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यू पी में अधिवक्ता खतरे में

Written By Shalini kaushik on बुधवार, 30 अगस्त 2023 | 3:42 pm

 

हापुड़ में प्रियंका त्यागी एडवोकेट के साथ पुलिस प्रशासन द्वारा बदसलूकी और उसके बाद हापुड़ बार एसोसिएशन के अधिवक्ताओं के शांति पूर्ण धरने पर सी ओ हापुड़ द्वारा बर्बरता पूर्वक लाठी चार्ज करना, साथ ही, महिला अधिवक्ताओं को भी लाठी चार्ज के घेरे में लेना जिसमें दो दर्जन से अधिक अधिवक्ताओं का गम्भीर रूप से घायल होना, इसे लेकर पूरे यू पी के अधिवक्ताओं की कलमबंद हड़ताल और ठीक हड़ताल के दिन हापुड़ से सटे हुए गाजियाबाद में 35 वर्षीय अधिवक्ता मोनू चौधरी की गोली मारकर हत्या उत्तर प्रदेश में अधिवक्ताओं की असुरक्षित स्थिति दिखाने के लिए पर्याप्त है और अधिवक्ता सुरक्षा कानून की जरूरत की पुरजोर वक़ालत कर रही है. 

       वकीलों की सुरक्षा के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया प्रतिबद्ध है और इसीलिए अधिवक्ता सुरक्षा कानून के ड्राफ़्ट को बीसीआई ने मंजूरी दे दी थी . बीसीआई ने इस ऐक्ट का प्रारूप तैयार कर सभी राज्यों की बार काउंसिल को भेजा था और उनसे सुझाव और संशोधन के लिए राय मांगी थी और फिर बिना किसी संशोधन के ही ऐक्ट के मसौदे को मंजूरी दे दी गयी. एडवोकेट प्रोटेक्शन बिल की रूपरेखा और ड्राफ़्ट बार काउंसिल ऑफ इंडिया की सात सदस्यीय कमेटी ने तैयार किया और इसकी 16 धाराओं में वकील तथा उसके परिवार के सदस्यों को किसी प्रकार की क्षति और चोट पहुंचाने की धमकी देना, किसी भी सूचना को जबरन उजागर करने का दबाव देना, पुलिस अथवा किसी अन्य पदाधिकारी से दबाव दिलवाना, वकीलों को किसी केस में पैरवी करने से रोकना, वकील की संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, किसी वकील के खिलाफ अपमानजनक शब्द का इस्तेमाल करना जैसे कार्यों को अपराध की श्रेणी में रखा गया और ये सभी अपराध गैर जमानती अपराध रखने का प्रावधान किया गया. ऐसे अपराध के लिए 6 माह से 5 वर्ष की सजा के साथ साथ दस लाख रुपये जुर्माना लगाने का भी प्रावधान रखा गया जिसके लिए पुलिस को 30 दिनों के भीतर अनुसंधान पूरा किया जाना जरूरी किया गया , जिसकी सुनवाई जिला एवं सत्र न्यायाधीश /अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश करेंगे. वकील को सुरक्षा के लिए हाई कोर्ट में आवेदन देने का प्रावधान और हाई कोर्ट वकील के आचरण सहित अन्य तथ्यों की जांच कर जरूरत पड़ने पर स्टेट बार काउंसिल तथा बीसीआई से जानकारी लेकर सुरक्षा देने के बारे में आदेश जारी करने का प्रावधान रखा गया लेकिन किसी केस में अभियुक्त वकील पर यह कानून लागू नहीं होगा यह भी निश्चित किया गय. 

    आज  तक भी एडवोकेट प्रोटेक्शन ऐक्ट लागू नहीं किये जाने का खामियाजा उत्तर प्रदेश के अधिवक्ताओं को लगातार भुगतना पड़ रहा है और ऐक्ट के न होने के नकारात्मक असर वकीलों को नजर आते जा रहे हैं. लगातार ऐक्ट लागू किए जाने की मांग उत्तर प्रदेश में तहसील बार एसोसिएशन से लेकर बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश द्वारा की जा रही है, किंतु उत्तर प्रदेश सरकार के कानों पर जूँ तक नहीं रेंग रही है. अब लगातार हो रही अधिवक्ताओं की हत्या को देखते हुए यही सवाल उठ रहा है कि क्या वेस्ट यू पी में हाई कोर्ट खंडपीठ की तरह ही अधिवक्ताओं की सुरक्षा को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है?  

    उत्तर प्रदेश के समस्त अधिवक्ताओं की ओर से विनम्र निवेदन है कि उत्तर प्रदेश सरकार तुरंत एडवोकेट प्रोटेक्शन ऐक्ट के लागू किए जाने के लिए कदम उठाए.   

शालिनी कौशिक 
एडवोकेट
कैराना (शामली) 

पाकिस्तान लौटेगी सीमा हैदर

Written By Shalini kaushik on रविवार, 27 अगस्त 2023 | 8:06 pm

 



     सीमा हैदर (पाकिस्तान की नागरिक) आजकल भारत में चर्चाओं में टॉप टेन में शामिल हैं और यही नहीं इस चर्चित चेहरे का फायदा उठाकर स्वयं को टॉप रैंकिंग में लाने के लिए भारतीय मीडिया भी काफी हाथ-पैर मार रहा है. पाकिस्तान के मुस्लिम समुदाय की सीमा हैदर अपने चार बच्चों के साथ तीन देशों - पाकिस्तान, नेपाल और भारत के बार्डर को अवैध रूप से पार कर भारत के राज्य उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के रघुपुरा में अवैध रूप से रह रही है और अब वह भारत के नागरिक सचिन की पत्नी के तौर पर भारत की नागरिकता हासिल करने के लिए आगे बढ़ गई है और यही भारतीय नागरिकता हासिल करने के लिए बढ़ाया गया सीमा हैदर का कदम उसकी भारत में अवैध उपस्थिति का भंडाफोड़ कर गया है. 
भारत में नागरिकता अधिनियम-1955 द्वारा भारतीय नागरिकता प्राप्ति के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं जो इस प्रकार हैं - 

 पंजीकरण द्वारा नागरिकता 
केन्द्रीय सरकार, आवेदन किये जाने पर, नागरिकता अधिनियम 1955 की धारा 5 के तहत किसी व्यक्ति (एक गैर क़ानूनी अप्रवासी न होने पर) को भारत के नागरिक के रूप में पंजीकृत कर सकती है यदि वह निम्न में से किसी एक श्रेणी के अंतर्गत आता है:--

भारतीय मूल का एक व्यक्ति जो पंजीकरण के लिए आवेदन करने से पहले सात साल के लिए भारत का निवासी हो;
भारतीय मूल का एक व्यक्ति जो अविभाजित भारत के बाहर किसी भी देश या स्थान में साधारण निवासी हो;
एक व्यक्ति जिसने भारत के एक नागरिक से विवाह किया है और पंजीकरण के लिए आवेदन करने से पहले सात साल के लिए भारत का साधारण निवासी है;
उन व्यक्तियों के अवयस्क बच्चे जो भारत के नागरिक हैं;
पूर्ण आयु और क्षमता से युक्त एक व्यक्ति जिसके माता पिता सात साल से भारत में रहने के कारण भारत के नागरिक के रूप में पंजीकृत हैं।
पूर्ण आयु और क्षमता से युक्त एक व्यक्ति, या उसका कोई एक अभिभावक, पहले स्वतंत्र भारत का नागरिक था और पंजीकरण के लिए आवेदन देने से पहले एक साल से वह भारत में रह रहा है।
पूर्ण आयु और क्षमता से युक्त एक व्यक्ति जो सात सालों के लिए भारत के एक विदेशी नागरिक के रूप में पंजीकृत है और पंजीकरण के लिए आवेदन देने से पहले वह एक साल से भारत में रह रहा है।.          
        जिसके अनुसार, सीमा हैदर का गैर कानूनी अप्रवासी होना उसकी भारतीय नागरिकता प्राप्ति की सर्वप्रथम बाधा है, उसके पश्चात यदि वह यह कहती है कि वह भारत के नागरिक की पत्नी है तब भी वह भारत की नागरिकता प्राप्त नहीं कर सकती है क्योंकि ऐसे में पंजीकरण के लिए आवेदन करने से पूर्व उसे सात साल के लिए भारत का साधारण निवासी होना चाहिए था और वह अभी दो माह से ही भारत में रह रही हैं इसलिए इस नियम के अंतर्गत भी उसे भारतीय नागरिकता प्राप्त नहीं हो सकती है. 
        सीमा हैदर का भारत में तीन तीन बॉर्डर लाँघकर आना, चार बच्चों को लेकर आना, पांचवी पास होना, मीडिया के प्रश्नों का बेहिचक ज़वाब देना, हिन्दू धर्म की मान्यताओं का बहुत बढ़चढ़कर दिखावा करना, इसरो के चंद्रमा पर पहुंचने को लेकर व्रत रखना, जय श्री राम के नारे लगाना आदि बहुत कुछ है जो उसे संदिग्धों की श्रेणी में रखता है और उसकी भारत में मौजूदगी को लेकर भारतीय जनमानस में रोष भरता है. ऐसे में भारतीय कानून के अनुसार और भारत में उसकी संदिग्ध उपस्थिति को देखते हुए उसे अभिरक्षा में लेकर उसके चारों बच्चों के साथ उसे वापस पाकिस्तानी सरकार के हवाले कर दिया जाना चाहिए.

शालिनी कौशिक
         एडवोकेट 
कैराना (शामली)

संघर्षों पर सफ़लता पाने वाले आदर्श चरित्र श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट

Written By Shalini kaushik on शुक्रवार, 25 अगस्त 2023 | 3:11 pm


  

   माननीय श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी संघर्षों का दूसरा नाम हैं. शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी जब कक्षा 6 में थे तब शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी ने मजदूरी की, कक्षा 7 में घर पर क्राकरी का काम किया, हॉकरी भी की और तब उन्हें इस कार्य के लिए 140/-रुपये मिलते थे. शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी ने 1977-78 में इन्टर किया और उसके बाद ट्यूशन करने शुरू किए. 1990 में शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी ने वक़ालत पास की, 2000 मे पहली बार क्षेत्र पंचायत का चुनाव लड़ा और ब्लॉक अध्यक्ष चुने गए. 2005 मे जिला पंचायत सदस्य चुने गए. 2006-07 में समाजवादी पार्टी के विधान सभा अध्यक्ष रहे. 2008 में खुर्जा बार एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी रहे. 2009-10 में समाजवादी पार्टी की अधिवक्ता सभा के जिला सचिव रहे. 2012 से 2017 तक समाजवादी पार्टी के विधान सभा के जिला अध्यक्ष रहे. 2018 में बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के सदस्य चुने गए और 1 साल 2020-21 में सचिव और तीसरी बार सह अध्यक्ष चुने गए.


    इतने कड़े संघर्षों के साथ माननीय श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी अपने जीवन के सिद्धांतो पर अडिग खड़े रहे और 20 अगस्त 2023 को यह गौड़ सर की श्रेष्ठता ही कही जाएगी कि बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश में पश्चिमी यू पी का प्रतिनिधित्व 25 सदस्यों मे मात्र 3 अधिवक्ताओं का होने पर भी उन्हें प्रथम बार की सदस्यता मे ही बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के चेयरमैन पद के लिए सदस्यों द्वारा चयनित किया गया है. यह पश्चिमी यू पी के लिए बहुत गौरव का क्षण है कि अधिवक्ताओं की सबसे बड़ी संस्था बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश में खुर्जा के अधिवक्ता श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट चेयरमैन पद पर नियुक्त हुए हैं.


