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शालिनी कौशिक जी

Written By Pappu Parihar Bundelkhandi on बुधवार, 13 जुलाई 2011 | 2:34 pm

शालिनी कौशिक जी

आपके तार्रुफ़ का,
आपकी हौसला अफजाई का,
आपके बड़प्पन का,
तहे दिल से शुक्रिया,
अदा करता हूँ,

आपने इस जहाँ से मेरा तार्रुफ़ करवाया |
आपने इस जहाँ से मुझे जुड़वाया |
आपने इस जहाँ से मुझे प्यार दिलवाया |
आपका तहे दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया |

मीडिया को संभलना होगा

Written By Shalini kaushik on बुधवार, 2 मार्च 2011 | 2:30 pm


राही कुरैशी के शब्दों में-
   सबको पहचान लिया,देख लिया जान लिया,
   एक दिन खुद को भी आईने में देखा जाये."
    अक्सर हम देखते हैं कि मीडिया में लगभग हर बड़ी हस्ती कटाक्ष की शिकार होती है .कटाक्ष भी ऐसे कि पढ़ते-पढ़ते पेट दुःख जाये किन्तु ऐसा लगता है   कि मीडिया खुद इन बड़ी हस्तियों की ख़बरों की आदी हो चुकी है   इनसे सम्बंधित कोई खबर न मिले तो मीडिया का काम ठप सा ही हो जाता है .ऐसी ही एक बड़ी हस्ती है  "गाँधी परिवार"और  ये गाँधी परिवार कुछ करता है  तो मीडिया परेशान कुछ न करे तो मीडिया परेशान  .आजकल वरुण गाँधी के विवाह की ख़बरों से समाचार पत्र भरे पड़े हैं.कभी यामिनी से शादी पक्की होने की खबर,कभी ताई सोनिया को आमंत्रित करने की खबर,कभी वाराणसी में मंडप सजने की खबर ,तो कभी प्रियंका के जाने की खबर,तो कभी राहुल के हड्डी टूटने के कारण जाने न जाने के कयास की खबर आखिर क्या आज के समाचार पात्र इतने खाली पेज रखते हैं कि इनके समाचारों से ही भरे जाते हैं फिर देश की अन्य समस्याओं के लिए मीडिया इन बड़ी हस्तियों को क्यों दोषी ठहरता है  जबकि "लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ "के रूप में ख्यात मीडिया अपने कर्तव्यों को पूर्ण करने में कोताही बरतता है .आज देश समाज में अपराधों की बाढ़ सी आयी है  और  यह मीडिया ही है  जो इन ख़बरों को मुस्तैदी से देश में उठा सकता है .मीडिया का यदि ऐसे मामलों में सकारात्मक कार्य हो तो पीड़ित अपनी पीड़ा बताने व् उस पर कदम उठाने से नहीं चूकेगा किन्तु मीडिया द्वारा केवल अपने प्रचार हेतु जब खबर नयी नयी हो तो रूचि लेना और  मामला ठंडा पड़ते ही मुहं मोड़ लेना पीड़ित को होंठ सी लेने को मजबूर करता है  .
       हमारे ही क्षेत्र में विधायक महोदय ने एक पीड़ित महिला से जिसके घर पर एक फ्रॉड ने कब्ज़ा कर लिया था से कहा"कि यदि मीडिया में ये मुद्दा उठ जाये तो मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकता हूँ."अब इसमें कितनी सच्चाई है  ये तो वे ही जाने किन्तु ये तो मानना ही पड़ेगा कि मीडिया की ताक़त से वे भी अपने कदम को जायज़ ठहराने की ताक़त रखते हैं.ऐसे में मीडिया को देखना होगा कि वह इन मुद्दों को सामान्य मुद्दे मान कर ज्यादा तूल न दे और  आम आदमी जिन कारणों से त्रस्त है  ,प्रभावित है ,उन मुद्दों  को मजबूती से उठाये और  उन्हें न्यायपूर्ण अंत तक पहुंचाए.
    मीडिया के लिए अंत में यही कहूँगी-
"पूरी धरा भी साथ दे तो और  बात है ,
पर तू जरा भी साथ दे तो और  बात है  ,
चलने को तो एक पांव से भी चल रहे हैं लोग
ये दूसरा भी साथ दे तो और बात है."  
                 शालिनी  कौशिक
http://shalinikaushik2.blogspot.com/

