नियम व निति निर्देशिका::: AIBA के सदस्यगण से यह आशा की जाती है कि वह निम्नलिखित नियमों का अक्षरशः पालन करेंगे और यह अनुपालित न करने पर उन्हें तत्काल प्रभाव से AIBA की सदस्यता से निलम्बित किया जा सकता है: *कोई भी सदस्य अपनी पोस्ट/लेख को केवल ड्राफ्ट में ही सेव करेगा/करेगी. *पोस्ट/लेख को किसी भी दशा में पब्लिश नहीं करेगा/करेगी. इन दो नियमों का पालन करना सभी सदस्यों के लिए अनिवार्य है. द्वारा:- ADMIN, AIBA

पत्नी का फोटो

Written By kavisudhirchakra.blogspot.com on गुरुवार, 20 जून 2013 | 10:03 am

एक दिन दफ्तर में
मेरी एक मात्र पत्नी का
बिना सूचना के आगमन हुआ
उसके चेहरे पर गुस्सा देख
मुझे
तूफान के पहले की
आंधी का आभास हुआ
अचानक
उसका हाव-भाव बदल गया
गुस्से से लाल चेहरा
फूल सा खिल गया
उसका
पाकिस्तान की तरह
इतनी जल्दी बदलाव
मेरी समझ में नहीं आया
जब मैंने इसका कारण पूछा
तो
मुस्कुराकर बोली
हे मेरे प्राणनाथ
मैं आपको कितना गलत समझती थी
आपकी टेबिल पर
सुन्दर फ्रेम में जड़ी हुई अपनी फोटो देखकर
मुझे आज पता चला
आप यूँ ही आहें नहीं भरते हैं
मुझसे कितना प्यार करते हैं 
पति बोला
यह तुम्हारा भ्रम है
टेबिल पर तुम्हारी
फोटो लगाने का तो दूसरा ही कारण है
तुम तो जानती हो कि
मैं जनसम्पर्क अधिकारी हूँ
प्रतिदिन
अच्छे और बुरे लोगों से
मेरा पाला पड़ता है
किसी-किसी दिन तो
लड़ना भी पड़ता है
तब किसी काम में नहीं लगता है मन
इसलिए हो जाती है टेंशन
तुम्हारी
फोटो पास रहेगी तो
यह आभास होगा
क्या
तुमसे भी बड़ा कोई टेंशन होगा
इस तरह
टेंशन की समस्या सुलझ जायेगी
और
मेरी नौकरी आराम से कट जायेगी।

नुकसानों का पलड़ा नीतीश का भारी है

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on शुक्रवार, 14 जून 2013 | 9:44 pm

Neeteesh-Modi whispering among Sushma-Rajnath.
नीतीश कुमार काबिल मुख्यमंत्रियों में से एक हैं, लेकिन मोदी की खिलाफत करके  वे बुरे फंस गए हैं। शुरुआत तो कॉमन प्रेशर पीयरिंग से हुई थी, मगर वह सिलसिला इतना आगे बढ़ चला कि वे अब समझ नहीं पा रहे कि करें तो क्या? छोड़ देते हैं एनडीए तो बिहार से बाहर हो जाएंगे, नहीं छोड़ते तो मीडिया की चिल्लाई बनाई इज्जत चली जाएगी। यूं सियासी जोड़तोड़ में इज्जत, फिज्जत तभी तक रहती हैं, जब तक आप स्पष्ट बहुमत से सरकार चला रहे हों। वरना मुलायम जिन्होंने सोनिया को पीएम बनाने के लिए 1998 में एक वोट से अटल सरकार को गिरवाया था और फिर बाद में सोनिया सेना के ही फोन नहीं उठाने वाले फिर उनके साथ नहीं होते। गैर भरोसेमंद लोग ही बाद में भरोसेमंद होते हैं। चलिए जरा जानते हैं क्या हो सकता है।
एनडीए से बाहर
हंड्रैड परसेंट बाहर होने के कई खतरे हैं। नीतीश की सरकार अभी 2015 तक चलेगी। इसे कोई रोक भी नहीं सकता। भले ही वे एनडीए से बाहर आ जाएं। निर्दलीय हैं न। लेकिन बाहर आने के बाद यह भी सौ फीसदी सही है कि उन्हें हर हाल में सत्ता से बाहर होना पड़ेगा। सत्ता से बाहर होकर भी चल जाता, लेकिन संकट यह है कि वे मुख्य विपक्ष से भी बाहर हो जाएंगे। चूंकि सीट कैल्कुलेशन कहता है कि भाजपा 91 विधानसभा सीटों पर काबिज है। अलग होकर नीतीश को नुकसान करेगी। खुद को फायदा होगा। इसी बीच नीतीश भी भाजपा को नुकसान करेंगे, लेकिन मोदी वेव बिहारियों और उत्तर भारतीयों पर ज्यादा सवार है, तो यहां भी संभावित खतरे हैं। यानी ऐसे वैसे जैसे भी भाजपा अपनी 80 सीटें तो बचा ही लेगी, लेकिन जो सीटें जदयू के साथ मिलकर लड़ती हैं, उनमें से कम से कम 25 सीटों पर भाजपा जेडीयू को सीधे टक्कर दे सकने की स्थिति में है। इस बीच लालू जो 22 सीटों पर बैठकर अबतक सिर पीट रहे थे। बच्चों, भतीजों को लॉन्च करने में मशरूफ थे, वे एक बार फिर 50 क्रॉस कर सकते हैं। कांग्रेस को भी फायदा ही होना है, चूंकि मैक्सिमम नुकसान पर वह बैठी ही है। अब शरद बाबू नीतीश से सीधे भी नहीं कह पा रहे कि भाई बखेड़ा हो जाएगा और छुपा भी नहीं पा रहे। तब नुकसानों का पलड़ा नीतीश का भारी है।
एनडीए में रहते हैं
रहते हैं तो मुस्लिम वोट खिसक सकता है। लेकिन वह खिसक कर भी किसी एक पार्टी के पास नहीं जाएगा। बंटेगा, कांग्रेस, राजद और कुछ और अन्य में। यानी यहां पर भी कैल्कुलेटिवली जेडीयू को नुकसान है, किंतु उतना बड़ा फिर भी नहीं, जितना कि एनडीए छोडऩे से होगा। इधर शरद बाबू की भावनाएं हिचकोले खा रही हैं, कि हो सकता है एनडीए में ऐसी स्थिति बने कि उन्हें डेप्टी पीएम बना दिया जाए।
तब क्या करे जेडीयू
इस पूरे घमासान में जो करना है वह जेडीयू को ही करना है। लेकिन इज्जत का क्या? भाड़ में जाए इज्जत फिज्जत, अपन तो यह कहते हैं कि मोदी को पीएम बनाया तो अपन भाग जाएंगे। और शरद कहते हैं, सचमें चले जाएंगे। इज्जत भी बच निकलेगी और फिर भाजपा का भी सीधा पता चलेगा कि उसे अपनी जरूरत भी है या नहीं।
- सखाजी

