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मत कहो सच

Written By नीरज द्विवेदी on शनिवार, 1 अक्टूबर 2011 | 12:35 am



मत कहो कुछकोई बच्चा कुनमुना है,
सूर्य लेकर हाथ में, सच ढूंढने की कोशिश,
भी हार सकती है,
बाहर सब ओर कोहरा घना है॥

मत जगाओ देश कोयह अनसुना है,
किसान का हलसैनिक की बन्दूक,
भी हार सकती है,
धन का नशा कई गुना है॥

मत कहो सचआजकल बिलकुल मना है,
पत्रकारिता की बिकी कलम को छोड़ोये कलम,
ना हार सकती है
सत्य का न ही नामों निशां है॥

मत समझनागरीब भी मानव जना है,
इन्हें बचाने की कोशिश करती, इंसानियत
भी हार सकती है
ये न मिट्टी का बना है॥

मत कहो कुछकोई बच्चा कुनमुना है

प्रेमी जमाना होता



न होता कोई कत्ले आम,
मंदिर मस्जिद को रोता,
होते धर्म न इश्वर अल्लाह,
इक पालनहार ही होता॥

होता हर ओर एक ही रंग,
बस प्रेमी जमाना होता,
न आती कोई आफत,
न ही जंगे तराना होता॥

पेड़ मुस्लिम है न हिन्दू है,
अब भी जंगल में रहता,
पशु पक्षी और मौसम को,
जीवन का दान ही करता॥

क्या करें सभ्यता का अब,
जब सभ्य सभ्य से लड़ता,
अधनंगा जब आदि मनुज,
बस यहाँ शांति से रहता॥

न होता कोई कत्लेआम,

ये जीवन क्यूँ भारी लगता है?

Written By नीरज द्विवेदी on बुधवार, 28 सितंबर 2011 | 4:58 pm



तू आज नहीं है सम्मुख तो,
जीवन क्यूँ भारी लगता है?
मौसम भी साथ नहीं देता,
तेरा आभारी लगता है॥

इन सबकी बातें छोड़ो,
आँखे क्यूँ साथ नहीं देतीं?
इस सूखे साखे मौसम में,
क्यूँ भरा पनारा लगता है?

कागज की कश्ती डूब चुकी,
जीवन नौका की बारी है,
पतवार है जिसके हाथों में,
बस उसका पता नहीं लगता है॥

कैसे रो रोकर गाऊँ मैं?
कैसे खुद को समझाऊँ मैं?
ये चाँद भी बात नहीं करता,
तेरा ही आशिक लगता है॥

आँखे खोलूं तो पानी है,
दिखती ना कोई निशानी है,
कानों में पड़ने वाला श्वर,
बस तेरी कहानी कहता है॥

ये धरा नहीं है, जन्नत है



जन्मों से जिसको माँगा है,

वो पूरी होती मन्नत है।
ये धरा नहीं हैजन्नत है।

शस्य श्यामला धरती प्यारी,
ईश्वर की एक अमानत है,
सबको ये खैर मिलेगी कैसे?
बस ये तो  मेरी किस्मत है॥
ये धरा नहीं हैजन्नत है।

क्रांतिवीर विस्मिल की माता,
जननी है नेता सुभाष की,
पद प्रक्षालन करता सागर,
जिसके सम्मुख शरणागत है॥
ये धरा नहीं हैजन्नत है।

बाँट दिया हो भले तुच्छ,
नेताओं ने मंदिर मस्जिद में,
भूकम्पों से ना हिलने वाला,
हिमगिरी से रक्षित भारत है॥
ये धरा नहीं हैजन्नत है।

संस्कार शुशोभित पुण्यभूमि,
हैं प्रेमराग में गाते पंछी,
दुनिया को राह दिखाने की,
इसकी ये अविरल गति है॥
ये धरा नहीं हैजन्नत है।

आदिकाल से मानव को,
जीवन का सार सिखाया है,
स्रष्टि का सारा तेज ज्ञान,
जिसके आगे नतमस्तक है॥
ये धरा नहीं हैजन्नत है।

जन्म यहाँ फिर पाना ही,
मेरा बस एक मनोरथ है,
कर लूँ चाहे जितने प्रणाम,
पर झुका रहेगा मस्तक ये॥
ये धरा नहीं हैजन्नत है।

नाजायज भी जायज है

Written By नीरज द्विवेदी on मंगलवार, 20 सितंबर 2011 | 12:20 pm




तू अगर खड़ी हो सम्मुख तो,
दिल की दुर्घटना जायज है,
आँखों की बात करूँ कैसे?
इनका ना हटना जायज है॥

स्वप्नों में उड़ना जायज है,
चाँद पकड़ना जायज है,
गर तुम हो साथ मेरे तो,
दुनिया से लड़ना जायज है॥

किसी और से आँख लड़े कैसे?
ये सब तो अब नाजायज है
तू हो मेरे आलिंगन में तो,
धरती का फटना जायज है॥

