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वीर जवानों को नमन

Written By Mithilesh dubey on सोमवार, 24 मार्च 2014 | 8:35 pm

कपकपाती ठण्ड में
जो कभी ठहरा नहीं
चिलचिलाती धूप में
जो कभी थमा नहीं

गोलियों की बौछार में
जो कभी डरा नहीं
बारूदी धमाकों से
जो कभी दहला नहीं

अनगिनत लाशों में
जो कभी सहमा नहीं
फर्ज के सामने
जो कभी डिगा नहीं

आंसुओं के सैलाब से
जो कभी पिघला नहीं
देश के आन ,मान ,शान में
मिटने से जो कभी पीछे हटा नहीं

ऐसे वीर जवानों को
शत -शत नमन ।।

नव वर्ष की बधाई

Written By kavisudhirchakra.blogspot.com on मंगलवार, 1 जनवरी 2013 | 10:25 am


हमारे एक मित्र
हैं बड़े विचित्र
एक जनवरी को हमसे बोले -
"
चक्र" जी
नव वर्ष की बधाई !
हमने कहा
बड़े अजीब हो,
बिना सोचे समझे ही बधाई
आपको
देने मै ज़रा भी शर्म नहीं आयी ?
अरे,
नव वर्ष जब भी आता है
केवल
वर्ष ही तो नया रहता है
लेकिन
समस्याएँ पुरानी दोहराता है !
समस्याओं की श्रेणी में
प्रथम क्रमांक
रोटी का आता है
विश्वाश करो,
एक दिन तो ऐसा आएगा
जब
मोनो एक्टिंग करके
कोरी कल्पना से पेट भरना होगा,
तब
हम अपने बच्चों को बताएंगे
कि
रोटी एक इतिहास है
और
उसकी कहानियां सुनाएंगे !
यह सुनकर
हमारे बच्चे भी
रोटी के भूतकालीन अस्तित्व पर
विशवास नहीं कर पाएंगे !
मेरे भाई,
बधाई का क्या है -
नव वर्ष की
सिर्फ निष्ठा बदल जाती है
और
मौक़ा देखकर
उसकी भी नीयत बदल जाती है !
जिस दिन
महंगाई कम हो जाएगी
उस दिन मैं
घी के दिये जलाऊंगा
और
सच मानो
आपको नव वर्ष की बधाई देने अवश्य आऊँगा |

ख़त

Written By S.VIKRAM on गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011 | 12:01 pm


जनवरी की सर्द रात, एक कम्बल 
और कुछ अटपटे ख़याल
थोड़ी सी मदहोशी, कुछ चाय के प्याले 
और मन मे उठे सवाल 
कुछ पुरानी यादें, और वो नज़्में 
जो तुमने गुनगुनायी थीं 
तुम्हारी बातें, और मेरी पुरानी गजलें 
जो मैंने तुम्हें सुनाई थीं 
मेरी गुस्ताख़ शरारत पे 
तुम्हारी हया भरी डांट
हमने बूढ़े पीपल पे लगाई थी 
जो लाल डोरी की गांठ 
कुछ खत जो कभी भेजे नहीं 
और वो बातें जो कही नहीं 
जिस्मों के ये फासले और
दिलों मे दूरिया जो रही नहीं 
वो बेचैनी मे बदली गयी करवटें 
और तनहाई मे भरी गयी आह 
वो पूनम के चाँद को देखकर 
तुमको छू लेने की चाह 
वो किताबों से निकले 
सूखे फूलों की महक 
तेरे चेहरे का ताब, 
तेरी साँसों की दहक
मेरे कुछ रंगीन ख्वाब, 
और आँखें तेरी शराब  

और भी बहुत कुछ मिला कर 
पकाया है जज़्बातों की आंच पर 
फिर कुछ देर ठंडा किया है 
रख के हसरतों के काँच पर।

कागज़ पे परोस कर 
इक ख़त तुम्हें भेजा है
ज़रा चख के ये बताना 
क्या नमक इश्क़ का सही पड़ा है??