मैं तो कहीं रहा ही नहीं

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on बुधवार, 12 जून 2013 | 9:48 pm

LK Adwani, BJP Sr. Leader
आडवाणी खांटी सियासतदां हैं, उनका इस्तीफा पब्लिसिटी या प्रेशर टेक्टिस नहीं हो सकता। देश को भरोसा है कि कोई उनकी गहरी सियासत रही होगी। सियासत यानी चाल नहीं, अच्छी सियासत। समझ में तो नहीं आ रही, कि क्या सोच थी। बहरहाल लग यूं ही रहा है कि, यह महज दिखाने की थी। इससे दो बातें सामने आईं, पहली तो यह कि क्या आडवाणी जी का कद इतना गिर रहा है पार्टी के भीतर कि उन्हें सार्वजनिक इस प्रपंच का सहारा लेना पड़ा। प्रपंच इसलिए कि वे मान गए और एनडीए के चेयरमैन का पद नहीं छोड़ा था। इससे तो यही लगता है कि आडवाणी साहब अभी जो कुछ हैं उससे भी कहीं और ज्यादा अप्रासंगिक होते, इसलिए ही उन्होंने यह किया। दूसरी बात यह लग रही है, कि वे सबको संदेश देना चाहते थे कि भाजपा मेरी है। यह मैंने ही बनाई और चलाई है। पहले अटल ले भागे और अब मोदी। मैं तो कहीं रहा ही नहीं।
खैर जो भी हो, किंतु जो कुछ दिख रहा है, उससे तो आडवाणी साहब को बड़ा खामियाजा हुआ है। एक तो वे एंटी युवा साबित हुए, दूसरे वे नई पौध को नेतृत्व न देने वाले विलैन बने, तीसरे वे लोकप्रियता के पैमाने को नकारने वाले व्यक्तित्व बने, चौथे वे असल हृदय के सम्मान से थोड़े नीचे उतरे, पांचवे वे मोदी जो कि डैड श्योर पॉवर में आना ही है से भी बुरे हुए। मोदी से बुरे होने का दावा इसलिए भी सही है, क्योंकि वे यानी उनके समर्थक बाद में संबंध सुधारने के लिए संघ के दो लोगों से नाराजगी बताते नजर आए।
- सखाजी

यू आर ग्रेट राजनाथ जी

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on रविवार, 9 जून 2013 | 10:23 pm

The two polls of BJP, have a unipolar in middle also.
आडवाणी और नरेंद्र मोदी के बीच के संभावित रिफ्ट का फायदा उठाकर राजनाथ सिंह की यह सियासी जीत है। ऊपर से जो नरेंद्र मोदी की जीत लग रही है, उनका उभरना लग रहा है, वह वास्तव में राजनाथ सिंह की सफलता है। नरेंद्र मोदी का बीजेपी में अहम स्थान तो होना ही था, उन्हें एक किसी औपचारिक पद पर लाकर कार्यकर्ताओं को खुश करना ही पड़ता। राजनाथ सिंह इन दो तथ्यों को लेकर ही आगे बढ़े। आडवाणी कहते रहे कि इस बार और नरेंद्र को वेटिंग में रखा जाए, फिर अगला चुनाव उन्हें दे देंगे। किंतु कांग्रेस की नाकामयाबियों के चलते देश के फेवर टू अदर्स माहौल का फायदा भी तो उठाना है। इसे फेवर टू बीजेपी बनाना है, तो स्ट्रोंग फैसले करना होंगे। राजनाथ सिंह ने इस बात का पूरा ख्याल रखा। अब जब मोदी मैदान में हैं, प्रचार कमेटी के जरिए कार्यकर्ताओं के सीधे संपर्क में रहेंगे, तो राजनाथ सिंह को दो बड़े फायदे मिलेंगे, पहला तो उनके सांगठनिक नेतृत्व में पार्टी जीतेगी, तो दूसरा मोदी सौ फीसदी मेजोरिटी नहीं ला पाएंगे, तब कुछ सहयोगियों की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में मोदी के नाम से देश के आधे से ज्यादा तथाकथित सेकुलर साथ नहीं आएंगे और अगर आएंगे तो अनअफोर्डेबल कंडीशन के साथ फिर क्या, ऑप्शन है? आडवाणी? तो राजनाथ सिंह यहां पर अपने दोनों ही मकसदों में कामयाब हुए हैं, एक तो मोदी को आगे बढ़ाने में और आडवाणी को मुकम्मल तौर पर किनारा करने में। चूंकि जब ढफली बजेगी कौन है सेकुलर या कौन है भाजपा में सर्वग्राह्य आदमी, तो खोज की सुई आडवाणी पर नहीं राजनाथ सिंह पर रुकेगी। अगर अभी आडवाणी भी मोदी-मोदी कर रहे होते, तो वे पीएम की रेस में सबसे आगे होते। इसलिए एक अध्यक्ष के रूप में राजनाथ सिंह इस रिफ्ट को बढ़ाना ही चाहते थे।
मोदी तो परीक्षाएं ही देते रह जाएंगे, पहली तो गुजरात में लगातर साबित करते रहने की, दूसरी नवीनतम 6 लोस एवं विस चुनावों में सफलता, तीसरी पार्टी में कोई औपचारिक रूप से अखिल भारतीय स्तर की 2014 के लोस चुनावों से जुड़ी जिम्मेदारी पाने की, चौथी परीक्षा बेहद कठिन पार्टी की जो सीटें एंटी इंकंबेंसी फैक्टर और कांग्रेस की खराब छवि के चलते आनी हैं उनसे वे कितना ज्यादा ला सकते हैं, पांचवी कम पड़ गईं सीटों का गणित वे कैसे बिठाएंगे, छठवीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खासकर अमेरिकी नकारात्मक रुख को वे कैसे चेंज करेंगे, सातवीं परीक्षा मोदी की वह होगी जिसमें वे लोगों की महा अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगे, चूंकि अब लोगों को शांतिपूर्ण कैंडल मार्च, लालकिले पर प्रर्दशन की लपक लग चुकी है, फिर चाहे सरकार का मुखिया मनमोहन हों या मोदी। यूं भी नेवर वोट कॉस्टिंग पार्टिसिपेंट्स वोकेल ऑन इंटरनेट स्पेस प्रोटेस्टर्स के ऊपर यह ज्यादा दबाव है कि वे प्रो बीजेपी हैं, तो वे कुछ अनावश्क मुद्दों पर भी नई सरकार को घेरेंगे। देखिए परीक्षाओं की इतनी सीढिय़ां अगर कोई चढ़ सकता है तो वह बेशक नेता है और फिर सर्वस्वीकार्य है ही है।
-सखाजी

Life is Just a Life: ये क्या बेहूदगी है? Ye kya behudagi hai?