चाहें लाख बरसतें हो बादल,
उनका चिल्लाना जायज है,
गर तेरा सर हो मेरे सीने पर,
बिजली का गिरना जायज है॥

अचूक हलाहल हो सम्मुख,
मेरा पी जाना जायज है,
इक आह हो तेरे होंठों पर,
तो मेरा डर जाना जायज है॥

स्रष्टि का क्रंदन जायज है,
हिमाद्रि बिखंडन जायज है,
मेरे होंठो पर हों होंठ तेरे,
तो धरा का कम्पन जायज है॥

तू हो तीर खड़ी नदिया के,
उसका रुक जाना जायज है,
बस तेरे लिए हे प्राणप्रिये,

जीवन के छंद



नौका को सागर की लहरों पर
पति और पत्नी के झगड़ों पर,
एहसास प्यार का होता है,
गऊयों को अपने बछड़ों पर॥

हिन्दू मुस्लिम के दंगों पर,
भाई भाई के झगड़ों पर,
एहसास दर्द का होता है,
धरती को अपने टुकड़ों पर॥

पेड़ों पर चढ़ती बेलों पर,
उन पर इठलातीं कलियों पर,
एहसास प्यार का होता है,
मिटटी को जौं की फलियों पर॥

नदिया के दोनों छोरों पर,
आँखों के दोनों कोरों पर,
एहसास दर्द का होता है,
अब तेरे बिना बिछौनों पर॥

उस रब के सारे बन्दों पर,
इस दुनिया के सब धंधो पर,
आश्चर्य बहुत ही होता है,
अब जीवन के इन छंदों पर॥

ये मदिरालय

Written By नीरज द्विवेदी on मंगलवार, 13 सितंबर 2011 | 6:30 pm


थोड़े गम जो सह नही पाते हैं,
बस मय में ही डूबे जाते हैं।
पीकर खुद को बादशाह समझ,
मदिरालय में झुकने जाते हैं।

मदिरामय होकरस्वप्नों में,
सच्चे दुःख दर्दभुलाये जाते हैं।
मृतप्राय पड़े इस जीवन के,
सत्यासत्य बखाने जाते हैं। 

दो चार ग़मों के ही खातिर,
ये मदिरालय जाया करते हैं।
स्वाभिमान गिरवी रख कर,
मय की ठोकर खाया करते हैं।

ये तो अपने कर्मों का ही,
बोझ नहीं ढ़ो पाते हैं।
ये तुच्छ और असहाय जीव,
दार्शनिक बनाये जाते हैं। 

हम प्रश्न नहीं उठाते दुःख पर,
जीवन के पहलू होते हैं।
पर इनसे लड़ने की ताकत,
मदिरा से कायर ही लेते हैं।

हम निपट अकेले हैं फिर भी,
साथ न इसका लेते हैं।
हम अपने जख्मों का दर्द,
हँसस्वयं गर्व से पीते हैं।


हमारी जिद

Written By नीरज द्विवेदी on बुधवार, 7 सितंबर 2011 | 4:12 pm


इस गुस्ताख दिल काऔर हस्र क्या करोगी तुम
हम तो ढंग से, रो भी नहीं सके, तेरे आजमाने में।

जिंदगी बड़ी मुबारक चीज हैरब की इनायत है
पर हमें इस तरह जीनागंवारा नहीं तेरे फंसाने में।

हम बहुत जिद्दी थे कभीअपने किसी जमाने में,
तुम्हे ही पाने की जिद छोड़ दीएक बार ठोकर खाने में।
हमारी जिद
My Blog: Life is Just A Life

शुक्रिया जनाब


हम शुक्रगुजार हैं उनकेजिसने ठुकराया है हमें,
अपने भावों को कविता मेंपिरोना सिखाया है हमें।

उनके इस तरह जाने कागम क्या करें रब से,
उसने ही तो रोते हुए मुस्कुराना, सिखाया है हमें।

हम तो उनकी इस अदा कोजुल्म भी न कह सके,
इस अदा ने ही तोअपना आशिक बनाया है हमें।
शुक्रिया जनाब
My Blog: Life is Just a Life

तुझको मिले अब तो चाहत तेरी

Written By नीरज द्विवेदी on रविवार, 4 सितंबर 2011 | 10:35 pm



मेरी दुआ है रब सेकि पूरी हो आरजू तेरी,
मेरी अल्तजा है उस खुदा सेमोहब्बत मेरी,
मुझे तू मिलेना मिलेअब ये किस्मत मेरी,
फिर भी तुझको मिले अब तो चाहत तेरी॥

इन दिनों हमें शौक हैयाद करना तुम्हें,
और तुम्हारी आदत हैभूल जाना हमें,
तुझे हिचकी का आना है हरकत मेरी
फिर भी तुझको मिले अब तो चाहत तेरी॥