     संघर्षों से भरे हुए माननीय श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी के जीवन के बारे में जब मैंने सर से गहराई से जानना चाहा तो अपने जीवन के संघर्षों के बारे में बताते बताते श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी काफी भावुक हो गए और कहने लगे कि आपको तो हमने उपरी उपरी बातेँ ही बताई हैं अगर पूरी गहराई से हम बताएं तो आप रो देंगी. सर कहने लगे कि हमने बहुत संघर्ष देखे हैं और इसीलिये हमें किसी का भी दर्द अपना ही लगता है और इसीलिए हम हर किसी की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं और आज अगर मैं कुछ हूं तो यह परम पिता परमात्मा की ही कृपा है. 


   और यह सच्चाई है क्योंकि मैंने जब सर का नम्बर ढूंढ़कर उनसे अपने COP नम्बर के लिए सहायता मांगी थी तो सर ने मुझसे मेरा फॉर्म भेजने के लिए कहा और जिस किसी का भी फॉर्म मैंने सर को दिया है सर ने उसका काम कराया है और यही नहीं सर ने कभी भी फॉर्म में निश्चित रकम से ऊपर एक भी पैसा नहीं लिया है क्योंकि जब मैं सर को अपना फॉर्म देने मुजफ्फरनगर गई तो वहां सर के बेटे उत्कर्ष गौड़ एडवोकेट मिले और मेरा ड्राफ़्ट तैयार नहीं था तो मैं उन्हें 500 /- रुपये के ड्राफ़्ट के लिए ऊपर से पैसे देने लगी तो उन्होंने एकदम कहा कि पापा गुस्सा होंगे. 31 जनवरी 2020 को मैंने सर को पहले फॉर्म के रूप में अपना फॉर्म दिया था COP नम्बर के लिए और आज अगस्त 2023 में स्थिति यह है कि सर शामली जिले के 170 अधिवक्ताओं को COP नम्बर और 60 अधिवक्ताओं के रजिस्ट्रेशन नंबर बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश से जारी करा चुके हैं. जबसे गौड़ सर ने शामली जिले के अधिवक्ताओं के सहयोग की जिम्मेदारी अपने कँधों पर उठाई है, शामली जिले के अधिवक्ताओं का ना तो बार काउंसिल में रजिस्ट्रेशन की कोई परेशानी रह गई है और न ही COP नम्बर प्राप्त करने में कोई परेशानी रह गई है.


  और यह गौड़ सर की अधिवक्ताओं की समस्या निदान करने की भावना ही कही जाएगी कि सर ने बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के चेयरमैन पद को सम्भालते ही 2018 में सबसे पहले COP नम्बर प्राप्त अधिवक्ताओं के COP नम्बर रि-इश्यू की फीस 500 रुपये से घटाकर 250 रुपये कर दी है जिसमें सर्वप्रथम बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश को बहुत बड़े आर्थिक नुकसान की समस्या सामने आई किन्तु सर अपने निर्णय से नहीं डगमगाये और उन्होंने अधिवक्ताओं का हित हो ऊपर रखा. सर का कहना था कि - "जिसने मेरे लिए एक बार भी कोई कार्य कर दिया है उसका एहसान मैं जिंदगी भर याद रखता हूं और उसके साथ खड़ा रहता हूं." 


  ऐसे हैं हम सभी के आदरणीय श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट जी और उनके जीवन के संघर्षों और उसके बाद सफ़लता के चरमोत्कर्ष पर पहुंचने को हम इन पंक्तियों के माध्यम से समझ सकते हैं - 

" कुछ किए बिना ही जय - जयकार नहीं होती 

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती." 

शालिनी कौशिक एडवोकेट

विशेष प्रतिनिधि, शामली

माननीय श्री शिव किशोर गौड़ एडवोकेट, 

चेयरमैन, बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश

योगी आदित्यनाथ जी कैराना में स्थापित करें जनपद न्यायालय शामली

Written By Shalini kaushik on शुक्रवार, 11 अगस्त 2023 | 12:04 pm

  


       2011 में 28 सितंबर को शामली जिले का सृजन किया गया. तब उसमें केवल शामली और कैराना तहसील शामिल थी. इससे पहले शामली और कैराना तहसील मुजफ्फरनगर जनपद के अंतर्गत आती थी. कुछ समय बाद शामली जिले में ऊन तहसील बनने के बाद अब शामली जिले के अंतर्गत तीन तहसील कार्यरत हैं. 2018 के अगस्त तक शामली जिले का कानूनी कार्य मुजफ्फरनगर जिले के अंतर्गत ही कार्यान्वित रहा किन्तु अगस्त 2018 में शामली जिले की कोर्ट शामली जिले में जगह का चयन न हो पाने के कारण कैराना में आ गई और इसे नाम दिया गया -" जिला एवं सत्र न्यायालय शामली स्थित कैराना. "

        2018 से अब तक मतलब अगस्त 2023 तक शामली जिले के मुख्यालय से लगभग 12 किलोमीटर दूर जिला जज की कोर्ट के लिए जगह का चयन हो जाने के बाद शासन द्वारा 51 एकड़ भूमि जिला न्यायालय कार्यालय और आवासीय भवनों के लिए आवंटित की गयी थी, जिसमें चाहरदीवारी के निर्माण के लिए 4 करोड़ की धन राशि अवमुक्त की गई थी जिससे अब तक केवल बाउंड्रीवाल का ही निर्माण हो पाया है. उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा जिला न्यायालय कार्यालय और आवासीय भवनों के निर्माण के लिए 295 करोड़ रुपये का एस्टीमेट बनाकर शासन को भेजा गया था किंतु शासन द्वारा वर्तमान तक भी कोई धनराशि अवमुक्त नहीं की गई. 

    अब तक हमने बात की केवल उन महत्वाकांक्षाओं की जिनके मद्देनजर बगैर किसी व्यवस्थित योजना के शामली जिले का निर्माण पहले प्रबुद्ध नगर के नाम से और बाद में जनता के दबाव में शामली जिले के ही नाम से कर दिया गया. अब यदि वास्तविकता की बात करें तो शामली जिले में केवल तहसील स्तर का ही कार्य सम्पन्न हो रहा है. जिसे देखते हुए कहा जा सकता है कि वहां कानूनी विभाग लगभग शून्यता की स्थिति में है और वहां जिला जज की कोर्ट की स्थापना के साथ साथ मुंसिफ कोर्ट से लेकर जिला जज की कोर्ट की स्थापना करने के लिए बहुत बड़े स्तर का कार्य सम्पन्न करना होगा, जबकि शामली जिले की तहसील कैराना में जिला जज की कोर्ट से एक नंबर कम की कही जाने वाली कोर्ट ए डी जे कोर्ट की स्थापना ही 2011 में हो चुकी है और कैराना तहसील में स्थापित न्यायालय परिसर शामली जिले के मुख्यालय से मात्र 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और फिर ज़िला न्यायालय शामली के कार्यालय और आवासीय भवनों का निर्माण अब भी तो शामली मुख्यालय पर नहीं किया जाना है अब भी तो वह शामली के गाँव बनत में किया जाना है और वह भी केवल शामली के अधिवक्ताओं और जनता की इस जिद पर कि शामली जिले का ही सर ऊंचा रहना चाहिए, जबकि कैराना भी तो शामली जिले की ही तहसील है और अगर उत्तर प्रदेश सरकार  कैराना के न्यायालय तक के क्षेत्र को शामली जिले के ही क्षेत्र में सम्मिलित कर यहां स्थापित न्यायालयों को मुख्य न्यायालय का दर्जा प्रदान करती है तो जितने बजट की आवश्यकता शामली जिले के बनत गाँव में न्यायालय भवनों हेतु है उसके एक चौथाई से भी कम खर्च में शामली जिले के जनपद न्यायालय की समस्या का निवारण हो जाएगा, किन्तु मानवीय हठ इस साधारण सी बात को एक प्रदेश स्तरीय समस्या का रूप प्रदान कर रही है. 

    ऐसे में, माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी से विनम्र निवेदन है कि वे कैराना की सुदृढ़ न्यायिक व्यवस्था, कैराना में फैली अपराधियों की जड़ें और शामली जिले की बदहाल कर देने वाली जाम की समस्या को देखते हुए कैराना में ही जिला एवं सत्र न्यायाधीश के न्यायालय को शामली जिले का मुख्य न्यायालय घोषित करें और यदि इसके लिए उन्हें कैराना में न्यायालय परिसर तक के क्षेत्र को शामली जिले के अंतर्गत ही घोषित करना पड़े तो करें क्योंकि शामली जिले में जिस जगह का चयन जिला कोर्ट के लिए किया गया है वहां तक क्षेत्र के निवासियों का पहुंचना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है क्योंकि शामली जिला इतना सघन रूप से बसा हुआ है कि मात्र एक किलोमीटर पार करने में भी 1-2 घण्टे से ऊपर का समय लग रहा है. ऐसे में न्याय पाने के लिए पीड़ितों को या तो रात में ही घर से निकलना पड़ेगा या फिर न्याय पाने की आशा को ही खो देना पड़ेगा. साथ ही, यदि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कैराना स्थित जनपद न्यायालय को मुख्य न्यायालय का दर्जा दिया जाता है तो सरकार का बहुत सारा धन भी बचेगा और कैराना तहसील में लगभग खंडहर पड़े बहुत सारे क्षेत्र का न्यायालय और अधिवक्ताओं के चेम्बर के रूप में इस्तेमाल भी हो सकेगा. 

    अतः माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी कम से कम एक बार जांच कमेटी बिठाकर कैराना स्थित जनपद न्यायालय को ही शामली जिले के मुख्य न्यायालय का दर्जा दिए जाने की मांग पर विचार करें. 


       🙏🙏धन्यवाद 🙏🙏


शालिनी कौशिक एडवोकेट

कैराना (शामली)

बंदर और उत्तर प्रदेश

Written By Shalini kaushik on गुरुवार, 3 अगस्त 2023 | 12:49 pm

 


    आज उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा चर्चाओं में अगर कोई शब्द है तो वह है " विकास", जो कि सत्ता पक्ष की नजरों में बहुत ज्यादा हो रहा है और विपक्ष की नजरों में गायब हो गया है किन्तु जो सच्चाई आम जनता के सामने है, जिस भयावह सच को उत्तर प्रदेश की जनता भुगत रही है, वह यह है कि घर के अंदर, घर के बाहर, मन्दिर, मस्जिद, कार्यस्थल, न्यायालय - कचहरी परिसर, सडकें, बिजली के खंबे, पानी की टंकियां, खुले घास के मैदान, वाहनों के पार्किंग स्थल आदि आदि क्या क्या कहा जाए, सभी बन्दरों के परिवार - खानदान से आतंकित हैं और इनके खौफ में कोई अपनी जिंदगी से हाथ धो रहा है तो कोई अपने हाथ पैर से तो कोई अपने बच्चों या बूढे माँ बाप से, किन्तु आश्चर्य इस बात का है कि जनता के हृदय पर विराजमान सरकार के दिल पर तो क्या असर करेगी, उसके कानों पर जूँ तक नहीं रेंग रही है.

