नियम व निति निर्देशिका::: AIBA के सदस्यगण से यह आशा की जाती है कि वह निम्नलिखित नियमों का अक्षरशः पालन करेंगे और यह अनुपालित न करने पर उन्हें तत्काल प्रभाव से AIBA की सदस्यता से निलम्बित किया जा सकता है: *कोई भी सदस्य अपनी पोस्ट/लेख को केवल ड्राफ्ट में ही सेव करेगा/करेगी. *पोस्ट/लेख को किसी भी दशा में पब्लिश नहीं करेगा/करेगी. इन दो नियमों का पालन करना सभी सदस्यों के लिए अनिवार्य है. द्वारा:- ADMIN, AIBA

स्मार्ट फोन चलेगा, अफसर नहीं

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on शुक्रवार, 15 मई 2015 | 4:10 pm

हमें स्मार्ट सिटी चाहिए, स्मार्ट सरकार, स्मार्ट कार्ड, स्मार्ट फोन, स्मार्ट पत्नी, स्मार्ट क्लास और स्मार्ट टीवी समेत और भी न जाने क्या-क्या स्मार्ट चाहिए। मगर अफसर वही चाहिए। सफारी सूट या तपती धूप में भी गलेबंद टाई, सूट में कैद कांख में फाइल दबाए कोई मुनीम सा। ऐसा क्यों?
छत्तीसगढ़ कैडर के आईएएस अफसर और जगदलपुर के जिला कलक्टर अमित कटारिया से राज्य सरकार ने सिविल सर्विस के सिविल कोड की किसी अ, ब, स, द धारा के उपबंध ढिमका के तहत फलां के उल्लंघन का दोषी मानते हुए जवाब तलब किया है। अफसर की चूक सिर्फ इतनी है कि उसने प्रधानमंत्री से मिलते वक्त ब्रांडेड चश्मा और रंगीन चटक शर्ट पहन रखी थी। बेचारे कमअकल अफसर ने भारत की आम आदमी की पहचान बांह से फटी शर्ट नहीं पहनी, अस्पतालों में मिलने वाला मोतियाबिंद ऑपरेशन वाला चश्मा नहीं लगाया था। मोदी के दो घंटे के कार्यक्रम में दो शर्ट भी बदल ली थी। इसलिए अफसर बहुत दोषी है।
न जाने क्यों ये देश नंगों पर ही भरोसा करता है। बाबा, वैराग्य के चोले को ही क्यों मान्यता देता है। हाथी पर बैठकर भीख मांगने वाले को क्यों संत कहता है और पैदल चलकर तल्ख धूप में सब्जी बेचने वाले को ठग्गू क्यों मानता है।
इक्कसवीं सदी में प्रधानमंत्री के सूट पर बवाल, अफसर के ब्रांडेड चश्मे पर सवाल गले में फंस जाते हैं। क्या इस देश को गंगा किनारे के पंडा चलाएं, जो पहनें तो भरोसे का प्रतीक भगवा, मगर ठगी में चंबल के डाकुओं के बाप हों। क्यों किसी अफसर को हम भिनका सा ही देखना चाहते हैं। क्या छत्तीसगढ़ में ही ऐसे अफसर नहीं हैं, जो अरबों की संपत्ति के मालिक हैं, जिनके पैसे स्विस बैंक में जमा हैं। दुबई में इंटरनेशनल कंपनी में भागीदारी है। कइयों मंत्रियों की अकूत संपदा देश-विदेश में है। नसबंदी कांड के दोषी मंत्री अमर अग्रवाल के दामादों की दवा कंपनियों के ही कितने ठेके राज्य के स्वास्थ्य विभाग में हैं। लेकिन वे सामान्य खादी का कुर्ता पहनते हैं, इसलिए हमें ऐतराज नहीं। वे सामान्य पोशाक में आते हैं तो हमें दिक्कत नहीं है। बस कोई स्टाइल में नजर न आए। मजे की बात तो ये है कि समकक्ष और वरिष्ठ अफसर तो वेतन वृद्धि तक रोकने की बात कह रहे हैं। अमित कटारिया कोई दूध के धुले नहीं हैं। मगर इस मामले में आम आदमी उनके साथ है। ऐसे तो युवा अफसर लाॅबी डिमॅरलाइज हो जाएगी। जरा मुक्त रखिए इन्हें बकवासों से। कितने ऊर्जावान हैं छत्तीसगढ़ के युवा अफसर ओमप्रकाश चौधरी, अमित कटारिया, सारांश मित्तर, रजत कुमार, किरण कौशल, सिद्धार्थ कोमल परदेशी। इन्हें यूं डिमॅरलाज न कीजिए।
-सखाजी

''परलोक में सैटेलाइट'' की समीक्षा

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on बुधवार, 13 मई 2015 | 1:47 pm

व्यंग्य उपन्यास ''परलोक में सैटेलाइट'' हास्य व्यंग्य का जीवंत नायक है। इसके जरिए लेखक ने समाज के हर वर्ग को संबोधित किया है। गहन विज्ञान और मनोविज्ञान का इस्तेमाल नजर आता है। कथानक की शुरुआत ही बुंदेलखंड के एक ऐसे पात्र से होती है, जो अपनी कुर्सी बचाने और उसे जस्टीफाई करने के लिए अपने मातहतों को तौलता रहता है। व्यंग्य सरकारी दफ्तरान में ''साहबवाद'' को भी एड्रेस करता है। सबसे मौजू और महत्वपूर्ण व्यंग्य के भीतर छुपा वह विचार है, जिसमें लेखक दुनियाभर की स्पेस एजेंसियों के अलग-अलग मिशनों पर कटाक्ष करता है। वह यहां सार्वभौमवाद जैसे अतिगंभीर टाॅपिक पर भी पाठक से वार्तालाप सा करता हुआ हास्य अंदाज में चर्चा करता है।
भूखे देश में अरबों रुपये विफल सैटेलाइट पर खर्चने के बाद स्पेस एजेंसी के डायरेक्टर की राजनैतिक खुरफातों का व्यंग्य में जीवंत चित्रण है। गंभीर से गंभीर बात बेहद सरल और हास्य के जरिए ऐसे कर दी गई  है, जैसे पाठक से आमने-सामने तादातम्य बिठाकर बात की जा रही हो।
सैटेलाइट का परलोक से दृश्य भेजना। पृथ्वी के मानव समाज की प्रतिक्रियात्मकता अद्भुत है। कई बातें ऐसी हैं, जिनकी बहुत ढंग से व्याख्या की जा सकती है। कई नये शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। मुद्दों पर विस्तृत राय है।
व्यंग्य दो कारणों से जरूर पढ़े। पहला तो एक संपूर्ण व्यंग्य, जहां कहीं भी आपको गंभीर होने की जरूरत नहीं और एक बार भी बचकाना या हल्कापन नहीं लगेगा। दूसरा कारण इसकी शैली है। पाठक को कहीं भी उलझना नहीं पड़ता। एक पैरा सवाल खड़ा करता तो दूसरा ही पैरा जवाब दे देता है।
व्यंग्य की दो खामियां भी हैं। पहली तो यह अश्लील गालियों से गुरेज नहीं करता दूसरी इसमें किसी तरह की व्यावसायिकता की परवाह नहीं की गई। इससे प्रकाशक खोजने में दिक्कत हुई। वहीं  इतनी स्पष्टवादिता बरती गई है, कि कोई भी सरकारी पुस्तकालय इस विस्फोटक को अपने यहां रखने से भी गुरेज कर रहा है।