ये आज कल अश्क बहाना है हरकत मेरी,
फिर भी तुझको मिले अब तो चाहत तेरी॥

एक अकेला पत्ता

Written By नीरज द्विवेदी on गुरुवार, 1 सितंबर 2011 | 9:30 am



एक पेड़ से टूटा हुआ, निरुपाय, हताश, निपट अकेला पत्ता  क्या सन्देश देना चाहता है. पढिये यहाँ:  एक पत्ता



२६ अगस्त के आन्दोलन का एक और अनदेखा बलिदान

Written By नीरज द्विवेदी on बुधवार, 31 अगस्त 2011 | 10:30 pm



मौत से पहले दिनेश ने पूछा था, ”टीम अन्ना का कोई क्यों नहीं आया?”
अब आप जानना चाहेंगे की कौन दिनेश?
हम बात कर रहे हैं अन्ना हजारे जी के सशक्त लोकपाल के समर्थन में आत्मदाह करने वाला दिनेश.

दिनेश यादव का शव जब बिहार में उसके पैतृक गांव पहुंचा तो हजारों की भीड़ ने उसका स्वागत किया और उसकी मौत को बेकार नहीं जाने देने’ का प्रण किया। लेकिन टीम अन्ना की बेरुखी कइयों के मन में सवालिया निशान छोड़ गई। सवाल था कि क्या उसकी जान यूं ही चली गई या उसके बलिदान’ को किसी ने कोई महत्व भी दिया?

गौरतलब है कि सशक्त लोकपाल पर अन्ना हजारे के समर्थन में पिछले सप्ताह आत्मदाह करने वाले दिनेश यादव की सोमवार को मौत हो गई थी। पुलिस के मुताबिक यादव ने सुबह ... २६ अगस्त के... (Complete)

एक लघुदीप की लौ





इक खामोश अँधेरी रात की, इक रोशनी कहती है,
ये जो चमक है, उस लघुदीप की कहानी कहती है,
जिसकी लौ में जिजीविषा की, छोटी झलक दिखती है,
और इस अथाह अँधेरे से, लड़ने की कोशिश दिखती है॥

ये रात से जंग जीत लेने की, ख्वाइश दिखती है,
मजलूम की ईश्वर से की गयी, फरमाइश लगती है,
इस कालिमा में भले ही, बस ... एक लघुदीप की लौ (Complete)

इक पेड़ की हँसी

Written By नीरज द्विवेदी on शुक्रवार, 26 अगस्त 2011 | 10:55 pm





छोटी सी चोट पर हीलोग रोया करते हैं बहुत यूँ ही,
दूसरे का हक मरकर भीखुश रहा करते हैं बहुत यूँ ही,
हमसबकोअपना सब कुछदेने से ही नहीं अघाते,
लोगों से जख्म पाने पर भीहँसा करते हैं बहुत यूँ ही॥

चोट हो बच्चों के पत्थर की फल के लिएतब तो हम,
उनकी आँखों में ख़ुशी देखकरहँसा करते हैं बहुत यूँ ही,
गर हो जख्म लालची मनुष्य... इक पेड़ की हँसी (Complete)


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बोला सुभाष

Written By नीरज द्विवेदी on रविवार, 21 अगस्त 2011 | 1:18 am


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यहाँ देश धर्म करते करतेमैं चलते चलते ठहर गया,
भारत को एक करते करतेमैं ही टुकड़ों में बिखर गया,
अरे मेरा भी इक जीना थाबहता जो खून पसीना था,
इस धरती की सेवा करतेबहते बहते बस निकल गया॥

जो निकल गया सो निकल गयाइस आज़ादी की राहों में,
उसकी सोचो जो तेरी रगों मेंबहता बहता ही सूख गया,
अब जाग और पहचान मुझेहे देशभक्तक्या पता तुम्हें?
बोला सुभाषलड़ते लड़ते इस धरा से कब मैं चला गया?

15 अगस्त 2011

Written By नीरज द्विवेदी on सोमवार, 15 अगस्त 2011 | 6:04 pm


ये इस बार स्वतंत्रता दिवस(15 अगस्त 2011) पर खुशी नही हो रही है, शायद इसलिये कि मेरी आँखे जो खुल गयीं हैं, आज़ादी कहीं दिखाई जो नही दे रही है। ना सच बोलने की आज़ादी, न सच लिखने की आज़ादी और ना ही सच देखने की आज़ादी, यहाँ तक कि अब तो भूखे रहने की आज़ादी भी छीन ली गयी है।
स्वतंत्रता और स्वतंत्र व्यक्ति तो कोई नही दिख रहा, दिख रहा है तो गुलामी और गुलामी के नये नये आकर्षक रूप, चाहे वो नेताओं की गुलामी हो, विचारधारा की गुलामी हो या विदेशी कम्पनियों की।
आज तो हर हिन्दुस्तानी देशभक्त हो गया है, और सारी की सारी देशभक्ति मोबाईल सन्देशों और फ़िल्मी गाने सुनने में ही लगी जा रही है। कहीं लोग झन्डे लिये बैठे हैं तो कहीं...  15 अगस्त 2011(Complete)



Founder

Founder
Saleem Khan