         जबसे इस धरती पर जन्म लिया, बंदरों की बहुत बड़ी संख्या का सामना किया है. घर के ऊंचे ऊंचे जीनों से बन्दरों से बचने के लिए छलांग तक लगाई है. मम्मी को दो दो बार, एक बार रात में छत पर सोते समय और एक बार रसोई से बाहर आते समय बन्दरों ने काटा है, पापा को कैराना कचहरी में कोर्ट की ओर जाते समय बन्दर ने काटा है. मुझे खुदको बन्दर ने छत पर पकड़ लिया था, वो तो और बन्दरों के शोर को सुनकर मेरे मुँह के पास तक पहुंचा बन्दर मुझे छोडकर भाग गया था और मैं वे दर्दनाक इंजेक्शन लगवाने से बच गई थी जो मम्मी को दो बार और पापा को एक बार लगवाने पड़े थे.

    यही नहीं, दुःखद स्थिति तब रही जब कैराना के भाजपा नेता अनिल चौहान जी की धर्मपत्नी को बन्दरों के हमले के कारण असमय मृत्यु का शिकार होना पड़ा. बन्दरों का आतंक, उत्तर प्रदेश के शामली जिले में एक लम्बे समय से फैला हुआ है, शामली, कैराना, कांधला, थाना भवन में बन्दरों के हमले में आम आदमी को घातक दुर्घटनाओं का शिकार होना पड़ रहा है, 8 सितंबर 2021 को कैराना के भाजपा नेता अनिल चौहान की पत्नी सुषमा चौहान बन्दरों के हमले में छत से गिरी थी और मृत्यु का शिकार हुई थी, शामली के काका नगर में एक युवक को 9 मार्च 2020 को बन्दरों ने नोच नोच कर घायल कर दिया था जिससे बचने के लिए युवक ऊंचाई से गिरकर मृत्यु का शिकार हो गया था, थाना भवन में एक बच्ची को बन्दरों ने बुरी तरह घायल कर दिया था. प्रतिदिन क्षेत्र के सरकारी अस्पतालों में बन्दरों के हमले में घायल लोगों द्वारा बहुत बड़ी संख्या में जाकर एंटी रेबीज के इंजेक्शन लगवाए जा रहे हैं. वर्तमान में हाल यह है कि पूरे प्रदेश में कभी कोई पिता अपने बच्चे को बचाते हुए बन्दरों के हमले में छत से गिर रहा है और चोटिल हो रहा है. कभी कहीं बन्दर वकीलों के कोट, फाइल उठा कर उन्हें घण्टों परेशान कर रहे हैं. रोज अखबारों में कहीं न कहीं की बंदरों के हमलों की खबरें आती रहती हैं, कहीं बन्दर घरों की दीवारें तोड़ रहे हैं, कहीं हरे भरे बाग उजाड़ रहे हैं, पेड़ों पर लगे चिड़ियाओं के घौंसले तोड़ रहे हैं, कहीं बिजली के खंबे से लगे तारों पर झूल कर उन्हें अपने आवा जाही का जरिया बना रहे हैं, जिससे बिजली के तार खम्भों पर ढीले हो रहे हैं और बिजली के आने पर स्पार्किंग के कारण खंबे के नीचे खड़े हुए लोग चिंगारियों से झुलस रहे हैं. रोज सरकारी अस्पतालों में बंदरों के काटने पर इंजेक्शन लगवाने वालों की भीड़ रहती है किन्तु उत्तर प्रदेश की सरकार तक एक सारस की खबर तो पहुंच जाती है किन्तु बन्दरों के आतंक से दहले ज़न जीवन की कोई सूचना सरकार के पास या तो पहुंच ही नहीं रही है या सरकार ने बंदरों के प्रति धार्मिक आस्था को अधिक महत्त्व देते हुए ज़न ज़न की पीड़ा से मुँह मोड़ लिया है.

      मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, चंडीगढ़ आदि कुछ जगहों पर बन्दरों के हमले में मारे गए या घायल हुए लोगों के लिए वन विभाग द्वारा मुआवजे का प्रावधान किया है किन्तु उत्तर प्रदेश में ऐसी कोई व्यवस्था वन विभाग द्वारा नहीं की गई है. उत्तर प्रदेश की सरकार उदार है, जीव मात्र के सुरक्षित जीवन को लेकर संवेदनशील है किन्तु इंसान को, आम जनता को भी तो एक सुरक्षित जीवन की जरूरत होती है. सामर्थ्यवान लोग जाल आदि लगाकर, कुत्ते पालकर अपने जीवन को सुरक्षित कर लेते हैं किन्तु जिनके लिए दो वक़्त की रोटी, रोज पहनने के कपड़े और सर पर छत को जुटाना ही भारी हो क्या वे बन्दरों के हमलों से बचने के अधिकारी नहीं हैं?

       उत्तर प्रदेश की एक जागरूक नागरिक होने के नाते मेरा माननीय श्री योगी आदित्यनाथ जी से कर बद्ध निवेदन है कि आम जनता के प्रति भी थोड़ा उदार रवैय्या अपनाएं, ताकि वह अपनी रोज की जरूरतों को पूरा करने की ओर अपना ध्यान केंद्रित कर सके और पर्यावरण संरक्षण के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की राह पर चलते हुए जिन पौधों का रोपण किया है उन पौधों को बन्दरों के हमलों से बचाते हुए पेड़ बनते हुए देख सकें. साथ ही, जनता की परेशानी को देखते हुए बंदरों के हमलों में घायल या मारे गए लोगों की सहायता हेतु उत्तर प्रदेश के वन विभाग को लंगूरों की व्यवस्था और मुआवजे का प्रावधान किए जाने का भी आदेश दें.

शालिनी कौशिक एडवोकेट 

कैराना (शामली) 

नारी शक्ति है क्या

Written By Shalini kaushik on गुरुवार, 20 जुलाई 2023 | 6:11 pm

  



 
    मणिपुर वीभत्स घटना आज पूरे देश के सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर छाई हुई है. महिलाओं के लिए मौजूदा समय कितना दुखदायी है निरन्तर आंखों के सामने खुलता जा रहा है. यूँ तो, आरंभ से नारी की जिंदगी माँ के गर्भ में आने से लेकर मृत्यु तक शोचनीय ही रहती है. वह चाहे बेटी हो, पत्नी हो या माँ, सभी की नजर में बेचारी ही रहती है. आज एक ओर सरकारी योजनाओं में मिशन शक्ति, विधिक सेवा प्राधिकरण आदि माध्यम से सरकार नारी को सशक्त किए जाने का अथक प्रयास कर रही है किन्तु यह प्रयास भी भारतीय पुरातन सोच को परिवर्तित करने में विफल ही नजर आते हैं. नारी को अबला और भोग्या ही समझने वाला पुरुष सत्ता धारी समाज नारी की सामाजिक स्थिति को उन्नत होते हुए नहीं देख सकता है और वह जब भी, जैसे भी नारी को शोषित करने का कोई भी दुष्कर्म कर सकता है, करता है. बृज भूषण सिंह हो, कुलदीप सेंगर हो या मणिपुरी आदिवासी समाज - महिला को अपमानित करने से कहीं भी पीछे नहीं हटते हैं और ऐसे में इन पुरुष सामंतवाद के समर्थकों पर फर्क नहीं पड़ता है नारी के कमजोर या सबल होने से और सबसे दुःखद स्थिति यह है कि आज सत्ता के शीर्ष पर बैठी नारी शक्ति की मिसाल भी नारी अपमान के मुद्दों पर नारी के साथ खड़ी दिखाई नहीं देती हैं और इतनी ऊपर पहुंचकर भी नारी के "अबला और बेचारी" होने की कहावत को ही चरितार्थ करती हैं.

शालिनी कौशिक एडवोकेट

कैराना (शामली) 

कांधला-कैराना की सड़क जल्द ठीक हो

Written By Shalini kaushik on सोमवार, 17 जुलाई 2023 | 12:59 pm



कांधला से कैराना कहा जाए या कैराना से कांधला - एक ही बात है. पूरे यू पी या कहें तो बीजेपी की केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार ने सड़कों का जाल सा बिछा दिया है सारे में, सड़कों को लेकर बहुत कार्य किया गया है भाजपा सरकार में, किन्तु यह कांधला - कैराना के रास्ते में पड़ते नीलकण्ठ महादेव मन्दिर (वैष्णो देवी मन्दिर) के ठीक सामने पड़ती सड़क पर कांधला में और कांधला से कैराना की ओर निकलते हुए ग्राम असदपुर जिढाना से पहले और ग्राम में काफी लम्बे क्षेत्र की सड़क का दुर्भाग्य कहा जाएगा कि इस पर माननीय मोदी जी या माननीय योगी जी की नजरें नहीं पड़ी और यह ज़बर्दस्त गड्ढे और टूट फूट भरी सड़क होते हुए और बड़े हादसों की वज़ह होते हुए भी बस लीपापोती से ही ठीक दिखाई जाती रही. आज स्थिति यह है कि चार पहिया वाहन तो इस पर किसी तरह लुढ़क लुढ़क कर घसीटते हुए चला लिए जा रहे हैं किन्तु मोटर साइकिल, स्कूटी, साईकिल, ई-रिक्शा चालक मजबूरी में और कोई रास्ता न होने के कारण इस पर निकल रहे हैं और हादसों के शिकार हो रहे हैं और ऐसे में निरन्तर बारिश ने कंगाली में आटा गीला वाला कार्य किया है. जिसे देखते हुए कांधला से ऊंचा गाँव तक की सड़क का जल्द ठीक किया जाना बेहद जरूरी है ताकि क्षेत्रीय निवासियों के जान माल की सुरक्षा की जा सके.

   शालिनी कौशिक एडवोकेट

   अध्यक्ष

मन्दिर महादेव मारूफ शिवाला कांधला धर्मार्थ ट्रस्ट (रजिस्टर्ड)

बात क्या है ?