मत कहो सच

Written By नीरज द्विवेदी on शनिवार, 1 अक्टूबर 2011 | 12:35 am



मत कहो कुछकोई बच्चा कुनमुना है,
सूर्य लेकर हाथ में, सच ढूंढने की कोशिश,
भी हार सकती है,
बाहर सब ओर कोहरा घना है॥

मत जगाओ देश कोयह अनसुना है,
किसान का हलसैनिक की बन्दूक,
भी हार सकती है,
धन का नशा कई गुना है॥

मत कहो सचआजकल बिलकुल मना है,
पत्रकारिता की बिकी कलम को छोड़ोये कलम,
ना हार सकती है
सत्य का न ही नामों निशां है॥

मत समझनागरीब भी मानव जना है,
इन्हें बचाने की कोशिश करती, इंसानियत
भी हार सकती है
ये न मिट्टी का बना है॥

मत कहो कुछकोई बच्चा कुनमुना है

प्रेमी जमाना होता



न होता कोई कत्ले आम,
मंदिर मस्जिद को रोता,
होते धर्म न इश्वर अल्लाह,
इक पालनहार ही होता॥

होता हर ओर एक ही रंग,
बस प्रेमी जमाना होता,
न आती कोई आफत,
न ही जंगे तराना होता॥

पेड़ मुस्लिम है न हिन्दू है,
अब भी जंगल में रहता,
पशु पक्षी और मौसम को,
जीवन का दान ही करता॥

क्या करें सभ्यता का अब,
जब सभ्य सभ्य से लड़ता,
अधनंगा जब आदि मनुज,
बस यहाँ शांति से रहता॥

न होता कोई कत्लेआम,

ये जीवन क्यूँ भारी लगता है?

Written By नीरज द्विवेदी on बुधवार, 28 सितंबर 2011 | 4:58 pm



तू आज नहीं है सम्मुख तो,
जीवन क्यूँ भारी लगता है?
मौसम भी साथ नहीं देता,
तेरा आभारी लगता है॥

इन सबकी बातें छोड़ो,
आँखे क्यूँ साथ नहीं देतीं?
इस सूखे साखे मौसम में,
क्यूँ भरा पनारा लगता है?

कागज की कश्ती डूब चुकी,
जीवन नौका की बारी है,
पतवार है जिसके हाथों में,
बस उसका पता नहीं लगता है॥

कैसे रो रोकर गाऊँ मैं?
कैसे खुद को समझाऊँ मैं?
ये चाँद भी बात नहीं करता,
तेरा ही आशिक लगता है॥

आँखे खोलूं तो पानी है,
दिखती ना कोई निशानी है,
कानों में पड़ने वाला श्वर,
बस तेरी कहानी कहता है॥

ये धरा नहीं है, जन्नत है



जन्मों से जिसको माँगा है,

वो पूरी होती मन्नत है।
ये धरा नहीं हैजन्नत है।

शस्य श्यामला धरती प्यारी,
ईश्वर की एक अमानत है,
सबको ये खैर मिलेगी कैसे?
बस ये तो  मेरी किस्मत है॥
ये धरा नहीं हैजन्नत है।

क्रांतिवीर विस्मिल की माता,
जननी है नेता सुभाष की,
पद प्रक्षालन करता सागर,
जिसके सम्मुख शरणागत है॥
ये धरा नहीं हैजन्नत है।

बाँट दिया हो भले तुच्छ,
नेताओं ने मंदिर मस्जिद में,
भूकम्पों से ना हिलने वाला,
हिमगिरी से रक्षित भारत है॥
ये धरा नहीं हैजन्नत है।

संस्कार शुशोभित पुण्यभूमि,
हैं प्रेमराग में गाते पंछी,
दुनिया को राह दिखाने की,
इसकी ये अविरल गति है॥
ये धरा नहीं हैजन्नत है।