Written By नीरज द्विवेदी on गुरुवार, 6 जून 2013 | 8:39 pm

Life is Just a Life: ये क्या बेहूदगी है? Ye kya behudagi hai?: ये क्या बेहूदगी है? तेज हवाएं धूल भरी आंधी टूटे फूटे अरमान चीथड़ों से पता नहीं किसके जाने कहाँ से लेकर आना जहाँ मन चाहे फें...

Life is Just a Life: एहसास Ehsas

Written By नीरज द्विवेदी on बुधवार, 5 जून 2013 | 8:02 am

Life is Just a Life: एहसास Ehsas: चाहे जितनी कोशिश कर लूँ पूरा होने की पर मुझे पता है तुम्हारे बिना अधूरा ही रहूँगा अतृप्त ही रहूँगा सूनी आँखों से क्षितिज को न...

Life is Just a Life: बोझ आँखों का Bojh Ankhon Ka

Written By नीरज द्विवेदी on सोमवार, 3 जून 2013 | 2:07 am

Life is Just a Life: बोझ आँखों का Bojh Ankhon Ka: क्या देखते हो आईने में   लाल आंखें   गालों पर सूखा पानी   अपना हाल ....? अब क्यों ये हाल बना रखा है ? बहा तो दिया   अभी अभी   थ...

Life is Just a Life: संवेदन Samvedan

Written By नीरज द्विवेदी on सोमवार, 13 मई 2013 | 7:51 am

Life is Just a Life: संवेदन Samvedan: मैं प्यार मोहब्बत तब    लिखता हूँ जब जीना मुश्किल हो जाता है, बोझ हक़ीकत का सपनों की छाती पर  ढोना मुश्किल हो जाता है। कुछ मर जाते ...

Life is Just a Life: बँटवारा Bantwara

Written By नीरज द्विवेदी on शनिवार, 11 मई 2013 | 9:36 pm

Life is Just a Life: बँटवारा Bantwara: चलो समेटो टुकडे हर घर से हर कोने से हर मंदिर से महलों से झोपड़ियों से हर गली मोहल्ले गाँव शहर से फुटपाथों से पुल के नीचे से...

अमन का पैग़ाम: इस्लाम के खिलाफ नहीं है वंदे मातरम् शफीकुर्रहमान ब...

Written By एस एम् मासूम on शुक्रवार, 10 मई 2013 | 3:14 pm

अमन का पैग़ाम: इस्लाम के खिलाफ नहीं है वंदे मातरम् शफीकुर्रहमान ब...: बुधवार को लोकसभा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए जाने से पहले सदन में 'वंदे मातरम्' की धुन बजने के दौरान संभल से बीएसपी सांसद ...
kroyaaa is aalekh ko pura pdhen or prtikriya avshy de shukriyaa
अख्तर खान अकेला
9 hours ago
Girish Pankaj
सबसे पहला धर्म हमारा, वन्दे मातरम
देश हमारा सबसे न्यारा, वन्दे मातरम

देश है सबसे पहले, उसके बाद धर्म आये
सोचो इस पर आज दुबारा, वन्दे मातरम

हिन्दू मुस्लिम, सिख, ईसाई बातें हैं बेकार
देश हमें हो प्राण से प्यारा, वन्दे मातरम

जहां रहें, हम जहां भी जाएँ रखे वतन को याद
जिसने अपना आज संवारा, वन्दे मातरम

देश विरोधी लोगों को हम सिखलाएँ यह बात
सुबह-शाम बस एक हो नारा, वन्दे मातरम

देश हमारी आन-बान है देश हमारी शान
लायेंगे घर-घर उजियारा, वन्दे मातरम

भारत मटा तुम्हें बुलाती लौटो अपने देश
घर आओ ये कितना प्यारा, वन्दे मातरम

जातिधर्म की ये दीवारे कब तक कैद रहें?
तोड़ो-तोड़ो अब ये कारा, वन्दे मातरम

ध्वज अपना है, भाषा अपनी, राष्ट्रगान का मान
राष्ट्र प्रेम की सच्ची धारा, वन्दे मातरम