परलोक में सैटेलाइट अब pothi.com पर भी

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on मंगलवार, 12 मई 2015 | 2:28 am

व्यंग्य उपन्यास ''परलोक में सैटेलाइट'' अब notnul.com के साथ  pothi.com पर भी।
http://pothi.com/pothi/preview?pFile=51294#preview-top

व्यंग्य उपन्यास ''परलोक में सैटेलाइट'' विमोचित

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on गुरुवार, 7 मई 2015 | 2:37 am

रायपुर.
तकनकी युग में ई-पुस्तकों का दौर है। आने वाला वक्त पूरी तरह से ऑनलाइन हो जाएगा। यह अच्छा है। एक  छोटे से टैब में सैकड़ों पुस्तकों को पढ़ स·ते हैं। यह कहना है वरिष्ठ साहित्यकर रमेश नैयर का श्री नैयर बरुण सखाजी के पहले व्यंग्य उपन्यास परलोक में सैटेलाइट के विमोचन अवसर पर बोल रहे थे। यह छत्तीसगढ़ का  ऐसा पहला उपन्यास है जो ईबुक के तौर पर विमोचित किया गया है। वृंदावन हॉल में २७ अप्रैल २०१५, सोमवार को आयोजित कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि साहित्यकार सुभद्रा राठौर ने कहा कि व्यंग्य में नई शब्दावली गढ़ी गई है। जैसे यकीनेबल। अप्सराइजेशन आदि। नई और नई ऐसी बातें भी की गईं हैं, जो जुमले की तरह हैं। जैसे भगवान विष्णु ही क्यों सर्वोच्च हैं, क्योंकि वे ही इकलौते ऐसे भगवान हैं, जो अपनी पत्नी से पैर दबवा सकते हैं। उनके अलावा कोई  और नहीं जो इतना बड़ा साहस कर सकता। लेकिन व्यंग्य में गालियों का इस्तेमाल गैरज़रूरी लगता है.
विज्ञान और धर्म के रोचक कथानक
विशिष्ट अतिथि व्यंग्यकार प्रभाकर चौबे ने कहा कि नए लोगों में जबरदस्त ऊर्जा दिखाई देती है। परलोक में सैटेलाइट में विज्ञान और धर्म की मिलीजुली फंतासी है। यह प्रज्ञ और परिपूर्ण लेखन की निशानी है।
हास्य की परिधि तोड़ता है परलोक में सैटेलाइट
अन्य विशिष्ट अतिथि और वरिष्ठ पत्रकार अभय किशोर ने कहा कि परलोक में सैटेलाइट हास्य की परिधि को तोड़कर नश्तर से मौजूदा व्यवस्था पर करारा व्यंग्य करता है। विशिष्ट अतिथि दूरदर्शन केंद्र के निदेशक संजय प्रसाद ने कहा कि यह बेहद खुशी की बात है कि लेखन के मामले में रायपुर समृद्ध है। परलोक में सैटेलाइट के जरिए जिस हास्य को छूने की कोशिश की गई है, वह लाजबाव है। वहीं विशष्ट अतिथि महेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि परलोक में सैटेलाइट एक तरह से अंतरिक्ष, विज्ञान और धर्म के बीच त्रिकोण बनाता है। कार्यक्रम का संचालन अनिल द्विेदी ने किया। अंत में अतिथियों और आगुंतकों का आभार वरिष्ठ भाजपा नेता प्रकाश बजाज ने किया।
नॉटनल डॉट काम से क रें डाउनलोड
इस व्यंग्य उपन्यास को नॉटनल डॉट काम से डाउनलोड किया जा सकता है। वहीं यह जल्द ही न्यूजहंट मोबाइल एप पर भी जारी होने जा रहा है। इसके अलावा उपन्यास की हार्डकाही के लिए ९००९९८६१७९ पर एसएमएस करके मंगाई जा सकती है।
यहां से करें डाउनलोड।
http://notnul.com/Pages/ViewPort.aspx?Shortcode=eAVycMqD