Written By Rajesh Sharma on बुधवार, 21 जून 2023 | 9:45 pm

 बात से जब बात निकली है

तो कहा है

बात इससे पहले

हमने कब कहा है

बात ही बात में

चर्चा ये आम है

बात कोई और है

जो अभी नहीं सरेआम है


बात इतनी भी नहीं

की तुम क्या थे

बात ये भी नहीं की 

हम क्या है 

बात ये है की 

मंज़िल कहाँ थी

बात ये है की 

अब हम कहाँ है 


मनोज मुन्तशिर का लेखन सीमा में बंधे

Written By Shalini kaushik on मंगलवार, 20 जून 2023 | 6:13 pm

 


 "कपड़ा तेरे बाप का,

   तेल तेरे बाप का, 

   आग भी तेरे बाप की 

   और जलेगी भी तेरे बाप की"

        भक्त शिरोमणि हनुमानजी के मुख से इस तरह के सड़क छाप डायलाग कहलाती "आदिपुरुष" के डायलाग राइटर "मनोज मुन्तशिर" शायद लंकेश रावण के पश्चात दूसरे ब्राह्मण होंगे जिन्होंने श्री राम के चरित्र के साथ खिलवाड़ करने का असहनीय कृत्य किया है. जिस दिन से" आदिपुरुष" सनातन धर्मावलंबियों के सामने आई है शायद ही कोई सच्चा सनातनी होगा जो मनोज मुन्तशिर के अनोखे ज्ञान को लेकर कम से कम दो शब्द विरोध में न बोला हो और जिस तरह से हमेशा होता आया है गलत अपनी गलतियों को कभी स्वीकार नहीं करता अपितु और नई गलतियां करना आरंभ कर देता है. पहले तो असभ्यता, अश्लीलता की सीमाएं पार कर "आदिपुरुष" ने हिन्दू धर्म को कलंकित करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी थी, अब मनोज मुन्तशिर और कहने के लिए आगे बढ़े हैं, रामायण के गहरे जानकार मनोज मुन्तशिर कहते हैं -

"बजरंग बली ने भगवान राम की तरह से संवाद नहीं किए हैं। क्योंकि वे भगवान नहीं भक्त हैं, भगवान हमने उन्हें बनाया है, उनकी भक्ति में वह शक्ति थी।"

     कलियुग के एकमात्र प्रत्यक्ष भगवान के रूप में हम हनुमानजी की पूजा आराधना करते आ रहे हैं और अचानक पता चलता है एक प्रकांड विद्धान" मनोज मुन्तशिर " से कि हनुमानजी तो हमारे जैसे ही हैं बहुत गहरा धक्का पहुंचता है हमारी आस्था पर, अब ऐसे में मन यही कहता है कि कम से कम एक बार तो  बुद्धिमानी का दिखावटी चोला धारण किए मनोज मुन्तशिर को आईना दिखा ही दिया जाए.

   हनुमान भगवान शिवजी के 11वें रुद्रावतार, भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त एवं अमर बालाजी के रूप में हम सभी सनातन धर्मावलंबियों की आस्था के प्रमुख केंद्र हैं. हनुमान (संस्कृत: हनुमान्, आंजनेय और मारुति भी) परमेश्वर की भक्ति (हिन्दू धर्म में भगवान की भक्ति) की सबसे लोकप्रिय अवधारणाओं और भारतीय महाकाव्य रामायण में सबसे महत्वपूर्ण पात्रों में प्रधान हैं। वह भगवान शिवजी के सभी अवतारों में सबसे बलवान और बुद्धिमान माने जाते हैं। रामायण के अनुसार वे जानकी के अत्यधिक प्रिय हैं। इस धरा पर जिन सात मनीषियों को अमरत्व का वरदान प्राप्त है, उनमें बजरंगबली भी हैं। हनुमान जी का अवतार भगवान राम की सहायता के लिये हुआ। हनुमान जी के पराक्रम की असंख्य गाथाएँ प्रचलित हैं। इन्होंने जिस तरह से राम के साथ सुग्रीव की मैत्री कराई और फिर वानरों की मदद से असुरों का मर्दन किया, वह अत्यन्त प्रसिद्ध है। ऐसा भी जगत में प्रसिद्ध है कि जब श्री राम ने सरयू नदी के जल में महाप्रयाण का निश्चय किया तब उन्होंने हनुमानजी को जगत के प्राणियों की रक्षा के लिए धरती पर ही रहने का आदेश दिया और तब से हनुमानजी धरती पर ही निवास करते हैं और जहां जहां भी रामायण पाठ होता है वहां अवश्य पहुंचते हैं. इसी कारण रामायण पाठ के आरंभ में

"कथा प्रारम्भ होत है -, आओ वीर हनुमान,

ऊंचे आसन बैठकर करो सदा कल्याण"

और, रामायण पाठ पूर्ण होने पर 

"कथा समाप्त होत है, जाओ वीर हनुमान,

राम लखन श्री जानकी सहित करो सदा कल्याण"

 कहने का विधान है और धरती पर बहुत से भक्त जनों ने हनुमानजी की उपस्थिति को प्रत्यक्षतः अनुभव भी किया है. आज मनोज मुन्तशिर जैसे सड़क छाप लेखक हिन्दू धर्म की गहरी आस्था के केंद्र सियाराम और हनुमानजी के चरित्र से ही खिलवाड़ पर उतर आए हैं और ऐसा तब हो रहा है जब केंद्र और उत्तर प्रदेश में बैठी सरकार हिन्दू धर्म एवं संस्कृति की रक्षा के लिए कृत संकल्प है. ऐसे में, आदिपुरुष बैन होनी चाहिए और मनोज मुन्तशिर के लेखन का सीमा बंधन होना चाहिए.

शालिनी कौशिक 

  एडवोकेट 

कैराना (शामली) 

आमंत्रण पुस्तक विमोचन

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on बुधवार, 19 अप्रैल 2023 | 11:31 pm

अमेज़न पर उपलब्ध

आमंत्रण

Written By Barun Sakhajee Shrivastav on सोमवार, 17 अप्रैल 2023 | 11:48 pm

Lawyer - Advocate (Difference)

Written By Shalini kaushik on शनिवार, 25 मार्च 2023 | 3:26 pm

 

 Lawyer और एडवोकेट या अधिवक्ता या अभिभाषक या वकील को आम जनता एक ही समझती है किन्तु सत्य कुछ अलग है - 

         Lawyer और एडवोकेट दोनों को ही कानून की जानकारी होती है।  Lawyer शब्द का उपयोग जनरल नेचर में होता है। यह उन लोगों के लिए इस्तेमाल होता है, जिसने कानून की पढ़ाई की हो। अगर इसे सीधे शब्दों में कहें तो Lawyer वो हो सकता है, जिसने एलएलबी (LLB) यानी कानून की पढ़ाई की हो। हालांकि, ये जरूरी नहीं कि कोई भी कानून पढ़ चुका हुआ व्यक्ति एडवोकेट हो। पर किसी भी व्यक्ति को लीगल एडवाइज देने का काम Lawyer कर सकता है, लेकिन वह किसी व्यक्ति के लिए कोर्ट में केस नहीं लड़ सकता है।

        अगर बात करें एडवोकेट की तो एडवोकेट को Lawyer से अलग कहा जाता सकता है। यह शब्द उन लोगों के लिए प्रयोग किया जाता है, जो कानून की पढ़ाई करने के बाद किसी दूसरे व्यक्ति के लिए कोर्ट में अपनी दलील दे सकते हैं। जैसे हम कोई केस के लिए वकील के पास जाते हैं, और वो कोर्ट में हमारे लिए दलील देता है या केस लड़ता है, वो एडवोकेट होता है। बता दें कि हर Lawyer एडवोकेट हो यह ऐसा जरूरी नहीं है। लेकिन हर ए़डवोकेट Lawyer होता है।

      अगर कोई कानून पढ़ाई करने के बाद दूसरों के लिए केस नहीं लड़ता है तो वो Lawyer कहा जाता है। वहीं,अगर व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के लिए केस लड़ता है तो वह एडवोकेट बोला जाता है। यह प्रोफेशनल होता है। एडवोकेट बनने के लिए Lawyer को बार काउंसिल में रजिस्ट्रेशन करवाना होता है और बार के एग्जाम पास करने होते हैं, जिसके बाद वो एडवोकेट बन सकता है।

       अब आते हैं एडवोकेट - अधिवक्ता - अभिभाषक - वकील पर तो ये सब एक ही होते हैं -

   अधिवक्ता, अभिभाषक या वकील (एडवोकेट advocate) के अनेक अर्थ हैं, परंतु हिंदी में ऐसे व्यक्ति से है जिसको न्यायालय में किसी अन्य व्यक्ति की ओर से उसके हेतु या वाद का प्रतिपादन करने का अधिकार प्राप्त हो। अधिवक्ता किसी दूसरे व्यक्ति के स्थान पर (या उसकी तरफ से) दलील प्रस्तुत करता है।

प्रस्तुति 

शालिनी कौशिक 

      एडवोकेट 

कैराना (शामली) 

लोक अदालत का आज की न्याय व्यवस्था में स्थान

Written By Shalini kaushik on रविवार, 19 मार्च 2023 | 9:09 am



 राजस्थान हाइकोर्ट द्वारा अपने निर्णय 

 "श्याम बच्चन बनाम राजस्थान राज्य एस.बी. आपराधिक रिट याचिका नंबर 365/2023" में यह स्पष्ट किया गया है कि लोक अदालतों के फैसले पक्षकारों की आपसी सहमति पर ही दिए जा सकते हैं. 

    राजस्थान हाईकोर्ट ने माना कि लोक अदालतों के पास कोई न्यायनिर्णय शक्ति नहीं है और केवल पक्षकारों के बीच समझौते के आधार पर अवार्ड दे सकती है।

अदालत के सामने यह सवाल उठाया गया कि क्या विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अध्याय VI के तहत लोक अदालतों के पास न्यायिक शक्ति है या केवल पक्षकारों के बीच आम सहमति पर निर्णय पारित करने की आवश्यकता है।

अदालत ने कहा,

"उपर्युक्त प्रावधानों का एकमात्र अवलोकन यह स्पष्ट करता है कि जब न्यायालय के समक्ष लंबित मामला (जैसा कि वर्तमान मामले में) को लोक अदालत में भेजा जाता है तो उसके पक्षकारों को संदर्भ के लिए सहमत होना चाहिए। यदि कोई एक पक्ष केवल इस तरह के संदर्भ के लिए न्यायालय में आवेदन करता है तो दूसरे पक्ष के पास न्यायालय द्वारा निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए पहले से ही सुनवाई का अवसर होना चाहिए कि मामला लोक अदालत में भेजने के लिए उपयुक्त है।

पक्षकारों के बीच समझौता होने पर ही अधिनिर्णय दिया जा सकता है और यदि पक्षकार किसी समझौते पर नहीं पहुंचते हैं तो लोक अदालत अधिनियम की धारा 20 की उप-धारा (6) के तहत मामले को न्यायालय के समक्ष वापस भेजने के लिए बाध्य है।"

इस प्रकार यह माना जा सकता है कि लोक अदालतों के पास कोई न्यायिक शक्ति नहीं है किन्तु जो शक्ति लोक अदालत अपने पास रखती है वह बेहद महत्वपूर्ण है. पक्षकारों की आपसी सहमति पर आधारित लोक अदालतों के निर्णय एक डिक्री की तरह होते हैं और यही कारण है कि लोक अदालतों के निर्णय के खिलाफ कोई अपील किसी भी अन्य न्यायालय में पेश नहीं की जा सकती है. 

    उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण निःशुल्क कानूनी सहायता के क्षेत्र में प्रयासरत है.  लोक अदालतों को निःशुल्क कानूनी सहायता का एक बहुत ही सशक्त माध्यम कहा जा सकता है. जिसमें अदालतों द्वारा विवादग्रस्त मामलों को पक्षकारों की आपसी सहमति से निबटा कर मुकदमों के बोझ को तो हल्का किया ही जा रहा है साथ ही, पक्षकारों पर न्याय प्राप्ति के लिए महंगी पड़ रही न्याय व्यवस्था को भी सस्ता करने का प्रयास किया जा रहा है. अदालतों में लम्बित मुकदमों की भरमार को देखते हुए लोक अदालतों की संख्या में बढ़ोतरी की जा रही है और उनमें न केवल पहले से ही दायर मुकदमे वरन ऐसे सभी विवाद भी जो अभी न्यायालय के समक्ष नहीं आए हैं, प्री लिटिगेशन के आधार पर निबटाने के प्रयास जारी हैं और इसी को देखते हुए विशेष लोक अदालतों का आयोजन भी किया जा रहा है जिनमे चेक बाउंस, बैंक वसूली, नगरपालिका के संपत्ति कर आदि मामले निबटाये जा रहे हैं. 

