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हम देते हैं – हम लेते हैं हम ही तो हैं भ्रष्टाचारी !

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on मंगलवार, 5 जुलाई 2011 | 1:25 pm


हम देते हैं – हम लेते हैं
हम ही तो हैं भ्रष्टाचारी !
हम ही उनको पैदा करते
हम ही बड़े हैं – अत्याचारी !!

पाक-साफ़ पहले खुद होकर
भाई रोज बजाओ घंटी !

ऊँगली एक उठाते उस पर
तीन इशारा तुम पर करती !!
एक बताती – ऊपर तुम हो
कुछ करने को तुम को कहती !!

अपने घर की रोज सफाई
काहे ना ये जनता करती !

वो जो ‘पागल” बौराए हैं
जिनसे डर है हम को लगता !
रोटी उनको हम ही डालें
कौन कहे है ना वो सुनता !!

प्यार में तेरे जो शक्ति है
कर उपयोग मोम तू कर दे !
अगर बना है लोहा फिर भी
चला हथौड़ा सीधा कर दे !!

अंधियारे से उजियारे ला !
दर्पण पग-पग उसे दिखा दे !!

वरना कल जनता जो उसको
चौराहे – खींचे – लाएगी !
भाई -बाप- पुत्र  है तेरा
पल-पल याद दिलाएगी !!

चुल्लू भर पानी खोजोगे
शर्म तुझे भी आएगी !!

शुक्ल भ्रमर ५ -३.७.२०११
9 पूर्वाह्न जल पी बी

नैन मिल ही गए बात हो जाने दो

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on गुरुवार, 23 जून 2011 | 7:40 pm



जंग जीतेंगे हम आप जो संग हैं -लोकपाल बिल तो बनाना ही है -आइये आज आप का मन कुछ हल्का करें -लीक से हट
नैन मिल ही गए बात हो जाने दो


बेरहमी से यूं ना पर्दा गिराइये –जाइए जाइए
मूर्ति बन मै गया एक झलक के लिए
सर पे बांधे कफ़न एक नजर के लिए
नाग जैसे फंसा एक मणि के लिए
आग जैसे जला उर्वशी के लिए
राख बनने से पहले ही छा जाइये
आंसू छलके ख़ुशी के जो बरसाइये
जाइए जाइए ———
नैन मिल ही गए बात हो जाने दो
बेरहमी से यूं ना पर्दा गिराइए –जाइए जाइए
प्यार दिल में जो पनपा वो कब तक छिपे
लाख बादल ढंके चाँद क्या छिप सके ?
कैद बुल बुल जकड आह मत लीजिये
नैन मूंदे प्रिये आंसू मत पीजिये
फूटती जो कली कितना पर्दा करे
देख उसको जरा तो सकुचाइए
जाइए जाइए ———
नैन मिल ही गए बात हो जाने दो
बेरहमी से यूं ना पर्दा गिराइए –जाइए जाइए –
फूल अरमान दिल तेरे स्वागत बिछे ना कुचल जाइये
गूंथ माला प्रिये बिखरे मोती सभी आज चुन लीजिये
साँसे उखड़ी भले प्राण प्रिय में बसा ना दफ़न कीजिये
बाँहे उठ ही गयी मन मचलने लगा पग को बल दीजिये
सूख पथराये ना दिल की सुन लीजिये
सींच उसको सनम ना प्रलय ढाइए – न कुम्हलाइए
जाइए जाइए ———
नैन मिल ही गए बात हो जाने दो
बेरहमी से यूं ना पर्दा गिराइए –जाइए जाइए –
जंग जीतेगे हम आप जो संग हैं
द्वार खुल जायेंगे आज जो बंद हैं
काया है एक ही पांच ही तत्व हैं
रक्त ले हम खड़े देख लो एक है
होके मायूस ना हार पहनाइए
दिल को जीतेंगे हम आस मन में लिए
आज मुस्कुराइए –
जाइए जाइए ———
नैन मिल ही गए बात हो जाने दो
बेरहमी से यूं ना पर्दा गिराइए –जाइए जाइए –
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on बुधवार, 22 जून 2011 | 7:35 am


