन्दिर महादेव मारूफ शिवाला कांधला धर्मार्थ ट्रस्ट (रजिस्टर्ड) 

समाज की कुलदेविया गौत्र वार

Written By yayawer on गुरुवार, 18 अप्रैल 2024 | 3:09 pm

क्षत्रिय वंश की कुलदेवियां प्राचीन समय में भारत में वर्ण व्यवस्था थी, जिसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र इन चार वर्णों में बाँटा गया था। यह वर्ण व्यवस्था समाप्त हो गई तथा इन वर्णों के स्थान पर कई जातियाँ व उपजातियाँ बन गई। क्षत्रियों का कार्य समाज की रक्षा करना था। भारतीय उपमहाद्वीप की बहुत प्रभावशाली जाति है। 

समाज की अपनी कुल देवियों की मान्यता है. जिनकी यह पूजा करते है और जिनसे उन्हें शक्ति मिलती है। इन सभी कुल शाखाओं ने नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षित रखने के लिए कुल देवियों को स्वीकार किया। 

ये कुलदेवियां कुल के अनुसार निम्नलिखित हैं- 

खंगार - गजानन माता, 

चावड़ा - चामुंडा माता, 

छोकर - चण्डी केलावती माता, 

धाकर - कालिका माता, 

निमीवंश - दुर्गा माता, 

परमार - सच्चियाय माता, 

आसोपा सांखला - जाखन माता,

 पुरु - महालक्ष्मी माता, 

बुन्देला - अन्नपूर्णा माता, 

इन्दा - चामुण्डा माता, 

उज्जेनिया - कालिका माता, 

उदमतिया - कालिका माता, 

कछवाहा - जमवाय माता, 

कणड़वार - चण्डी माता, 

कलचूरी - विंध्यवासिनी माता, 

काकतिय - चण्डी माता,

काकन - दुर्गा माता, 

किनवार - दुर्गा माता, 

केलवाडा - नंदी माता, 

कौशिक - योगेश्वरी माता, 

गर्गवंश कालिका माता, 

गोंड़ - महाकाली माता, 

गोतम - चामुण्डा माता, 

गोहिल - बाणेश्वरी माता, 

चंदेल - मेंनिया माता, 

चंदोसिया - दुर्गा माता, 

चंद्रवंशी - गायत्री माता, 

चुड़ासमा -अम्बा भवानी माता, 

चौहान - आशापूर्णा माता, 

जाडेजा - आशपुरा माता, 

जादोन - कैला देवी (करोली), 

जेठंवा - चामुण्डा माता, 

झाला - शक्ति माता, 

तंवर - चिलाय माता, 

तिलोर - दुर्गा माता, 

दहिया - कैवाय माता, 

दाहिमा - दधिमति माता, 

दीक्षित - दुर्गा माता, 

देवल - सुंधा माता, 

दोगाई - कालिका(सोखा)माता, 

नकुम - वेरीनाग बाई,

नाग - विजवासिन माता, 

निकुम्भ - कालिका माता, 

निमुडी - प्रभावती माता, 

निशान - भगवती दुर्गा माता, 

नेवतनी - अम्बिका भवानी,

 पड़िहार - चामुण्डा माता,

परिहार - योगेश्वरी माता, 

बड़गूजर - कालिका(महालक्ष्मी)माँ, 

बनाफर - शारदा माता, 

बिलादरिया - योगेश्वरी माता, 

बैस - कालका माता, 

भाटी - स्वांगिया माता, 

भारदाज - शारदा माता, 

भॉसले - जगदम्बा माता, 

यादव - योगेश्वरी माता, 

राउलजी - क्षेमकल्याणी माता, 

राठौड़ - नागणेचिया माता, 

रावत - चण्डी माता, 

लोह - थम्ब चण्डी माता, 

लोहतमी - चण्डी माता, 

लोहतमी - चण्डी माता, 

वाघेला - अम्बाजी माता, 

वाला - गात्रद माता, 

विसेन - दुर्गा माता, 

शेखावत - जमवाय माता,

सरनिहा - दुर्गा माता, 

सिंघेल - पंखनी माता, 

सिसोदिया - बाणेश्वरी माता, 

सीकरवाल - कालिका माता, 

सेंगर - विन्ध्यवासिनि माता,

 सोमवंश - महालक्ष्मी माता, 

सोलंकी - खीवज माता, 

स्वाति - कालिका माता, 

हुल - बाण माता,

 हैध्य - विंध्यवासिनी माता, 

मायला - इन्जु माता , 

सिकरवार क्षत्रियों की कुलदेवी कालिका माता.