एक आग्रह अगर सभी माने

Written By Shalini kaushik on सोमवार, 28 फ़रवरी 2011 | 4:15 pm

अभी अभी ब्लोग्स पर मैं एक लेख पढ़ कर आ रही हूँ कि "एल.बी.ए.ब्लोगर का सबसे बड़ा संगठन"और यह लेख मिथलेश जी ने लिखा है.इसमें कोई शक नहीं की एल.बी.ए.बड़ा संगठन है किन्तु इस तरह की बातें ब्लॉग जगत में अलगाव पैदा करने की कोशिश करती हैं.आज ब्लॉग जगत में बहुत सारे सामूहिक ब्लॉग हैं और सब पर लगभग सभी ब्लोगर जुड़ रहे हैं.कारण साफ है सभी देश के विभिन्न विवादस्पद मुद्दों पर अपनी राय दे रहे हैं और चाह रहे हैं कि हम किसी तरह इन स्थितियों में सुधार की सम्भावना पैदा कर दें .ऐसे में ऐसे लेख न ही आये तो शायद हम जैसे नवीन चिट्ठाकारों के प्रयासों को एक स्वच्छ दिशा मिल सकती है.हम सभी का मिल जुल कर यही प्रयास होना चाहिए कि हम एक जुट होकर देश की समस्याओं से लड़ें .हम सभी का कर्त्तव्य बनता है कि हम एक ऐसे मंच का संयोंजन करें जो सबको मिलजुल कर आगे बढ़ाये न कि आपस में दरारे पैदा करने की बातें करें.आज ब्लॉग जगत में भड़ास,हिंदुस्तान का दर्द,जौनपुर ब्लोगर एसोसिएशिअन ,आदि बहुत से सामूहिक ब्लॉग हैं और लगभग सभी ब्लोगर इनसे जुड़कर पाने विचारों से ब्लॉग जगत को लाभान्वित कर रहे हैं और सत्ता की शीशे की दीवारों पर प्रहार कर रहे हैं.आज देश में बहुत सी समस्याएँ हैं और हम "वसुधेव कुटुम्बकम "की धारणा को यहाँ बलवती कर सकते हैं .मिलजुल कर देश विरोधी ताकतों,bhrashtachariyon  , बेटी  -बहु के हत्यारों आदि के खिलाफ मोर्चा खोल सकते हैं अत  ऐसे में मेरा आग्रह है यदि आप माने तो कि इन तुच्छ बातों की और ध्यान न देकर बड़ी-बड़ी समस्याओं की और ध्यान दें और देश के नव निर्माण में भागीदार बनें.बड़े बने मगर विचारों में -
"बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर,
पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर."
        शालिनी kaushik

.न्याय पथभ्रष्ट हो रहा है...

Written By Shalini kaushik on गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011 | 12:04 am

"इंसाफ जालिमों की हिमायत में जायेगा,
ये हाल है तो कौन अदालत में जायेगा."
   राहत इन्दोरी के ये शब्द और २६ नवम्बर को सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ के द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट  पर किया   गया दोषारोपण "कि हाईकोर्ट में सफाई के सख्त कदम उठाने की ज़रुरत है क्योंकि यहाँ कुछ सड़ रहा है."साबित करते हैं कि न्याय भटकने की राह पर चल पड़ा है.इस बात को अब सुप्रीम कोर्ट भी मान रही है कि न्याय के भटकाव ने आम आदमी के विश्वास को हिलाया है वह विश्वास जो सदियों से कायम था कि जीत सच्चाई की होती है पर आज ऐसा नहीं है ,आज जीत दबंगई की है ,दलाली की है .अपराधी     बाईज्ज़त     बरी हो रहे हैं और न्याय का यह सिद्धांत "कि भले ही सौ अपराधी छूट   जाएँ किन्तु एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए"मिटटी में लोट रहा है .स्थिति आज ये हो गयी है कि आज कातिल खुले आकाश के नीचे घूम रहे हैं और क़त्ल हुए आदमी की आत्मा  तक को कष्ट दे रहे हैं-खालिद जाहिद के शब्दों में-
"वो हादसा तो हुआ ही नहीं कहीं,
अख़बार की जो शहर में कीमत बढ़ा गया,
सच ये है मेरे क़त्ल में वो भी शरीक था,
जो शख्स मेरी कब्र पे चादर चढ़ा गया."
न्याय का पथभ्रष्ट होना आम आदमी के लिए बहुत ही कष्टदायक हो रहा है.आम आदमी खून के आंसू रो रहा है.निचले स्तर पर भ्रष्टाचार   को झेल जब वह उच्च अदालत में भी भ्रष्टाचार को हावी हुआ पाता है तो वह अपने होश खो बैठता है .अपराध कुछ और वह पलट कर कुछ और कर दिया जाता है और अपराधी को बरी होने का मौका कानूनन   मिल जाता है.हफ़ीज़ मेरठी के शब्दों में-
"अजीब लोग हैं क्या मुन्सफी की है,
हमारे क़त्ल को कहते हैं ख़ुदकुशी की है."
आश्चर्य की बात तो यह है कि संविधान द्वारा दिए गए कर्त्तव्य को उच्चतम न्यायालय जितनी मुस्तैदी से निभा रहा है उच्च न्यायालयों में वह श्रद्धा प्रतीत नहीं होतीजबकि संविधान द्वारा लोकतंत्र के आधार स्तम्भ में लोकतंत्र की मर्यादा बनाये रखने के जिम्मेदारी न्यायालयों को सौंपी गयी है और इस तरह उच्च न्यायालयों का भी ये उत्तरदायित्व बनता है कि वे भी उच्चतम न्यायालय की तरह न्याय के संरक्षक बने .उच्च न्यायालय अपनी गरिमा के अनुसार कार्य नहीं कर रहे हैं .कभी कर्णाटक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश दिनाकरण का मामला न्याय को ठेस लगाता है तो कभी सुप्रीम कोर्ट की इलाहाबाद हाईकोर्ट में "सडन"की टिपण्णी से सर शर्म से झुक जाता है प्रतीत होता है कि मुज़फ्फर रज्मी के शब्दों में न्याय भी ये कह रहा है-
"टुकड़े-टुकड़े हो गया आइना गिर कर हाथ से,
मेरा चेहरा अनगिनत टुकड़ों में बँटकर रह गया."

Founder

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Saleem Khan