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सच तो शिव है -शिव ही करता नाग सरीखा संग-संग रहता

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on सोमवार, 11 जुलाई 2011 | 9:54 am

सच एक हंस है 
पानी दूध को अलग किये ये 
मोती खाता -मान-सरोवर डटा  हुआ है 
धवल चाँद है 
अंधियारे को दूर भगाता
घोर अमावस -अंधियारे में 
महिमा अपनी रहे बताता 
ये तो भाई पूर्ण पड़ा है !
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सच-सूरज है अडिग टिका है 
लाख कुहासा या अँधियारा 
चीर फाड़ हर बाधाओं को 
रोशन करने जग आ जाता 
प्राण फूंक हर जड़-जंगम में 
नव सृष्टि ये  रचता जाता 
सुबह सवेरे पूजा जाता !!
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सच- आत्मा है - परमात्मा है 
कभी मिटे ना लाख मिटाए 
चाहे आंधी तूफाँ  आये 
चले सुनामी सभी बहाए 
दर्द कहीं है लाश बिछी है 
भूखा कोई रोता जाये 
कहीं लूट है - घर भरते कुछ 
सच - दर्पण है सभी दिखाए !!
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सच तो शिव है -शिव ही करता 
नाग सरीखा संग-संग रहता 
जिसके पास ये आभूषण हैं 
ब्रह्म -अस्त्र ये- ताकत उसमे 
पापी उसके पास न आयें 
राहू-केतु से झूठे राक्षस 
झूठें ही बस दौड़ डराएँ 
खाने धाये !!
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सच इक आग है - शोला है ये 
धधक रहा है चमक रहा है 
उद्भव -पूजा हवन यज्ञं में 
आहुति को ये गले लगाये 
प्राणों को महकाता जाए 
श्री गणेश -पावन कर जाये 
भीषण ज्वाला - कभी नहीं जो बुझने वाला 
लंका को ये जला जला कर 
झूठी सत्ता- झूठ- जलाकर 
अहम् का पुतला दहन किये है 
सब कुछ भस्म राख कर देता 
गंगा को सब किये समर्पित 
मूड़ मुड़ाये सन्यासी सा 
बिना सहारा-डटा खड़ा है !!
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सच ये कोई नदी नहीं है 
जब चाहो तुम बाँध बना लो 
ये अथाह है- सागर- है ये 
गोता ला बस मोती ढूंढो 
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सच ये भाई ना घर तेरा 
जाति नहीं- ना धर्म है तेरा 
जब चाहो भाई से लड़ -लड़ 
ऊँची तुम दीवार बना लो 
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सच पंछी है मुक्त फिरे है 
आसमान में -वन में -सर में 
एकाकी -निर्जन-जीवन में 
सच की महिमा के गुण गाये 
कलरव करते विचरे जाए !!
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सच कोमल है फूल सरीखा 
रंग बिरंगा हमें लुभाए 
चुभते कांटे दर्द सहे पर 
हँसता और हंसाता जाये 
जीवन को महकाता  जाये 
अमर बनाये !!
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सच कठोर है -ये मूरति है 
सच्चाई का  दामन थामे 
पूजे मन से जो -सुख जाने 
यही शिला है यही हथौड़ा 
मार-मार मूरति गढ़ता है 
सुन्दर सच को आँक आँक कर 
सच्चाई सब हमें दिखाता
आँखें फिर भी देख न पायें 
या बदहवास जो सब झूंठलायें  
ये पहाड़ फिर गिर कर भाई 
चूर चूर सब कुछ कर जाए !!
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर 
७.७.२०११ ६.२६ पूर्वाह्न जल पी बी 

और फिर हम मारे मारे भटकने लगे-हमारी सरकार पर पूरा भरोसा है

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on शनिवार, 18 जून 2011 | 7:19 am



सूरज निकला दिन चढ़ आया
और फिर हम मारे मारे भटकने लगे
विकासशील देश है हमारा
यहाँ सब कुछ न्यारा न्यारा
कोई चाहे लोक पाल
कोई बना दे जोक पाल
हम स्वतंत्र हैं
चुनी हुयी सरकार है हमारी
स्वतंत्र
दुनिया से हमें क्या ---
दुनिया को हमसे क्या ??