कुर्सी चरित्रम***

कुर्सी ताकत है, तो कुर्सी कमजोरी भी है। कुर्सी अदावत है तो यह नजाकत भी है। कुर्सी कथा है तो यह नाटक भी है। कुर्सी वक्त है तो यह बुरा वक्त भी है। कुर्सी सपना है तो यह श्याह हकीकतत भी है। कुर्सी विरासत है तो यह समरथ भी है। कुर्सी कल है तो यह आज भी है। कुर्सी कर्म है तो नसीब भी है। कुर्सी अहम है तो उपेक्षित भी है। कुर्सी नर्म है तो कुर्सी गर्म भी है। कुर्सी के आगे अच्छे-अच्छे झुके हैं। कुर्सी कमाल है। कुर्सी के कई रूप हैं। कुर्सी पर बैठकर नीचे चटाई पर बैठना भी कुर्सी ही का ही एक रूप है। कुर्सी से उतरकर कुर्सी के लिए काम करना भी कुर्सी ही है। कुर्सी जो है वह कुर्सी ही है। उसके समकक्ष न टेबल है न स्टूल। बनने को अपने मुंह मियां मिट्ठू बना करें। टेबल अपना ओहदा ऊंचा माना करे, स्टूल अपनी जरूरत जताता रहे, मगर हैं सब कुर्सी के इर्दगिर्द ही। कुर्सी लालच है तो कुर्सी निरमोह भी है। कुर्सी तेरे कितने चरित्र हैं, कुर्सी तू क्यों इतने सत्चरित्रा है, तू क्यों इतना वैश्या है। कुर्सी तेरी लीला तू ही जाने। कितने नाचें, कितने आएं, कितने जाएं, कितनों को कितने ही श्रम करने पड़ जाएं, तुझ पर बैठे को नीचे उतारने में। कुर्सी यूं तो अभिमान है, लेकिन अपमान भी है। कुर्सी यूं तो क्रोध है, लेकिन विरोध भी है। कुर्सी पर डटकर जो चिपक जाए, कुर्सी उसे ही आहार बना लेती है। उसे निगल जाती है। कहने को वह कुर्सी में समा जाता है, लेकिन कुर्सी उसमें कभी नहीं समाती। कुर्सी फिर नई तशरीफों की तलाश में रहती है। कुर्सी कर्ज है, तो कुर्सी मर्ज भी है। कुर्सी आफत है तो राहत भी है। कुर्सी के लिए न जाने किस-किसने क्या न किया। कुर्सी ने अपने पर चढ़ाकर किसको न दचका, किसको न गिराया, किसको न उठाया। कुर्सी पर बैठकर न जाने कितने गौरवान्वित हुए, कुर्सी पर बैठकर न जाने कितने अपमानित हुए। कुर्सी ने रंग नहीं बदला। कुर्सी ने चाल नहीं बदली। कुर्सी ने चरित्र नहीं बदला। किसी के लिए यह वैश्या रही तो किसी ने इसे पूजा। अयोध्या में कुर्सी राम की पादुकाएं पाकर गौरवान्वित हुई, तो दिल्ली में भ्रष्टों के पिछवाड़ों से आहत रही। अपानवायु से नाक सिकोड़ती, त्योरियां ताने, नथुनों से आग बरसाती सी। कुर्सी आंगन का एक ओंटा भी है। कुर्सी आंगन की एक टिपटी भी है। कुर्सी राख का ढेर भी है, तो कुर्सी कर्तव्यों की करताल भी है। कुर्सी खुद में कुछ नहीं, लेकिन सबकुछ भी है। कुर्सी तू गजब है। कुर्सी से निकले चार पायों में इतना अभिमान है कि वह नितंबों को जमीन से मिलने नहीं देते। हमेशा रखते हैं दूर, ऊपर, चार पायों पर कुछ इस तरह से जैसे चलता है कोई मुर्दा चार कांधों पर। कुर्सी पर बैठे बख्तरबंद, दस्तरखानों पर भोजन करने वाले शाहों की भी नहीं है कुर्सी। कुर्सी गजब है। कुर्सी गलत फहमी है तो कुर्सी हकीकत भी। कुर्सी जवाब है तो कुर्सी सवाल भी। कुर्सी अदावत है, तो कुर्सी नजाकत भी। कुर्सी हाल तो कुर्सी चाल भी है। कुर्सी यूं न चलेगी अपने इशारों पर कुर्सी यूं न घूमेगी आपके सहारों पर। कुर्सी पर बैठकर इठलाना, पतली डाल पर चढ़कर फल तोड़ने जैसा है। टूटी तो धड़ाम न टूटी तो मीठा फल। पर गारंटी कुछ भी नहीं। स्थाई कुछ भी नहीं। कुर्सी कल्पना है, तो कुर्सी वास्तविकता भी है। कुर्सी कसम है तो कुर्सी वादाखिलाफी भी है। कुर्सी दौड़ है तो कुर्सी ठहराव भी है। कुर्सी कलम है तो कुर्सी कलाम भी है। कुर्सी किसी की नहीं, कुर्सी सबकी है। कुर्सी पर कोई नहीं बैठ पाया, तो कुर्सी पर हर कोई चढ़ा हुआ है।
- सखाजी

क्यों बरगला रहे हो मोदीजी

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on मंगलवार, 14 अप्रैल 2015 | 12:06 am

मोदी दुनियाभर में अप्रवासी भारतीयों को बरगला रहे हैं। वे भी भावनाओं में बहकर भारतीय तिरंगा लहरा रहे हैं। ये संबंधित देश की नजर में देशद्रोह नहीं तो और क्या है। ऐसे में अप्रवासियों को देश निकाला सुना दिया जाए तो कौन जिम्मेदार होगा। यूं भी ये कोई विश्वसनीय नहीं हैं। जब भारत भूखा था तो इसे गरियाते हुए भाग गये थे और आज जब भारत का पेट भर रहा है तो फिर आएंगे। जब खराब हाल होंगे तो फिर भागेंगे। यद्दपि एसे सब नहीं हैं, किंतु अधिकतर हैं। जो नहीं हैं उनसे क्षमा। मोदीजी तो पांच साल के लिए हैं भैया। अप्रवासियों के लिए ये नासूर न बन जाए। हर-हर मोदी घर-घर मोदी।
-सखाजी

चैन दिल का हम कहाँ तलाशते रहे |

Written By Nazeel on गुरुवार, 2 अप्रैल 2015 | 11:13 am

चैन दिल का हम कहाँ  तलाशते रहे |
इस ज़मीं से आसमां तलाशते रहे ||

और चेहरों में नहीं मिली हमें ,
या खुदा ! ताउम्र माँ तलाशते रहे ||

ये कहे हिन्दू ,कहे मुस्लमान वो,
ना मिला हमको ,इंसां तलाशते रहे |

कुछ आया न हाथ तो उदास से हुए ,
ख़ाक से मेरी दास्ताँ तलाशते रहे ||

नींद आई थी कहाँ हिज्र की रात में ,
बस उसे अपने दरम्याँ तलाशते रहे ||

बात  ही तो थी "नज़ील" ये नसीब की ,
उजड़ के हम पासबाँ तलाशते रहे ||

जड़ो से जुड़े रहने के मायने।

Written By Rahul Paliwal on सोमवार, 9 फ़रवरी 2015 | 10:02 am

तुम मिया, गलत करते हो। 
सही सवाल पूछते हो। 
पर गफलत करते हो। 
...............