 हरदोई के भवानीपुर गांव में कालिका माता का प्राचीन मंदिर है। सिकरवार क्षत्रियों के घरों में होने वाले मांगलिक अवसरों पर अब भी सबसे पहले कालिका माता को याद किया जाता है। यह मंदिर नैमिषारण्य से लगभग 3 किलोमीटर दूर कोथावां ब्लाक में स्थित है। कहा जाता है कि पहले गोमती नदी मंदिर से सट कर बहती थी। वर्तमान में गोमती अपना रास्ता बदल कर मंदिर से दूर हो गयी है, लेकिन नदी की पुरानी धारा अब भी एक झील के रूप में मौजूद है। बुजुर्ग बताते हैं कि पेशवा बाजीराव द्वितीय को 1761 में अहमद शाह अब्दाली ने युद्ध क्षेत्र में हरा दिया था। इसके बाद बाजीराव ने अपना शेष जीवन गोमती तट के इस निर्जन क्षेत्र में बिताया। चूंकि वह देवी के साधक थे। इस कारण मंदिर स्थल को भवानीपुर नाम दिया गया। पेशवा ने नैमिषारण्य के देव देवेश्वर मंदिर का भी जीर्णोद्धार कराया था। अब्दाली से मिली पराजय के बाद उनका शेष जीवन यहां माता कालिका की सेवा और साधना में बीता। उनकी समाधि मंदिर परिसर में ही स्थित है। यहां नवरात्र के दिनों में मेला लगता है। मेला में भवानीपुर के अलावा जियनखेड़ा, महुआ खेड़ा, काकूपुर, जरौआ, अटिया और कोथावां के ग्रामीण पहुंचते हैं। यहां सिकरवार क्षत्रिय एकत्र होकर माता कालिका की विशेष साधना करते हैं।

डी जे पर प्रतिबन्ध लगे

Written By Shalini kaushik on मंगलवार, 5 मार्च 2024 | 7:21 am

  


आजकल शादी विवाह समारोह चल रहे हैं, आज घर के पीछे स्थित एक धर्मशाला में विवाह समारोह थाऔर जैसा कि आजकल का प्रचलन है वहाँ डी.जे. बज रहा था और शायद उच्चतम ध्वनि में बज रहा था और जैसा कि डी.जे. का प्रभाव होता है वही हो रहा था ,उथल-पुथल मचा रहा था ,मानसिक शांति भंग कर रहा था और आश्चर्य की बात है कि हमारे कमरों के किवाड़ भी हिले जा रहे थे ,हमारे कमरों के किवाड़ जो कि ऐसी दीवारों में लगे हैं जो लगभग दो फुट मोटी हैं और जब हमारे घर की ये हालत थी तो आजकल के डेढ़ ईंट के दीवार वाले घरों की हालत समझी जा सकती है .बहुत मन किया कि जाकर डी.जे. बंद करा दूँ किन्तु किसी की ख़ुशी में भंग डालना न हमारी संस्कृति है न स्वभाव इसलिए तब किसी तरह बर्दाश्त किया किन्तु आगे से ऐसा न हो इसके लिए कानून में हमें मिले अधिकारों की तरफ ध्यान गया .