दर्द देख जब रो मै पड़ता  
---------------------------------
बूढ़े जर्जर नतमस्तक हो
इतना बोझा ढोते
साँस समाती नहीं है छाती
खांस खांस गिर पड़ते !
दुत्कारे-कोई- लूट चले है
प्लेटफार्म पर सोते !
नमन तुम्हे हे ताऊ काका
सिर ऊंचा रख- फिर भी जीते !!
-------------------------------------
वंजर धरती हरी वो करते 
 खून -पसीने सींचे !
 कहें सुदामा -श्याम कहाँ हैं ?
पाँव विवाई फूटे !
सूखा -अकाल अति वृष्टि कभी तो
अंत ऐंठती बच्चे सोते भूखे !
कर्ज दिए कुछ फंदा डाले
कठपुतली से खेलें !
नमन तुम्हे हे ताऊ काका
पेट -पीठ से बांधे हो भी
पेट हमारा भरते !!
--------------------------
बैल के जैसे घोडा -गाडी
जेठ दुपहरी खींचे !
जीभ निकाले  पड़ा कभी तो
दो पैसे की खातिर कोई
गाली देता पीटे
बदहवास -कुछ-यार मिले तो
चले लुटाये -पी के !!
नमन तुम्हे हे ताऊ काका
दो पैसों  से बच्चे तेरे
खाते -पढ़ते-जीते !!
--------------------------
काले -काले भूत सरीखे
मैले कुचले फटे वस्त्र में
बच्चे-बूढ़े होते !
ईंट का भट्ठा-खान हो चाहे
मिल- गैरेज -में डटे देख लो
दिवस रात बस  खटते !
नैन में भर के- ढांक -रहे हैं
इज्जत अपनी -रही कुंवारी
गिद्ध बाज -जो भिड़ के !
नमन तुम्हे- हे ! - तेज तुम्हारा
कल - दुनिया को जीते !!
-----------------------------
बर्फीली नदियों घाटी में
बुत से बर्फ लदे जो दिखते !
रेगिस्तान का धूल फांक जो
जलते - भुनते - लड़ते !
भूख प्यास जंगल जंगल
जान लुटाते भटकें !
कहीं सुहागन- विरहन -बैठी
विधवा- कहीं है रोती !
होली में गोली संग खेले 
माँ का कर्ज चुकाते !
तुम को नमन हे वीर -सिपाही 
दर्द देख -- जब रो मै पड़ता 
तेरे अपने - कैसे -जीते !!
--------------------------------
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
२२.०६.२०११ जल पी बी 

पुरुष “पिता” - पाले -भर नेह

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on रविवार, 19 जून 2011 | 4:56 pm




जीवन रथ के दो पहिये का 
बड़ा सुहाना अदभुत मेल 
एक अगर जो नहीं मिला तो 
बिगड़े जीवन का सब खेल !!
नारी प्यारी माँ अपनी तो
पुरुष पिता- पाले -भर नेह !!

मेहनत कर थक दिन भी आये  
पहले शिशु को गले लगाये
चूमे उछले गोदी भर ले
भूख प्यास को रहे भुलाये !!

दृष्टि सदा कोमल शिशु रख वो
न्योछावर हो बलि बलि जाये
भटके खुद काँटों के पथ पर
फूल के पलना उसे झुलाये !!

कोशिश उसकी पल पल जीवन
कोई कमी नहीं रह जाये
उसके अगर अधूरे सपने
देखे खुद को शिशु में अपने
संबल -संसाधन सब ला दे
सपने अपने सच कर जाये !!

शिक्षक है वो रक्षक है वो
पालक भाग्य विधाता है वो
ईश रूप है सब ला देता
भटकी नैया तट ला देता
-----------------------------

नाज हमें भी पूज्य पिता पर  

जिसने हमको गुणी बनाया |  

अनुशासन में पाला हमको, 

निज संस्कृति को हमें सिखाया|| 
शुद्ध आचरण सु-विचार से
निष्कलंक रहना सिखलाया !!

