प्रदूषण का मारा.....
( बृज भाषा )
हे बगुला ! तू कारो क्यों है ,
सूखौ ढीलौ ढालौ क्यों है ?
कितै गईं वे उजरी पंखियां ,
चौंच नुकीली तीखी अँखियाँ ||
दर्द तिहारौ दयौ , भला अब -
पूछत हौ दुःख भरी कहानी |
नदिया ताल नहरि पोखरि कौ,
तुमनै कियौ प्रदूषित पानी ||
मछरी कबहुं कबहुं मिलि जावे ,
कहाँ प्रदूसन मैं पलि पावै |
कारन है जानौ पहचानौ,
भूखौ रहिबौ, दूषित खानौ ||
ताल- तलैया पाटि दये हैं ,
दूर दूर उडि कै जाऊं मैं |
धुंआ डीज़ल मिली हवा में ,
पांखें कारी करि लाऊँ मैं ||
खानौ पीनौ सब जहरीलौ,
क्यों न बदन हो सूखौ ढीलौ |
मंद भईं अँखियाँ चमकीली ,
कहा करै अब चौंच नुकीली ||