Royal Tours & Travels

Written By D.P. Mishra on मंगलवार, 20 जनवरी 2015 | 5:19 pm

 

 

An INDO-NEPAL BORDER tourism planner Agency -Royal Tours & Travels

        We, living at Palia (Kheri) , the last railway station and nearest  to DUDHWA ,  know how best can a guest be entertained in Dudhwa National Park with Casino in Nepal and having a glimpse of Tharu Tribal Culture in the Tarai region of Indo-Nepal. 
We have a blend of Wild Safaris & Casino Entertainment in our folder which is nowhere found in India. 
So Enjoy your holidays with Nature in the Tarai Belt of Indo-Nepal , 
Gaming with Casino & educate yourself with 
Tribal Culture of THARUS said to be the 
vanshaj of Shivaji Mahraj.
How to Get There
Air : Lucknow is the most convenient airport. Airlines operate a number of flights to Lucknow from major cities across the country and then you can have a taxi & reach Palia-Dudhwa in 210 minutes from Lucknow.

Rail : The nearest railheads are Dudhwa (4 kms), Palia (10 kms), all NER. However the most convenient way would be to travel to Lucknow or Bareilly and hit the road or take a train to any of the nearer stations from there like Mailani (37 Kms.) and then hit the road.
Road : The State Roadways buses and private bus services link PALIA to Lakhimpur Kheri, Shahjahanpur, Bareilly, Lucknow,Kanpur Agra,Mathura and Delhi. Buses are frequent between Palia and Dudhwa.  To travel by road from Delhi, take the NH24 to Bareilly via Ghaziabad, Moradabad, Rampur . A state highway from there will take you to Dudhwa via Pilibhit, puranpur, Khutar, Mailani, Bhira and Palia.
Distances from Major CitiesLucknow : 182 km, Bareilly: 165 Kms, Shahjahanpur : 18 Kms., 
Delhi : 410 km

Best time to visit Dudhwa National Park

The best time to visit Dudhwa National Park is between November and May. The park remains open to public from November to June, 
though the months of May and June are a little too hot for comfort. While visiting the Park during winter you 
must remember to take woolen clothes as it can get pretty chilly, particularly between
 December to February. Best Time to Visit :October to April7:00 AM to 10:00 AM and 3:00 PM to 6:00 PM.   
VISITING NATIONAL PARKS of UP, India  & Bordering  SANCTUARY &  NATIONAL PARKS of Nepal

have never been so easy and comfortable. The homes of Wild Tigers, Rhinos, Elephants, Deers , Antilopes and many more in 
Lush Green Towering Forests of Saal Trees, Watching thousands of migratory birds in the lakes deep inside the 
jungle gives the utmost pleasure of being with the nature.  A view that gives the utmost satisfaction and 
freshness of pure natural fresh air delights deep inside of a human being.

Wildlife in Dudhwa National Park

The Dudhwa National Park is spread over 490sq km along with a buffer area of over 100 Sq km. Besides massive grassland and swamps, Dudhwa National Park is home to one of the finest Sal (Shorea robusta) forests in India. Some of these trees are more than 
150 years old and over 70 feet tall. In 1976, the park had a population of 50 tigers, 41 elephants and 76 bears apart from
 five species of deer, more than 400 species of birds, crocodiles and some other species of mammals and reptiles.

Dudwa National Park is a stronghold of the barasingha/ swamp deer, which can be spotted in herds of hundreds. India is the only country where this species of deer is found. It is interesting to note that around half of the total Barasinghas on the Earth are present in 
Dudhwa National Park. Smaller than the sambar, the barasinghas have 12 antlers that collectively measure up to 100 cm. 
A full-grown stag can weigh as much as 180 kg and measure 135cm. The coat of the animal is slightly woolly, 
dark brown to pale yellow, adapted perfectly to camouflage in the tall grasses of the area.

During the winter season the swamps of Dudhwa echo with the frequent wallowing of rutting stags. This is also the time for mock fights that entail stiff postures and shrill calls rather than the actual locking of the horns. With the onset of spring the herd gets ready to welcome the newborn fawns. With the passage of winter the Barasinghas shed the woolly coats. During this point of

 time the fights amongst the male Barasinghas are minimal. 
Besides the abovementioned animals, the avian life at dudhwa is a delight for avid bird watcher. The marshland of Dudhwa National Park is home to around 400 species of resident and migratory birds that include the swamp partridge, Bengal florican, great slaty 

Woodpecker, plenty of painted storks, owls, barbets, woodpeckers, sarus cranes, minivets, etc.It is also to be noted that 
much of Dudhwa’s avian fauna is aquatic in nature and found around the lakes. 

Safaris in Dudhwa National Park
You can hire Jeeps and mini buses to move around inside the Dudhwa National Park. Besides the Jeeps and mini buses you can also enjoy Elephant rides through tours. Usually the mahouts / Elephant drivers double up as guides.
 However our tour programmes include the cost of the safaris.

ग़ज़लगंगा.dg: उसने चाहा था ख़ुदा हो जाए

Written By devendra gautam on शनिवार, 13 दिसंबर 2014 | 12:43 pm

उसने चाहा था ख़ुदा हो जाए

सबकी नज़रों से जुदा हो जाए.
उसने चाहा था ख़ुदा हो जाए.

चीख उसके निजाम तक पहुंचे
वर्ना गूंगे की सदा हो जाए.

अपनी पहचान साथ रहती है
वक़्त कितना भी बुरा हो जाए.

थक चुके हैं तमाम चारागर
दर्द से कह दो दवा हो जाए.

उसके साए से दूर रहता हूं
क्या पता मुझसे खता हो जाए.

कुछ भला भी जरूर निकलेगा
जितना होना है बुरा हो जाए.

होश उसको कभी नहीं आता
जिसको दौलत का नशा हो जाए.