सत्य अहिंसा दे ईमान धन
ऊँगली थामे खड़ा किया !
रोज -रोज सींचे पौधे से
मुझको इतना बड़ा किया !!
----------------------------
अभिलाषा है प्रभु बस इतनी
मुन्ना”- उनका बना रहूँ !
वरद हस्त सिर पर हो उनका
चरणों उनके पड़ा रहूँ !!
उनकी कभी अवज्ञा न हो
आज्ञाकारी बना रहूँ !!
पिता और संतान का रिश्ता
पावन प्रतिदिन हो जाए
नहीं अभागा कोई जग में
पिता से वंचित हो जाये
--------------------------
पिता की महिमा जग जाहिर है
शोभे उपमा जहाँ लगा दो !
परम पिता परमेश्वर जग के
राष्ट्र पिता चाहे तुम कह लो !!
बूढ़े पीड़ित भटक रहे जो
पिता समान अगर तुम कह दो
लो आशीष दुआ तुम जी भर
जीवन अपना धन्य बना लो !!
-----------------------------------
शुक्ल भ्रमर५
१९.६.२०११ जल पी बी 

और फिर हम मारे मारे भटकने लगे-हमारी सरकार पर पूरा भरोसा है

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on शनिवार, 18 जून 2011 | 7:19 am



सूरज निकला दिन चढ़ आया
और फिर हम मारे मारे भटकने लगे
विकासशील देश है हमारा
यहाँ सब कुछ न्यारा न्यारा
कोई चाहे लोक पाल
कोई बना दे जोक पाल
हम स्वतंत्र हैं
चुनी हुयी सरकार है हमारी
स्वतंत्र
दुनिया से हमें क्या ---
दुनिया को हमसे क्या ??






मेरी अलग ही दुनिया है
 उधर शून्य में सब हैं मेरे
प्यारे बे इन्तहा  प्यार करने वाले  -
मुझसे लड़ने वाले -
मेरा घर परिवार
एक अनोखा संसार
नहीं यहाँ कोई हमारा परिवार
न हमारी कोई सरकार !!










मुझसे अभी दुनिया से क्या लेना देना मेरी अम्मी है न
-मै तो यूं ही झूला झूलता सोता रहूँगा
-अभी तो हाथ भी नहीं फैलाऊंगा
हमारी सरकार पर हमें पूरा भरोसा है
मेरी माँ जब बच्ची थी
वो भी यही कहती थी
मै भी बड़ा हो रहा हूँ
आँख खोलने को मन नहीं करता
कौन कहता है भुखमरी फैलाती है
गोदामों में अन्न जलाती और सड़ाती है
हमारी सरकार….. ???


शुक्ल भ्रमर ५

१७.६.11


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

कुत्ता !! - सांप उन्हें ना काटे

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on सोमवार, 13 जून 2011 | 1:06 pm