मेरी अलग ही दुनिया है
 उधर शून्य में सब हैं मेरे
प्यारे बे इन्तहा  प्यार करने वाले  -
मुझसे लड़ने वाले -
मेरा घर परिवार
एक अनोखा संसार
नहीं यहाँ कोई हमारा परिवार
न हमारी कोई सरकार !!










मुझसे अभी दुनिया से क्या लेना देना मेरी अम्मी है न
-मै तो यूं ही झूला झूलता सोता रहूँगा
-अभी तो हाथ भी नहीं फैलाऊंगा
हमारी सरकार पर हमें पूरा भरोसा है
मेरी माँ जब बच्ची थी
वो भी यही कहती थी
मै भी बड़ा हो रहा हूँ
आँख खोलने को मन नहीं करता
कौन कहता है भुखमरी फैलाती है
गोदामों में अन्न जलाती और सड़ाती है
हमारी सरकार….. ???


शुक्ल भ्रमर ५

१७.६.11


दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

बंधुआ हूँ मै -मुक्त कहाँ हूँ -??

Written By Surendra shukla" Bhramar"5 on बुधवार, 15 जून 2011 | 4:09 pm


बंधुआ  हूँ मै  -मुक्त कहाँ हूँ -??
गर्भ में था तो हाथ बंधे थे
जकड़ा था मै जैसे कैदी !
सीखा वही जो माँ करती थी
खांस खांस जो कुढ़ मरती थी
बर्तन धोना झाड़ू पोंछा
बीस -बीस ईंटो का बोझा
धंसा हुआ मै चार किलो का
पेट में -रोटी का ना टुकड़ा
दर्द टीस का नाच घिनौना
पत्थर पर जो चला हथोडा
कहीं खान में कोयले जैसी
गोरी चमड़ी रंग बदलती
धूप में तपता चाँदी सोना
मोती ढुरता  आँख का कोना !!

कैसा सपना -इच्छा पूरी ??
उमर   भी अपनी सदा अधूरी
अहो भाग्य ! आया जो धरती
सुन्दर कर्म थे माँ की करनी !!

क्या है दूध -व् चाँद खिलौना ?
क्या कपडे - बस नंगे सोना
बाग़ बस-अड्डा रेल स्टेशन
मरू भूमि का सूखा कोना !
नागफनी हैं -कांटे देखा
देख लिया हर जादू टोना !!
दर्जन भर भाई बहना पर
क्रूर निगाहों का उत्पीडन !
चोर सा कोई पुस्तक झाँकू
क-ख-ग सब कृष्ण पहर !!


काली रात का काला साया  
बाप नशेड़ी -जग भरमाया !
दो पैसे के लालच भाई
बंधुआ सब ने मुझे बनाया !!
चौदह में ही चौंसठ जी कर
कभी कमाया कभी खिलाया !
कन्यादान भी करना मुझको
चौरासी मानव तन पाया !!

रब्ब खुदा या मालिक है क्या ??
मालिक मेरा होटल वाला
गैरेज वाला -फैक्ट्री वाला
कहीं भिखारी -पैसे वाला !!
दो रोटी संग चाबुक देकर
खाल उधेड़ सभी करवाता !!

मन करता है आग लगा दूं
धर्म शाश्त्र को धता बता दूं
सब झूठे -कानून-जला दूं
जो अंधे हैं देख न पाते
बंधुआ -बंधन होता क्या है ??

बंधुआ हूँ मै कहाँ नहीं हूँ ???
तलवे उनके चाट रहा हूँ
आगे पीछे नाच रहा हूँ
अब भी मेरे हाथ बंधे हैं
नाग पाश में हम जकड़े हैं !!

मूक -सहूँ मै-भाव नहीं हैं
हड्डी है बस -चाम नहीं है
गूंगे बहरे -वो -भी तो हैं
जिह्वा शब्द है- जान नहीं है
आह चीख- पर -कान नहीं है
जेब ठूंसकर -ले जाते वो
लाज नहीं अभिमान नहीं है
जिनका कुछ सम्मान नहीं है !!

बंधुआ हूँ मै मुक्त कहाँ हूँ ???
गर्भ में थे तो हम जकड़े थे
नाग पाश अब भी जकड़े हैं
चौरासी मानव तन पाया
कठपुतली बन बस रह पाया  
बंधुआ हूँ मै कहाँ नहीं हूँ ??

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
१५.०६.२०११ 

Founder

Founder
Saleem Khan