घर में बच्चा ही कहा जाएगा
चाहे जितना भी बड़ा हो जाए.

-देवेंद्र गौतम

Read more: http://www.gazalganga.in/2014/12/blog-post.html#ixzz3Ll9YpXwSग़ज़लगंगा.dg: उसने चाहा था ख़ुदा हो जाए

काली कमाई का सबसे सुरक्षित ठिकाना बैंक लॉकर !

Written By Swarajya karun on मंगलवार, 18 नवंबर 2014 | 8:11 am


                                                                                                               -स्वराज्य करुण
      भ्रष्टाचार और काला धन दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं . दोनों एक-दूजे के लिए ही बने हैं और एक-दूजे के फलने-फूलने के लिए ज़मीन तैयार करते रहते हैं . यह कहना भी गलत नहीं होगा कि दोनों एकदम सगे मौसेरे भाई हैं. भ्रष्टाचार से अर्जित करोड़ों-अरबों -खरबों की दौलत को छुपाकर रखने के लिए तरह -तरह की जुगत लगाई जाती है . भ्रष्टाचारियों द्वारा इसके लिए अपने नाते-रिश्तेदारों ,नौकर-चाकरों और यहाँ तक कि कुत्ते-बिल्लियों के नाम से भी बेनामी सम्पत्ति खरीदी जाती है . बेईमानी की कालिख लगी दौलत अगर छलकने लगे तो सफेदपोश चोर-डाकू उसे अपने बिस्तर और यहाँ तक कि टायलेट में भी छुपाकर रख देते हैं . .हालांकि देश के सभी राज्यों में हर साल और हर महीने कालिख लगी कमाई करने वाले सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के घरों पर छापेमारी चलती रहती है ,करोड़ों -अरबों की अनुपातहीन सम्पत्ति होने के खुलासे भी मीडिया में आते रहते हैं .
     आपको यह जानकर शायद हैरानी होगी कि हमारे देश के राष्ट्रीयकृत और निजी क्षेत्र के बैंक भी भ्रष्टाचारियों  की   बेहिसाब दौलत को छुपाने का सबसे सुरक्षित ठिकाना बन गए हैं .जी हाँ !  ये बैंक  जाने-अनजाने इन भ्रष्ट लोगों की मदद कर रहे हैं और उनकी काली कमाई के अघोषित संरक्षक बने हुए हैं  ! वह कैसे ? तो जरा विचार कीजिये ! प्रत्येक बैंक में  ग्राहकों को लॉकर रखने की भी सुविधा मिलती है .हालांकि सभी खातेदार इसका लाभ नहीं लेते ,लेकिन कई इच्छुक खातेदारों को बैंक शाखाएं  निर्धारित शुल्क पर लॉकर आवंटित करती हैं  .उस लॉकर में आप क्या रखने जा रहे हैं , उसकी कोई सूची बैंक वाले नहीं बनाते . उन्हें केवल अपने लॉकर के किराए से ही मतलब रहता है . लॉकर-धारक से उसमे रखे जाने वाले सामानों की जानकारी के लिए कोई फ़ार्म नहीं भरवाया जाता .  .आप सोने-चांदी ,हीरे-जवाहरात से लेकर  बेहिसाब नोटों के बंडल तक उसमे रख सकते हैं . एक मित्र ने मजाक में कहा - अगर आप चाहें तो अपने बैंक लॉकर में दारू की बोतल और अफीम-गांजा -भांग जैसे नशीले पदार्थ भी जमा करवा सकते हैं .
          कहने का मतलब यह  कि बैंक वाले अपनी शाखा में लॉकर की मांग करने वाले किसी भी ग्राहक  को निर्धारित किराए पर लॉकर उपलब्ध करवा कर अपनी ड्यूटी पूरी मान  लेते हैं  .हाल ही में कुछ अखबारों में यह समाचार पढ़ने को मिला कि   एक भ्रष्ट अधिकारी के बैंक लॉकर होने की जानकारी मिलने पर जांच दल ने जब उस बैंक में उसे साथ ले जाकर लॉकर खुलवाया तो उसमे पांच लाख रूपए नगद मिले ,जबकि उसमे विभिन्न देशों के बासठ नोटों के अलावा कई विदेशी सिक्के भी उसी लॉकर से बरामद किये गए ..उसके ही एक अन्य बैंक के लॉकर में करोड़ों रूपयों की जमीन खरीदी से संबंधित रजिस्ट्री के अनेक दस्तावेज भी पाए गए .जरा सोचिये ! इस व्यक्ति ने  पांच लाख रूपये की नगद राशि को अपने बैंक खाते में जमा क्यों नहीं किया ? उसने इतनी बड़ी रकम को लॉकर में क्यों रखा ? फिर उस लॉकर में विदेशी नोटों और विदेशी सिक्कों को रखने के पीछे  उसका इरादा क्या था ? हमारे जैसे लोगों के लिए तो  पांच लाख रूपये भी बहुत बड़ी रकम होती है .इसलिए मैंने इसे 'इतनी बड़ी रकम' कहा .
          बहरहाल हमारे  देश में बैंकों के लॉकरों में पांच लाख तो क्या , पांच-पांच करोड रूपए रखने वाले भ्रष्टाचारी भी होंगे .आम धारणा है कि भारत के काले धन का जितना बड़ा जखीरा विदेशी बैंकों में है ,उससे कहीं ज्यादा काला धन देश में ही छुपा हुआ है और तरह-तरह के काले कारोबार में उसका धडल्ले से इस्तेमाल हो रहा है . ऐसा लगता है कि बैंक लॉकर भी काले-धन को सुरक्षित रखने का एक सहज-सरल माध्यम   बन गए हैं .ऐसे में अगर देश के भीतर छुपाकर रखे गए काले धन को उजागर करना हो तो सबसे पहले तमाम बैंक-लॉकर धारकों के लिए यह कानूनन अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए कि वे अपने लॉकर में रखे गए सामानों की पूरी जानकारी बैंक-प्रबंधन को दें .ताकि उसका रिकार्ड सरकार को भी मिल सके .अगर लॉकर धारक ऐसा नहीं करते हैं तो उनके लॉकर जब्त कर लिए जाएँ . मुझे लगता है कि ऐसा होने पर  अरबों-खरबों रूपयों का काला धन अपने आप बाहर आने लगेगा और उसका उपयोग देश-हित में किया जा सकेगा .(स्वराज्य करुण )