प्रस्तुति

शालिनी कौशिक 

         एडवोकेट

रिसोर्स पर्सन 

जिला विधिक सेवा प्राधिकरण 

शामली 


तुलसीदास का पुरूष अहं भारी

Written By Shalini kaushik on मंगलवार, 7 फ़रवरी 2023 | 4:10 pm

 एक संस्कृत उक्ति है -

"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता."
      किन्तु केवल पुस्तकों और धर्म शास्त्रों तक ही सिमट कर रह गई है यह उक्ति. सदैव से स्त्री को पुरुष सत्ता के द्वारा दोयम दर्जा ही प्रदान किया जाता रहा है. धर्म शास्त्रों ने पुरुष के द्वारा किसी भी धार्मिक अनुष्ठान को उसकी धर्मपत्नी के अभाव में किए जाने की स्वीकृति नहीं दी और इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमने श्री राम द्वारा अश्वमेघ यज्ञ के समय उनके वामांग देवी सीता की विराजमान मूर्ति के रूप में देखा है. हमने अपने बाल्यकाल में गार्गी, अपाला जैसी विदुषियों का मुनि याज्ञवल्क्य जैसे महर्षि से शास्त्रार्थ के विषय में भी पढ़ा है किन्तु धीरे धीरे नारी को दबाने का चलन बढ़ा और इसके लिए ढाल बने महाकवि तुलसीदास, जिन्होंने श्री रामचरितमानस में लिख दिया 
           "ढोल, गँवार, शूद्र, पशु, नारी - 
                     ये सब ताड़न के अधिकारी" 


      अब तुलसीदास जी के इस लिखे को पढ़े लिखों ने अपने हिसाब से, अनपढ़ों ने अपने हिसाब से, पुरूष समुदाय ने अपने दिमाग से, नारी वर्ग ने अपने दिल से, सभ्य समाज ने सभ्यता की सीमाओं में, असभ्य - अभद्र लोगों ने मर्यादा की सीमाएं लाँघकर वर्णित किया, किंतु सबसे ज्यादा मार पड़ी नारी जाति पर, जिसका योगदान महाकवि के द्वारा रचित पवित्र पुण्य महाकाव्य श्री रामचरित मानस में सर्वाधिक था और उसी नारी जाति के लिए महाकवि दो शब्द धन्यवाद के लिखने के स्थान पर यह कई अर्थ भरी उक्ति लिख गए. अब नारी जाति का श्री रामचरित मानस लिखने मे क्या योगदान है, यह भी समझ लिया जाना चाहिए -
      बाल्यकाल से ही तुलसी के जीवन में संघर्ष रहा, माता पिता का सुख तो कभी नहीं मिला क्योंकि वे मूल् नक्षत्र में पैदा हुए थे और पैदा होते ही उनकी माता जी के स्वर्गवास होने पर पिता ने उन्हें त्याग दिया था. मामा के घर रहे वहां  शिक्षा का समय आ गया, वह भी पूरी कर ली। लेकिन जब इनका विवाह बनारस की एक बड़ी सुंदर स्त्री, रत्नावली से हुआ, पहली बार अपना परिवार पाया, तो पत्नी के प्रति आसक्ति कुछ अधिक ही हो गई। एक बार पत्नी मायके गई, अब पत्नी से मिलने की इच्छा में रात में ही पत्नी से मिलने पहुँच गए, द्वार बंद पाया तो पत्नी तक पहुंचने के लिए तेज बारिश में साँप को रस्सी समझकर उसे ही पकड़कर ऊपर चढ़ गए. पत्नी रत्नावली ने पति को ऐसे आया देखा तो उसे पति तुलसीदास पर बहुत क्रोध आया और उसने जो कहा वह पति तुलसीदास के लिए प्रभु का संदेश बन गया 
       "लाज न आवत आपको, 
             दौरे आयहू साथ, 
       धिक-धिक ऐसे प्रेम को 
          कहा कहहुं मैं नाथ. 
      अस्थि चर्ममय देह मम 
          ता में ऐसी प्रीती 
      तैसी जो श्रीराम में 
          कबहु न हो भव भीती." 



     अर्थात तुलसीदास जी से उनकी पत्नी कहती हैं, कि आपको लाज नहीं आई जो दौड़ते हुए मेरे पास आ गए।
हे नाथ! अब मैं आपसे क्या कहूँ। आपके ऐसे प्रेम पर धिक्कार है। मेरे प्रति जितना प्रेम आप दिखा रहे हैं उसका आधा प्रेम भी अगर आप प्रभु श्री राम के प्रति दिखा देते, तो आप इस संसार के समस्त कष्टों से मुक्ति पा जाते. 
इस हाड़-माँस की देह के प्रति प्रेम और अनुराग करने से कोई लाभ नहीं। यदि आपको प्रेम करना है, तो प्रभु श्री राम से कीजिए, जिनकी भक्ति से आप संसार के भय से मुक्त हो जाएंगे और आपको मोक्ष की प्राप्ति हो जायेगी।" 
          और पत्नी रत्नावली का यह कहना मात्र ही तुलसीदास जी के जीवन का ध्येय बन गया और उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन चरित पर आधारित युगान्तरकारी कालजयी ग्रंथ श्री रामचरित मानस की रचना की किन्तु अपने पुरुष अहं को ऊपर रखते हुए पत्नी - नारी रत्नावली का धन्यवाद अर्पित नहीं किया और लिख गए नारी को ताड़न की अधिकारी - जिसे भले ही सभ्य समाज कितना सही रूप में परिभाषित कर नारी के पक्ष में प्रचारित कर ले, असभ्य-अभद्र समाज नारी की ताड़ना करता ही रहेगा नारी को अपमानित करता ही रहेगा क्योंकि भले ही लव कुश ने अपनी माता सीता का सच्चरित्र अयोध्या वासियों के सामने रख दिया हो, भले ही महर्षि वाल्मीकि ने रामायण का सुखद अंत किए जाने की चेष्टा में अपना सारा पुण्य ज्ञान लगा दिया हो किन्तु माता सीता को तो धरती माँ की गोद में हो समाना पड़ा था. इसलिए महाकवि तुलसीदास जी का पुरुष अहं नारी समुदाय पर सदैव भारी हो पड़ेगा. 
शालिनी कौशिक 
      एडवोकेट 
कैराना (शामली) 



श्री राहुल गांधी - एक महान राष्ट्रनायक

Written By Shalini kaushik on सोमवार, 26 दिसंबर 2022 | 5:49 pm

 



        श्री राहुल गांधी जी आज भारत में कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक आम भारतीयों के दिलों में एक गहरी छाप छोड़ चुके हैं. भारत जोड़ो यात्रा के माध्यम से राहुल गांधी ने भारत को तोड़ने का इरादा रखने वालों के दिलों को बहुत तगड़ा झटका दिया है और इसी कारण राहुल गांधी जी के विरोधी कभी राहुल गांधी द्वारा महिलाओं, ल़डकियों से हाथ मिलाने को लेकर उन पर कटाक्ष करते हैं तो कभी यात्रा में मात्र सुरक्षा कर्मियों की मौजूदगी बताकर राहुल गांधी जी के भारत जोड़ने के प्रयास की हँसी उड़ाते हैं ऊपर से गोदी मीडिया के द्वारा भरसक कोशिश की जाती है कि भारत जोड़ो यात्रा को भारत में कोई प्रचार न मिले किन्तु आज भारत जोड़ो यात्रा एक क्रांति बन चुकी है और इतिहास गवाह है कि क्रांति कभी दबाई नहीं जा सकती है बल्कि क्रांति को जितना दबाया जाता है वह उतना ही रौद्र रूप लेकर उभरती है. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम इसकी गवाही देता है और आज भारत जोड़ो यात्रा भी एक ऐसी ही क्रांति बन गई है जिसमें कॉंग्रेस पार्टी के युवा नेता पूर्व कॉंग्रेस अध्यक्ष श्री राहुल गांधी जी ने अपनी पूरी जीवन शक्ति लगा दी है.

                  कन्याकुमारी से आरंभ होकर भारत जोड़ो यात्रा जैसे ही उत्तर की ओर बढ़ी, सियासी हल्कों में हलचल आरंभ हो गई और राजस्थान में उमड़ पड़े जनसमुदाय ने राहुल गांधी जी के विरोधियों में आग सी लग गई और शुरू हो गई कोरोना के फैलने की खबरें. जिस भारत जोड़ो यात्रा में अब तक विरोधियों के अनुसार इक्का-दुक्का ही लोग आ रहे थे उसे रोकने के लिए स्वास्थ्य मंत्री राहुल गांधी जी को भारत जोड़ो यात्रा रोकने के लिए पत्र लिखने बैठ गए.

      यही नहीं राहुल गांधी जी की राष्ट्रीयता यहीं पर नहीं रुकी बल्कि यात्रा के दिल्ली आने पर वे सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों के समाधि स्थल पर गए और यहां उन्होंने एक बार फिर दिखा दिया कि उनमें है वह भावना-जो एक सच्चे और महान राष्ट्रनायक में होनी चाहिए.

      राहुल गांधी सर्वप्रथम अपने पिता और देश के सातवें प्रधान मंत्री स्व श्री राजीव गांधी जी की समाधि स्थल वीर भूमि पर गए, इंदिरा गांधी जी की समाधि शक्ति स्थल, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि राजघाट, पंडित नेहरू की समाधि शांति वन, लाल बहादुर शास्त्री जी की समाधि विजय घाट, चौधरी चरण सिंह जी की समाधि स्थल किसान घाट पर गए, पर यह कोई महान कार्य नहीं था क्योंकि ये सभी कॉंग्रेस पार्टी के आदर्श चरित्र और नेता रहे हैं, राहुल गांधी जी की महानता कही जाएगी उनका भाजपा नेता और पूर्व प्रधानमंत्री स्व अटल बिहारी वाजपेयी जी की समाधि स्थल सदैव अटल पर जाकर पुष्पांजलि अर्पित करना. ऐसा नहीं है कि स्व अटल बिहारी वाजपेयी जी उनकी श्रद्धांजली के पात्र नहीं थे, अटल बिहारी वाजपेयी जी सदैव भारतीयों के हृदय में सम्मान के पात्र हैं और रहेंगे किन्तु देश के लिए अपना सर्वस्व अर्पित करने वाले पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी जी क्या भाजपाई प्रधानमंत्री और भाजपाई राष्ट्रपति के द्वारा सम्मान के पात्र नहीं होने चाहिए. वर्तमान और  वर्ष 2000 के बाद का देश का इतिहास गवाह है भाजपा द्वारा बनाए गए पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी जी के जयंती और पुण्यतिथि के अवसर पर देश में कहीं और का प्रवास कार्यक्रम तय कर लेते थे और इनकी समाधि स्थल पर जाकर अपनी पुष्पांजलि अर्पित नहीं करते थे और यही रवैय्या भाजपा के वर्तमान नेतृत्व का है जो देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले कॉंग्रेस पार्टी के इन महान प्रधानमंत्रियों की जयंती और पुण्यतिथि पर ट्विटर पर ट्वीट द्वारा ही अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं.