देश प्रेम ही विश्व प्रेम की है सच्ची शुरुआत,
बिन इसके न होय गुजारा, वन्दे मातरम
अख्तर खान अकेला
3 hours ago
फिर दिल से कहो हम इस मिटटी से प्यार करते है इसी मिटटी में मिलकर फना हो जाना चाहते है और वन्देमातरम कहते ही नहीं वन्देमातरम करके भी दिखाते है वन्देमातरम वन्देमातरम
दोस्तों कल संसद में बसपा के एक मुस्लिम सांसद ने वन्देमातरम गीत का बहिष्कार किया उस पर देश भर में बहस छिड़ी हुई है बात भी सही है के जिसे हम राष्ट्रगीत कहते है उसे हमे बोलने सुनने में दिक्क़त है लेकिन जरा हम अपने सीने पर हाथ रख कर देखे क्या हम इस गीत का सम्मान करते है या फिर इस गीत के नाम पर राजनीति कर वोट कबाड़ने और एक दुसरे को नीचा दिखने की सोचते है ..देश की संसद में इस मामले में चुनाव हुआ और बहुमत के आधार पर राष्ट्रगान जन गन मन सुना गया ..बस वोह राष्ट्रगान हो गया देश के मान सम्मान का प्रतीक होने के कारन इस गायन को सम्मान देने के लियें राष्ट्रिय सम्मान कानून बनाया गया और इस गान के अपमान करने वाले को सजा देने का प्रावधान रखा गया लेकिन चाहे कोंग्रेस सत्ता में रही हो चाहे भाजपा सत्ता में रही हो किसी ने भी वन्दे मातरम गीत को गाने और इसका सम्मान करने के मामले में कोई आचार संहिता कोई कानून नही बनाया केवल ऐच्छिक रखा गया अब ऐच्छिक अगर कोई चीज़ है तो उस मामले में की जीद काम नहीं देती खेर यह तो अलग बात हो गयी है लेकिन जरा सोचिये अपने दिल पर हाथ रखिये जो लोग संसद में राष्ट्रगीत वन्देमातरम गा रहे थे क्या उन्हें इस ईत को गाने का हक है क्या वोह लोग देश से प्यार करते है क्या संसद में बेठे लोगों का चरित्र उन्हें इस गीत को गाने की इजाज़त देता है जो लोग बलात्कारी हो ..बेईमान हो ..मक्कार हो ..फरेबी हो ..रिश्वतखोर हो ..भ्रष्ट हो देश के कानून का मान सम्मान नहीं करते हो दश की सीमाओं का सम्मान नहीं करते हो जिनके दिलों में गीता ..कुरान .बाइबिल ...गुरुवाणी या किसी भी द्र्ह्मे का सम्मान नहीं हो तो क्या वोह लोग उनकी नापाक जुबान से वन्देमातरम जेसा गीत गाने के हकदार है क्या संसद में बेठे बेईमान लोग शपथ लेकर देश के संविधान की धज्जियां उढ़ा कर इस गीत को गाने के हकदार है नहीं न तो फिर यह तमाशा क्यूँ वन्देमातरम पर राजनीति क्यूँ ..एक कट्टर हिन्दू वन्देमातरम पर मुसलमानों को इस गीत का दुश्मन बताकर अपने कट्टरवादी वोट मजबूत करने की कोशिशों में जुटा रहता है तो एक मुसलमान सांसद सिर्फ मुस्लिम वोटों को प्रापत् करने के लियें संसद में इस गीत के गायन के वक्त इस गीत का बहिष्कार करता है हमे शर्म आती है दिल में तो बेईमानी और जुबान पर राजनीति वोह भी पवित्र गीत के नाम पर इस गीत का अहसास कोई समझ नहीं सकता मुख्तलिफ शायरों और मुख्तलिफ विचारधाराओं के लोगों ने इस गीत की व्याख्या अपने आने तरीके से की है मुसलमान कहते है के देश की मिटटी से प्यार करने और इसी मिटटी में फना हो जाने को वन्देमातरम कहते है मुसलमानों का तर्क है के यह उन लोगों के लियें संदेश है जो लोग जुबान से देशभक्ति का दिखावा करते है और इस देश की मीट्टी में मिलने की जगह नदी के जरिये विदेशों के समुन्द्र में समां जाते है ..मुसलमान कहते है के हम जब नमाज़ पढ़ते है तो इस देश की मिटटी पर सर झुका कर अपने खुद तक पहुंचने का रास्ता बनाते है ..मुसलमान कहते है के जब नमाज़ के पहेल उन्हें पानी नहीं मिलता या बीमारी के कारण उनका पानी से परहेज़ होता है तो इसी देश की मिटटी से तहममुम यानी सूखा वुजू कर खुद को पाक कर लेता है और फिर खुद के दरबार में नमाज़ के जरिये इसी सर जमीन पर सजदा कर अपनी हाजरी लगाता है ...इतना ही नहीं मुसलमान इस धरती पर पैदा होता है बढ़ा होता है और मरने पर इसी मिटटी में दफन होकर खुद को फना कर लेता है जबके दुसरे समाज के लोग दिखावे को तो इस मिटटी से दिखावे का नाटक करते है लेकिन जिस धरती में सीता मय्या ने समाकर इस धरती की पवित्रता और मिटटी में मिलजाने का संदेश दिया था वही लोग राख बनकर नदी में भाये जाते है और नदी इनको बहा कर दूर विदेशी समुन्द्रों में लेजाती है ऐसा क्यूँ होता है मुसलमान तो इस मिटटी से अपना रिश्ता मरने के बाद भी रखता है लेकिन दुसरे लोग मरने के बाद इस मिटटी से अपना रिश्ता क्यूँ तोड़ कर दूर विदेशी समुन्द्रों में चले जाते है ........दूसरी तरफ दुसरे समाज का कहना है के मुसलमान वन्देमातरम का अपमान करते है धरती भारत की धरती पर अपना शीश नहीं झुकाते है ..उन्हें भारत से प्यार नहीं और वोह भारत को माँ नहीं मानते भारत माँ का सम्मान नहीं करते इसीलियें इस गीत का अपमान करते है अब वक्त आ गया है के गीतों के नाम पर राजनीति करने वाले लोगों को पकड़ा जाए उनसे सवाल किये जाए उनकी राष्ट्रीयता को परखा जाए और कम से कम मुंह में राम बगल में छुरी रखें वाले चोर बेइमान नेताओं से तो इस गीत को गाने का हक छीन लिया जाए इस गीत को गाने ..इसके सम्मान ..इसके गाने के तरीके स्थान और गीत गाने के हकदारों और इसकी उपेक्षा करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही को लेकर कोई आचार संहिता बनाने की जरूरत है इस गीत के नाम पर राजनीति करने वालों को रोकने की भी आचार संहिता बनाने की जरूरत है और जुबान से नहीं दिल से कर्म से मन से वचन से वन्देमातरम कहने वालों की जरूरत है इसलियें एक बार फिर दिल से कहो हम इस मिटटी से प्यार करते है इसी मिटटी में मिलकर फना हो जाना चाहते है और वन्देमातरम कहते ही नहीं वन्देमातरम करके भी दिखाते है वन्देमातरम वन्देमातरम ..............अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

Life is Just a Life: प्यार और शब्द का रिश्ता Pyar aur Shabd ka rishta

Written By नीरज द्विवेदी on शनिवार, 4 मई 2013 | 12:33 pm

Life is Just a Life: प्यार और शब्द का रिश्ता Pyar aur Shabd ka rishta: हरिवंश राय बच्चन जी की एक कविता "एक नया अनुभव" में कवि चिड़िया से कहता है कि मुझे तुझसे प्यार है मैं तुझ पर कविता लिखना चाहता ह...