आदिकाल से मानव को,
जीवन का सार सिखाया है,
स्रष्टि का सारा तेज ज्ञान,
जिसके आगे नतमस्तक है॥
ये धरा नहीं हैजन्नत है।

जन्म यहाँ फिर पाना ही,
मेरा बस एक मनोरथ है,
कर लूँ चाहे जितने प्रणाम,
पर झुका रहेगा मस्तक ये॥
ये धरा नहीं हैजन्नत है।

नाजायज भी जायज है

Written By नीरज द्विवेदी on मंगलवार, 20 सितंबर 2011 | 12:20 pm




तू अगर खड़ी हो सम्मुख तो,
दिल की दुर्घटना जायज है,
आँखों की बात करूँ कैसे?
इनका ना हटना जायज है॥

स्वप्नों में उड़ना जायज है,
चाँद पकड़ना जायज है,
गर तुम हो साथ मेरे तो,
दुनिया से लड़ना जायज है॥

किसी और से आँख लड़े कैसे?
ये सब तो अब नाजायज है
तू हो मेरे आलिंगन में तो,
धरती का फटना जायज है॥

चाहें लाख बरसतें हो बादल,
उनका चिल्लाना जायज है,
गर तेरा सर हो मेरे सीने पर,
बिजली का गिरना जायज है॥

अचूक हलाहल हो सम्मुख,
मेरा पी जाना जायज है,
इक आह हो तेरे होंठों पर,
तो मेरा डर जाना जायज है॥

स्रष्टि का क्रंदन जायज है,
हिमाद्रि बिखंडन जायज है,
मेरे होंठो पर हों होंठ तेरे,
तो धरा का कम्पन जायज है॥

तू हो तीर खड़ी नदिया के,
उसका रुक जाना जायज है,
बस तेरे लिए हे प्राणप्रिये,

जीवन के छंद



नौका को सागर की लहरों पर
पति और पत्नी के झगड़ों पर,
एहसास प्यार का होता है,
गऊयों को अपने बछड़ों पर॥

हिन्दू मुस्लिम के दंगों पर,
भाई भाई के झगड़ों पर,
एहसास दर्द का होता है,
धरती को अपने टुकड़ों पर॥

पेड़ों पर चढ़ती बेलों पर,
उन पर इठलातीं कलियों पर,
एहसास प्यार का होता है,
मिटटी को जौं की फलियों पर॥

नदिया के दोनों छोरों पर,
आँखों के दोनों कोरों पर,
एहसास दर्द का होता है,
अब तेरे बिना बिछौनों पर॥

उस रब के सारे बन्दों पर,
इस दुनिया के सब धंधो पर,
आश्चर्य बहुत ही होता है,
अब जीवन के इन छंदों पर॥

ये मदिरालय

Written By नीरज द्विवेदी on मंगलवार, 13 सितंबर 2011 | 6:30 pm


थोड़े गम जो सह नही पाते हैं,
बस मय में ही डूबे जाते हैं।
पीकर खुद को बादशाह समझ,
मदिरालय में झुकने जाते हैं।

मदिरामय होकरस्वप्नों में,
सच्चे दुःख दर्दभुलाये जाते हैं।
मृतप्राय पड़े इस जीवन के,
सत्यासत्य बखाने जाते हैं। 

दो चार ग़मों के ही खातिर,
ये मदिरालय जाया करते हैं।
स्वाभिमान गिरवी रख कर,
मय की ठोकर खाया करते हैं।

ये तो अपने कर्मों का ही,
बोझ नहीं ढ़ो पाते हैं।
ये तुच्छ और असहाय जीव,
दार्शनिक बनाये जाते हैं। 

हम प्रश्न नहीं उठाते दुःख पर,
जीवन के पहलू होते हैं।
पर इनसे लड़ने की ताकत,
मदिरा से कायर ही लेते हैं।

हम निपट अकेले हैं फिर भी,
साथ न इसका लेते हैं।
हम अपने जख्मों का दर्द,
हँसस्वयं गर्व से पीते हैं।


Founder

Founder
Saleem Khan