        ऐसे में, एक राष्ट्रनायक वही होना चाहिए जो दलगत राजनीति से परे रहता हो, केवल राष्ट्र का सम्मान ही सर्वोपरि रखता हो और कॉंग्रेस पार्टी से जुड़े होने पर भी राहुल गांधी के द्वारा भाजपा के पूर्व प्रधानमंत्री स्व श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की समाधि पर जाकर पुष्पांजलि अर्पित करना उन्हें राष्ट्रनायक की छवि प्रदान करता है और एक आम भारतीय आज उनमें अपने भारत राष्ट्र का महान नायक होने का अक्स देख रहा है. राहुल गांधी जिंदाबाद 🇮🇳

शालिनी कौशिक

 एडवोकेट 

कैराना (शामली) 


हिन्दू बड़े दिलवाले - Marry Christmas 🌲🌹🌲

Written By Shalini kaushik on शनिवार, 24 दिसंबर 2022 | 2:35 pm

   


 व्हाटसएप और ट्विटर पर आज राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में लगभग हर किसी के खाते नज़र आते हैं और इसीलिए मन की हर बात को इन पर साझा किया जाना एक आम चलन बनता जा रहा है और इसी कारण ये अकाउंट सामाजिक सौहार्द और भारतीय संस्कृति के लिए काफी हद तक, अगर सच ही कहा जाए तो, खतरनाक बनते जा रहे हैं. 

     पिछले कुछ दिनों से ट्विटर और व्हाटसएप के स्टेटस पर 25 दिसंबर के लिए कट्टर हिन्दुत्व, स्वयंसेवक बनने और तुलसी पूजन जैसे संदेश प्रसारित किए जा रहे हैं और वह मात्र इसलिए कि 25 दिसंबर को ईसाई धर्मावलंबियों का पवित्र त्यौहार "क्रिसमस" मनाया जाता है. ऐसी ट्वीट, ऐसे स्टेटस एक चिंता सी पैदा कर रहे हैं कि क्या यही लिखा है हमारे महान भारत की महान संस्कृति में कि हम दूसरे की खुशियों में आग लगाने का कार्य करें. वह संस्कृति जो कबीरदास की पन्क्तियों में हमें प्रेरित करती है 

"ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोए, 

  औरन को सीतल करे, आपहु सीतल होय." 

      आज उसी भारतीय संस्कृति को मैला करने का, दूषित करने का आगाज हो रहा है और यह कहना भी देरी ही होगी कि आज ऐसा करना आरंभ किया गया है जबकि बीते भारत के कुछ साल एक खास वर्ग इसी साज़िश को अंजाम दे रहा है जिससे निबटने के लिए देश के एक प्रमुख राजनेता श्री राहुल गांधी जी ने कन्याकुमारी से कश्मीर तक भारत जोड़ो यात्रा की सफल शुरूआत की है. 

       भारतीय संस्कृति के महान विद्वान् डाॅ. रामधारी सिंह जी दिनकर ने भारतीय संस्कृति की व्याख्या करते हुए लिखा है, कि भारतीय संस्कृति का महत्व स्वयं सिद्ध है। यह व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की धरोहर है। संस्कृति के वरदहस्त से ही हमारा राष्ट्र निरंतर प्रगति के पथ पर प्रशस्त है। भारतीय संस्कृति आंतरिक भावना है। इसके अंतर्गत व्यक्ति के आचार विचार उसके जीवन मूल्य, उसकी नैतिकता, संस्कार, आदर्श, शिक्षा, धर्म, साहित्य और कला का समावेश होता है अतः भारतीय संस्कृति एक व्यापक तत्व है। निश्चित ही भारतीय संस्कृति मानव की साधना की सर्वोत्तम परिणति है।"

‘‘भारतीय संस्कृति में धर्म की स्वीकृति है, किन्तु धर्म किसी संकीणर्ता या अंधविश्वास का पर्याय नहीं है।’’ वर्तमान समय ही नहीं बल्कि प्राचीनकाल से ही भारतीय संस्कृति का आधार धार्मिक एकता व सहिष्णुता रहा है। राम, कृष्ण, शिव तथा बुद्ध, महावीर इत्यादि की मान्यताओं के अलावा भारत में देवी-देवताओं की संख्या अनगिनत है। फिर भी इनकी विचारधाराओं में एकता का मूल है, क्योंकि विभिन्न रूप स्वीकार करने पर भी एक-ईश्वर में भारतीय मानस का विश्वास सुदृढ़ है। 

ऋग्वदे की प्रसिद्ध ऋचा - ‘एक सद्धिप्रा बहुधा वदन्ति’ के अनुसार एक शक्ति के स्वरूप अनेक है। सगुण रूप मे इष्टदेव के नामभेद होने पर भी निराकार ब्रह्म की सत्ता सब हिन्दू मतो में मान्य है। अहिंसा, दया, तप आदि सभी गृहस्थ और वैराग्य धर्मों का सिद्धान्त है। चाहे वे बौद्ध, जैन या वैष्णव किसी भी मत के मानने वाले हों। 

भारतीय संस्कृति मे सहनशीलता का भी बड़ा विशिष्ट गुण है। इसी का परिणाम है कि देश में अनेक जातियाँ और धर्मों के लोग आपस में मिलजुल कर रहते हैं फिर भी भारतीय संस्कृति विलीन नहीं हुई है। आदान-प्रदान की प्रक्रिया द्वारा भारतीय संस्कृति अपने स्वरूप को संजोये हुए ‘अनेकता में एकता’ की स्थापना प्रकट करती है। भारत की धर्म परायणता से न तो इस्लाम को ठेस पहुँची और न ईसाईयत को कोई हानि हुई। हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई भारत में केवल एक धर्म ही नहीं हैं बल्कि भारत की पहचान के चार मजबूत स्तंभ हैं. धर्म और अध्यात्म द्वारा भारतीय संस्कृति जन-जीवन को आश्वस्त बनाने में सफल हैं। 

        भारतीय संस्कृति के इस गुण को बताते हुए पृथ्वी कुमार अग्रवाल लिखते हैं - ‘आपसी भेद का कारण भारतीय संस्कृति में धर्म कभी नहीं बन सका। एक-दो उदाहरण हो तो उसके मूल में अन्य तथ्य प्रमुख है। संस्कृति की एक विशेषता को न केवल विचारक दार्शनिकों ने स्थापित किया, बल्कि राजनयिकों और सम्राटो ने भी समझा। 

स्वयं अशोक का कथन है कि उसने धार्मिक मेल-जोल को बढ़ावा देने का सफल प्रयत्न किया है। इस सहिष्णुतापूर्ण समन्वय भावना को मुगल बादशाह अकबर ने भी स्वीकार किया और तदनुसार इस्लाम जैसा विपरीत मत भी भारतीयता का अंग बन गया।’ विश्व इतिहास में हम धर्म के नाम पर अनेक अत्याचारों का होना पाते हैं। यूनान में सुकरात, फिलिस्तीन में ईसा मसीह को बलि होना पड़ा। परन्तु भारतीय संस्कृति में हिंसा धर्मान्धता के वशीभूत नही हुई। सहिष्णुता भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है।

   खुली दृष्टि और ग्रहण शीलता भारतीय संस्कृति का एक मन्त्र है। बाह्य संस्कृतियों और जातियों से आदान-प्रदान प्रभावों को आत्मसात करना, नए लक्ष्य की प्राप्ति आदि उसी विचारधारा के अंग है। सामाजिक व्यवस्था की उदारता और ग्रहण क्षमता उसके लक्षण है। डॉ विजयेन्द्र स्नातक लिखते हैं कि भारतीय संस्कृति का मूलाधार - ‘‘जीयो और जीने दो है। हमारी संस्कृति की यही खुली विचारधारा है। समय-समय पर अनेक जातियाँ भारतवर्ष में आकर यही  घुल-मिल गई। राजनीतिक विजय के बावजूद भी ये भारत की संस्कृति पर विजय नहीं पा सकी। इनकी अच्छी विचारधारा को भारतीय संस्कृति ने अपने अन्दर समाहित कर लिया।

इसी प्रकार की विचारधारा को दिनकर जी ने भी व्यक्त किया है - ‘भारतीय संस्कृति में जो एक प्रकार की विश्वसनीयता उत्पन्न हुई, वह संसार के लिए सचमुच वरदान है। इसके लिए सारा संसार उसका प्रशंसक रहा है। निःसंदेह वर्तमान में भी यही विचारधारा भारतीय संस्कृति को संपोषित कर रही है।

भारतवर्ष में भौगोलिक व सांस्कृतिक विविधता होते हुए भी यह देश अपनी एकता के लिए विख्यात है। इस देश को ’संसार का संक्षिप्त प्रतिरूप’ कहा गया है। यह धरती अनेक जनो वाली विविध भाषा, अनेक धर्म और यथेच्छ घरो वाली है। भाषा और धर्म देश में विविधता के आज भी लक्षण है। किन्तु वे एक सूत्रबद्ध है। भारतीय संस्कृति की ‘विविधता में एकता’ की विचारधारा पर रामधारी सिंह दिनकर लिखते हैं - ‘‘भारतवर्ष मे सभी जाति मिलकर एक अलग समाज का निर्माण करती हैं जैसे - कई प्रकार की औषधियों को कड़ाही में डालकर जब काढ़ा बनाते हैं तब उस काढ़ा  का स्वाद दूर एक औषधि के अलग स्वाद से सर्वथा भिन्न हो जाता है। असल में उस काढ़ा  का स्वाद सभी औषधियों के स्वादों के मिश्रण का परिणाम होता है। 

     भारतीय संस्कृति ने विश्व की किसी भी संस्कृति को हेय दृष्टि से नहीं देखा है। किसी को भी स्वयं से तुच्छ आंकना हमारी संस्कृति में सिखाया ही नहीं गया है. इसने अन्य सभ्यताओं के गुणों को आत्मसात करने के साथ-साथ उनके अवगुणों का परिष्कार भी किया है। यह हमारी ही संस्कृति है जो सच्चाई के लिए अगर मिटना जानती है तो अपनों का साथ देने के लिए मिटा देना भी जानती है. शायद यही कारण है कि हमारी संस्कृति वर्तमान में भी ज्यो की त्यों अपनी प्रसिद्धि बनाये हुए हैं। इस प्रकार हमारी संस्कृति विश्व की ओजस्वी संस्कृति है।

      

       डाॅ. हरिनारायण दुबे ने भारतीय संस्कृति पर प्रकाश डालते हुए लिखा है, कि ‘‘भारतीय संस्कृति का प्राणतत्व आध्यात्मिक है। इसमें ऐहिक एवं भौतिक सुखों की तुलना में आत्मिक अथवा पारलौकिक सुख के प्रति आग्रह देखा जा सकता है। भारतीय संस्कृति में धर्मान्धता का कोई स्थान नहीं है। इस संस्कृति की मूल विशेषता यह रही है कि व्यक्ति अपनी परिस्थितियों के अनुरूप मूल्यों की रक्षा करते हुए कोई भी मत, विचार अथवा धर्म अपना सकता है।"