रानी

Written By Sadhana Vaid on गुरुवार, 2 मई 2013 | 10:59 pm


वह रोज आती है मेरे यहाँ अपनी माँ के साथ ! छोटी सी बच्ची है पाँच छ: साल की ! नाम है रानी ! माँ बर्तन माँज कर डलिया में रखती जाती है वह एक-एक दो-दो उठा कर शेल्फ में सजाती जाती है ! छोटे-छोटे हाथों से बड़े-बड़े भारी बर्तन कुकर कढ़ाई उठाती है तो डर लगता है कि कहीं गिरा न ले अपने पैरों पर ! कितनी चोट लग जायेगी !
मैं उसे प्यार से अपने पास बिठा लेती हूँ अक्सर ! बिस्किट, रस्क या कुछ खाने को दे देती हूँ कि उसकी माँ उसे काम ना बता पाये ! लेकिन ज़रा देर में ही उसकी पुकार लग जाती है ! कभी पुचकार के साथ तो कभी खीझ भरी झिड़की के साथ !
“चल रानी ! जल्दी-जल्दी डला खाली कर दे बेटा ! फिर झाडू भी तो लगानी है ! ज़रा जल्दी हाथ चला ले !“
मेरे मन में मरोड़ सी उठती है ! मेरे परिवार में भी बच्चियाँ हैं ! अच्छे स्कूल में पढती हैं ! क्या इस बच्ची को पढ़ने का हक नहीं है ! क्या उसका बचपन इसी तरह अपनी माँ के साथ बर्तन माँजते और झाडू लगाते ही बीत जायेगा ! अगर यह नहीं पढ़ा पा रही है तो मैं उसके स्कूल की फीस भर दूँगी ! कम से कम उसका भविष्य तो बन जायेगा ! मैं उसकी माँ मीरा को बुलाती हूँ ! उसे अपने मन की बात बताती हूँ ! लेकिन मेरी बात सुन कर जब उसके चहरे पर कोई अपेक्षित प्रतिक्रिया दिखाई नहीं देती है तो मुझे आश्चर्य के साथ कुछ निराशा भी होती है !
“मैं तो उसका स्कूल में एडमीशन करवाना चाहती हूँ और तुम कोई दिलचस्पी ही नहीं दिखा रही हो ! इतनी ज़रा सी बच्ची से घर का काम करवा रही हो पता है यह अपराध होता है ! बच्चों से काम नहीं कराते ! किसीने रिपोर्ट कर दी तो हमें भी सज़ा हो जायेगी और तुम भी लपेटे में आ जाओगी ! इसे अपने साथ मत लाया करो !”
 “तो कहाँ छोड़ कर आऊँ इसे आप बताओ !” मीरा जैसे फट पड़ी ! “सारा दिन तो मेरा आप लोगन के घर के काम करने में निकल जाता है ! इसे घर में किसके पास छोड़ूँ ! इसका बाप सुबह से ही कारखाने चला जाता है काम पर ! लड़के भी दोनों अभी बच्चा ही हैं ! स्कूल से आकर बाहर दोस्तों में डोलने चले जाते हैं ! उनके ऊपर इसकी जिम्मेदारी कैसे डाल सकू हूँ ! लड़की जात है इसीके मारे साथ लेकर आती हूँ ! सबका काम निबटाते-निबटाते मुझे संजा के सात बज जाते हैं ! कैसा बुरा बखत चल रहा है आजकल ! अकेली छोरी चार पाँच बजे संजा को स्कूल से घर लौटेगी तो कौन इसे देखेगा ! इसीलिये इसका नाम नहीं लिखवाया ! मेरी आँख के सामने रहेगी तो बची तो रहेगी ! नहीं तो आजकल तो हर जगह बस एक ही बात सुनाई देत है ! कैसा बुरा ज़माना आ गया है !”
मुझे कोई जवाब नहीं सूझ रहा था ! वाकई मीरा जैसे लोगों की समस्या गंभीर है ! यह भी कामकाजी महिला है ! लेकिन अपने बच्चों को क्रेच में नहीं डाल सकती ! लड़कों को पढ़ा रही है लेकिन लड़की को स्कूल में सिर्फ इसलिए नहीं भर्ती कराया कि उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किस पर डाले ! कैसे विचित्र नियम और क़ानून हमने बनाये हैं ! श्रम दिवस के गुणगान बहुत गाये जाते हैं लेकिन जो वास्तव में श्रमजीवी हैं उनके लिये ये क़ानून कितने सुविधाजनक एवँ फलदायी हैं और कितने समस्याएँ बढ़ाने वाले और दिक्कतें पैदा करने वाले हैं इसका आकलन करने की ज़हमत कौन उठाता है ! जबकि सबसे ज्यादह ज़रूरत इसी बात की है !
 स्वयंसेवी संस्थायें जो निर्धन बस्तियों में इनकी सहायता के लिये काम कर रही हैं उन्हें इन बच्चों के लिये नि:शुल्क क्रेच खोलने चाहिये जहाँ इन्हें प्रारम्भिक शिक्षा भी मिल सके, इनके खेलकूद, मनोरंजन एवँ उम्र के अनुसार इनकी कलात्मकता को बढ़ावा देने वाली ट्रेनिंग की भी समुचित व्यवस्था हो और ये एक सुरक्षित एवँ स्वस्थ माहौल में रह सकें ! मँहगाई इतनी बढ़ी हुई है कि इस वर्ग के परिवार में एक व्यक्ति की कमाई से सबका पेट भर जाये यह कल्पना भी असंभव है ! और माता पिता जब दोनों ही काम पर निकल जाते हैं तो नासमझ बच्चे गली मोहल्लों में असुरक्षित यहाँ वहाँ घूमते रहते हैं जिन्हें समाज में व्याप्त नकारात्मक प्रवृत्ति के लोग आसानी से मिठाई, चॉकलेट्स या खिलौने इत्यादि का लालच देकर आसानी से फुसला लेते हैं और फिर हृदय विदारक पाशविक घटनाओं को अंजाम देने में सफल हो जाते हैं !
बच्चों के यौन शोषण की समस्या की जड़ें कहाँ पर हैं उन्हें कैसे दूर किया जा सकता है यह तो बहुत ही पेचीदा सवाल है ! सबकी मानसिकता में रातों रात सुधार आ जाये, फिल्मों, टीवी, या सेंसर बोर्ड के सारे कायदे कानूनों में बदलाव कर दिया जाये, लोगों को नैतिक शिक्षा और संस्कारों की घुट्टी पिलाना शुरू कर दी जाये ये सब बातें कहने सुनने में भले ही अच्छी लगें पर व्यावहारिकता के स्तर पर अमल में लाना असंभव हैं ! लेकिन अगर हम सचमुच गंभीरता से कोई निदान ढूँढना चाहते हैं तो इतना तो कर ही सकते हैं कि नासमझ छोटे बच्चे सड़कों पर लावारिस घूमते ना दिखें इसके लिये कुछ ऐसी व्यवस्था की जाये कि माता पिता पर बिना कोई अतिरिक्त भार डाले हुए बच्चों की बुनियादी शिक्षा और सुरक्षा का दायित्व उठा लिया जाये ! और ज़रूरी नहीं है कि प्रोफेशनल एन जी ओज़ ही इस तरह के काम को अंजाम दे सकते हैं ! शहरों में कुछ इस तरह की व्यवस्था होती है कि जहाँ सम्भ्रांत लोगों की रिहाइशी कॉलोनीज़ होती हैं उन्हीं के आस पास उनके घरों में तरह तरह से अपनी सेवाएं देने वाले वर्ग के लोगों की बस्तियाँ भी होती हैं ! सम्भ्रांत लोग अपनी और अपने बच्चों की सुरक्षा तो चाक चौबंद रखते हैं लेकिन दरिंदों की लपेटे में ये बच्चे आ जाते हैं जिनके पास उनके घर वालों की रहनुमाई उपलब्ध नहीं होती क्योंकि वे उस समय आपको घरों में आपकी सेवा में उपस्थित होते हैं और जिनके बिना आपका एक वक्त भी काम नहीं चल सकता ! तो क्या हम इनकी सेवाओं के बदले इतना भी नहीं कर सकते कि इनके बच्चों को कुछ समय देकर उनकी सुरक्षा, शिक्षा और खुशी के लिये थोड़ा सा वक्त दे दें ! इससे कितनी ही रानी, गुड़िया, मुनिया, बिटिया तो बच ही जायेंगी हमें भी खुद पर नाज़ करने के लिये एक पुख्ता वजह मिल जायेगी !
साधना वैद     