शरीर, आत्मा, मैं और तुम

Written By Anurag Anant on मंगलवार, 11 नवंबर 2014 | 11:39 am

जब जब तुम्हारी आत्मा तक जाना चाहा है
तुम्हारा शरीर मिला है
एक रूकावट की तरह
एक रास्ते की तरह
उससे उलझा हूँ जब जब
उलझ ही गया हूँ बस 
उस पर चला हूँ जब जब 
चलता ही गया हूँ बस

शरीर, आत्मा, मैं और तुम
एक दूसरे की ओर चलते रहे
और बढ़ते रहे फासले
हर कदम के साथ
कितना अजब सफ़र है
कितने अजब मुसाफिर
और कितनी अजब राह है न ये
--अनुराग अनंत

सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों की असलियत !

Written By Swarajya karun on रविवार, 9 नवंबर 2014 | 1:27 pm

निजी क्षेत्र में सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों के नाम पर लूट-मार जारी है. हालांकि अपवाद स्वरुप कुछ अच्छे अस्पताल और अच्छे डॉक्टर भी होते हैं , जिनमे  परोपकार और समाज  सेवा  की भावना जीवित है ,लेकिन अधिकाँश अस्पतालों की व्यवस्था देखकर लगता है कि मानवता खत्म हो गई है .अपने एक मित्र के बीमार पिताजी को देखने एक ऐसे ही स्वनाम धन्य अस्पताल गया तो मित्र ने बताया --- इस अस्पताल के डॉक्टरों की आपसी बातचीत अगर सुन लें तो आपको डॉक्टर और हैवान में कोई अन्तर नज़र नहीं आएगा .ये डॉक्टर अपने लंच टाईम में आपसी चर्चा में मरीजों को क्रिकेट का 'विकेट' कहते हैं. .एक डॉक्टर दूसरे से कहता है -आज चार विकेट आए थे ,एक विकेट गिरा है .

 दरअसल  सुपर स्पेशलिटी में स्पेशल बात ये होती है कि वहाँ किसी गंभीर मरीज को ले जाने के बाद सबसे पहले बिलिंग काऊंटर में बीस-पच्चीस या पचास हजार रूपए जमा करवा लिए जाते हैं . उसके बाद शुरू होता है असली लूट -खसोट का सिलसिला . मरीज को आई.सी. यू .में भर्ती करने के बाद तरह-तरह के मेडिकल टेस्ट करवाने और हर दो -चार घंटे बाद नई -नई दवाइयों की लिस्ट उसके परिजन को थमा दी जाती है .उसी अस्पताल के परिसर में अस्पताल मालिक का मेडिकल स्टोर भी होता है .यह मरीज के घर के लोगों के लिए सुविधा की दृष्टि से तो ठीक है ,लेकिन वहाँ दवाईयां मनमाने दाम पर खरीदना उनकी मजबूरी हो जाती है.मरीज को छोड़कर ज्यादा दूर किसी मेडिकल स्टोर तक जाने -आने का जोखिम उठाना ठीक भी नहीं लगता . खैर किसी तरह अगर दवाई खरीद कर डॉक्टर को दे दी जाए तो उसके बाद यह पता भी नहीं चलता कि उन सभी दवाइयों का इस्तेमाल मरीज के लिए किया गया है या नहीं ?गौर तलब है कि आई.सी. यू. में मरीज के साथ हर वक्त उसके परिजन को मौजूद रहने की अनुमति नहीं होती .उसे बाहर ही बैठकर इन्तजार करना होता है .वह बड़ी व्याकुलता से समय बिताता है. उसे केवल आई.सी.यू. में दाखिल अपने प्रियजन के स्वास्थ्य की चिन्ता रहती है,लिहाजा डॉक्टर से कई प्रकार के मेडिकल टेस्ट का और मरीज के लिए खरीदी गयी दवाइयों के उपयोग का हिसाब मांगने की बात उसके मन में आती ही नहीं. इसका ही बेजा फायदा उठाते हैं कथित सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों के मालिक और डॉक्टर .वैसे इस प्रकार के ज्यादातर अस्पतालों के मालिक स्वयं डॉक्टर होते हैं .सरकार तो जन-कल्याण अच्छे  इरादे के साथ गरीब परिवारों को स्मार्ट -कार्ड देकर उन्हें सालाना एक निश्चित राशि तक निशुल्क इलाज की सुविधा देती है यह सुविधा पंजीकृत अस्पतालों में दी जाती है ,लेकिन वहाँ डॉक्टर कई स्मार्ट कार्ड धारक परिवार के किसी एक सदस्य के एक बार के इलाज में ही अनाप-शनाप खर्च बताकर स्मार्ट कार्ड की पूरी राशि निकलवा लेते हैं.
     दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी अस्पताल हैं ,जहां गंभीर से गंभीर बीमारियों का मुफ्त इलाज होता है.जैसे - नया रायपुर और पुट्टपर्थी  स्थित श्री सत्य साईसंजीवनी अस्पताल ,जहां जन्मजात ह्रदय रोगियों का पूरा इलाज और ऑपरेशन मुफ्त किया जाता है .यह एक ऐसा अस्पताल है ,जहाँ कोई बिलिंग काऊंटर नहीं है. मरीजों के और उनके सहायकों के लिए भोजन और आवास की व्यवस्था भी निशुल्क है .-स्वराज्य करुण