भारतीय दंड सहिंता का अध्याय 14 लोक स्वास्थ्य ,क्षेम ,सुविधा ,शिष्टता और सदाचार पर प्रभाव डालने वाले अपराधों के विषय में है और इस तरह से शोर मचाकर जो असुविधा जन सामान्य के लिए उत्पन्न की जाती है वह दंड सहिंता के इसी अध्याय के अंतर्गत अपराध मानी जायेगी और लोक न्यूसेंस के अंतर्गत आएगी .भारतीय दंड सहिंता की धारा 268 कहती है -
''वह व्यक्ति लोक न्यूसेंस का दोषी है जो कोई ऐसा कार्य करता है ,या किसी ऐसे अवैध लोप का दोषी है ,जिससे लोक को या जन साधारण को जो आस-पास रहते हों या आस-पास की संपत्ति पर अधिभोग रखते हों ,कोई सामान्य क्षति ,संकट या क्षोभ कारित हो या जिसमे उन व्यक्तियों का ,जिन्हें किसी लोक अधिकार को उपयोग में लाने का मौका पड़े ,क्षति ,बाधा ,संकट या क्षोभ कारित होना अवश्यम्भावी हो .''
कोई सामान्य न्यूसेंस इस आधार पर माफ़ी योग्य नहीं है कि उससे कुछ सुविधा या भलाई कारित होती है .
इस प्रकार न्यूसेंस या उपताप से आशय ऐसे काम से है जो किसी भी प्रकार की असुविधा ,परेशानी ,खतरा,क्षोभ [खीझ ]उत्पन्न करे या क्षति पहुंचाए .यह कोई काम करने या कोई कार्य न करने के द्वारा भी हो सकता है और धारा 290 भारतीय दंड सहिंता में इसके लिए दंड भी दिया जा सकता है .धारा 290 कहती है -
''जो कोई किसी ऐसे मामले में लोक न्यूसेंस करेगा जो इस सहिंता द्वारा अन्यथा दंडनीय नहीं है वह जुर्माने से जो दो सौ रूपये तक का हो सकेगा दण्डित किया जायेगा .''
और न केवल दाण्डिक कार्यवाही का विकल्प है बल्कि इसके लिए सिविल कार्यवाही भी हो सकती है क्योंकि यह एक अपकृत्य है और यह पीड़ित पक्ष पर निर्भर है कि वह दाण्डिक कार्यवाही संस्थित करे या क्षतिपूर्ति के लिए सिविल दावा दायर करे .
और चूँकि किसी विशिष्ट समय पर रेडियो .लाउडस्पीकर ,डीजे आदि को लोक न्यूसेंस नहीं माना जा सकता इसका मतलब यह नहीं कि इन्हें हमेशा ही इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता .वर्त्तमान में अनेक राज्यों ने अपने पुलिस अधिनियमों में इन यंत्रों से शोर मचाने को एक दंडनीय अपराध माना है क्योंकि यह लोक स्वास्थ्य को दुष्प्रभावित करता है तथा इससे जनसाधारण को क्षोभ या परेशानी उत्पन्न होती है [बम्बई पुलिस अधिनियम 1951 की धाराएं  33, 36 एवं 38 तथा कलकत्ता पुलिस अधिनियम 1866 की धारा 62 क [ड़]आदि ]
इसी तरह उ०प्र० पुलिस अधिनयम 1861 की धारा  30[4] में यह उल्लेख है कि वह त्यौहारों और समारोहों के अवसर पर मार्गों में कितना संगीत है उसको भी विनियमित कर सकेगा .

''शंकर सिंह बनाम एम्परर ए.आई.आर. 1929 all .201 के अनुसार त्यौहारों और समारोहों के अवसर पर पुलिस को यह सुनिश्चित करने का अधिकार है कि वह संगीत के आवाज़ की तीव्रता को सुनिश्चित करे .त्यौहारों और समारोहों के अवसर पर लोक मार्गों पर गाये गए गाने एवं संगीत की सीमा सुनिश्चित करना पुलिस का अधिकार है .''

और यहाँ मार्ग से तात्पर्य सार्वजनिक मार्ग व् स्थान से है जहाँ जनता का जमाव विधिपूर्ण रूप में होता है और इसलिए ऐसे में पुलिस भी इस तरह के समारोहों में इन यंत्रों की ध्वनि तीव्रता का विनियमन कर सकती है .

      साथ ही कानून द्वारा मिले हुए इस अधिकार के रहते ऐसे स्थानों की प्रबंध समिति का भी यह दायित्व बन जाता है कि वह जन सुविधा व् स्वास्थ्य को देखते हुए ध्वनि तीव्रता के सम्बन्ध में नियम बनाये अन्यथा वह भी भारतीय दंड सहिंता के अंतर्गत दंड के भागी हो सकते हैं क्योंकि वे प्रबंधक की हैसियत से प्रतिनिधायी दायित्व के अधीन आते हैं .
 
शालिनी कौशिक 
एडवोकेट 
कैराना (शामली) 

एक पुत्र को पिता की पाती

Written By Sundip Kumar Singh on शनिवार, 21 अक्टूबर 2023 | 9:26 pm

'कुछ लोग ऐसे परिवारों में जन्म लेते हैं जहां शिक्षा को बढ़ावा दिया जाता है, जबकि कुछ अन्य इसके विरुद्ध होते हैं. कुछ का जन्म समृद्ध अर्थव्यवस्था में होता है जहां उद्मिता को बढ़ावा दिया जाता है, जबकि कुछ का जन्म युद्ध और अभाव में होता है. मैं तुम्हें सफल होते देखना चाहता हूं. और मैं चाहता हूं कि तुम इसे खुद हासिल करो. लेकिन याद रखो कि सफलता हमेशा मेहनत के कारण नहीं मिलती, और गरीबी हमेशा आलस के कारण नहीं होती. जब तुम दूसरों को, और साथ में खुद को आंकने लगो, यह हमेशा ध्यान में रखना.'

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एक पुत्र को पिता की पाती...

Founder

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Saleem Khan