पार्ट टाइम दलित की बेटी

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on शनिवार, 27 अप्रैल 2013 | 10:41 pm

जब वे अभेद्य किले में रहती हैं, पचासियों ब्लैक कमांडोज के बीच चलती हैं, सैकड़ों गाडिय़ों के काफिले के बीच होकर चलती हैं और जब वे रुपयों से गुथी माला पहनती हैं। तब वे दलित नहीं होती। जैसे ही सीबीआई उनपर आंखे तररेती है, किसी सुरक्षा कारण से तलाशी देती हैं या फिर जैसे ही उनके ऐशो आराम की कोई सियासतदां निंदा करता है तो वे दलित हो जाती हैं। जैसे ही उनकी कार से लाख रुपये चुनाव आयोग खंगालता है तो वे दलित हो जाती हैं। न जाने क्यों यूपी जैसे प्रबुद्ध प्रदेश की वे ऐसी चालाक  नेता हैं, जो जब-तब हारकर जीत जाती हैं। मुख्यमंत्री बन जाती हैं, देश की सरकार को चलाने की खिवैया बन जाती हैं। दलित की यह बेटी इतनी पीडि़त है कि समूचा देश दुनिया के सामने शर्मिंदा है। यह इतनी पीडि़त है जितना कि खुद दलित वर्ग नहीं। अहो। गजब है। माया। वे कहती हैं जैसा उनके साथ कर्नाटक के गुलबर्गा में हुआ वैसा सोनिया गांधी के साथ क्यों नहीं? साफ है माया की नजरों में सोनिया ब्राह्मण हैं (...लेकिन भाजपाई उन्हें क्रिश्चिन कहते हैं)...फिरोज गांदी के खानदान की कुल बहू हैं। माया कहां। दलित। कांशी राम को बंधक बनाकर बनीं नेता। वे कहां सौदेबाज, ताज के रास्ते को चबाने वाली जिम्मेदारी दलित की बेटी। बहुत खूब। और शर्मिंदा हूं, दो चीजों पर एक तो यूपी पर, जो उन्हें फिर-फिर चुनता है तो दूसरा बीजेपी और कांग्रेस पर। कैसे नेशनल दल हो, यूपी के 16 करोड़ लोगों की नजरों में इतनी भी औकात नहीं कि सरकार को समर्थन देकर बनवा सको। यह तो पार्ट टाइम दलित की बेटी बन जाती हैं। फिर ऐश्वर्य की महामाया। खैर।
- सखाजी

Life is Just a Life: कैसे भारत सो जाता है Kaise Bharat So Jata Hai

Life is Just a Life: कैसे भारत सो जाता है Kaise Bharat So Jata Hai: मैं कैसे  बदल जाऊं हर  बार कैसे  जीत बनाऊं , हार , लाशों के दम पर जीवित दिन कैसे बन जाते त्यौहार ? अगल बगल के ऐरे गैरे जब तब हम पर चढ...

हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते ?