(पुस्तक चर्चा ) भारतीय अवनद्ध वाद्यों पर एक जरूरी किताब

Written By Swarajya karun on शनिवार, 8 नवंबर 2014 | 6:07 pm

   संगीत की अपनी भाषा होती है ,जो दुनिया के हर इंसान के दिल को छू जाती है और चाहे कोई देश-प्रदेश हो या विदेश,  कहीं का भी संगीत , कहीं के भी इंसान को सहज ही अपनी ओर आसानी से खींच लेता है.  भारतीय संगीत और वाद्य यंत्रों की भी अपनी कई विशेषताएं हैं .उनकी उत्पत्ति का अपना इतिहास है .   अवनद्ध वाद्य भी इनमे अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं . संगीत में अवनद्ध वाद्यों की जरूरत भोजन का जायका बढ़ाने वाली  मसालेदार सब्जियों और स्वादिष्ट चटनियों की तरह है . 
      भारतीय अवनद्ध वाद्यों पर  डॉ.जवाहरलाल नायक का शोध-ग्रन्थ लगभग तीस साल बाद पुस्तक के रूप में सामने आया है .लेखक के अनुसार  चमड़े से ढंके वाद्य-यंत्रों के बारे में शायद अपने किस्म की यह पहली शोध पुस्तक है .. डॉ जवाहर नायक छत्तीसगढ़ में महानदी के किनारे ग्राम लोधिया (जिला -रायगढ़ ) के निवासी हैं. मध्यप्रदेश के जमाने में उस जिले के सरिया क्षेत्र से विधायक भी रह चुके हैं .उनकी पहचान एक कुशल तबला वादक के रूप में भी है .उन्होंने छत्तीसगढ़ के इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ से तबले में एम .ए. की उपाधि प्राप्त की है.और इसी विश्वविद्यालय से भारतीय अवनद्ध वाद्यों पर पी.एच-डी की है. 
      डॉ. नायक के अनुसार चर्म-आच्छादित वाद्यों जैसे तबला , पखावज ,मृदंग खंजरी , डफ ,ढोलक, ,आदि के लिए 'अवनद्ध ' संज्ञा दी गयी है. उन्होंने इस बारे में पुस्तक में अवनद्ध वाद्य  यंत्रों  के बारे में कई विद्वानों की परिभाषाएं भी संकलित की हैं .स्वर्गीय डॉ. लालमणि मिश्र के अनुसार -वे वाद्य जो भीतर से पोले तथा चमड़े से मढ़े हुए होते हैं और हाथ या किसी अन्य वस्तु के ताड़न से ध्वनि या शब्द उत्पन्न करते हैं ,उन्हें 'अवनद्ध ' या ' वितत ' भी कहा गया है. डॉ. जवाहर नायक ने 407 पृष्ठों की अपनी इस पुस्तक मे भारतीय अवनद्ध वाद्यों का वर्गीकरण करते हुए प्राचीन काल के अवनद्ध वाद्यों , मध्यकालीन अवनद्ध वाद्यों और आधुनिक अवनद्ध वाद्यों का दिलचस्प विश्लेषण किया है. सर्वाधिक प्रचलित अवनद्ध वाद्य 'तबला ' पर भी उन्होंने प्रकाश डाला है.प्रत्येक अवनद्ध वाद्यकी उत्पत्ति, बनावट, निर्माण विधि की जानकारी भी इसमें दी गयी है. 
        शोध-ग्रन्थ नौ अध्यायों में है. विषय प्रवेश के साथ पहले अध्याय में अवनद्ध वाद्य : शब्द व्युत्पत्ति , परिभाषा , अवनद्ध वाद्यों की निर्माण सामग्री , अवनद्ध वाद्यों का महत्व और उत्पत्ति का संक्षिप्त विवेचन है . दूसरे अध्याय में अवनद्ध वाद्यों का वर्गीकरण किया गया है. तीसरे अध्याय में भारत के प्राचीन अवनद्ध  वाद्य यंत्रों का उल्लेख है .इसमें भूमि- दुन्दुभि ,  दुन्दुभि , केतुमत और मृदंग जैसे वाद्य यंत्रों पर प्रकाश डाला गया है. चौथे अध्याय में संजा , धोंसा , तम्बकी , ढक्का, हुडुक जैसे  मध्यकालीन अवनद्ध वाद्यों पर, पांचवें अध्याय में खंजरी , दफ़ , दुक्कड , दमामा , ढोल  जैसे आधुनिक अवनद्ध वाद्यों पर और छठवें अध्याय में सर्वाधिक प्रचलित अवनद्ध वाद्य 'तबला' पर शोधकर्ता लेखक ने ज्ञानवर्धक जानकारी दी है. सातवें अध्याय में प्रमुख भारतीय अवनद्ध वाद्यों के अनेक प्रसिद्ध वादकों का परिचय दिया गया है .लेखक ने आठवें अध्याय में पाश्चात्य अवनद्ध वाद्यों का विश्लेषण किया है .इसमें लेखक डॉ.नायक की  ये पंक्तियाँ संगीत कला को लेकर उनके व्यापक और प्रगतिशील नज़रिए को प्रकट करती हैं - पाश्चात्य और हिन्दुस्तानी ,इन दो संगीत पद्धतियों के नाम से सभी संगीत रसिक परिचित हैं .दोनों ही संगीत पद्धतियाँ अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं .आज वैज्ञानिक विकास के युग में जब सम्पूर्ण विश्व की दूरी नगण्य -सी हो गई है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र की सांस्कृतिक उपलब्धियों का पूर्ण सहिष्णुता के आधार पर समाकलन प्रस्तुत करें ,जिससे विस्तृत वसुन्धरा के प्रत्येक कला में स्वाभाविक सामंजस्य स्थापित हो सके .समय की आवाज को यदि आज के परिवेश में सही रूप से पहचाना जाए तो प्रत्येक विचारधारा का निष्कर्ष राष्ट्रीयता से ऊपर उठकर विश्व-बन्धुता की प्रेरणा प्रदान करता हुआ मिलेगा .
           शोधार्थी डॉ. नायक के अनुसार भारतीय अवनद्ध वाद्यों के स्वतंत्र अध्ययन की दृष्टि से संभवतः यह पहला प्रयास है. उन्होंने छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ और इंदिरा संगीत एवं कला विश्वविद्यालय के पूर्व उप-कुलपति स्वर्गीय डॉ. अरुण कुमार सेन के मार्ग दर्शन में यह शोध-कार्य पूर्ण किया था . लगभग तीस साल के लंबे अंतराल के बाद वर्ष .2012 में डॉ. नायक की मेहनत पुस्तक के रूप में सामने आयी .उन्हें बहुत-बहुत बधाई. (स्वराज्य करुण )

क्या सपना ही रह जाएगा अपने मकान का सपना ?