 जब जब कोई नेता या
भूला भटका-अधिकारी आता
गाँव गली की सैर वो करने
शहर कभी जब ऊब भागता
अम्मा अपना लिए पुलिंदा
गठरी लिए पहुँचती धम से
देखो साहब ! अब आये हो
क्या करने ?? जब बुधिया मर गयी !
झुग्गी उसकी जली साल से
भूखे कुढ़ कुढ़ के मरती थी
बच्चे नंगे घूम रहे हैं
खेत पे कब्ज़ा "उसने" की है
पटवारी भी कल आया था
भरी जेब फिर फुर्र हुआ था
पुलिस -सिपाही थाने वाले 
"वहीँ" बैठ पी जाते पानी !!
थोडा खेत बचा भी जिसमे 
मेहनत कर -कर वो मरती थी  
"नील-गाय " ने सब कुछ खाया
मेड काटते --मारे -कोई
काट- काट- चक-रोड मिलाये
सूखे- हरे पेड़- जो कुछ थे
होली- में उसने कटवाये
प्राइमरी का सूखा नल है
बच्चे- प्यासे गाँव  -भटकते
सुन्दर 'सर' जो कल बनवाया 
टूटी सीढ़ी -सभी -धंसा है
रात में बिजली भी ना आती 
साँप लोटते घर आँगन 
अस्पताल की दवा  है  नकली
कोई डाक्टर- नर्स नहीं है
दो दिन -दर्शन कर के जाते -
कुत्ता -  सांप उन्हें ना काटे
कितना - क्या मै गठरी खोलूं ??
 या जी भर बोलो -  मै- रो लूं
अधिकारी बस आँख दिखाता
हाथ जोड़ ले जा फुसलाता 
नेता जी भी उठ- कर - जोरे 
मधुर वचन मुस्काते बोले !
अम्मा !! अब मै यहीं रहूँगा 
इसी क्षेत्र से फिर आऊँगा 
अब की सब मिल अगर जिताए !
कभी  ये फिर दर्द सताए !!
जीतूँगा दिल्ली जाऊँगा
प्रश्न सभी मै वहां उठाऊँ !
अगर पा गया उत्तर सब का
तो फिर प्रश्न रहे कैसे माँ ????
अब जाओ तुम मडई अपनी !
पानी -टंकी-सडक -गली की
चिंता सब हम को है करनी !!
 मुँह बिचका नेता ने देखा
अधिकारी को उल्टा’- ठोंका
इसे रोंक ना सकते - मुरदों
दरी बिछाए”- बैठे -गुरगों
अगली बार जो बुढ़िया आई  
मै तेरी फिर करूँ दवाई !
याद तुझे आएगी नानी
सुबह दिखेगा काला पानी !!!

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
13.06.2011

आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on गुरुवार, 2 जून 2011 | 11:47 am


आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला
picture-of-the-sun-rising_4
(फोटो गूगल /नेट से साभार )
सहमा ठगा सा खड़ा झांकता था
आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला
कल पुर्जों ने गैस विषैली थी छोड़ी
लाश सडती पड़ी कूड़े कचरों की ढेरी
रक्त जैसे हों गंगा पशु पक्षी न कोई
पेड़ हिलने लगे मस्त झोंके ने आँखें जो खोली
व्योम नीला दिखा शिशु ने रो के बुलाया
आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला —
घबराहट अगर दिल बदल दो अब हैं दुनिया निराली
पाप हर दिन में हो हर समय रात काली
द्रौपदी चीखती -खून बहता -हर तरफ है शिकारी
न्याय सस्ता ,खून बिकता, जेल जाते भिखारी
घर से भागा युवा संग विधवा के फेरे रचाया
आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला —
धन हो इज्जत लूटे रखे अब जमीं ना सुरक्षित
खून सर चढ़ के बोले उलटी गोली चले यही माथे पे अंकित
घर जो अपना ही जलता दौड़ लाये क्या मुरख करे रोज संचित
प्यार गरिमा को भूले छू पाए क्या -खुद को -रह जाये ना वंचित
एक अपराधी भागा अस्त्र फेंके यहाँ आज माथा है टेका
आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला —
भूल माने जो- पथ शाम फिर लौट आये -न जाए
डाल बाँहों का हार -प्यार देकर चलो साथ स्वागत जताए
चीखती हर दिशा मौन क्यों हम खड़े ? आह सुनकर तो धाएं
भूख से लड़खड़ा पथ भटक जा रहे बाँट टुकड़े चलो साहस बढ़ाएं
स्वच्छ परिवेश रख -फूल मन को समझ
ध्यान इतना कहीं ये न मुरझाये
देख सूरज न कल का कहीं लौट जाए —-
आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला
सहमा ठगा सा खड़ा झांकता था
आज सूरज बड़ी देर कुछ आंक निकला
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
२.६.२०११

मै आवारा ना प्यारा बदनाम हुआ -

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on मंगलवार, 31 मई 2011 | 5:32 pm