Written By Sadhana Vaid on सोमवार, 22 अप्रैल 2013 | 7:43 pm



घृणा और जुगुप्सा के मारे दो तीन दिन से संज्ञाशून्य होने जैसी स्थिति हो गयी है ! शर्मिंदगी, क्षोभ और गुस्से का यह आलम है कि लगता है मुँह खोला तो जैसे ज्वालामुखी फट पड़ेगा ! यह किस किस्म के समाज में हम रह रहे हैं जहाँ ना तो इंसानियत बची है, न दया माया ना ही मासूम बच्चों के प्रति ममता और करुणा का भाव ! इतना तो मान कर चलना ही होगा कि इस तरह की घृणित मानसिकता वाले लोग जानवर ही होते हैं ! अब चिंता इस बात की है कि प्रतिक्षण बढ़ने वाली जनसंख्या में ऐसे जानवर कितने पैदा हो रहे हैं और कहाँ कहाँ हो रहे हैं इस आँकड़े का निर्धारण कैसे हो ! समस्या का हल सिर्फ एक ही है कि इन जानवरों को इंसान बनाना होगा ! उसके लिये जो भी उपाय हो सकते हैं किये ही जाने चाहिये ! सबसे पहले पोर्न फ़िल्में और वीडियोज दिखाने वाले टी वी चैनल्स पर तत्काल बैन लगा दिया जाना चाहिये ! फिल्मों में दिखाये जाने बेहूदा आइटम सॉंग्स, अश्लील दृश्य व संवाद, जो आजकल फिल्म की सफलता की गारंटी माने जाते हैं, सैंसर बोर्ड द्वारा पास ही नहीं किये जाने चाहिये ! समाज का एक अभिन्न अंग होने के नाते महिलाओं की भी जिम्मेदारी होती है कि समाज में हर पल बढ़ते इस मानसिक प्रदूषण को रोकने के लिये कुछ कारगर उपाय करें ! इसलिये केवल खोखली शोहरत और धन कमाने के लिये अभिनेत्रियों व मॉडल्स को ऐसी फिल्मों व विज्ञापनों में काम करने से मना कर देना चाहिये जिन्हें देख कर समाज के लोगों की मानसिकता पर दुष्प्रभाव पड़ता हो ! स्त्री एक माँ भी होती है ! अपने बच्चों को गलत रास्ते पर जाने से रोकने के लिये एक माँ हर संभव उपाय अपनाती है ! आज भारतीय समाज भी ऐसे ही निरंकुश, पथभ्रष्ट और संस्कारविहीन लोगों से भरता जा रहा है ! महिलाओं को माँ बन कर उन्हें सख्ती से रास्ते पर लाना होगा और इसके लिये सरकार को भी कुछ सख्त कदम उठा कर क़ानून कायदों को प्रभावी और समाजोपयोगी बनाना होगा ! पश्चिमी संस्कृति का जब और सारी बातों में अनुसरण किया जाता है तो इस बात में भी तो किया जाना चाहिये कि वहाँ की क़ानून व्यवस्था कितनी सख्त और पुख्ता है और उसका इम्प्लीमेंटेशन कितना त्वरित और असरदार होता है ! वहाँ किसी व्यक्ति के खिलाफ, बलात्कार तो बहुत बड़ी बात है, यदि ईव टीज़िंग की शिकायत भी दर्ज कर दी जाती है तो उसे सज़ा तो भुगतनी  ही पड़ती है उसके अलावा हमेशा के लिये उसका रिकॉर्ड खराब हो जाता है और उसे कहीं नौकरी नहीं मिलती ! हमारे देश में विरोध करने वालों की सहायता करने की बजाय पुलिसवाले उन पर हाथ उठाते हैं और उन्हें पैसे देकर मामला दबाने के लिये मजबूर करते हैं !
दामिनी वाला हादसा जब हुआ था तब भी मैंने इस विषय पर एक पोस्ट डाली थी और अपनी ओर से कुछ सुझाव दिये थे ! आज फिर उस आलेख का यह हिस्सा दोहरा रही हूँ ! दामिनी के साथ क्या हुआ, क्यों हुआ उसे दोहराना नहीं चाहती ! दोहराने से कोई फ़ायदा भी नहीं है ! हमारा सारा ध्यान इस बात पर केन्द्रित होना चाहिए कि जो हैवान उसके गुनहगार हैं उनके साथ क्या हो रहा है और क्या होना चाहिए ! देश की धीमी न्याय प्रक्रिया पर हमें भरोसा नहीं है ! यहाँ कोर्ट में मुकदमे सालों तक चलते हैं और ऐसे खतरनाक अपराधी जमानत पर छूट कर फिर उसी तरह के जघन्य अपराधों में लिप्त होकर समाज के लिए खतरा बन कर बेख़ौफ़ घूमते रहते हैं !
भागलपुर वाले केस को आप लोग अभी तक भूले नहीं होंगे जिसमें बारह साल पहले एक ऐसी ही साहसी और बहादुर लड़की पर गुंडों ने प्रतिरोध करने पर एसिड डाल कर उसका चेहरा जला दिया था ! वह लड़की अभी तक न्याय के लिए प्रतीक्षा कर रही है और उसके गुनहगार सालों से जमानत पर छूट कर ऐशो आराम की ज़िंदगी बसर कर रहे हैं साथ ही अपने गुनाहों के सबूत मिटा रहे हैं !
मेरे विचार से ऐसे गुनहगारों को कोर्ट कचहरी के टेढ़े-मेढ़े रास्तों, वकीलों और जजों की लम्बी-लम्बी बहसों और हर रोज़ आगे बढ़ती मुकदमों की तारीखों की भूलभुलैया से निकाल कर सीधे समाज के हवाले कर देना चाहिए ! सर्व सम्मति से समाज के हर वर्ग और हर क्षेत्र से प्रबुद्ध व्यक्तियों की समिति बनानी चाहिए जिनमें प्राध्यापक, वकील, जज, कलाकार, गृहणियाँ, डॉक्टर्स, इंजीनियर्स, व्यापारी, साहित्यकार व अन्य सभी विधाओं से जुड़े लोग शामिल हों और सबकी राय से उचित फैसला किया जाना चाहिए और गुनहगारों को दंड भी सरे आम दिया जाना चाहिए ताकि बाकी सभी के लिए ऐसा फैसला सबक बन सके !
ऐसे अपराधियों के माता-पिता से पूछना चाहिए कि वे अपने ऐसे कुसंस्कारी और हैवान बेटों के लिए खुद क्या सज़ा तजवीज करते हैं ! अगर वे अपने बच्चों के लिए रहम की अपील करते हैं तो उनसे पूछना चाहिए की यदि उनकी अपनी बेटी के साथ ऐसी दुर्घटना हो जाती तो क्या वे उसके गुनहगारों के लिए भी रहम की अपील ही करते ? इतनी खराब परवरिश और इतने खराब संस्कार अपने बच्चों को देने के लिए स्वयम् उन्हें क्या सज़ा दी जानी चाहिए ? दामिनी, गुड़िया या इन दरिंदों की हवस का शिकार हुई उन जैसी अनेकों बच्चियों के गुनाहगारों पर कोल्ड ब्लडेड मर्डर का आरोप लगाया जाना चाहिए और उन्हें तुरंत कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिये !
लेकिन यह भी सच है कि हमारे आपके चाहने से क्या होगा ! होगा वही जो इस देश की धीमी गति से चलने वाली व्यवस्था में विधि सम्मत होगा ! मगर इतना तो हम कर ही सकते हैं कि इतने घटिया लोगों का पूरी तरह से सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाए ! सबसे ज्यादह आपत्ति तो मुझे इस बात पर है कि रिपोर्टिंग के वक्त ऐसे गुनाहगारों के चहरे क्यों छिपाए जाते हैं ! होना तो यह चाहिये कि जिन लोगों के ऊपर बलात्कार के आरोप सिद्ध हो चुके हैं उनकी तस्वीरें, नाम, पता व सभी डिटेल हर रोज़ टी वी पर और अखबारों में दिखाए जाने चाहिए ताकि ऐसे लोगों से जनता सावधान रह सके ! समाज के आम लोगों के साथ घुलमिल कर रहने का इन्हें मौक़ा नहीं दिया जाना चाहिए ! यदि किरायेदार हैं तो इन्हें तुरंत घर से निकाल बाहर करना चाहिए और यदि मकान मालिक हैं तो ऐसा क़ानून बनाया जाना चाहिए कि इन्हें इनकी जायदाद से बेदखल किया जा सके ! जब तक कड़े और ठोस कदम नहीं उठाये जायेंगे ये मुख्य धारा में सबके बीच छिपे रहेंगे और मौक़ा पाते ही अपने घिनौने इरादों को अंजाम देते रहेंगे ! जब दंड कठोर होगा और परिवार के अन्य सदस्य भी इसकी चपेट में आयेंगे तो घर के लोग भी अपने बच्चों के चालचलन पर निगरानी रखेंगे और लगाम खींच कर रखेंगे ! यदि इन बातों पर ध्यान दिया जाएगा तो आशा कर सकते हैं कि ऐसी घटनाओं की आवृति में निश्चित रूप से कमी आ जाएगी ! 
दामिनी के गुनाहगारों को सज़ा देने में इतनी ढील ना बरती जाती तो शायद ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति इतनी अधिक नहीं होती और कई ‘गुड़ियाएँ’ इस दमन से बच गयी होतीं ! मेरी इच्छा है इस आलेख को सभी लोग पढ़ें और सभी प्रबुद्ध पाठकों का इसे समर्थन मिले ताकि इस दमन चक्र के खिलाफ उठने वाली आवाज़ इतनी बुलंद हो जाये कि नीति नियंताओं की नींद टूटे और वे किसी सार्थक निष्कर्ष पर पहुँच सकें !