" भारतीय संस्कृति की महत्वपूर्ण विरासत इसमें अंतर्निहित सहिष्णुता की भावना मानी जा सकती है। यद्यपि प्राचीन काल से ही भारत में अनेक धर्म एवं सम्प्रदाय रहे हैं किंतु इतिहास साक्षी है कि धर्म के नाम पर अत्याचार और रक्तपात प्राचीन भारत में नहीं हुआ. इस प्रकार भारत भूमि का यह सतत् सौभाग्य रहा है कि यहां अनादिकाल से मानवमात्र को ही नहीं वरन प्राणिमात्र को एकता एवं भाईचारे की भावना में जोड़ने की प्रबल संस्कृति प्रवाहमान है।"

   महान् साहित्यकार कवि और विद्वान् श्री रवींद्रनाथ टैगोर के अनुसार ‘‘भारतीय संस्कृति की आध्यात्म और मानवता की भावना अनुकरणीय है। भारतीय संस्कृति का दृष्टिकोण उदार और विशाल है क्योंकि मूलतः उसका विकास प्रकृति के स्वच्छन्द वातावरण में और उसके साथ सहयोग करते हुए हुआ है। इसी कारण भारतीय संस्कृति में सहयोग समन्वय, उदारता तथा समझौते की प्रवृत्ति मूलरूप से विद्यमान है।"

       " डाॅ. एल. पी. शर्मा ने भारतीय संस्कृति की व्याख्या करते हुए उसकी निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख किया है-          

भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम् संस्कृति है। 

भारतीय संस्कृति में विविधता होते हुए भी एकता विद्यमान है। 

भारतीय संस्कृति में धार्मिक सहिष्णुता सदैव रही है।

 भारतीय संस्कृति एक धर्म प्रधान संस्कृति है। 

भारतीय संस्कृति सदैव प्रगतिशील रही है। 

भारतीय संस्कृति में भौतिक और आध्यात्मिक प्रगति का मिश्रण है। 

भारतीय संस्कृति में विश्व बंधुत्व की भावना निहित है। 

भारतीय संस्कृति की प्रकृति सहयोगात्मक है.   

       

           इस प्रकार, विश्व बंधुत्व का संदेश देने वाली, वसुधैव कुटुंबकम की भावना संजोने वाली भारतीय संस्कृति आज स्वार्थ की राजनीति का शिकार होकर क्या इतना नीचे गिर जाएगी कि दूसरे की खुशियों को आग लगाकर अपनी दुनिया को रोशन करेगी. जिस संस्कृति में अतिथि तक को देवता का स्थान दिया गया है, उस संस्कृति में अपनी आने वाली पीढ़ी को अपने भाइयों के ही साथ भेदभाव की सीख दी जाएगी. तुलसी पूजन दिवस कह कर हिन्दुओं की भावनाएं उद्वेलित करने वाले धर्म के ठेकेदारों ने क्या अभी कार्तिक माह के पूरे महीने में माँ तुलसी की आराधना नहीं की है और फिर तुलसी हमारे लिए पूजनीय पौधा है क्या इसके लिए हम मात्र 25 दिसंबर को ही चुनेंगे और वो भी इसलिए कि क्रिसमस पर एक ट्री को सजा कर ईसाई अपनी खुशियाँ मनाते हैं. क्यूँ छोटा कर रहे हैं हिन्दू अपने हृदय की विशालता को, जो साल भर सत्कार पाने वाली माँ तुलसी को एक क्रिसमस ट्री के समक्ष खड़ा कर छोटा कर रहे हैं. संता के रूप में ईसाईयों के छोटे मासूम बच्चों की मासूमियत को क्यूँ अपनी राजनीति के लिए अपमानित करने की कोशिश कर रहे हैं? कहाँ तो विद्यालयों में राजनीति के प्रवेश तक का विरोध किया जाता था और कहां आज सत्ता के लिए, अपनी राजनीति चमकाने के लिए छोटे छोटे मासूम बच्चों की मासूमियत को कट्टरता में बदलने की कोशिश की जा रही है. इस तरह खतम हो जाएगा ये बचपन, ये समाज, ये देश और इस तरह ये सारी सभ्यता. 

          इसलिए मत संकीर्ण कीजिए खुद की सोच को, खुद के दिल के दरवाजे बंद मत कीजिए, हवाओं को आने दीजिए और सामाजिक समरसता, धार्मिक सौहार्दपूर्ण वातावरण बना रहने दीजिए, हिन्दू धर्मावलंबियों ने अभी श्री कृष्ण जन्माष्टमी, नवरात्रि, विजयादशमी, दीपावली आदि बहुत से त्योहार मनाए हैं और उसमें अपने ईसाई, मुस्लिम, सिख भाई - बहनों से बहुत सी हार्दिक शुभकामनाएं प्राप्त की हैं. तो अब अपना भी दिल खुला रखिए और खुले दिल से अपने ईसाई भाई बहनों को भी क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनाएं प्रेषित कीजिए. 

🌲🌹HAPPY CHRISTMAS 🌹🌲

द्वारा 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली)






संविधान दिवस आयोजन - भारत जोड़ो यात्रा की सफ़लता

Written By Shalini kaushik on रविवार, 27 नवंबर 2022 | 12:37 pm

 



      26 नवंबर - विधि दिवस - संविधान दिवस के रूप में 1949 से स्थापित हो गया था। भारत गणराज्य का संविधान 26 नवम्बर 1949 को बनकर तैयार हुआ था। संविधान सभा ने भारत के संविधान को 2 वर्ष 11 माह 18 दिन में 26 नवम्बर 1949 को पूरा कर राष्ट्र को समर्पित किया और तभी से भारत गणराज्य में 26 नवंबर का दिन "संविधान दिवस - विधि दिवस" के रूप में मनाया जाता है. 

     देश में एक लम्बे समय तक कॉंग्रेस पार्टी की ही सरकार रही है और क्योंकि कॉंग्रेस पार्टी के ही अनथक प्रयासों से देश में संविधान का शासन स्थापित हुआ है इसलिए कॉंग्रेस पार्टी के द्वारा संविधान दिवस मनाया जाना आरंभ से ही उसकी कार्यप्रणाली में सम्मिलित रहा है किन्तु आज देश में कॉंग्रेस विरोधी विचारधारा सत्ता में है और उस विचारधारा ने कॉंग्रेस की विचारधारा और कार्यप्रणाली के ही विपरीत आचरण को ही सदैव अपने आचरण में सम्मिलित किया है और इसी का परिणाम है कि आज देश में बहुत से ऐसे शासनादेश सामने आए हैं जो संवैधानिक नियमों का उल्लंघन करते हुए नजर आए हैं और इन्ही कुछ परिस्थितियों के मद्देनजर कॉंग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और वर्तमान सांसद श्री राहुल गांधी जी द्वारा देश में कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक 7 सितंबर 2022 से भारत जोड़ो यात्रा आरंभ की गई, जिसमें उमड़े हुए अपार ज़न समूह को देखकर और राहुल गांधी के प्रति जनसमुदाय के प्यार को देखकर कॉंग्रेस पार्टी के विपक्षी  खेमे को गहरा झटका लगा है और वह कैसे भी करके, कभी महिलाओं का राहुल गांधी जी द्वारा हाथ पकड़ने को लेकर तो कभी राहुल गांधी जी की दाढ़ी को लेकर, कभी भीड़ को फोटो शॉप कहकर भारत जोड़ो यात्रा को बदनाम करने की कोशिश में लगे हुए हैं. 

     भारत जोड़ो यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण असर ही कहा जाएगा कि पिछले 8 साल से सत्ता में आया कॉंग्रेस पार्टी का विपक्षी खेमा अपनी विचारधारा के विपरीत देश के सभी महत्वपूर्ण संस्थानों - कलेक्ट्रेट, पुलिस थाने, विकास विभाग, महाविद्यालय, इंटर कॉलेज आदि सभी जगह संविधान दिवस मनाए जाने के आदेश पारित किए जाते हैं, सभी संस्थानों के अफसर संविधान की शपथ ग्रहण करते हैं. संविधान की श्रेष्ठता पर बड़े बड़े भाषण दिए जाते हैं. ये राहुल गांधी जी की भारत जोड़ो यात्रा की बहुत बड़ी सफ़लता कही जाएगी क्योंकि आज कॉंग्रेस पार्टी का विपक्षी खेमा वह सब कुछ कर रहा है जिसे उसने कभी अपनी कार्यप्रणाली, अपनी संस्कृति, अपनी विचारधारा मे कोई जगह नहीं दी. वह संविधान की शपथ ले रहे हैं जो संविधान के शासन के ही खिलाफ थे, वे हर घर तिरंगा अभियान चला रहे हैं जो कभी अपने कार्यालय तक पर तिरंगे को फहराने की ज़हमत नहीं उठाते थे. 

         आज राहुल गांधी और उनकी भारत जोड़ो यात्रा देश ही नहीं, विदेश में भी सुर्खियों में है और इसमें उमड़ता हुआ अपार ज़न समूह इसकी बुलंदियां ज़ाहिर करने के लिए पर्याप्त है. जय हिंद - जय भारत 🇮🇳🇮🇳

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली) 



डॉ शिखा कौशिक नूतन की पुस्तक का विमोचन


 मेरठ लिटरेरी फेस्टिवल (छठा संस्करण) 25, 26, 27 नंवबर 2022 को चौधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के 'बृहस्पति भवन' में विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के सहयोग से आयोजित किया गया. आयोजन समिति में नेपाल, ब्रिटेन, रूस, जापान और समस्त भारत से आने वाले अतिथियों का भारत में आयोजक डॉ विजय पंडित और पूनम पंडित द्वारा हार्दिक स्वागत किया गया. 

      देश विदेश में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुके अंतरराष्ट्रीय क्रांतिधरा मेरठ साहित्यिक महाकुंभ में 26 नवंबर को आयोजित लघुकथा सत्र में डॉ शिखा कौशिक "नूतन" द्वारा लिखित लघु कथा संग्रह "काली सोच" का विमोचन बलराम अग्रवाल जी (वरिष्ठ लघुकथाकार, दिल्ली) श्री जी सी शर्मा (रिटायर्ड डिप्टी एस पी), श्रीमती अंजू खरबंदा (लघुकथाकार, दिल्ली) डॉ अलका शर्मा (दिल्ली) श्रीमती पूर्णिमा (मेरठ)  नेपाल से वरिष्ठ लघुकथाकार डॉ पुष्कर राज भट्ट जी द्वारा किया गया और डॉ शिखा कौशिक नूतन को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया.डॉ शिखा कौशिक नूतन ने अपने संबोधन में लघुकथा के स्वरूप को परिभाषित करने वाले हिन्दी लघुकथा के पितामह स्व सतीश राज पुष्करणा का उल्लेख करते हुए कहा कि वास्तव में लघुकथा मंद मंद बहती हुई सरिता के समान न होकर अनायास प्रस्फुटित झरने के समान है। उन्होंने अपने लघुकथा संग्रह 'काली सोच' में संग्रहित लघुकथा ' प्रेम की अभिव्यक्ति' का वाचन भी किया। जिसमें डॉ शिखा कौशिक द्वारा प्रेम की अभिव्यक्ति - लघुकथा द्वारा प्रेम के विराट और सच्चे स्वरूप का वर्णन किया गया. लेखिका ने लघुकथा का वाचन करते हुए कहा गया कि "प्रेमी ने प्रेमिका को गुलाब का महकता फूल भेंट करते हुए कहा - मैं तुमसे प्रेम करता हूँ. प्रेमिका ने फूल स्वीकार करने से पहले अपना ओढ़ा हुआ शॉल कंधे से उतारा और ठंड से ठिठुरते हुए प्रेमी को ओढ़ा दिया." लेखिका द्वारा की गई प्रेम की उच्च अभिव्यक्ति की सभी उपस्थित अतिथियों द्वारा मुक्त कंठ से सराहना की गई.