Written By Swarajya karun on मंगलवार, 4 नवंबर 2014 | 2:05 pm

           आधुनिक भारतीय समाज में यह आम धारणा है कि इंसान को अपनी कमाई बैंकों में जमा करने के बजाय ज़मीन में निवेश  करना चाहिए . कई लोग ज़मीन खरीदने में पूँजी लगाने को बैंकों में  'फिक्स्ड  डिपौजिट' करने जैसा मानते हैं . यह भी आम धारणा है कि सोना खरीदने से ज्यादा फायदा ज़मीन खरीदी में है . समाज में प्रचलित इन धारणाओं में काफी सच्चाई है, जो साफ़ नज़र आती है .  अपने शहर में किसी ने आज से पचीस साल पहले अगर दो हजार वर्ग फीट जमीन कहीं बीस रूपए प्रति वर्ग फीट के भाव से चालीस हजार रूपए में खरीदी थी तो आज उसकी कीमत चालीस लाख रूपए हो गयी है . पीछे  मुड़कर बहुत दूर तक देखने की जरूरत नहीं है .याद कीजिये तो पाएंगे कि  छोटे और मंझोले शहरों में आज से सिर्फ दस  साल पहले एक हजार  वर्ग फीट वाले जिस मकान की कीमत छह -सात लाख रूपए थी आज वह बढकर पैंतीस-चालीस लाख रूपए की हो गयी है . कई कॉलोनियां ऐसी बन रही हैं ,जहां एक करोड ,दो करोड और पांच-पांच करोड के भी मकान बिक रहे हैं .उन्हें खरीदने वाले कौन लोग हैं और उनकी आमदनी का क्या जरिया है , इसका अगर ईमानदारी से पता लगाया जाए तो काले धन के धंधे वालों के कई चौंकाने वाले रहस्य उजागर होंगे .प्रापर्टी का रेट शायद ऐसे ही लोगों के कारण तेजी से आसमान छूने लगा है . प्रापर्टी डीलिंग का काम करने वाले कुछ बिचौलियों की भी इसमें काफी संदेहास्पद भूमिका हो सकती है .  कॉलोनियां बनाने वालों के लिए यह कानूनी रूप से अनिवार्य है कि वे उनमे दस-पन्दरह प्रतिशत मकान आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए भी बनवाएं ,लेकिन अधिकाँश निजी बिल्डर इस क़ानून का पालन नहीं करते और उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता .जमीन और मकानों की  कीमतें  इस तरह बेतहाशा बढने के पीछे क्या गणित है ,यह कम से कम मुझ जैसे सामान्य इंसान की समझ से बाहर है ,लेकिन इस रहस्यमय मूल्य वृद्धि की वजह से  गरीबों और सामान्य आर्थिक स्थिति वालों पर जो संकट मंडराने लगा है , वह देश और समाज दोनों के भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है. जब किसी ज़रूरतमंद व्यक्ति या उसके परिवार को रहने के लिए एक अदद मकान नहीं मिलेगा तो उसके दिल में सामाजिक व्यवस्था के प्रति स्वाभाविक रूप से आक्रोश पैदा होगा .अगर यह आक्रोश सामूहिक रूप से प्रकट होने लगे तो फिर क्या होगा ? सोच कर ही  डर लगता है .

        यह एक ऐसी समस्या है जिस पर सरकार और समाज दोनों को मिलकर विचार करना और कोई रास्ता निकालना चाहिए . रोटी और कपडे का जुगाड तो इंसान किसी तरह कर लेता है ,लेकिन अपने परिवार के लिए मकान खरीदने या बनवाने में उसे पसीना आ जाता है.  खुद का मकान होना सौभाग्य की बात होती है ,लेकिन यह सौभाग्य हर किसी का नहीं होता . खास तौर पर शहरों में यह एक गंभीर समस्या बनती जा रही है . जैसे-जैसे रोजी-रोटी के लिए , सरकारी और प्राइवेट नौकरियों के लिए ग्रामीण आबादी का शहरों की ओर पलायन हो रहा है , यह समस्या और भी विकराल रूप धारण कर रही है .जहां आज से कुछ साल पहले शहरों में आवासीय भूमि की कीमत पच्चीस-तीस या पचास  रूपए प्रति वर्ग फीट के आस-पास हुआ करती थी ,आज वहाँ  उसका  मूल्य सैकड़ों और हजारों रूपए वर्ग फीट हो गया है . ऐसे में कोई निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार स्वयं के घर का सपना कैसे साकार कर पाएगा ?
        सरकारी हाऊसिंग  एजेंसियां शहरों में लोगों को सस्ते मकान देने का दावा करती हैं ,लेकिन उनकी कीमतें भी इतनी ज्यादा होती हैं कि  उनका मकान  खरीद पाना हर किसी के लिए संभव नहीं हो पाता .इधर निजी क्षेत्र के बिल्डरों की भी  मौज ही मौज है . अगर किसी मकान की प्रति वर्ग फीट निर्माण लागत अधिकतम एक हजार  रूपए प्रति वर्ग फीट हो तो सीधी-सी बात है कि  पांच सौ वर्ग फीट का मकान पांच  लाख रूपए में बन सकता है .लेकिन बिल्डर लोग इसे पन्द्रह -बीस लाख रूपए में बेचते हैं ,यानी निर्माण लागत का तिगुना -चौगुना दाम वसूल करते हैं . ज़ाहिर है कि गरीब या कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवार के लिए खुद के मकान का सपना आसानी से साकार नहीं हो सकता . ऐसे में सरकार को अलग-अलग आकार के मकानों की  प्रति वर्ग फीट  एक निश्चित निर्माण लागत तय कर देनी  चाहिए ,जो  सरकारी तथा निजी दोनों तरह के बिल्डरों के लिए अनिवार्य हो . शहरों में आवासीय ज़मीन की बेलगाम बढती कीमतों पर भी अंकुश लगाने की जरूरत है . अगर ऐसा नहीं हुआ तो देश के शहरों में अधिकाँश लोगों के लिए अपने मकान  का सपना सिर्फ सपना बनकर रह जाएगा .(स्वराज्य करुण )

Founder

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Saleem Khan