साधना वैद

Life is Just a Life: मेरा भी इम्तिहान ले लो Mera Bhi Imtihan Le Lo

Written By नीरज द्विवेदी on बुधवार, 17 अप्रैल 2013 | 8:59 am

Life is Just a Life: मेरा भी इम्तिहान ले लो Mera Bhi Imtihan Le Lo: तुम आँसू   नहीं   जान ले लो ... मेरा भी  इम्तिहान  ले  लो ... छुआ तो  एहसास हो जाएगा , हाथों में तीर  कमान ले लो ... मरने दो ...

Life is Just a Life: जिंदगी और खेल Jindagi aur Khel

Written By नीरज द्विवेदी on शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013 | 8:13 pm

Life is Just a Life: जिंदगी और खेल Jindagi aur Khel: कई दिनों से टप टप करती सुनता हूँ आवाजें , हैं तो पानी की पर लगती क्यों भूखी नंगी फरियादें , जैसे मरता हो विधान देश का खाकी के ...

Life is Just a Life: हम ढूंढ़ लायेंगे Ham Dhundh Layenge

Written By नीरज द्विवेदी on बुधवार, 10 अप्रैल 2013 | 8:52 am

Life is Just a Life: हम ढूंढ़ लायेंगे Ham Dhundh Layenge: लिखने दो आसमां को बंजर जमीं की कहानी लिखने दो , दहकता सच  सड़े बदबूदार झूंठ की  जुबानी लिखने दो। हम ढूंढ़ लायेंगे कल तक फलक से चुन ...

साथ अपने लड़कियों तेजाब रखना सीख लो !

Written By Shikha Kaushik on सोमवार, 8 अप्रैल 2013 | 2:06 pm

 JOIN HANDS WITH US न्याय के लिए साथ आये
GO ON THIS LINK AND JOIN THIS GROUP -

ACID ATTACK IN KANDHLA[SHAMLI]

 LIKE THIS PAGE -

Justice for Acid Victims in Kandhla Shamli

न्याय के लिए साथ आये




चुप नहीं रहना है अब पुरजोर आज चीख लो ,
साथ अपने लड़कियों तेजाब रखना सीख लो !

 मूक दर्शक बन के ये सारा समाज देखता ,
साथ देंगें ये नपुंसक ? मत दया की भीख लो !

 है नहीं कोई व्यवस्था  छोड़ दो बैसाखियाँ ,
अपनी सुरक्षा करने को मुट्ठियाँ अब भींच लो !

कमजोर हैं नाज़ुक हैं हम इन भ्रमों में मत रहो ,
काली तुम चंडी हो तुम पापी का रक्त चूस लो !

तुम डराओगे हमें ! हम भी डरा सकते तुम्हे ,
आर पार की ये रेखा हौसलों से खींच लो !

शिखा कौशिक 'नूतन'


THIS WAS THE FIRST ACID ATTACK IN KANDHLA [SHAMLI] ON GIRLS .ON 2ND APRIL 2013 FOUR SISTERS WERE RETURNING TO THEIR HOME AFTER A COLLEGE EXAM DUTY .TWO OR THREE BOYS HAVE THROWN ACID ON THEM .ONE SISTER WAS SERIOUSLY INJURED IN THIS ATTACK .SHE HAS BEEN ADMITTED IN SR.GANGA RAM HOSPITAL IN DELHI . AT THE SPOT SISTERS TRIED THEIR BEST TO CATCH THEM BUT THE CONVICTS GOT OFF .THE CONVICTS ARE STILL AT LARGE . THIS IS REALLY FRUSTRATING .LET US WAIT AND WATCH HOW WILL POLICE DEAL WITH THE ROGUES ? BUT ONE THING IS CLEAR WE OPPOSE THIS ATTACK  WITH ALL FORCE  .
    JAY HIND
DR.SHIKHA KAUSHIK

जानवरों की तरह कहीं भी ,कभी भी, किसी से भी ,

Written By एस एम् मासूम on रविवार, 31 मार्च 2013 | 8:16 pm

वोह औरतें या मर्द जो जानवरों की तरह कहीं भी ,कभी भी, किसी से भी ,शारीरिक सम्बन्ध बना लेने को गलत नहीं समझते यदि अपने शरीर का प्रदर्शन करते दिखाई दें तो बात समझ में आती है लेकिन आश्चर्य तो उस समय होता है जब वो लोग जो इस्लाम के कानून को मानने का दावा करते हैं अपने शरीर का प्रदर्शन करते नजर आते हैं| 

कई बार तो महरम और नामहरम की परिभाषा भी यह बदल देते हैं |कभी किसी नामहरम के करीब जाते हैं तो कहते हैं बेटी जैसी है, कभी कहते हैं बहन जैसी है | वहीं इस्लाम कहता है यह नामहरम है इस से पर्दा करो | “अल्लाह ओ अकबर “ का नारा लगाने वाले ऐसे दो चेहरे वाले मुसलमानों के यहाँ होता वही है जो यह चाहते हैं या जो इनका खुद का बनाया कानून कहता है |क्योंकि सवाल नामहरम औरत की कुर्बत का है| अल्लाह कहता है दूर रहो ,इंसान का दिल कहता है औरत के करीब रहो |जीत इन्सान के दिल की गलत ख्वाहिशों की होती है और नतीजे में कभी बलात्कार होता है कभी व्यभिचार होता है |जब औरत के शरीर के करीब रहने की लालच इंसान को अल्लाह से दूर कर देती है,इस्लाम के कानून को भुला देता है तो दौलत और शोहरत की लालच के आड़े आने वाले इस इस्लाम के कानून को भुला देने में कितनी देर लगेगी | 

आगे पढ़ें 

Founder

Founder
Saleem Khan