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली) 

भारत की शेरनी प्रियदर्शनी इंदिरा गांधी - कोटि कोटि नमन 💐

Written By Shalini kaushik on शुक्रवार, 18 नवंबर 2022 | 9:52 pm



अदा रखती थी मुख्तलिफ ,इरादे नेक रखती थी ,

वतन की खातिर मिटने को सदा तैयार रहती थी .

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मोम की गुड़िया की जैसी ,वे नेता वानर दल की थी ,,

मुल्क पर कुर्बां होने का वो जज़बा दिल में रखती थी .

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पाक की खातिर नामर्दी झेली जो हिन्द ने अपने ,

वे उसका बदला लेने को मर्द बन जाया करती थी .

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मदद से सेना की जिसने कराये पाक के टुकड़े ,

शेरनी ऐसी वे नारी यहाँ कहलाया करती थी .

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बना है पञ्च-अग्नि आज छुपी है पीछे जो ताकत ,

उसी से चीन की रूहें तभी से कांपा करती थी .

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जहाँ दोयम दर्जा नारी निकल न सकती घूंघट से ,

वहीँ पर ये आगे बढ़कर हुकुम मनवाया करती थी .

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कान जो सुन न सकते थे औरतों के मुहं से कुछ बोल ,

वो इनके भाषण सुनने को दौड़कर आया करती थी .

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न चाहती थी जो बेटी का कभी भी जन्म घर में हो ,

मिले ऐसी बेटी उनको वो रब से माँगा करती थी .

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जन्मदिन ये मुबारक हो उसी इंदिरा की जनता को ,

जिसे वे जान से ज्यादा हमेशा चाहा करती थी .


शालिनी कौशिक

[एडवोकेट ]

कैराना (शामली) 

बाल दिवस विशेष - बच्चों के प्रति लापरवाही गलत

Written By Shalini kaushik on सोमवार, 14 नवंबर 2022 | 12:36 pm

  




"वक़्त करता है परवरिश बरसों 

हादिसा एक दम नहीं होता" 

सभी जानते हैं कि हादसे एक दम जन्म नहीं लेते, एक लम्बे समय से परिस्थितियों के प्रति बरती गई लापरवाही हादसों की पैदाइश का मुख्य कारण होती है. भले ही अवैध रूप से चलाई जा रही पटाखा फैक्ट्री के हादसे हों या सड़कों में बनते जा रहे गड्ढों के कारण इ-रिक्शा पलटने के हादसे, बन्दरों के हमलों के कारण घरों में छोटी मोटी चोट लगने के हादसे, सब चलते रहते हैं और आम जनता से लेकर प्रशासन तक सभी इन्हें " बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध ले" कहकर टालते रहते हैं, क़दम उठाए जाते हैं तब जब पटाखा फैक्ट्री में विस्फोट के कारण दो - तीन गरीब महिला या कामगार बच्चे के शरीर के चीथड़े उड़ जाते हैं, जब इ-रिक्शा पलटने से स्कूल जाती हुई बच्ची की लाश उसके घर पहुंचाई जाती है, जब बन्दरों के हमले के कारण मन्दिर से घर आई सुषमा चौहान को असमय काल का ग्रास बनना पड़ता है.

     क्यूँ नहीं विचार किया जाता इन परिस्थितियों पर इनके हादसे में तब्दील होने से पहले, प्रशासन की, सरकारी विभागों की तो छोड़िए वे तो तब ध्यान देंगे जब ऊपर से इन परिस्थितियों के राजनीतिक लाभ लेने के लिए कार्रवाई किए जाने के आदेश होंगे किन्तु बड़ा सवाल यह है कि भुक्त भोगी तो हम "आम जनता" अर्थात "हम भारत के लोग" होते हैं, हम ध्यान क्यूँ नहीं देते?

      बच्चों के साथ होने वाले हादसे रोज अखबारों की सुर्खियों में हैं. कितने ही बच्चे गायब हो रहे हैं, कितने ही बच्चों को दुष्ट लोगों के द्वारा यौन उत्पीड़न का शिकार बनाया जा रहा है. कल ही बागपत में 112 पुलिस वाहन द्वारा दो बच्चों को टक्कर मारने का मामला पब्लिक ऐप पर छाया हुआ है. कस्बा कांधला के मोहल्ला सरावज्ञान में सीता चौक पर एक चौहान डेयरी की दुकान है जहां पिछले कुछ समय से शाम को 3-4 साल से 8-10 साल तक के बच्चों की दूध की बर्नी हाथ में लिए दौड़ भाग किए जाने की भरमार रहती है. बच्चों की लड़ाई होती है, मार पीट भी होती है जिसे बहुत सी बार आने जाने वाले लोगों द्वारा डांट फटकार कर रोका जाता है. आश्चर्यजनक बात यह है कि इतने छोटे बच्चों को रात के अंधेरे में दूध लेने के लिए घर से भेज दिया जाता है और कितना ही अंधेरा हो जाए, किसी का भी कोई ध्यान भी इस ओर नहीं जाता. जो बच्चे खुद को भी ठीक तरह से नहीं सम्भाल सकते उन्हें अंधेरे रास्तों पर दूध दुकान से लेने और घर तक आने के लिए अंधेरी गलियों में दूध भरा हुआ बर्तन लाने की जिम्मेदारी दे दी गई है और कहीं कोई चिंता नहीं, कोई परवाह नहीं, साथ में किसी भी बड़े का कोई संरक्षण नहीं, क्या गारन्टी है कि आज सब कुछ ठीक है तो कल भी सब ठीक रहेगा. दुकान पर आने वाले बड़ी उम्र के किसी भी आदमी औरत को इन बच्चों की सहायता करते हुए नहीं देखा जाता, कोई नहीं कहता कि बेटा /बेटी पहले तुम ले लो. पहले शाम 7 बजे और अब शाम 6 बजे खुलने वाली दूध की दुकान पर इन बच्चों को दूध तब मिलता है जब बड़ी उम्र के ग्राहक दूध लेकर निकल चुके होते हैं और तब तक छोटे छोटे बच्चे अंधेरे में खेलते रहते हैं, लड़ते रहते हैं और कभी कभी चोट खाते रहते हैं. पर किसी का कोई ध्यान नहीं जबकि अभी 7 नवम्बर 2022 से कांधला के ही एक मोहल्ले का 15 साल का लड़का गायब है, पहले भी लगभग 2 साल पहले एक 7-8 साल की लड़की गायब हो चुकी है जिसका आज तक कोई पता नहीं चल पाया है. क्यूँ नहीं विचार करते हम इन सभी खतरों पर, एक आध दिन की मजबूरी अलग बात है कि भेजना पड़ जाए बच्चे को, किन्तु रोज रोज के लिए ऐसा करना गलत लोगों के गलत इरादों को शह देना है. ये सोचना कि आज कुछ नहीं हुआ तो कल भी नहीं होगा, बेवकूफ़ी है. 

       ऐसे में, न केवल प्रशासन बल्कि बच्चों के माता पिता और संरक्षकों को जागरूक होकर ध्यान देना होगा क्योंकि बच्चे तो भोले होते हैं उनके साथ कोई भी हादसा अगर होता है तो उसकी जिम्मेदारी स्वतः ही बड़े पर आ जाएगी. इसलिए बडों को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए इस ओर ध्यान देना ही होगा और बच्चों की कम उम्र को देखते हुए उन्हें इस तरह स्वतंत्र रूप से जिम्मेदारी भरे कार्य में न डाला जाए बल्कि सुरक्षित अह्सास प्रदान कर सही गलत की समझ विकसित कर ही कार्य सौंपा जाए और तब सही तरीके में बाल दिवस मनाया जाए. सभी बालक - बालिकाओं को बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली) 







कैराना की पत्रकारिता का अजीम मंसूरी दौर

Written By Shalini kaushik on सोमवार, 7 नवंबर 2022 | 11:52 am

   


  भारतीय मीडिया इतना पथभ्रष्ट कभी नहीं था, जितना अभी पिछले कुछ सालों से हुआ है. पत्रकारिता और राजनीति एक दूसरे के बहुत महत्वपूर्ण पर्याय रहे हैं , पत्रकारिता ने हमेशा राजनीति की बखिया उधेड कर रख दी हैं, राजनीतिज्ञों की कोई भी योजना रही हो, किसी भी दल की, पत्रकारों की पारखी नजरों से कोई भी राजनीतिक चाल कभी छुपी नहीं रह सकी, यही नहीं भारतीय राजनीति में एक दबदबा कायम रहा है कैराना के राजनीतिज्ञों और पत्रकारों का जिसके कारण कैराना राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर चर्चाओं का मुद्दा रहा है किन्तु ये सब तथ्य अब पुराने पड़ चुके हैं, अब राजनीति का जो स्वरूप सामने है वह चापलूसी को ऊपर रखता है और कैराना वह राजनीति के हल्के में स्व बाबू हुकुम सिंह जी और मरहूम मुनव्वर हसन के बाद से अपनी पहचान खोता जा रहा है और पत्रकारिता भटक गई है केवल एक मसखरे अजीम मंसूरी की खबरों में, जो पहले अपने निकाह कराने की दरख्वास्त को लेकर प्रशासन को तंग करता है, फिर बरात ले जाने, निकाह स्थल पर गोदी में ले जाने, फिर दुल्हन बुशरा को घर लाने, उसकी मुँह दिखाई, बुशरा की डिमांड और अब खुशी में चुन्नी ओढ़कर नाचने की खबरों को लेकर चर्चाओं में है और कैराना का मीडिया पूरी कवरेज दे रहा है एक मसखरे की मसखरी चर्चाओं को, कैराना की पत्रकारिता का स्तर इतना नीचे कभी नहीं गिरा होगा कि मात्र चर्चाओं में बने रहने के लिए पत्रकार एक मसखरे का सहारा लें. क्या कैराना अपराधियों के जंजाल से मुक्त हो गया, क्या कैराना की सडकें गड्ढा मुक्त हो गई, क्या डी. के. कॉन्वेंट स्कूल में हादसे का शिकार हुई बेटी अनुष्का को न्याय मिल गया, क्या बन्दरों के हमले में मृत सुषमा चौहान की मृत्यु के कारण से अन्य कैराना वालों को बचाने में प्रशासन ने सफलता प्राप्त कर ली? क्यूँ नहीं ध्यान दे रहे हैं कैराना के पत्रकार अपने जरूरी कर्तव्य पर क्या वास्तव में बिक चुकी है पत्रकारिता और भटक चुके हैं आज के पत्रकार, क्या फिर से किसी जामवंत को आना होगा हनुमान रूपी पत्रकारों को उनकी शक्ति याद दिलाने के लिए. 


    शालिनी कौशिक 

             एडवोकेट 

   कैराना (शामली) 

Founder

Founder
Saleem Khan