मै आवारा ना प्यारा बदनाम हुआ -
बचपन में कोई नहीं दुलारा !
सींचे बिन कोई शीश उठा मिटटी -ना-
-छाया पायी कोई -आँखें रोई !
boy-child-children_~x11362173
(फोटो साभार गूगल / नेट से )
रूखे दूजे चढ़ हरे हुए- अचरज से देखे
काट लिया उसको भी कोई !
गलियारों में कुत्ते भूंके- बच्चे तो छूने ना देते
-ना-आँख मिलायी !
रहा अकेला- मन में खेला -कुंठा ने दीवार बनायीं
लोग कहें हैं पाप कमाई !!
भूखे को दे –टाला खाना -मन कैसा ?
छीना झपटी- क्यों मारा ?? मै आवारा !!
————————————————-
बद अच्छा बदनाम बुरा -खुद कांटे बोकर -
घाव किया न सूखेगा !
नैनों में ना नीर बचा दिल पत्थर क्या तीर चुभे-
फूल कहाँ से फूटेगा !
बढ़ा दिए मन दूर किये जन -फूलों को अब लगता काँटा
अंग कहाँ बन पायेगा !
लगी आग घर -दूर खड़े हम -प्यास लगे ना पानी देता
ख़ाक हाथ रह जायेगा !
खोद कुआँ मै पानी पीता -रोज किसी को दिया सहारा -
मै आवारा ??? ना प्यारा बदनाम हुआ -
बचपन में कोई नहीं दुलारा !
————————————————-
नासूर बनाये छेड़ छाड़ तो अंग तेरा कट जाएगा
उपचार जरा दे !!
टेढ़ी -मेढ़ी चालें चलता पग लड़ता गिर जायेगा
-तू चाल बदल दे !
भृकुटी ताने आँखें काढ़े -बोझ लिए मन रोयेगा
मुस्कान जरा दे !
अपनों को ही सांप कहे- पागल- तुझको डंस जायेगा
तू ख्याल बदल दे !
आग लगी मन -जल जाता तन-भटका फिरता -
छाँव कहाँ मिल पायेगा -मै आवारा ??
ना प्यारा बदनाम हुआ -
बचपन में कोई नहीं दुलारा !
!
————————————————–
आग लगे सब दूर रहें -परिचय चाहूं ना -
जल तप्त हुए -मै ना झुलसाता !
कीचड जाने दूर रहें -अभिनय -साधू ना-
दलदल में वह ना धंस जाता !
बलिदान चढ़ाता- ऋण भूले ना -
सजा काट कर न्याय बचाता -
पाप किये ना पाँव धुलाता
सीमा रेखा में अपनी -सिद्धांत बनाता -
दो टुकड़ों के खातिर कुछ भी -
साजिश कर -ना -देश लुटाता !
माँ बहनों को “प्यार” किये – “बदनाम” भी होता -
आग नहीं तो राख कहीं लग जाएगी -ये आवारा !
मै आवारा ?? ना प्यारा -बदनाम हुआ -
बचपन में कोई नहीं दुलारा !!!
सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
३१.०५.२०११ जल पी. बी .१०.४१ मध्याह्न

दुःख ही दुःख का कारण है

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on रविवार, 29 मई 2011 | 2:57 pm



दुःख ही दुःख का कारण है
दिल पर एक बोझ है
मन मष्तिष्क पर छाया कोहराम है
आँखों में धुंध है
पाँवो की बेड़ियाँ हैं
हाथों में हथकड़ी है
धीमा जहर है
विषधर एक -ज्वाला है !!
राख है – कहीं कब्रिस्तान है
तो कहीं चिता में जलती
जलाती- जिंदगियों को
काली सी छाया है !!
फिर भी दुनिया में
दुःख के पीछे भागे
न जाने क्यों ये
जग बौराया है !!
यहीं एक फूल है
खिला हुआ कमल सा – दिल
Image021
हँसता -हंसाता है
मन मुक्त- आसमां उड़ता है
पंछी सा – कुहुक कुहुक
कोयल –सा- मोर सा नाचता है
दिन रात भागता है -जागता है
अमृत सा -जा के बरसता है
हरियाली लाता है
बगिया में तरुवर को
ओज तेज दे रहा
फल के रसों से परिपूर्ण
हो लुभाता है !!
गंगा की धारा सा शीतल
हुआ वो मन !
जिधर भी कदम रखे
पाप हर जाता है !!

देखा है गुप्त यहीं
ऐसा भी नजारा है
ठंडी हवाएं है
झरने की धारा है
jharna














(फोटो साभार गूगल से)
जहाँ नदिया है
7551247-summer-landscape-with-river


(फोटो साभार गूगल से)



भंवर है


पर एक किनारा है





-जहाँ शून्य है
आकाश गंगा है
धूम केतु है
पर चाँद
एक मन भावन
प्यारा सा तारा है !!
शुक्ल भ्रमर ५
29.05.2011 जल पी बी

अरे लुटेरे भाई तेरी - क्या दूकान चली है

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on शनिवार, 16 अप्रैल 2011 | 11:52 am


अरे लुटेरे भाई तेरी -
क्या दूकान चली है
कल तक तो तू जुआ खेलता
गलियों में था दर्शन देता
अब 'पद्मावती' में घूमे - जाये
दिल्ली पहुंचे तो उड़ जाये
सागर के उस पार !!

कोई महिला -कहीं अकेली
या कायर हो पुरुष कहीं
पल भर तू फिर नहीं चूकता
हाथ सफाई-लगे कसाई !!

कामाख्या का जादू सीखा

एक खिलाडी को ना- छोड़ा

टूट –फूट- कर ‘सपने बिखरे 

फिर भी कहती मै ना हारी
ये है नारी !!  अरे लुटेरे
ले ली उसकी टांग
तुझको ना नरसिंह मिलें
कभी बिठाते जांघ !!



अगर लूटना है तो लूटो
लूट  रहे जो घूमे
उसी ट्रेन में टी. टी. से मिल
जेब भरे - है - घूमे
एक तमाचा जड़ दो उसको
ताकत अपनी दिखा वहां तू
पहलवान बन जाओ !!

अगर काटना पाँव ही तुझको
सोये -देखो ड्यूटी- हैं वो
लूट रहे -सरकार- खजाना
उनको जा के लूटो !!

कल तेरी माँ -बहना भी
सफ़र कहीं - जो कहीं अकेली
तेरे भाई मिल जायेंगे -देर नहीं
काट-काट कर- डालें -बोटी !!

इसी ट्रेन में अपनी -सेना
लव-‘लश्कर के साथ चले है
माना तेरी सीमा तय है
दुश्मन से तू देश के भाई
जान लड़ाए रोज लड़े हैं
आँख खोल कर प्यारे देखो
दुश्मन तेरे साथ चले हैं
कभी कहीं कुछ मोड़ जो आये
चलती ट्रेन कहीं रुक जाये
थोडा सा तुम जागो भाई
चीर- हरण या कोई लुटेरा
आह भरी कानो जब आये
कृष्ण हमारे कुछ कर जाओ  !!!



कार खड़ी कर सड़कों पर हम
कितना जाम लगायें -
ले परिवार शाम को आयें
वो फुल्के की और बताशा
चाट -चाटने -मटरू वाली
क्या दूकान लगी है
उस बर्तन में "मूते" -जाये
क्या संदेशा  दुनिया  छाये !!
इन जैसों से भी डरना क्या-
लोकपाल बिल लाना ??

चार साल की बच्ची - माँ- को
दफ़न किये हैं घर उसके
ताला उसके  घर में लाये
कुछ हजार जो ना ले पाए
है पंजाब की घटना सच्ची  
है -ये चेहरा- एक "पुलिस" का
लाज-शर्म सब खाए
चुल्लू भर पानी ना डूबें
ये रक्षक कहलायें !!

कहें भ्रमर "कैप्टन" की मानों
पकड़ इन्हें तुम उल्टा टांगो 
मूर्ति - इनकी ना पत्थर की
हर चौराहे एक- एक -कर
जिन्दा ही तुम कभी लगा दो

जिसके ‘दिल में जान अभी -
धड़कन कुछ जिन्दा है भाई
रोको तुम है लुटी कमाई
जागो तुम -
अभी वक्त है -
दर्द बढ़ रहा - दिन प्रतिदिन है
ठेस लगी है -
खून बह रहा -
घाव कही नासूर बने ना
जगा रही है रोती  माई !!

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर५
१५.०४.2011

Founder

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Saleem Khan